रेलवे मंत्री ममता बनर्जी ने अपना बजट प्रस्तुत करते हुए कहा है कि रेलवे ने अपने लिए मिशन 2020 निर्धारित किया है. मिशन 2020 के बारे में बताते हुए उन्होंने तर्क दिया है कि रेलवे का विकास करना है और इस मिशन को पूरा करने के लिए निजी क्षेत्र से निवेश हासिल किया जाएगा.
अपने पिछले बजट में भी ममता बनर्जी ने निजीकरण का संकेत दिया था. उसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए रेलवे बजट की शुरूआत करते हुए ममता बनर्जी ने साफ कहा कि रेलवे ने तीन तरह की योजनाएं तैयार की हैं जिसमें कम अवधि, मध्यम अवधि और लंबी अवधि की योजनाएं हैं. इन योजनाओं को कुछ रेलवे अपने दम पर पूरा करेगा लेकिन कुछ योजनाओं को पूरा करने के लिए निजी क्षेत्र के निवेश की जरूरत होगी. उन्होंने निजी क्षेत्र के निवेश को आमंत्रित करते हुए पीपीपी (पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप) मॉडल को भी लागू करने की घोषणा की है. उन्होंने 2020 तक 25000 किलोमीटर नई रेल लाईन बिछाने की घोषणा की है जिसके लिए भी उन्होंने निजी क्षेत्र से निवेश के रास्ते खोलने की वकालत की है. हालांकि ममता ने रेल विभाग में निजीकरण की किसी संभावना से इंकार किया है
बड़े आश्चर्य की बात है कि पिछले पचास सालों में देश में हर साल रेल नेटवर्क में औसतन 180 रूट किलोमीटर ही जुड़ते रहे हैं। 1960 में कुल रूट किलोमीटर करीब 54,000 था, अब 2010 तक 64,015 किलोमीटर है। यह तथ्य खुद रेल मंत्री ममता बनर्जी ने आज लोकसभा में वित्त वर्ष 2010-11 का रेल बजट पेश करते हुए रखा है। नए वित्त वर्ष के लिए ममता बनर्जी ने 1000 रूट किलोमीटर जोड़ने का लक्ष्य रखा है। उन्होंने न तो मालभाड़े में कोई वृद्धि की है और न ही यात्री किराए में। उल्टे, अनाज और केरोसिन पर मालभाड़ा प्रति वैगन 100 रुपए घटा दिया है। साथ ही एसी किराये पर सर्विस चार्ज घटाकर 20 रुपए और स्लीपर किराए पर सर्विस चार्ज घटाकर 10 रुपए कर दिया है।
नए साल में 80,000 नए वैगन खरीदे जाएंगे। निवेश प्रस्तावों पर तेज फैसले के लिए 100 दिनों के भीतर विशेष टास्क फोर्स बनाई जाएगी। निजी क्षेत्र को मालगाड़ियां चलाने की इजाजत दी जाएगी। दस नए ऑटो एंसिलरी हब बनाए जाएंगे। मोडिफाइड वैगन स्कीम शुरू की जाएगी। 5 नई वैगन फैक्ट्रियां लगाई जाएंगी। रायबरेली कोच फैक्ट्री का काम एक साल में शुरू होगा। यात्रियों को साफ पानी मुहैया कराने के लिए छह बोटलिंग प्लांट लगाए जाएंगे। उन्होंने यह भी बताया कि जुलाई 2009 के रेल बजट में जिन 120 नई ट्रेनों को शुरू करने की घोषणा की गई थी, उनमें से मार्च तक 117 शुरू हो जाएंगी। बाकी तीन गेज परिवर्तन की वजह से नहीं शुरू हो पाएंगी। रेल बजट के प्रस्तावों से सीमेंट, स्टील, लौह अयस्क और फर्टिलाइजर उद्योग को खास फायदा होगा। इससे लाभान्वित होनेवाली चुनिंदा कंपनियां हैं – टेक्समैको वैगन, टीटागढ़. भारत अर्थ मूवर्स और कॉनकोर।
ममता बनर्जी ने कुशल राजनीतिज्ञ की तरह स्पष्ट किया कि रेलवे के किसी विभाग का निजीकरण नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि अगर रेलवे की किसी परियोजना में जिस किसी की जमीन ली जाएगी, उसके परिवार के एक सदस्य को रेलवे नौकरी देगा। रेलवे की भर्ती परीक्षाएं हिंदी व उर्दू के साथ ही क्षेत्रीय भाषाओं में ली जाएंगी। गौर करने की बात है कि ममता बनर्जी ने अपने अंग्रेजी भाषण में कई बार पैराग्राफ के पैराग्राफ हिंदी में बोले। ऊपर से भले लगे कि ममता ने अवाम को रिझानेवाला बजट पेश किया है। लेकिन उन्होंने उद्योग जगत की जरूरतों का भी पूरा ख्याल रखा है।
उनके कुछ अन्य खास प्रस्ताव हैं – आआईटी, आईआईएम और मेडिकल कॉलेजों में मोबाइल ई टिकटिंग की व्यवस्था, जिला व पंचायत स्तर पर रेलवे के टिकट, यात्री सुविधा के लिए 1300 करोड़ रुपए, गरीब परीक्षार्थियों से कोई फीस नहीं, मुंबई में 101 नई उपनगरीय ट्रेनों की शुरूआत, देश में 381 नए डाइग्नोस्टक सेंटर खोले जाएंगे। ममता ने अपने भाषण की शुरुआत में ही कह दिया था कि उनके लिए व्यावसायिक व्यवहार्यता से ज्यादा सामाजिक उत्तरदायित्व मायने रखता है। उनका एक वाक्य अंत में – अभी तो शुरुआत है, सफर बहुत लंबा है।
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ममता बनर्जी ने बजट प्रस्तुत करते हुए कहा कि एक बिजनेस माडल बनाने की जरूरत है उनकी जिम्मेदारी है कि वे इस दिशा में पहल करें. उन्होंने कहा कि अगर रेलवे की महात्वाकांक्षी योजनाओं को पूरा करना है तो निजी क्षेत्र की मदद लेना जरूरी है. इसके लिए उन्होंने एक टास्क फोर्स बनाने और प्रधानंत्री से बात करने की बात भी कही है. रेल मंत्री ने साफ कहा कि सफर लंबा है, यह तो अभी शुरूआत है.
रेलमंत्री ममता बनर्जी ने सात महीने पहले अपने बजटीय घोषणाओं में सिर्फ डाकघर से आरक्षण की योजना के न पूरा हो पाने की सूचना दी. उन्होंने कहा कि पिछले रेल बजट में उन्होंने 120 नई ट्रेने शुरू करने की घोषणा की थी जिसमें से 117 ट्रेने मार्च 2010 तक शुरू हो जाएंगी. उन्होंने कहा कि ट्रेन यात्रियों को सस्ता और साफ पानी उपलब्ध कराने के लिए छह नये बाटलिंग प्लांट शुरू कर दिये गये हैं. इसके साथ ही उन्होंने कहा कि ट्रेनों में जनता आहार योजना को सुचारू रूप से शुरू कर दिया गया है.
ममता बनर्जी के बजट भाषण के दौरान लगातार उन पर पश्चिम बंगाल का पक्षधर होने का आरोप लगता रहा और वे बीच बीच में इन आरोपों का खण्डन भी करती रहीं.
प्रमुख घोषणाएं-
1. आरपीएफ के नये जवानों की भर्ती
2. 5 खेल अकादमी के गठन की घोषणा- दिल्ली, चेन्नई, सिकंदराबाद, कोलकाता, मुंबई
3. कामनवेल्थ गेम्स के लिए विशेष ट्रेने चलाई जाएंगी
4. 2010-11 रविन्द्र म्यूजियम बनाने की घोषणा
5. शहरी विकास मंत्रालय के साथ मिलकर 10 साल के अंदर रेलवे के सभी 14 लाख कर्मचारियों के िलए घर बनाने की घोषणा.
6. कर्मचारियों के लिए 386 जांच केन्द्र और 101 मध्यम दर्जे के अस्पताल खोले जाएंगे
7. रेलवे की 80 हजार महिला कर्मचारियों के िलए विशेष योजनाओं का ऐलान
8. वेन्डर्स, हॉकर्स के लिए योजनाएं
9. खड़गपुर में लोकोवर्कशाप बनाने की घोषणा
10. जबलपुर, कोटा, खडगपुर में ट्रैक ट्रेनिंग सेन्टर बनाया जाएगा
11. रायबरेली कोच फैक्टरी एक साल में शुरू की जाएगी.
12. मधेपुरा और मरवाना में भी कोच फैक्टरी बनाई जाएगी.
13. इन्टेग्रिट कोच फैक्टरी का नवीनीकरण किया जाएगा और दूसरी यूनिट शुरू होगी
14. अमरावती में कोच रिपेयर फैक्टरी शुरू की जाएगी.
15. बंगलौर में डिजाइन और डेवलपमेन्ट सेन्टर बनाया जाएगा
16. पर्यावरण के प्रति संवेदनशील होते हुए रेलवे 10 इको पार्क बनेंगे. हर ट्रेन में कम से कम 10 बोगी में ग्रीन टायलेट होंगे.
17. वेस्टर्न डेडीकेटेड फ्रेट कारिडोर के लिए अगले महीने समहमति पत्र पर हस्ताक्षर. जमीन का अधिग्रहण शुरू किया जाएगा. इसके लिए आम आदमी की सहमति से सहमति लेकर जमीन ली जाएगी और जिसकी जमीन ली जाएगी उसके परिवार के एक सदस्य को नौकरी दी जाएगी.
18. नार्थ-साउथ, ईस्ट-वेस्ट, साउथ-साउथ कारीडोर बनाने की घोषणा
19. डेडीकेटेड पैसेन्जर रेल कारीडोर बनाने की घोषणा
20. नेशनल हाईस्पीड रेल अथारिटी का गठन
21. माल ढुलाई में आठ मिट्रीक टन की बढ़ोत्तरी
22. टनकपुर से बागेश्वर के बीच नयी रेल लाईन
23. भारत-बांग्लादेश के बीच नयी ट्रेन
24. 1000 किलोमीटर ट्रैक का विद्युतीकरण किया जाएगा.
25. मानवरहित 13 हजार फाटकों पर तैनात होंगे गार्ड
26. मुंबई लोकल में 101 ट्रेनों का इजाफा
27. कैंसर रोगियों को एसी थ्री टीयर में मुफ्त रेल यात्रा की सुविधा
28. जन्मभूमि, कर्मभूमि और मातृभूमि नाम से नयी ट्रेन सेवाओं को शुरू किया जाएगा.
29. ई-टिकट सरचार्ज में कटौती. 40 की बजाय अब 20 रुपये सरचार्ज
30. कोलकाता मेट्रो का विस्तार किया जाएगा
31. आनेवाले वित्तीय वर्ष में कुल 56 नई ट्रेने चलाई जाएंगी.
Wednesday, February 24, 2010
Tuesday, February 23, 2010
स्वास्थ्य विभाग में करोड़ों का गोलमाल
अशोक शर्मा को बचाने की कवायद ?
स्वास्थ्य विभाग में फिर करोड़ों का गोलमाल हुआ है. और इस बार सभी आरोप वर्त्तमान स्वास्थ्य संचालक डॉ. अशोक शर्मा पर लगाये जा रहे हैं. इन घोटालों की शिकायत लोकायुक्त में भी पहुँच चुकी है. और जांच भी चल रही है. डॉ. अशोक शर्मा पर आरोप है कि उन्होंने विज्ञापन प्रसारण, बैनर मुद्रण, विज्ञापन निर्माण, पल्स पोलियो अभियान, तथा दवा खरीदी में जमकर भ्रष्टाचार किया है. यह भ्रष्टाचार उचित मूल्य से अधिक कीमत पर आवश्यकता से अधिक खरीदी कर किया गया है. साथ ही इस खरीदी में क्रय नियमों की भी अनदेखी की गई है. ताकि उन फर्मो को भी सीधा लाभ पहुंचाया जा सके जिनसे दवा, उपकरण तथा अन्य सामग्री खरीदी जानी थी. हालाकि संयुक्त संचालक एवं प्रभारी संचालक स्वास्थ्य के दो वर्ष के कार्यकाल के भ्रष्टाचार के सम्बन्ध में संचालनालय कोष तथा लेखा के द्वारा अपनी अंकेक्षण रिपोर्ट प्रस्तुत करने के बाद भी डॉ. अशोक शर्मा के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की जा रही है. खबरें तो यह भी हैं कि डॉ. अशोक शर्मा को बचाने के लिए विभाग के अन्य अधिकारीयों ने रिपोर्ट गायब करवा दी है.
आइएएस अरविन्द जोशी और उनकी पत्नी टीनू जोशी के यहाँ आयकर विभाग के छापे के बाद करोड़ों रुपये की बेनामी सम्पत्ती जाप्त की गई थी. छापे की कार्यवाही में ३००० करोड रुपये नकद जाप्त किये गए. आयकर विभाग को इन नोटों को गिनने के लिए मशीन तक लगानी पडी थी. और अभी जहां एक और इस मामले में जांच अभी चल ही रही है. उधर स्वास्थ्य विभाग में एक और घोटाला उजागर हुआ है. और स्वास्थ्य संचालक डॉ. अशोक शर्मा संदेह के घेरे में हैं. इससे पूर्व भी स्वास्थ्य विभाग में करोड़ों का घपला हुआ था. उस वक्त स्वास्थ्य संचालक डॉ. योगीराज शर्मा थे. जिन्हें अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त कर दिया था. हालाकिं उनकी बर्ख्स्तागी के बाद कोर्ट से उन्होंने अपनी नियुक्ति वापस ले ली थी. लेकिन तत्कालीन स्वास्थ्य संचालक डॉ. योगीराज शर्मा इन दिनों फिर सुर्ख़ियों में है. वह इसीलिये कि पिछले घोटाले की जांच के दौरान उन्हें फिर से निलंबित कर दिया गया है. उनके निलंबन के पीछे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की भ्रष्टाचार के खिलाफ छेड़ी गई मुहिम माना जा रहा है. लेकिन वर्त्तमान स्वास्थ्य संचालक डॉ अशोक शर्मा के मामले में सरकार की चुप्पी पर भी कई सवालिया निशान लग रहे हैं?
कहाँ कहाँ घपला :-
संचालनालय कोष एवम लेखा के अंकेक्षण रिपोर्ट के मुताबिक ०१.०१.२००४ से २८.०२.२००५ तक राष्ट्रीय पल्स पोलियो टीकाकरण अभियान के अंतर्गत ४५ जिलों को ३,५३,२२,०४० रूपये आरसीएच के माध्यम से उपलब्ध करवाए गए. जो कि सम्बंधित जिलों के सीएमएचओ द्वारा व्यय की जानी थी. तथा संबधित व्यय का उपयोगिता प्रमाण पत्र लेना चाहिए था. लेकिन ४५ जिलों में कुल ३,५३,२२,०४० रु में से २,६५,८५,६९० रु खर्च हुए तथा ७,४६,६५९ रुपये संचालनालय को वापस प्राप्त हुए लेकिन संचालनालय ने सीएमएचओ से यह नहीं पूछा कि कितनी राशि कहाँ व्यय हुई.
कार्यालय के अभिलेखों के परिक्षण में पाया गया कि पल्स पोलियो अभियान के विज्ञापन प्रसारण आल इंडिया रेडियो में स्मृति फिल्म्स भोपाल से कराये गए. जिसके लिए कोई टेंडर प्रक्रिया नहीं की गई. जबकि स्मृति फिल्म्स भोपाल की दरों को क्रय समिति ने अनुमोदित नहीं किया था. साथ ही विज्ञापन प्रसारण देय राशि का सत्यापन भी नहीं किया गया. अंकेक्षण रिपोर्ट के मुताबिक विज्ञापन प्रसारण में लगभग २२,८८,२८६ रु अनियमित खर्च होना पाया गया है. इसके अलावा दूरदर्शन पर विज्ञापन प्रसारण के लिए प्रतिदिन ७५ प्रसारण का आदेश दिया गया था लेकिन प्रतिदिन ४५० सेकेण्ड का भुगतान किया गया. साथ ही कुल ८१० सेकेण्ड का प्रसारण किया जाना था लेकिन भुगतान ३३२० सेकेण्ड का किया गया. इस प्रकार १३,२८००० रुपये का भुगतान बिना कार्य के किया गया. ऑडियो केसेट्स निर्माण में २,२०,४०० का ज़्यादा भुगतान करते हुए एडजस्टमेंट कर दिया गया. केबल नेटवर्क पर ८,२०,००० का फर्जी भुगतान किया गया. होर्डिंग की न्यूनतम दरें २८७५ रु प्रतिमाह निर्धारित थीं लेकिन २९१७ रु प्रतिमाह की दर पर होर्डिंग लगाने के आदेश देकर १२,९२००० रुपये के वारे न्यारे कर दिए गए.
राष्ट्रीय पल्स पोलियो टीकाकरण अभियान के बैनर मुद्रण में १,३५,०६,८०० रुपये अनियमित व्यय किये गए. अंकेक्षण रिपोर्ट के मुताबिक ५०००० रुपये के बैनर जिलों में बांटे जाने के आदेश थे. लेकिन ५७६२० रु के बैनर बांटे गए यानि ७६२० रु अधिक काटे गए. इतना ही नहीं बैनर का मुद्रण मेसर्स विनायक क्रियेशन भोपाल से बिना टेंडर जारी किये ही करवा लिया गया.
संचालनालय कोष एवम लेखा के अंकेक्षण रिपोर्ट में दवा एवम अन्य सामग्री खरीदी में १० करोड रुपये बिना अनुमोदन कर सीधे भुगतान किया गया. साथ ही महामारी के नाम पर ४ करोड रु का घोटाला भी किया गया. महामारी के नाम पर लगभग ४ करोड रु की फिनाइल और ब्लीचिंग पाउडर खरीद ली गई. खरीदी में क्रय समिति का अनुमोदन लिया गया और न ही क्रय समिति से आवश्यकता का आंकलन कराया गया. इसके स्थान पर संचालक स्वास्थ्य सेवायें डॉ. अशोक शर्मा ने खुद ही आवश्यकता का आंकलन कर खरीदी कर ली. जो कि नियम विरुद्ध है. फिनाइल खरीदी में जमकर घोटाला किया गया है, इसका सीधा अंदाज़ा इसी बात से ही लगाया जा सकता है कि डी.जी.एच.एस. भारत शासन द्वारा जारी निर्देशों में महामारी में लगने वाली दवाइयों की सूची में फिनाइल शामिल नहीं है फिर कैसे महामारी के नाम पर फिनाइल खरीद ली ? यह एक अहम सवाल है.
बहरहाल आये दिन स्वास्थ्य विभाग में नए नए घोटाले सामने आते हैं. और सरकार मूक दर्शक बनी देखती रहती हैं. मामला जांच की पेचीदिगियों में उलझ जाता है. और कुछ समय बाद दोषी दोषमुक्त हो जाता है. अपुष्ट सूत्रों की माने तो स्वास्थ्य विभाग के संचालक के पास लगभग २०० करोड रु. की बेनामी संपत्ति है. जो कई सवालों को जन्म देता है. हालाकि स्वास्थ्य विभाग समेत अलग अलग विभागों में हो रहे घोटालों की गूँज विधानसभा में भी समय समय पर उठती रही है. लेकिन मध्यप्रदेश सरकार द्वारा भ्रष्टाचार जैसे संगीन मामलों में बिहार सरकार से सीख लेकर कोई कडा क़ानून बनाकर भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के कोई प्रयास न करना भी कई सवालों को जन्म देता है. समय रहते यदि सख्त से सख्त कार्यवाही नहीं की गई तो पूर्व स्वास्थ्य संचालक डॉ. योगीराज शर्मा की तरह वर्त्तमान स्वास्थ्य संचालक डॉ. अशोक शर्मा का मामला भी काफी बड़े स्तर तक जा सकता है. इस मामले में उनके साथ कई बड़ी मछलियाँ भी इस घोटाले में शामिल होंगी इस संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता. आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि जांच के बाद दोषी पाए जाने पर स्वास्थ्य संचालक के खिलाफ क्या कार्यवाही होती है ?
क्या सरकार करेगी डॉ अशोक शर्मा का निलंबन ?
सूत्रों कि माने तो आयकर विभाग ने आय ए एस राजेश राजोरा व डॉ अशोक शर्मा के बारे में एक रिपोर्ट राज्य शासन को भेजी है जिसमें छापे के दौरान इन अधिकारीयों से क्या संपत्ति बरामद हुई है इसका खुलासा होगा रिपोर्ट के आधार पर राज्य शासन आगे की कार्यवाही को अंजाम दे सकता है. स्वास्थ्य विभाग में ऐसी कई बड़ी मछलियाँ हैं जिन पर अनुशासनात्मक कार्यवाही की तलवार लटक रही है ? बड़ा सवाल यह भी है कि किस नेता या अधिकारी की शह पर इन पर कार्यवाही नहीं की जा सकी?
स्वास्थ्य विभाग में फिर करोड़ों का गोलमाल हुआ है. और इस बार सभी आरोप वर्त्तमान स्वास्थ्य संचालक डॉ. अशोक शर्मा पर लगाये जा रहे हैं. इन घोटालों की शिकायत लोकायुक्त में भी पहुँच चुकी है. और जांच भी चल रही है. डॉ. अशोक शर्मा पर आरोप है कि उन्होंने विज्ञापन प्रसारण, बैनर मुद्रण, विज्ञापन निर्माण, पल्स पोलियो अभियान, तथा दवा खरीदी में जमकर भ्रष्टाचार किया है. यह भ्रष्टाचार उचित मूल्य से अधिक कीमत पर आवश्यकता से अधिक खरीदी कर किया गया है. साथ ही इस खरीदी में क्रय नियमों की भी अनदेखी की गई है. ताकि उन फर्मो को भी सीधा लाभ पहुंचाया जा सके जिनसे दवा, उपकरण तथा अन्य सामग्री खरीदी जानी थी. हालाकि संयुक्त संचालक एवं प्रभारी संचालक स्वास्थ्य के दो वर्ष के कार्यकाल के भ्रष्टाचार के सम्बन्ध में संचालनालय कोष तथा लेखा के द्वारा अपनी अंकेक्षण रिपोर्ट प्रस्तुत करने के बाद भी डॉ. अशोक शर्मा के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की जा रही है. खबरें तो यह भी हैं कि डॉ. अशोक शर्मा को बचाने के लिए विभाग के अन्य अधिकारीयों ने रिपोर्ट गायब करवा दी है.
आइएएस अरविन्द जोशी और उनकी पत्नी टीनू जोशी के यहाँ आयकर विभाग के छापे के बाद करोड़ों रुपये की बेनामी सम्पत्ती जाप्त की गई थी. छापे की कार्यवाही में ३००० करोड रुपये नकद जाप्त किये गए. आयकर विभाग को इन नोटों को गिनने के लिए मशीन तक लगानी पडी थी. और अभी जहां एक और इस मामले में जांच अभी चल ही रही है. उधर स्वास्थ्य विभाग में एक और घोटाला उजागर हुआ है. और स्वास्थ्य संचालक डॉ. अशोक शर्मा संदेह के घेरे में हैं. इससे पूर्व भी स्वास्थ्य विभाग में करोड़ों का घपला हुआ था. उस वक्त स्वास्थ्य संचालक डॉ. योगीराज शर्मा थे. जिन्हें अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त कर दिया था. हालाकिं उनकी बर्ख्स्तागी के बाद कोर्ट से उन्होंने अपनी नियुक्ति वापस ले ली थी. लेकिन तत्कालीन स्वास्थ्य संचालक डॉ. योगीराज शर्मा इन दिनों फिर सुर्ख़ियों में है. वह इसीलिये कि पिछले घोटाले की जांच के दौरान उन्हें फिर से निलंबित कर दिया गया है. उनके निलंबन के पीछे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की भ्रष्टाचार के खिलाफ छेड़ी गई मुहिम माना जा रहा है. लेकिन वर्त्तमान स्वास्थ्य संचालक डॉ अशोक शर्मा के मामले में सरकार की चुप्पी पर भी कई सवालिया निशान लग रहे हैं?
कहाँ कहाँ घपला :-
संचालनालय कोष एवम लेखा के अंकेक्षण रिपोर्ट के मुताबिक ०१.०१.२००४ से २८.०२.२००५ तक राष्ट्रीय पल्स पोलियो टीकाकरण अभियान के अंतर्गत ४५ जिलों को ३,५३,२२,०४० रूपये आरसीएच के माध्यम से उपलब्ध करवाए गए. जो कि सम्बंधित जिलों के सीएमएचओ द्वारा व्यय की जानी थी. तथा संबधित व्यय का उपयोगिता प्रमाण पत्र लेना चाहिए था. लेकिन ४५ जिलों में कुल ३,५३,२२,०४० रु में से २,६५,८५,६९० रु खर्च हुए तथा ७,४६,६५९ रुपये संचालनालय को वापस प्राप्त हुए लेकिन संचालनालय ने सीएमएचओ से यह नहीं पूछा कि कितनी राशि कहाँ व्यय हुई.
कार्यालय के अभिलेखों के परिक्षण में पाया गया कि पल्स पोलियो अभियान के विज्ञापन प्रसारण आल इंडिया रेडियो में स्मृति फिल्म्स भोपाल से कराये गए. जिसके लिए कोई टेंडर प्रक्रिया नहीं की गई. जबकि स्मृति फिल्म्स भोपाल की दरों को क्रय समिति ने अनुमोदित नहीं किया था. साथ ही विज्ञापन प्रसारण देय राशि का सत्यापन भी नहीं किया गया. अंकेक्षण रिपोर्ट के मुताबिक विज्ञापन प्रसारण में लगभग २२,८८,२८६ रु अनियमित खर्च होना पाया गया है. इसके अलावा दूरदर्शन पर विज्ञापन प्रसारण के लिए प्रतिदिन ७५ प्रसारण का आदेश दिया गया था लेकिन प्रतिदिन ४५० सेकेण्ड का भुगतान किया गया. साथ ही कुल ८१० सेकेण्ड का प्रसारण किया जाना था लेकिन भुगतान ३३२० सेकेण्ड का किया गया. इस प्रकार १३,२८००० रुपये का भुगतान बिना कार्य के किया गया. ऑडियो केसेट्स निर्माण में २,२०,४०० का ज़्यादा भुगतान करते हुए एडजस्टमेंट कर दिया गया. केबल नेटवर्क पर ८,२०,००० का फर्जी भुगतान किया गया. होर्डिंग की न्यूनतम दरें २८७५ रु प्रतिमाह निर्धारित थीं लेकिन २९१७ रु प्रतिमाह की दर पर होर्डिंग लगाने के आदेश देकर १२,९२००० रुपये के वारे न्यारे कर दिए गए.
राष्ट्रीय पल्स पोलियो टीकाकरण अभियान के बैनर मुद्रण में १,३५,०६,८०० रुपये अनियमित व्यय किये गए. अंकेक्षण रिपोर्ट के मुताबिक ५०००० रुपये के बैनर जिलों में बांटे जाने के आदेश थे. लेकिन ५७६२० रु के बैनर बांटे गए यानि ७६२० रु अधिक काटे गए. इतना ही नहीं बैनर का मुद्रण मेसर्स विनायक क्रियेशन भोपाल से बिना टेंडर जारी किये ही करवा लिया गया.
संचालनालय कोष एवम लेखा के अंकेक्षण रिपोर्ट में दवा एवम अन्य सामग्री खरीदी में १० करोड रुपये बिना अनुमोदन कर सीधे भुगतान किया गया. साथ ही महामारी के नाम पर ४ करोड रु का घोटाला भी किया गया. महामारी के नाम पर लगभग ४ करोड रु की फिनाइल और ब्लीचिंग पाउडर खरीद ली गई. खरीदी में क्रय समिति का अनुमोदन लिया गया और न ही क्रय समिति से आवश्यकता का आंकलन कराया गया. इसके स्थान पर संचालक स्वास्थ्य सेवायें डॉ. अशोक शर्मा ने खुद ही आवश्यकता का आंकलन कर खरीदी कर ली. जो कि नियम विरुद्ध है. फिनाइल खरीदी में जमकर घोटाला किया गया है, इसका सीधा अंदाज़ा इसी बात से ही लगाया जा सकता है कि डी.जी.एच.एस. भारत शासन द्वारा जारी निर्देशों में महामारी में लगने वाली दवाइयों की सूची में फिनाइल शामिल नहीं है फिर कैसे महामारी के नाम पर फिनाइल खरीद ली ? यह एक अहम सवाल है.
बहरहाल आये दिन स्वास्थ्य विभाग में नए नए घोटाले सामने आते हैं. और सरकार मूक दर्शक बनी देखती रहती हैं. मामला जांच की पेचीदिगियों में उलझ जाता है. और कुछ समय बाद दोषी दोषमुक्त हो जाता है. अपुष्ट सूत्रों की माने तो स्वास्थ्य विभाग के संचालक के पास लगभग २०० करोड रु. की बेनामी संपत्ति है. जो कई सवालों को जन्म देता है. हालाकि स्वास्थ्य विभाग समेत अलग अलग विभागों में हो रहे घोटालों की गूँज विधानसभा में भी समय समय पर उठती रही है. लेकिन मध्यप्रदेश सरकार द्वारा भ्रष्टाचार जैसे संगीन मामलों में बिहार सरकार से सीख लेकर कोई कडा क़ानून बनाकर भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के कोई प्रयास न करना भी कई सवालों को जन्म देता है. समय रहते यदि सख्त से सख्त कार्यवाही नहीं की गई तो पूर्व स्वास्थ्य संचालक डॉ. योगीराज शर्मा की तरह वर्त्तमान स्वास्थ्य संचालक डॉ. अशोक शर्मा का मामला भी काफी बड़े स्तर तक जा सकता है. इस मामले में उनके साथ कई बड़ी मछलियाँ भी इस घोटाले में शामिल होंगी इस संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता. आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि जांच के बाद दोषी पाए जाने पर स्वास्थ्य संचालक के खिलाफ क्या कार्यवाही होती है ?
क्या सरकार करेगी डॉ अशोक शर्मा का निलंबन ?
सूत्रों कि माने तो आयकर विभाग ने आय ए एस राजेश राजोरा व डॉ अशोक शर्मा के बारे में एक रिपोर्ट राज्य शासन को भेजी है जिसमें छापे के दौरान इन अधिकारीयों से क्या संपत्ति बरामद हुई है इसका खुलासा होगा रिपोर्ट के आधार पर राज्य शासन आगे की कार्यवाही को अंजाम दे सकता है. स्वास्थ्य विभाग में ऐसी कई बड़ी मछलियाँ हैं जिन पर अनुशासनात्मक कार्यवाही की तलवार लटक रही है ? बड़ा सवाल यह भी है कि किस नेता या अधिकारी की शह पर इन पर कार्यवाही नहीं की जा सकी?
गांधी बनने की जुगत में बाबा
योग गुरू बाबा रामदेव के कदम ताल को देखकर यह माना जा सकता है कि वे आजादी के उपरान्त महात्मा गांधी की छवि को अपने अन्दर सिमटाना चाह रहे हैं। चाहे देश आजाद हुआ हो तब या वर्तमान परिदृश्य हो, राजनीति की धुरी गांधी के इर्द गिर्द ही सिमटी रही है। तब मोहन दास करमचन्द गांधी बिना किसी पद पर रहते हुए राजनीति के केन्द्र थे तो आज कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी के हाथों राजकाज की कमान है। लगता है बाबा रामदेव चाहते हैं कि वे सोनिया गांधी की तरह ही सबसे शक्तिशाली बने रहें और सक्रिय राजनीति में न रहें। बाबा रामदेव यह भूल जाते हैं कि आदि अनादी काल से राजकाज में सहयोग का काम राजगुरूओं का होता रहा है न कि कथित योग गुरू का। न तो बाबा रामदेव राजगुरू हैं और न ही वे धर्म गुरू। रही बात अपने आप को सबसे श्रेष्ठ समझने की तो शंकराचार्य के बारे में टिप्पणी करने के उपरान्त उन्हें माफी भी मांगनी पडी थी यह बात किसी से छिपी नहीं है।
देश में कथित अध्यात्म गुरू, ज्योतिषविद, प्रवचनकर्ताओं आदि की कमी किसी भी दृष्टिकोण से नहीं है। इन सबके बीच धु्रव तारा बनकर उभरे योग गुरू बाबा रामदेव बडे ही सधे कदमों से चल रहे हैं। एक परिपक्व राजनेता के मानिन्द पहले उन्होंने देश के बीमारों को स्वस्थ्य बनाने का बीडा उठाया। देश के प्राचीन अर्वाचीन योग को एक नई पेकिंग में बाजार में लांच किया, फिर समाचार और दूसरे चेनल्स के माध्यम से घरों घर में अपनी आमद दी। अब जबकि उनके अनुयायियों की खासी तादाद हो गई है, तब उन्होंने लोहा गरम देख राजनीति में आने का हथौडा जड दिया है।
पिछले चन्द दिनों से बाबा रामदेव के मुंह से योग के माध्यम से लोगों को स्वस्थ्य बनाने के बजाए राजनीति में आने की महात्वाकांक्षाएं ज्यादा कुलांचे मारती प्रतीत हो रहीं हैं। बाबा के मुंह से निकली यह बात किसी को भी आश्चर्यजनक इसलिए नहीं लग रही होगी क्योंकि बाबा रामदेव ने बहुत ही करीने से सबसे पहले अपने आप को महिमा मण्डित करवाया फिर अपनी इस महात्वाकांक्षा को जनता पर थोपा है।
बाबा रामदेव का कहना है कि अब राजनीति नहीं वरन योग नीति का वक्त आ गया है। स्वयंभू योगाचार्य बाबा रामदेव ने देश में केंसर की तरह फैल चुके भ्रष्टाचार को योगनीति के माध्यम से दुरूस्त करने का मानस बनाया है। बाबा ने बहुत सोच समझकर गरीब और अविकसित भारत देश में भ्रष्टाचार के साथ ही साथ विदेशों में फैले भारत के काले धन को भारत लाने का कौल उठाया है। बाबा का कहना है कि देश में अनेक प्रकार के अपराधों के लिए तरह तरह के कानून बने हैं, लेकिन भ्रष्टाचारियों पर अंकुश लगाने के लिए एक भी कठोर कानून नहीं है। बाबा यह भूल जाते हैं कि भ्रष्टाचार करते पकडे जाने पर न जाने कितने जनसेवक जेल की हवा भी खा चुके हैं।
बाबा का कहना सही है कि जनता की गाढी कमाई पर एश करने वालों के लिए सिर्फ और सिर्फ मृत्युदण्ड का प्रावधान होना चाहिए। बाबा के इस कथन से सत्तर के दशक में आई उस समय के सुपर डुपर स्टार राजेश खन्ना और मुमताज अभिनीत चलचित्र ``रोटी`` का ``यार हमारी बात सुनो, एसा एक इंसान चुनो जिसने पाप न किया हो जो पापी न हो. . . `` की याद ताजा हो जाती है। बाबा रामदेव देश के अनेक शहरों में अपने योग शिविर की दुकानें लगा चुके हैं इस हिसाब से वे भली भान्ति जानते होंगे कि देश में गरीब गुरबे किस तरह रहते हैं। यह बात भी उतनी ही सच है जितना कि दिन और रात कि बाबा के पास वर्तमान में अकूत दौलत का भण्डार है। बाबा अगर चाहें तो गरीब गुरबों के लिए एकदम निशुक्ल योग शिविर और चिकित्सा शिविर लगाकर दवाएं बांट सकते हैं। वस्तुत: बाबा रामदेव एसा नहीं कर रहे हैं, क्योंकि यह भी जानते हैं कि राजनेताओं का काम सिर्फ भाषण देना है, उसे अमली जामा पहनाना नहीं।
बाबा रामदेव के एजेण्डे में तीसरा तथ्य यह उभरकर सामने आया है कि उन्होंने ``हिन्दी की चिन्दी`` पर अफसोस जाहिर किया है। बाबा का कहना है कि आजादी के इतने समय बाद भी हम ब्रितानी मानसिकता के गुलाम हैं। आज भी न्यायालयों में हिन्दी के बजाए अंग्रेजी का ही बोल बाला है। बाबा रामदेव के इस कथन से हम पूरा इत्तेफाक रखते हैं, पर सवाल यह है कि समूची ब्यूरोक्रेसी में ही अंग्रेजी का बोलबाजा है, बाबा रामदेव बहुत चतुर खिलाडी हैं, वे अगर नौकरशाहों पर वार करते तो वे देश पर राज करने का जो रोडमेप तैयार कर रहे हैं उसके मार्ग में शूल ही शूल बिछा दिए जाते, यही कारण है कि बाबा रामदेव नौकरशाहों पर परोक्ष तौर पर निशाना साध रहे हैं।
हमारा अपना मानना है कि बाबा रामदेव पूरी तरह मुगालते में हैं। हमने अपने पिछले आलेखों ``राष्ट्रधर्म की राह पर बाबा रामदेव`` और ``बाबा रामदेव का राष्ट्रधर्म`` में बाबा रामदेव की भविष्य की राजनैतिक बिसात के बारे में इशारा किया था। उस दौरान बाबा रामदेव के अंधे भक्तों ने तरह तरह की प्रतिक्रियाएं व्यक्त की थीं। राजनेताओं को कोसना बहुत आसान है। जनसेवकों की मोटी खाल पर इसका कोई असर नहीं होता है। बाबा रामदेव ने भी जनसेवकों को पानी पी पी कर कोसा है। रामदेव यह भूल जाते हैं कि जैसे ही बाबा रामदेव उनकी कुर्सी हथियाने का साक्षात प्रयास करेंगे वैसे ही ये सारे राजनेता एक सुर में तान छेड देंगे और फिर आने वाले समय में बाबा रामदेव को अपनी योग की दुकान भी समेटना पड सकता है।
बाबा रामदेव के पास अकूत दौलत है। यह दौलत उन्होंने पिछले लगभग डेढ दशक में ही एकत्र की है। मीडिया की ताकत से बाबा रामदेव भली भान्ति परिचित हो चुके हैं। मीडिया चाहे तो किसी को फर्श से उठाकर अर्श पर तो किसी को आसमान से जमीन पर उतार सकता है। आने वाले समय में बाबा रामदेव अगर कोई समाचार चेनल खोल लें तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए, साथ ही प्रिंट की दुनिया में भी बाबा रामदेव उतर सकते हैं। हमें यह कहने मेें कोई संकोच नहीं कि मीडिया के ग्लेमर को देखकर इस क्षेत्र में उतरे लोग सरेआम अपनी कलम का सौदा कर रहे हैं। मीडिया को प्रजातन्त्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। प्रजातन्त्र के तीन स्तंभ तो गफलत, भ्रष्टाचार, अनैतिकता के दलदल में समा चुके हैं। लोगों की निगाहें अब मीडिया पर ही हैं, और मीडिया ही अगर अंधकार के रास्ते पर निकल गया तो भारत में प्रजातन्त्र के बजाए हिटलर राज आने में समय नहीं लगेगा।
बहरहाल बाबा के एक के बाद एक सधे हुए कदम से साफ जाहिर होने लगा है कि बाबा रामदेव के मन मस्तिष्क में देश पर राज करने की इच्छा बहुत पहले से ही थी। उन्होंने योग का माध्यम चुना और पहले लोगों को इसका चस्का लगाया। जब लोग योग के आदी हो गए तो योग गुरू ने अपना असली कार्ड खोल दिया। भारत स्वाभिमान ट्रस्ट की स्थापन के पीछे यही उद्देश्य प्रतीत हो रहा है। अब बाबा रामदेव ने इसके कार्यकर्ताओं से ज्यादा से ज्यादा सदस्य बनाने का आव्हान कर डाला है। बाबा के कदमों को देखकर यही कहा जा सकता है कि ``योग तो एक बहाना था, बाबा रामदेव का असल मकसद तो राजनीति में आना था।``
देश में कथित अध्यात्म गुरू, ज्योतिषविद, प्रवचनकर्ताओं आदि की कमी किसी भी दृष्टिकोण से नहीं है। इन सबके बीच धु्रव तारा बनकर उभरे योग गुरू बाबा रामदेव बडे ही सधे कदमों से चल रहे हैं। एक परिपक्व राजनेता के मानिन्द पहले उन्होंने देश के बीमारों को स्वस्थ्य बनाने का बीडा उठाया। देश के प्राचीन अर्वाचीन योग को एक नई पेकिंग में बाजार में लांच किया, फिर समाचार और दूसरे चेनल्स के माध्यम से घरों घर में अपनी आमद दी। अब जबकि उनके अनुयायियों की खासी तादाद हो गई है, तब उन्होंने लोहा गरम देख राजनीति में आने का हथौडा जड दिया है।
पिछले चन्द दिनों से बाबा रामदेव के मुंह से योग के माध्यम से लोगों को स्वस्थ्य बनाने के बजाए राजनीति में आने की महात्वाकांक्षाएं ज्यादा कुलांचे मारती प्रतीत हो रहीं हैं। बाबा के मुंह से निकली यह बात किसी को भी आश्चर्यजनक इसलिए नहीं लग रही होगी क्योंकि बाबा रामदेव ने बहुत ही करीने से सबसे पहले अपने आप को महिमा मण्डित करवाया फिर अपनी इस महात्वाकांक्षा को जनता पर थोपा है।
बाबा रामदेव का कहना है कि अब राजनीति नहीं वरन योग नीति का वक्त आ गया है। स्वयंभू योगाचार्य बाबा रामदेव ने देश में केंसर की तरह फैल चुके भ्रष्टाचार को योगनीति के माध्यम से दुरूस्त करने का मानस बनाया है। बाबा ने बहुत सोच समझकर गरीब और अविकसित भारत देश में भ्रष्टाचार के साथ ही साथ विदेशों में फैले भारत के काले धन को भारत लाने का कौल उठाया है। बाबा का कहना है कि देश में अनेक प्रकार के अपराधों के लिए तरह तरह के कानून बने हैं, लेकिन भ्रष्टाचारियों पर अंकुश लगाने के लिए एक भी कठोर कानून नहीं है। बाबा यह भूल जाते हैं कि भ्रष्टाचार करते पकडे जाने पर न जाने कितने जनसेवक जेल की हवा भी खा चुके हैं।
बाबा का कहना सही है कि जनता की गाढी कमाई पर एश करने वालों के लिए सिर्फ और सिर्फ मृत्युदण्ड का प्रावधान होना चाहिए। बाबा के इस कथन से सत्तर के दशक में आई उस समय के सुपर डुपर स्टार राजेश खन्ना और मुमताज अभिनीत चलचित्र ``रोटी`` का ``यार हमारी बात सुनो, एसा एक इंसान चुनो जिसने पाप न किया हो जो पापी न हो. . . `` की याद ताजा हो जाती है। बाबा रामदेव देश के अनेक शहरों में अपने योग शिविर की दुकानें लगा चुके हैं इस हिसाब से वे भली भान्ति जानते होंगे कि देश में गरीब गुरबे किस तरह रहते हैं। यह बात भी उतनी ही सच है जितना कि दिन और रात कि बाबा के पास वर्तमान में अकूत दौलत का भण्डार है। बाबा अगर चाहें तो गरीब गुरबों के लिए एकदम निशुक्ल योग शिविर और चिकित्सा शिविर लगाकर दवाएं बांट सकते हैं। वस्तुत: बाबा रामदेव एसा नहीं कर रहे हैं, क्योंकि यह भी जानते हैं कि राजनेताओं का काम सिर्फ भाषण देना है, उसे अमली जामा पहनाना नहीं।
बाबा रामदेव के एजेण्डे में तीसरा तथ्य यह उभरकर सामने आया है कि उन्होंने ``हिन्दी की चिन्दी`` पर अफसोस जाहिर किया है। बाबा का कहना है कि आजादी के इतने समय बाद भी हम ब्रितानी मानसिकता के गुलाम हैं। आज भी न्यायालयों में हिन्दी के बजाए अंग्रेजी का ही बोल बाला है। बाबा रामदेव के इस कथन से हम पूरा इत्तेफाक रखते हैं, पर सवाल यह है कि समूची ब्यूरोक्रेसी में ही अंग्रेजी का बोलबाजा है, बाबा रामदेव बहुत चतुर खिलाडी हैं, वे अगर नौकरशाहों पर वार करते तो वे देश पर राज करने का जो रोडमेप तैयार कर रहे हैं उसके मार्ग में शूल ही शूल बिछा दिए जाते, यही कारण है कि बाबा रामदेव नौकरशाहों पर परोक्ष तौर पर निशाना साध रहे हैं।
हमारा अपना मानना है कि बाबा रामदेव पूरी तरह मुगालते में हैं। हमने अपने पिछले आलेखों ``राष्ट्रधर्म की राह पर बाबा रामदेव`` और ``बाबा रामदेव का राष्ट्रधर्म`` में बाबा रामदेव की भविष्य की राजनैतिक बिसात के बारे में इशारा किया था। उस दौरान बाबा रामदेव के अंधे भक्तों ने तरह तरह की प्रतिक्रियाएं व्यक्त की थीं। राजनेताओं को कोसना बहुत आसान है। जनसेवकों की मोटी खाल पर इसका कोई असर नहीं होता है। बाबा रामदेव ने भी जनसेवकों को पानी पी पी कर कोसा है। रामदेव यह भूल जाते हैं कि जैसे ही बाबा रामदेव उनकी कुर्सी हथियाने का साक्षात प्रयास करेंगे वैसे ही ये सारे राजनेता एक सुर में तान छेड देंगे और फिर आने वाले समय में बाबा रामदेव को अपनी योग की दुकान भी समेटना पड सकता है।
बाबा रामदेव के पास अकूत दौलत है। यह दौलत उन्होंने पिछले लगभग डेढ दशक में ही एकत्र की है। मीडिया की ताकत से बाबा रामदेव भली भान्ति परिचित हो चुके हैं। मीडिया चाहे तो किसी को फर्श से उठाकर अर्श पर तो किसी को आसमान से जमीन पर उतार सकता है। आने वाले समय में बाबा रामदेव अगर कोई समाचार चेनल खोल लें तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए, साथ ही प्रिंट की दुनिया में भी बाबा रामदेव उतर सकते हैं। हमें यह कहने मेें कोई संकोच नहीं कि मीडिया के ग्लेमर को देखकर इस क्षेत्र में उतरे लोग सरेआम अपनी कलम का सौदा कर रहे हैं। मीडिया को प्रजातन्त्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। प्रजातन्त्र के तीन स्तंभ तो गफलत, भ्रष्टाचार, अनैतिकता के दलदल में समा चुके हैं। लोगों की निगाहें अब मीडिया पर ही हैं, और मीडिया ही अगर अंधकार के रास्ते पर निकल गया तो भारत में प्रजातन्त्र के बजाए हिटलर राज आने में समय नहीं लगेगा।
बहरहाल बाबा के एक के बाद एक सधे हुए कदम से साफ जाहिर होने लगा है कि बाबा रामदेव के मन मस्तिष्क में देश पर राज करने की इच्छा बहुत पहले से ही थी। उन्होंने योग का माध्यम चुना और पहले लोगों को इसका चस्का लगाया। जब लोग योग के आदी हो गए तो योग गुरू ने अपना असली कार्ड खोल दिया। भारत स्वाभिमान ट्रस्ट की स्थापन के पीछे यही उद्देश्य प्रतीत हो रहा है। अब बाबा रामदेव ने इसके कार्यकर्ताओं से ज्यादा से ज्यादा सदस्य बनाने का आव्हान कर डाला है। बाबा के कदमों को देखकर यही कहा जा सकता है कि ``योग तो एक बहाना था, बाबा रामदेव का असल मकसद तो राजनीति में आना था।``
Monday, February 22, 2010
अर्जुन की बैसाखी पर सवार दिग्विजय सिंह
अल्पसंख्यकों की जिस बैशाखी को सहारा बनाकर आधुनिक भारत की राजनीति के चाणक्य अर्जुन सिंह ने कांग्रेस के बड़े से बड़े नेताओं को अपनी सोच और समझ का लोहा मनवा दिया था अब उसी बैशाखी का सहारा उन्हीं के शार्गिद दिग्विजय सिंह ले रहे हैं।
पूर्व केंद्रीय मंत्री अर्जुन सिंह को बीसवीं सदी के अंतिम दशकों में कांग्रेस का कूटनीतिक चाणक्य माना जाता था। ढलती उमर के चलते उन्हें राजनीतिक बियावान से शून्य की ओर धकेल दिया गया है। अर्जुन खामोश हैं, लोगों को बहुत आश्चर्य है। इक्कीसवीं सदी में कांग्रेस के दूसरे नंबर के ताकतवर महासचिव दिग्विजय सिंह में लोग अर्जुन सिंह का अक्स ढूंढते मिल रहे हैं। माना जा रहा है कि अब अर्जुन सिंह की तर्ज पर ही दिग्विजय सिंह चाणक्य बनने की जुगत में हैं। उत्तर प्रदेश में मुसलमानों को साधने की महती जवाबदारी दिग्गी के कांधो पर डाली गई। अर्जुन सिंह की राह पर ही चलते हुए उन्होंने बटाला एनकाउंटर और आजमगढ मामले में जमकर सियासत की। इतना ही नहीं भारी विरोध के बावजूद न केवल दिग्गी राजा वहां गए वरन अब तो वे कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी को भी आजमगढ ले जाने की तैयारियों में जुट गए हैं। कांग्रेस के वर्तमान गांधी 'राहुल और सोनिया' को साधकर राजा दिग्विजय सिंह ने ''एक साधे सब सधें'' की कहावत को चरितार्थ कर दिया है।
मध्यप्रदेश की औद्योगिक राजधानी इंदौर में भाजपा के छोटे से लेकर बड़े नेता तक ने पार्टी की चाल, चेहरा और चरित्र को लेकर 72 घंटे तक मंथन किया लेकिन सबकी आंखों में दिग्विजय सिंह तैरते दिखे। पूरे अधिवेशन में अगर भाजपा नेताओं ने किसी दूसरी पार्टी के नेता पर चर्चा की तो वह हैं दिग्गी राजा। इंदौर में भाजपा की राष्ट्र्रीय समिति की बैठक के दौरान श्री सिंह अपनी पार्टी के अकेले नेता रहे जिन की भाजपा ने आलोचना की। इस पर चुटकी लेते हुए दिग्विजय सिंह ने कहा है कि भाजपा जब भी मेरी आलोचना करती है तो वे एक किस्म का गौरव महसूस करते हैं। कांग्रेस नेता ने कहा कि वे आजमगढ़ को पर्यटन स्थल बनाने के लिए नहीं गए थे पर अगर ऐसा हो गया तो उन्हें खुशी होगी क्योंकि इसके कारण स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा।
दिग्विजय सिंह आज की तारीख में कांग्रेस के सबसे ताकतवर महासचिव हैं। वे खुद राजनैतिक तौर पर कम प्रतिभाशाली नहीं हैं लेकिन कांग्रेस की कलाकाट राजनीति में उनकी ताकत का राज यह है कि वे राहुल गांधी के साथ मिल कर काम कर रहे हैं और जहां राहुल को जमीनी राजनीति समझानी होती है, समझाते हैं।
दिग्विजय सिंह से आतंकित कांग्रेसियों ने उनके हाल के आजमगढ़ दौरे को ले कर बहुत बवाल मचाया था और कुछ ने तो यह राय भी जाहिर कर दी थी कि दिग्विजय सिंह का यह कदम सांप्रदायिक हैं और इसीलिए उन्हें कम से कम महासचिव पद से हटा दिया जाना चाहिए। दिग्विजय सिंह का कसूर यह बताया जा रहा था कि उन्होंने आजमगढ़ जा कर दिल्ली के बाटला हाउस के अभियुक्तों से गहरी दोस्ती कर ली थी और उनके परिवारों से सहानुभूति जाहिर की थी।
मगर दिग्विजय सिंह की शक्ति का स्रोत सिर्फ राहुल गांधी नहीं है। वे मध्य प्रदेश के लगातार दो बार मुख्यमंत्री रह चुके हैं और जूझने की राजनीति उन्हें आती है। अमर सिंह जैसे वाचाल नेता को कई मौको पर उन्होने सिर्फ हंस कर कहे गए एक या दो सारगर्भित वाक्यों के जरिए खामोश कर दिया था। दिग्विजय सिंह की खासियत यह है कि वे मंत्री नहीं हैं इसलिए पार्टी के लिए उनके पास पूरा वक्त है।
भविष्य में यह देखना और भी दिलचस्प होगा कि अल्पसंख्यकों के किन-किन मुद्दों पर दिग्विजय सिंह अपनी राय देते हैं और कांग्रेस उससे अपना पल्ला झाड़ती है या नहीं। लेकिन दिग्विजय सिंह को यह याद रखना चाहिए कि अर्जुन सिंह के जमाने में राजनैतिक फिजा कुछ और थी और अब का राजनैतिक परिदृश्य अलहदा है। अब मुसलमानों को सिर्फ बयानबाजी से बरगलाना मुश्किल है उन्हें कुछ ठोस करके दिखाना होगा।
अर्जुन सिंह ने एक वक्त अपने वक्तव्यों और सहयोगियों के साथ मिलकर ऐसा समां बांध दिया था कि लगने लगा था कि सेक्युलरिज्म के वो सबसे बड़े पैरोकार हैं। अपनी बयानवीरता से उत्साहित अर्जुन सिंह यहीं नहीं रुके थे। उन्होंने एक वक्तव्य में संघ और हिंदू महासभा को भारत के विभाजन का जिम्मेदार भी ठहरा दिया था। अर्जुन सिंह ने संघ पर इतिहास को गलत दिशा देने का आरोप भी जड़ा था। अल्पसंख्यकों को लुभाने के चक्कर में सिंह ने कई बचकाने तर्क दिए और यह भूल गए कि विभाजन के असली जिम्मेदार तो जिन्ना थे जिन्होंने द्वि-राष्ट्र के सिद्धांत का ना केवल प्रतिपादन किया बल्कि उसको मूर्त रूप भी दिलवाया, जिसको कांग्रेस के नेताओं का भी मूक समर्थन प्राप्त था।
अब अर्जुन सिंह अस्वस्थ हैं और पार्टी में उनकी कोई पूछ नहीं रह गई है। कांग्रेस में कोई बड़ा अल्पसंख्यक नेता भी नहीं है जिस पर पार्टी को ये भरोसा हो कि वो अपने समुदाय का वोट पार्टी को दिला सकता है। मौका माकूल देखकर दिग्विजय सिंह ने अपने गुरु अर्जुन सिंह की राह पर चलने का फैसला कर लिया प्रतीत होता है। दिग्विजय सिंह को इसके दो फायदे हो सकते हैं एक तो पार्टी में उनकी पूछ बढ़ जाएगी और दूसरे अगर खुदा ना खास्ते उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को कोई फायदा होता है तो पार्टी आलाकमान की नजर में उनका ग्राफ भी ऊपर चढ़ जाएगा। कांग्रेस पार्टी में अपने प्रतिद्वंद्वियों की राजनीति से राहुल के नाम के सहारे जूझ रहे दिग्गी राजा को अल्पसंख्यकों की पैरोकारी का ये फॉर्मूला बेहतर लगा और संजरपुर पहुंचकर उन्होंने इसकी शुरुआत कर दी।
बटला हाउस मुठभेड़ को लेकर कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के बयान के बाद इस मामले पर एक बार फिर सियासत गर्म हो गई है। पार्टी के भीतर ही इस मसले पर मतभेद साफ नजर आ रहे हैं। वहीं भाजपा ने दिग्विजय के बयान को वोटबैंक की राजनीति बताकर घेरना शुरू कर दिया है। कांग्रेस में कई नेता मान रहे हैं कि इस मसले पर दिग्विजय ने जो कुछ कहा उसकी इस समय जरूरत नहीं थी।
पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक जब यह मामला प्रधानमंत्री खुद निपटा चुके थे। उन्होंने सभी तथ्यों को देखने के बाद न्यायिक जांच की संभावनाओं को नकार दिया था तो एक बार फिर इस मुद्दे को उठाना गड़े मुर्दे उखाडऩे जैसा है। हालांकि कांग्रेस के भीतर ही बटला हाउस मुठभेड़ पर सवाल उठाने वाला धड़ा कांग्रेस महासचिव के बयान के साथ खड़ा होता नजर आ रहा है। इस बात के भी कयास लगाए जा रहे हैं कि कांग्रेस महासचिव का बयान पार्टी की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है, जिसके तहत उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यकों का रुझान अपनी ओर देखते हुए पार्टी ने सोचा-समझा दांव खेला हो। हालांकि पार्टी की ओर से प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने बेहद नपे-तुले अंदाज में कहा कि दिग्विजय सिंह बड़े नेता हैं, यूपी के प्रभारी भी हैं, वे आजमगढ़ सत्य की खोज करने गए थे। वे अच्छी तरह से जानते हैं कि उन्हें क्या कहना है। जहां तक उनके बयान का सवाल है, इस बारे में वे खुद ही बता सकते हैं। जबकि भाजपा प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने कहा कि जांच के बाद साफ हो गया था कि बटला एनकाउंटर झूठा नहीं है। उन्होंने कहा कि कोर्ट ने भी इस संबंध में उठाई गई शंकाओं को खारिज कर दिया, ऐसे में दिग्विजय सिंह का बयान वोट बैंक की राजनीति के सिवा कुछ नहीं है। उन्होंने इसे भावनाएं भड़काने की कोशिश भी बताया।
उधर सिंघवी के नपे-तुले अंदाज में दिए गए बयान से कांग्रेस की दुविधा उजागर हुई। पार्टी सूत्रों का कहना है कि दिग्विजय यूपी में कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी के मिशन यूपी के सूत्रधार के तौर पर काम कर रहे हैं। उनको आजमगढ़ जाकर विवाद कुरेदने की जरूरत क्यों पड़ी, इसके मायने तलाशने में खुद पार्टी के कई नेता जुटे हैं।
आजादी के बाद के चुनावों में उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यकों के वोट कमोबेश कांग्रेस पार्टी को ही मिलते रहे हैं। 92 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद मुसलमानों का कांग्रेस से मोहभंग हुआ और उसका वोट कांग्रेस की झोली से निकलकर मुलायम के पास पहुंच गया। लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव के वक्त मुलायम सिंह यादव ने बाबरी मस्जिद विध्वंस के वक्त उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके पूर्व भाजपा नेता कल्याण सिंह को अपना सहयोगी बना लिया। लोकसभा चुनाव के नतीजों ने यह साफ कर दिया कि मुलायम के लिए कल्याण की यह दोस्ती भारी पड़ी। उत्तर प्रदेश में ढ़ाई साल बाद एक बार फिर से विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और लोकसभा चुनावों में पार्टी की सफलता से उत्साहित कांग्रेसियों की नजर एक बार फिर से मुस्लिम मतदाताओं पर है। पार्टी नेताओं को यह लगने लगा है कि अगर मुसलमानों को एक बार फिर से साध लिया गया तो प्रदेश में मरणासन्न पार्टी को नई संजीवनी मिल सकती है।
अपनी इसी योजना को लेकर पार्टी के उत्तर प्रदेश प्रभारी दिग्विजय सिंह आजमगढ़ के संजरपुर पहुंचते हैं। संजरपुर वो कस्बा है जहां के कुछ युवकों पर आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगता रहा है। वहां पहुंचकर दिग्विजय सिंह को अचानक दिल्ली ब्लास्ट के बाद हुए बटला एनकाउंटर की याद आती है। स्थानीय लोगों का जोरदार विरोध और काले झंडे के बावजूद जब दिग्विजय सिंह को बोलने का मौका मिला तो उन्होंने एक शातिर राजनेता की तरह लोगों की दुखती रग पर हाथ रख दिया। इशारों-इशारों में बटला हाउस एनकांउटर के फर्जी होने की बात कर डाली।
दिग्विजय ने कहा कि उन्होंने बटला हाउस एनकाउंटर के फोटोग्राफ्स देखे हैं जिनमें आतंकवादियों के सिर में गोली लगी है। उनके मुताबिक दहशतगर्दों के खिलाफ एनकाउंटर में इस तरह से गोली लगना नामुमकिन है। इशारा और इरादा दोनों साफ थे। दिग्विजय सिंह को अगर बटला हाउस एनकाउंटर की सत्यता पर संदेह था तो डेढ़ साल से चुप क्यों थे। संजरपुर पहुंचकर ही दिग्गी राजा को बटला हाउस की याद क्यों आई।
आपको याद दिलाते चलें कि 2008 के सितंबर में दिल्ली के बटला हाउस इलाके में हुए एक एनकाउंटर में दिल्ली पुलिस के जांबाज सिपाहियों ने दो आतंकवादियों को ढेर कर दिया था। आतंकवादियों से लड़ते हुए उस मुठभेड़ में दिल्ली पुलिस के जांबाज इंसपेक्टर मोहन चंद्र शर्मा शहीद हो गए थे और एक हेड कांस्टेबल बुरी तरह से जख्मी हो गया था। दो साल पहले जब यह एनकाउंटर हुआ था, उस वक्त भी इस पर सवाल खड़े हुए थे। लेकिन बाद में अदालत और सरकारी जांच में ये साबित हो गया कि मुठभेड़ सही थी।
जब दिग्विजय सिंह संजरपुर में ये बयान दे रहे थे उसके दो दिन पहले यूपी एसटीएफ ने दिल्ली समेत कई शहरों में हुए बम धमाकों के आरोपी आतंकवादी शहजाद को धर दबोचा था। शहजाद ने इस सिलसिले में कई सनसनीखेज खुलासे भी किए और यह भी माना कि दिल्ली पुलिस के इंसपेक्टर मोहनचंद शर्मा उसकी ही गोली का निशाना बने। लेकिन एनकाउंटर के फोटग्राफ्स को ध्यान से देखने वाले कांग्रेस पार्टी के इस वरिष्ठ नेता को शहजाद के बयानों को पढऩे की फुर्सत कहां। इन बातों से बेखबर दिग्विजय ने संजरपुर में बटला हाउस एनकाउंटर को ही संदेहास्पद करार दे दिया। ये इस एनकाउंटर में मारे गए शहीद मोहनचंद शर्मा का अपमान भी है।
जाहिर था दिग्विजय सिंह के इस बयान के बाद सियासी गलियारों में हड़कंप मचा और भारतीय जनता पार्टी ने दिग्विजय सिंह के बहाने कांग्रेस पार्टी पर निशाना साधा। आनन-फानन में कांग्रेस ने दिग्विजय के बयान से खुद को अलग कर लिया। दरअसल कांग्रेस में अल्पसंख्यकों को लुभाने की यह चाल बहुत पुरानी है। एक जमाने में दिग्विजय सिंह के गुरु और उनके ही प्रदेश के कांग्रेसी नेता अर्जुन सिंह भी इस तरह के राजनीतिक दांव चला करते थे। जब सीताराम केसरी कांग्रेस के अध्यक्ष थे उस वक्त अर्जुन सिंह ने अल्पसंख्यकों को खुश करने के लिए आरएसएस पर गांधी की हत्या का आरोप जड़ दिया था। जब आरएसएस ने कानूनी कार्रवाई की धमकी दी तो अर्जुन के तेवर नरम पड़े थे और बयान में संशोधन करते हुए कहा था कि संघ ने जो वातावरण तैयार किया था वही गांधी हत्या की वजह बना। लेकिन उस वक्त बयान देते वक्त अर्जुन सिंह यह भूल गए थे कि जस्टिस कपूर की रिपोर्ट, कांग्रेस के नेता डी पी मिश्रा की आत्मकथा और सरदार पटेल के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के पत्रों में भी आरएसएस को गांधी की हत्या के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया गया था।
लेकिन अर्जुन सिंह अपने राजनैतिक लाभ के लिए गांधी की हत्या का इस्तेमाल करते रहे। आरएसएस के तत्कालीन प्रवक्ता राम माधव ने अर्जुन सिंह को आईना भी दिखाया था। राम माधव ने बताया था कि अर्जुन सिंह के परिवार के संबंध संघ के साथ कितने गहरे रहे हैं और उनके भाई राणा बहादुर सिंह एक जमाने में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के जिला प्रमुख हुआ करते थे। लेकिन इन सबसे बेखबर अर्जुन सिंह ने अल्पसंख्यकों पर डोरे डालना नहीं छोड़ा।
इसके बाद जब अर्जुन सिंह केंद्र में मानव संसाधन विकास मंत्री बने तो पाठ्य पुस्तकों को भगवा रंग से मुक्त करने की मुहिम के नाम पर भी अपनी राजनीति चमकाते रहे। इस पर भी जमकर विवाद हुआ था। जिसमें बाद में प्रधानमंत्री को दखल देना पड़ा था।
पूर्व केंद्रीय मंत्री अर्जुन सिंह को बीसवीं सदी के अंतिम दशकों में कांग्रेस का कूटनीतिक चाणक्य माना जाता था। ढलती उमर के चलते उन्हें राजनीतिक बियावान से शून्य की ओर धकेल दिया गया है। अर्जुन खामोश हैं, लोगों को बहुत आश्चर्य है। इक्कीसवीं सदी में कांग्रेस के दूसरे नंबर के ताकतवर महासचिव दिग्विजय सिंह में लोग अर्जुन सिंह का अक्स ढूंढते मिल रहे हैं। माना जा रहा है कि अब अर्जुन सिंह की तर्ज पर ही दिग्विजय सिंह चाणक्य बनने की जुगत में हैं। उत्तर प्रदेश में मुसलमानों को साधने की महती जवाबदारी दिग्गी के कांधो पर डाली गई। अर्जुन सिंह की राह पर ही चलते हुए उन्होंने बटाला एनकाउंटर और आजमगढ मामले में जमकर सियासत की। इतना ही नहीं भारी विरोध के बावजूद न केवल दिग्गी राजा वहां गए वरन अब तो वे कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी को भी आजमगढ ले जाने की तैयारियों में जुट गए हैं। कांग्रेस के वर्तमान गांधी 'राहुल और सोनिया' को साधकर राजा दिग्विजय सिंह ने ''एक साधे सब सधें'' की कहावत को चरितार्थ कर दिया है।
मध्यप्रदेश की औद्योगिक राजधानी इंदौर में भाजपा के छोटे से लेकर बड़े नेता तक ने पार्टी की चाल, चेहरा और चरित्र को लेकर 72 घंटे तक मंथन किया लेकिन सबकी आंखों में दिग्विजय सिंह तैरते दिखे। पूरे अधिवेशन में अगर भाजपा नेताओं ने किसी दूसरी पार्टी के नेता पर चर्चा की तो वह हैं दिग्गी राजा। इंदौर में भाजपा की राष्ट्र्रीय समिति की बैठक के दौरान श्री सिंह अपनी पार्टी के अकेले नेता रहे जिन की भाजपा ने आलोचना की। इस पर चुटकी लेते हुए दिग्विजय सिंह ने कहा है कि भाजपा जब भी मेरी आलोचना करती है तो वे एक किस्म का गौरव महसूस करते हैं। कांग्रेस नेता ने कहा कि वे आजमगढ़ को पर्यटन स्थल बनाने के लिए नहीं गए थे पर अगर ऐसा हो गया तो उन्हें खुशी होगी क्योंकि इसके कारण स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा।
दिग्विजय सिंह आज की तारीख में कांग्रेस के सबसे ताकतवर महासचिव हैं। वे खुद राजनैतिक तौर पर कम प्रतिभाशाली नहीं हैं लेकिन कांग्रेस की कलाकाट राजनीति में उनकी ताकत का राज यह है कि वे राहुल गांधी के साथ मिल कर काम कर रहे हैं और जहां राहुल को जमीनी राजनीति समझानी होती है, समझाते हैं।
दिग्विजय सिंह से आतंकित कांग्रेसियों ने उनके हाल के आजमगढ़ दौरे को ले कर बहुत बवाल मचाया था और कुछ ने तो यह राय भी जाहिर कर दी थी कि दिग्विजय सिंह का यह कदम सांप्रदायिक हैं और इसीलिए उन्हें कम से कम महासचिव पद से हटा दिया जाना चाहिए। दिग्विजय सिंह का कसूर यह बताया जा रहा था कि उन्होंने आजमगढ़ जा कर दिल्ली के बाटला हाउस के अभियुक्तों से गहरी दोस्ती कर ली थी और उनके परिवारों से सहानुभूति जाहिर की थी।
मगर दिग्विजय सिंह की शक्ति का स्रोत सिर्फ राहुल गांधी नहीं है। वे मध्य प्रदेश के लगातार दो बार मुख्यमंत्री रह चुके हैं और जूझने की राजनीति उन्हें आती है। अमर सिंह जैसे वाचाल नेता को कई मौको पर उन्होने सिर्फ हंस कर कहे गए एक या दो सारगर्भित वाक्यों के जरिए खामोश कर दिया था। दिग्विजय सिंह की खासियत यह है कि वे मंत्री नहीं हैं इसलिए पार्टी के लिए उनके पास पूरा वक्त है।
भविष्य में यह देखना और भी दिलचस्प होगा कि अल्पसंख्यकों के किन-किन मुद्दों पर दिग्विजय सिंह अपनी राय देते हैं और कांग्रेस उससे अपना पल्ला झाड़ती है या नहीं। लेकिन दिग्विजय सिंह को यह याद रखना चाहिए कि अर्जुन सिंह के जमाने में राजनैतिक फिजा कुछ और थी और अब का राजनैतिक परिदृश्य अलहदा है। अब मुसलमानों को सिर्फ बयानबाजी से बरगलाना मुश्किल है उन्हें कुछ ठोस करके दिखाना होगा।
अर्जुन सिंह ने एक वक्त अपने वक्तव्यों और सहयोगियों के साथ मिलकर ऐसा समां बांध दिया था कि लगने लगा था कि सेक्युलरिज्म के वो सबसे बड़े पैरोकार हैं। अपनी बयानवीरता से उत्साहित अर्जुन सिंह यहीं नहीं रुके थे। उन्होंने एक वक्तव्य में संघ और हिंदू महासभा को भारत के विभाजन का जिम्मेदार भी ठहरा दिया था। अर्जुन सिंह ने संघ पर इतिहास को गलत दिशा देने का आरोप भी जड़ा था। अल्पसंख्यकों को लुभाने के चक्कर में सिंह ने कई बचकाने तर्क दिए और यह भूल गए कि विभाजन के असली जिम्मेदार तो जिन्ना थे जिन्होंने द्वि-राष्ट्र के सिद्धांत का ना केवल प्रतिपादन किया बल्कि उसको मूर्त रूप भी दिलवाया, जिसको कांग्रेस के नेताओं का भी मूक समर्थन प्राप्त था।
अब अर्जुन सिंह अस्वस्थ हैं और पार्टी में उनकी कोई पूछ नहीं रह गई है। कांग्रेस में कोई बड़ा अल्पसंख्यक नेता भी नहीं है जिस पर पार्टी को ये भरोसा हो कि वो अपने समुदाय का वोट पार्टी को दिला सकता है। मौका माकूल देखकर दिग्विजय सिंह ने अपने गुरु अर्जुन सिंह की राह पर चलने का फैसला कर लिया प्रतीत होता है। दिग्विजय सिंह को इसके दो फायदे हो सकते हैं एक तो पार्टी में उनकी पूछ बढ़ जाएगी और दूसरे अगर खुदा ना खास्ते उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को कोई फायदा होता है तो पार्टी आलाकमान की नजर में उनका ग्राफ भी ऊपर चढ़ जाएगा। कांग्रेस पार्टी में अपने प्रतिद्वंद्वियों की राजनीति से राहुल के नाम के सहारे जूझ रहे दिग्गी राजा को अल्पसंख्यकों की पैरोकारी का ये फॉर्मूला बेहतर लगा और संजरपुर पहुंचकर उन्होंने इसकी शुरुआत कर दी।
बटला हाउस मुठभेड़ को लेकर कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के बयान के बाद इस मामले पर एक बार फिर सियासत गर्म हो गई है। पार्टी के भीतर ही इस मसले पर मतभेद साफ नजर आ रहे हैं। वहीं भाजपा ने दिग्विजय के बयान को वोटबैंक की राजनीति बताकर घेरना शुरू कर दिया है। कांग्रेस में कई नेता मान रहे हैं कि इस मसले पर दिग्विजय ने जो कुछ कहा उसकी इस समय जरूरत नहीं थी।
पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक जब यह मामला प्रधानमंत्री खुद निपटा चुके थे। उन्होंने सभी तथ्यों को देखने के बाद न्यायिक जांच की संभावनाओं को नकार दिया था तो एक बार फिर इस मुद्दे को उठाना गड़े मुर्दे उखाडऩे जैसा है। हालांकि कांग्रेस के भीतर ही बटला हाउस मुठभेड़ पर सवाल उठाने वाला धड़ा कांग्रेस महासचिव के बयान के साथ खड़ा होता नजर आ रहा है। इस बात के भी कयास लगाए जा रहे हैं कि कांग्रेस महासचिव का बयान पार्टी की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है, जिसके तहत उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यकों का रुझान अपनी ओर देखते हुए पार्टी ने सोचा-समझा दांव खेला हो। हालांकि पार्टी की ओर से प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने बेहद नपे-तुले अंदाज में कहा कि दिग्विजय सिंह बड़े नेता हैं, यूपी के प्रभारी भी हैं, वे आजमगढ़ सत्य की खोज करने गए थे। वे अच्छी तरह से जानते हैं कि उन्हें क्या कहना है। जहां तक उनके बयान का सवाल है, इस बारे में वे खुद ही बता सकते हैं। जबकि भाजपा प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने कहा कि जांच के बाद साफ हो गया था कि बटला एनकाउंटर झूठा नहीं है। उन्होंने कहा कि कोर्ट ने भी इस संबंध में उठाई गई शंकाओं को खारिज कर दिया, ऐसे में दिग्विजय सिंह का बयान वोट बैंक की राजनीति के सिवा कुछ नहीं है। उन्होंने इसे भावनाएं भड़काने की कोशिश भी बताया।
उधर सिंघवी के नपे-तुले अंदाज में दिए गए बयान से कांग्रेस की दुविधा उजागर हुई। पार्टी सूत्रों का कहना है कि दिग्विजय यूपी में कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी के मिशन यूपी के सूत्रधार के तौर पर काम कर रहे हैं। उनको आजमगढ़ जाकर विवाद कुरेदने की जरूरत क्यों पड़ी, इसके मायने तलाशने में खुद पार्टी के कई नेता जुटे हैं।
आजादी के बाद के चुनावों में उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यकों के वोट कमोबेश कांग्रेस पार्टी को ही मिलते रहे हैं। 92 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद मुसलमानों का कांग्रेस से मोहभंग हुआ और उसका वोट कांग्रेस की झोली से निकलकर मुलायम के पास पहुंच गया। लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव के वक्त मुलायम सिंह यादव ने बाबरी मस्जिद विध्वंस के वक्त उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके पूर्व भाजपा नेता कल्याण सिंह को अपना सहयोगी बना लिया। लोकसभा चुनाव के नतीजों ने यह साफ कर दिया कि मुलायम के लिए कल्याण की यह दोस्ती भारी पड़ी। उत्तर प्रदेश में ढ़ाई साल बाद एक बार फिर से विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और लोकसभा चुनावों में पार्टी की सफलता से उत्साहित कांग्रेसियों की नजर एक बार फिर से मुस्लिम मतदाताओं पर है। पार्टी नेताओं को यह लगने लगा है कि अगर मुसलमानों को एक बार फिर से साध लिया गया तो प्रदेश में मरणासन्न पार्टी को नई संजीवनी मिल सकती है।
अपनी इसी योजना को लेकर पार्टी के उत्तर प्रदेश प्रभारी दिग्विजय सिंह आजमगढ़ के संजरपुर पहुंचते हैं। संजरपुर वो कस्बा है जहां के कुछ युवकों पर आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगता रहा है। वहां पहुंचकर दिग्विजय सिंह को अचानक दिल्ली ब्लास्ट के बाद हुए बटला एनकाउंटर की याद आती है। स्थानीय लोगों का जोरदार विरोध और काले झंडे के बावजूद जब दिग्विजय सिंह को बोलने का मौका मिला तो उन्होंने एक शातिर राजनेता की तरह लोगों की दुखती रग पर हाथ रख दिया। इशारों-इशारों में बटला हाउस एनकांउटर के फर्जी होने की बात कर डाली।
दिग्विजय ने कहा कि उन्होंने बटला हाउस एनकाउंटर के फोटोग्राफ्स देखे हैं जिनमें आतंकवादियों के सिर में गोली लगी है। उनके मुताबिक दहशतगर्दों के खिलाफ एनकाउंटर में इस तरह से गोली लगना नामुमकिन है। इशारा और इरादा दोनों साफ थे। दिग्विजय सिंह को अगर बटला हाउस एनकाउंटर की सत्यता पर संदेह था तो डेढ़ साल से चुप क्यों थे। संजरपुर पहुंचकर ही दिग्गी राजा को बटला हाउस की याद क्यों आई।
आपको याद दिलाते चलें कि 2008 के सितंबर में दिल्ली के बटला हाउस इलाके में हुए एक एनकाउंटर में दिल्ली पुलिस के जांबाज सिपाहियों ने दो आतंकवादियों को ढेर कर दिया था। आतंकवादियों से लड़ते हुए उस मुठभेड़ में दिल्ली पुलिस के जांबाज इंसपेक्टर मोहन चंद्र शर्मा शहीद हो गए थे और एक हेड कांस्टेबल बुरी तरह से जख्मी हो गया था। दो साल पहले जब यह एनकाउंटर हुआ था, उस वक्त भी इस पर सवाल खड़े हुए थे। लेकिन बाद में अदालत और सरकारी जांच में ये साबित हो गया कि मुठभेड़ सही थी।
जब दिग्विजय सिंह संजरपुर में ये बयान दे रहे थे उसके दो दिन पहले यूपी एसटीएफ ने दिल्ली समेत कई शहरों में हुए बम धमाकों के आरोपी आतंकवादी शहजाद को धर दबोचा था। शहजाद ने इस सिलसिले में कई सनसनीखेज खुलासे भी किए और यह भी माना कि दिल्ली पुलिस के इंसपेक्टर मोहनचंद शर्मा उसकी ही गोली का निशाना बने। लेकिन एनकाउंटर के फोटग्राफ्स को ध्यान से देखने वाले कांग्रेस पार्टी के इस वरिष्ठ नेता को शहजाद के बयानों को पढऩे की फुर्सत कहां। इन बातों से बेखबर दिग्विजय ने संजरपुर में बटला हाउस एनकाउंटर को ही संदेहास्पद करार दे दिया। ये इस एनकाउंटर में मारे गए शहीद मोहनचंद शर्मा का अपमान भी है।
जाहिर था दिग्विजय सिंह के इस बयान के बाद सियासी गलियारों में हड़कंप मचा और भारतीय जनता पार्टी ने दिग्विजय सिंह के बहाने कांग्रेस पार्टी पर निशाना साधा। आनन-फानन में कांग्रेस ने दिग्विजय के बयान से खुद को अलग कर लिया। दरअसल कांग्रेस में अल्पसंख्यकों को लुभाने की यह चाल बहुत पुरानी है। एक जमाने में दिग्विजय सिंह के गुरु और उनके ही प्रदेश के कांग्रेसी नेता अर्जुन सिंह भी इस तरह के राजनीतिक दांव चला करते थे। जब सीताराम केसरी कांग्रेस के अध्यक्ष थे उस वक्त अर्जुन सिंह ने अल्पसंख्यकों को खुश करने के लिए आरएसएस पर गांधी की हत्या का आरोप जड़ दिया था। जब आरएसएस ने कानूनी कार्रवाई की धमकी दी तो अर्जुन के तेवर नरम पड़े थे और बयान में संशोधन करते हुए कहा था कि संघ ने जो वातावरण तैयार किया था वही गांधी हत्या की वजह बना। लेकिन उस वक्त बयान देते वक्त अर्जुन सिंह यह भूल गए थे कि जस्टिस कपूर की रिपोर्ट, कांग्रेस के नेता डी पी मिश्रा की आत्मकथा और सरदार पटेल के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के पत्रों में भी आरएसएस को गांधी की हत्या के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया गया था।
लेकिन अर्जुन सिंह अपने राजनैतिक लाभ के लिए गांधी की हत्या का इस्तेमाल करते रहे। आरएसएस के तत्कालीन प्रवक्ता राम माधव ने अर्जुन सिंह को आईना भी दिखाया था। राम माधव ने बताया था कि अर्जुन सिंह के परिवार के संबंध संघ के साथ कितने गहरे रहे हैं और उनके भाई राणा बहादुर सिंह एक जमाने में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के जिला प्रमुख हुआ करते थे। लेकिन इन सबसे बेखबर अर्जुन सिंह ने अल्पसंख्यकों पर डोरे डालना नहीं छोड़ा।
इसके बाद जब अर्जुन सिंह केंद्र में मानव संसाधन विकास मंत्री बने तो पाठ्य पुस्तकों को भगवा रंग से मुक्त करने की मुहिम के नाम पर भी अपनी राजनीति चमकाते रहे। इस पर भी जमकर विवाद हुआ था। जिसमें बाद में प्रधानमंत्री को दखल देना पड़ा था।
नक्सलियों का आदिवासियों से अटूट रिश्ता
नक्सलियों पर निर्णायक कार्रवाई को लेकर सरकार इस बार गंभीर नजर आ रही है, मगर उसकी तैयारी अब भी अधूरी ही दिखाई पड़ रही है। केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम के लगातार आ रहे बयानों से ऐसा लगता है कि अब कभी भी नक्सल पीडि़त सात राज्यों में उनके खिलाफ कोई बड़ी कार्रवाई हो सकती है। इस बीच ऐसे विज्ञापनों के दौर भी चल रहे हैं, जिनसे नक्सलवाद के विरोध में जनमत बनाने और आदिवासियों की हमदर्दी बटोरने का इरादा साफ दिखता है। इस सबके बीच एक खुशनुमा खबर यह भी है कि चिदंबरम चाहते हैं कि कोई उनकी नक्सलियों से बातचीत कराए। उधर पश्चिम बंगाल के नक्सली कमांडर किशनजी ने भी बातचीत का रूझान जताया है। बेशक दोनों तरफ से यह समझदार पेशकश है और इसका स्वागत किया जाना चाहिए, लेकिन अब तक यह स्पष्ट नहीं है कि नक्सलियों पर कार्रवाई और बातचीत साथ-साथ चलेगी या नक्सलियों से हिंसा रोकने की बात कहने वाले गृहमंत्री अपने अर्द्ध सैनिक दस्तों को भी यह हिदायत देंगे कि वे गोली के बदले गोली का चक्त्र रोकें और अगले निर्देश का इंतजार करें। इसी तरह क्या नक्सली भी बेदर्दी से खून बहाने से तौबा करके अपनी बंदूकों और बारूदी सुरंगों को कुछ समय के लिए भूलकर बातचीत की लोकतांत्रिक की राह पर कदम आगे बढ़ाएंगे।
दरअसल, नक्सलवाद की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि जिन जगहों पर इसकी पैठ बनी है, वहां भूख से जूझते, जीवन के लिए संघर्ष कर रहे पुलिस और प्रशासन के अत्याचार से पीडि़त और शोषित करीब पांच करोड़ आदिवासियों का हुजूम है। मुल्क आजाद हो जाने के बावजूद सदियों शासन ने इनकी सुध नहीं ली। इनके दु:ख-दर्द नहीं बांटे। अपने पुरखों के जंगल में देश के आजाद होते ही आदिवासी भी आजादी की सांस लेने के बजाय बेगाने हो गए। जंगल का मालिक वन विभाग और उनके जीवन के मालिक पुलिसकर्मी बन गए। आजाद देश की जनता की सरकारों ने अपने कारकुनों को इन बेजुबान वनवासियों से लूट-खसोट और उन पर जुल्म करने से नहीं रोका, लेकिन नक्सलियों के पैर जमाते ही शासन को इनका खयाल आने लगा। इन्हें मुख्यधारा में शामिल करने की चिंता सताने लगी और उसके कारिंदे दुबकने लगे, मगर भ्रष्टाचार से बाज नहीं आए। पश्चिम से लेकर पूरब तक एक लंबी पट्टी में महाराष्ट्र, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्यप्रदेश और बंगाल के नक्शों पर नजर डालिए। स्पष्ट नजर आ जाएगा कि नक्सल प्रभावित इलाकों में कौन लोग बसे हैं और उनकी आमदनी कितनी है। उन्हें कितना पढ़ाया लिखाया गया है। उनकी जरूरतें पूरी करने के लिए सरकार ने क्या प्रबंध किए हैं। जो प्रबंध हैं, वे कितने कारगर हैं। क्या प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में तैनात डाक्टर की वहां मौजूदगी पर सरकार की तरफ से कभी नजर रखी गई है? बच्चों को मिलने वाले मिड-डे भोजन का किसी ने मुआयना करने की जरूरत समझी? उनकी आवागमन की तकलीफें, बाजार और रोजगार की सरकार को पहले कभी चिंता हुई है। यह चंद ऐसे अकाट्य तथ्य हैं, जिन्होंने इन इलाकों में नक्सलवाद को जड़ें जमाने में मदद की।
नक्सली चाहे जिस स्वार्थ से इन इलाकों में घुसे, पर वे इनके दर्द में हमदर्द हुए। वैसे सरकार भी चाहती तो इन इलाकों में पकड़ बना लेती। पर तब तो सरकारी नुमाइंदों का हाल यह था कि वे नक्सलियों की पकड़ बनने से पहले इन इलाकों में झांकते तक नहीं थे। उनकी नियुक्ति सिर्फ वेतन वसूली की रस्म अदायगी तक सीमित थी। वे शहरों से लगे कस्बों में बैठकर कागजों पर ही विकास योजनाओं को लागू करते और उनका पैसा अपनी जेबों के हवाले करते रहे। पर अफसोस कि सरकार ने इन्हें भी कभी नियंत्रित नहीं किया। उल्टे बंदूकधारी पुलिस को मनगंढ़त मामले दर्ज करने की छूट मिल गई। किसी भी गरीब की बेटी को उठाने का लाइसेंस मिल गया।
वजह सिर्फ इतनी कि वे जानते थे कि इस जंगल में कौन आएगा तस्दीक करने या फिर आज भी हिंदी बोलने या समझने में अक्षम गरीब आदिवासी किससे फरियाद करने जाएगा। और जरा उन सरकारी विज्ञापनों के दूसरे पहलू पर भी नजर डालिए, जिनकी असलियत घने जंगलों से छनकर कभी बाहर ही नहीं आती। जंगल के उस पार का सच विज्ञापन की इन तस्वीरों से भी भयानक है। वजह यही है कि जंगल में या तो पुलिस का शासन चलता है या नक्सलियों का। पुलिस ने भी नक्सलियों के नाम पर आम आदिवासियों के बेहिसाब एनकाउंटर किए हैं। पीयूसीएल की रिपोर्ट में ऐसी अनेक मुठभेड़ों का जिक्त्र है, जिनकी भनक कभी दुनिया को नहीं लगी। मिसाल के तौर पर बस्तर में मद्देड़ के सरपंच बंडे को तो सीआरपीएफ ने सिर्फ चुहलबाजी में मौत के घाट उतार दिया। उसने सीआरपीएफ की जीप के करीब से मोटरसाइकिल आगे निकालने की गुस्ताखी कर दी थी। जवानों द्वारा बस्तर के जंगलों में बलात्कार के दो चश्मदीदों को नदी में मरते दम तक डुबाया गया। इनमें से कोई भी नक्सली नहीं था मगर बस्तर कोई कश्मीर तो है नहीं, जिस पर पूरी दुनिया की निगाह लगी हो और जरा-सी जुंबिश होते ही सरकार को अपनी निष्पक्षता जताने कि लिए जांच बैठानी पड़े। इसलिए रोजमर्रा ऐसे जघन्य अत्याचारों के बावजूद आदिवासी इलाकों में इनका पर्दाफाश करने या विरोध के लिए न तो प्रेस में कोई खबर छपती है और न ही कोई आंदोलन हो पाता है। ये तथा अनेक ऐसे ही और भी तथ्य हैं, जिन्होंने मेहमान बनकर आए नक्सलियों का आदिवासियों से अटूट रिश्ता बना दिया।
शहरों में बैठे लोग यह कल्पना ही नहीं कर सकते कि पुलिस और प्रशासन के छुटभैये अफसर गांव और जंगलों में कैसे बिगड़ैल रईसजादों या शहंशाहों की तरह बर्ताव करते हैं। नक्सलियों ने कभी जंगल से बाहर न झांकने वाले आम आदिवासी को ऐसे ही लोगों के शोषण से निजात दिलाने में मदद की। यही वजह है कि आदिवासी उन्हें अपना सगा, रक्षक और मसीहा मानने लगे। उन्हें तो जो भी सुरक्षित जीवन की गारंटी देगा, उनका अपना हो जाएगा। नक्सली कौन हैं? शायद वे अब भी नहीं जानते। उन्हें यह भी नहीं पता कि वे किसी मकसद या सिद्धांत के लिए जीने-मरने वाले लोग है। आम आदिवासी को तो सिर्फ इतना पता है कि वे मुसीबत में उनके काम आते हैं और उनके डर से पुलिस और फॉरेस्ट विभाग का आतंक कम हुआ है। उनसे मिट्टी के मोल नमक के बदले कीमती चिरौंजी और शहर की छह झाड़ुओं के बराबर एक फूलझाड़ू मिट्टी के मोल खरीदने वाले व्यापारी अब उन्हें घर के दरवाजे पर अच्छी रकम दे जाते हैं। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस नेता महेंद्र कर्मा के नेतृत्व में सरकार समर्थित सलवा जुड़ूम को आदिवासियों ने इसीलिए पसंद नहीं किया। पूरी दुनिया में सलवा जुड़ूम को ऐसे प्रचारित किया गया, जैसे वह कोई अहिंसक गांधीवादी आंदोलन हो। असलियत यह थी कि सलवा जुड़ूम के नाम पर पुलिस के हाथों आदिवासी प्रताड़ना का जबर्दस्त दौर चला। गांव के गांव खाली हो गए। सिर्फ अपनी नाक बचाने के लिए आदिवासियों को सलवा जुड़ूम के कैंप में ऐसे ठूंस दिया गया, मानो उनका गांव में रह पाना मुश्किल हो गया हो। सलवा जुड़ूम से आदिवासियों का जो हुआ सो हुआ, पर भाजपा और कांग्रेस के छुटभैये नेताओं की दुकानें खुल गई। इस अभियान की लोकप्रियता का सबूत देखिए कि आंदोलन के सिरमौर और छत्तीसगढ़ विधान सभा में विपक्ष यानी कांग्रेस विधायक दल के नेता महेंद्र कर्मा अपने ही गृहक्षेत्र दंतेवाड़ा में 2008 का विधानसभा चुनाव बुरी तरह से हार गए। अब रहा सवाल बातचीत या कार्रवाई का। अगर कार्रवाई हुई तो मरेगा आदिवासी ही।
नक्सलियों के बड़े नेताओं तक सुरक्षा बल शायद ही पहुंच पाएं। वे अब तक आपातकाल में बस्तर के अबूझ माड़ में पनाह लेते थे, पर उनका इतिहास बताता है कि वे अब तक वहां से भी किसी अधिक सुरक्षित स्थान पर पनाह ले चुके होंगे। नक्सल इलाकों में अब सिर्फ चौथे, पांचवें, छठे क्रम के यानी नामालूम किस्म के नेता बचे हैं। इन्हें ही मारकर श्रेय लेना हो तो बात अलग है। इनमें ज्यादातर स्थानीय आदिवासी हैं। ऐसे में आम आदिवासी और छुटभैये नक्सली नेता की पहचान कर पाना आसान नहीं है। सरकार को आदिवासियों की पहचान का भी कोई पक्का फार्मूला निकालना होगा ताकि उस पर निर्दोष लोगों की हत्या का कलंक न लगे।। कहीं ऐसा न हो कि आखिरी पंक्ति की इन नेताओं के चक्कर में सड़क चलते आदिवासी मार दिए जाएं। आदिवासियों की फितरत आम शहरियों से अलग है। वे आम लोगों में घुलने-मिलने से कतराते हैं। सरकारी योजनाओं को शक की नजर से देखते हैं।
इस अविश्र्वास का कारण है 1966 में बस्तर सरकारी गोलीकांड में वहां के शासक महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव की हत्या। इस कांड के लिए 2003 में कांग्रेस की तरफ से छत्तीसगढ़ के तत्कालीन मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने वहां की जनता से माफी मांगी थी और आदिवासी मान भी गए थे। इसके अलावा पिछले कुछ वर्षो में शिक्षा के प्रसार से भी उनमें मेलजोल का जज्बा जागने लगा था, पर यदि अबकी बार केंद्र और राज्य सरकारों ने कोई बड़ी दमनात्मक कार्रवाई की तो आदिवासियों का विश्र्वास फिर टूट जाएगा। और मुख्यधारा में शामिल होने के बजाय डरे-सहमे आदिवासी घने जंगलों में फिर से गरीबी और पिछड़ेपन के अभिशाप से ढक जाएंगे। इसलिए यह जरूरी है कि सरकार आदिवासियों के बीच जो भी कार्रवाई करे, ठोक बजा कर करे। इस बात पर कड़ाई से अमल हो कि मारे गए नक्सलियों के आंकडे़ बढ़ाने के लिए निर्दोष आदिवासियों को विद्रोहियों की वर्दी पहनाकर फर्जी एनकाउंटर न किए जाएं। पहले से पूरी खुफिया जानकारी लेकर चुनींदा ठिकानों पर छापे मारे जाएं और त्वरित कार्रवाई के जरिए अपना लक्ष्य हासिल करें, क्योंकि लंबे अभियानों में जंगली इलाकों में पुलिस या अर्द्ध सैनिक बलों के लिए नक्सलियों के सामने टिक पाना कठिन होगा और रिकार्ड बताता है कि उसमें ज्यादातर अभी तक सरकारी बलों के लोगों की जान गई है।
इसके अलावा केंद्रीय गृहमंत्री सरकारी ईमानदारी जताने और आदिवासियों के नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए निष्पक्ष पर्यवेक्षक भी वहां तैनात कर सकते हैं। इतना ही नहीं, केंद्र और राज्य सरकारों को हथियारबंद कार्रवाई से पूर्व आदिवासियों का विश्र्वास अर्जित करने के लिए आजादी के बाद से उनके विकास के लिए सरकारी खजाने से खर्च हुए अरबों रुपये का समग्र ऑडिट भी करवाना चाहिए। इसके अंतर्गत यह जांच होनी चाहिए कि जिन परियोजनाओं के मद में सरकारी पैसे के खर्च का हिसाब सरकारी खातों में दर्ज है, वे वास्तव में लागू भी की गई या फिर उनके पैसों से जगदलपुर, राजनांदगांव, अंबिकापुर, जशपुर, रायपुर, रांची, जमशेदपुर, नागपुर, गोंदिया, कटक, भुवनेश्र्वर, संबलपुर, जबलपुर, मंडला, बैतूल, वारंगल, महबूब नगर, हैदराबाद और उत्तर बंगाल के नगरों में सरकारी विभागों के कर्मचारियों और अफसरों ने आलीशान बंगले और शॉपिंग सेंटर बना लिए।
दरअसल, नक्सलवाद की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि जिन जगहों पर इसकी पैठ बनी है, वहां भूख से जूझते, जीवन के लिए संघर्ष कर रहे पुलिस और प्रशासन के अत्याचार से पीडि़त और शोषित करीब पांच करोड़ आदिवासियों का हुजूम है। मुल्क आजाद हो जाने के बावजूद सदियों शासन ने इनकी सुध नहीं ली। इनके दु:ख-दर्द नहीं बांटे। अपने पुरखों के जंगल में देश के आजाद होते ही आदिवासी भी आजादी की सांस लेने के बजाय बेगाने हो गए। जंगल का मालिक वन विभाग और उनके जीवन के मालिक पुलिसकर्मी बन गए। आजाद देश की जनता की सरकारों ने अपने कारकुनों को इन बेजुबान वनवासियों से लूट-खसोट और उन पर जुल्म करने से नहीं रोका, लेकिन नक्सलियों के पैर जमाते ही शासन को इनका खयाल आने लगा। इन्हें मुख्यधारा में शामिल करने की चिंता सताने लगी और उसके कारिंदे दुबकने लगे, मगर भ्रष्टाचार से बाज नहीं आए। पश्चिम से लेकर पूरब तक एक लंबी पट्टी में महाराष्ट्र, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्यप्रदेश और बंगाल के नक्शों पर नजर डालिए। स्पष्ट नजर आ जाएगा कि नक्सल प्रभावित इलाकों में कौन लोग बसे हैं और उनकी आमदनी कितनी है। उन्हें कितना पढ़ाया लिखाया गया है। उनकी जरूरतें पूरी करने के लिए सरकार ने क्या प्रबंध किए हैं। जो प्रबंध हैं, वे कितने कारगर हैं। क्या प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में तैनात डाक्टर की वहां मौजूदगी पर सरकार की तरफ से कभी नजर रखी गई है? बच्चों को मिलने वाले मिड-डे भोजन का किसी ने मुआयना करने की जरूरत समझी? उनकी आवागमन की तकलीफें, बाजार और रोजगार की सरकार को पहले कभी चिंता हुई है। यह चंद ऐसे अकाट्य तथ्य हैं, जिन्होंने इन इलाकों में नक्सलवाद को जड़ें जमाने में मदद की।
नक्सली चाहे जिस स्वार्थ से इन इलाकों में घुसे, पर वे इनके दर्द में हमदर्द हुए। वैसे सरकार भी चाहती तो इन इलाकों में पकड़ बना लेती। पर तब तो सरकारी नुमाइंदों का हाल यह था कि वे नक्सलियों की पकड़ बनने से पहले इन इलाकों में झांकते तक नहीं थे। उनकी नियुक्ति सिर्फ वेतन वसूली की रस्म अदायगी तक सीमित थी। वे शहरों से लगे कस्बों में बैठकर कागजों पर ही विकास योजनाओं को लागू करते और उनका पैसा अपनी जेबों के हवाले करते रहे। पर अफसोस कि सरकार ने इन्हें भी कभी नियंत्रित नहीं किया। उल्टे बंदूकधारी पुलिस को मनगंढ़त मामले दर्ज करने की छूट मिल गई। किसी भी गरीब की बेटी को उठाने का लाइसेंस मिल गया।
वजह सिर्फ इतनी कि वे जानते थे कि इस जंगल में कौन आएगा तस्दीक करने या फिर आज भी हिंदी बोलने या समझने में अक्षम गरीब आदिवासी किससे फरियाद करने जाएगा। और जरा उन सरकारी विज्ञापनों के दूसरे पहलू पर भी नजर डालिए, जिनकी असलियत घने जंगलों से छनकर कभी बाहर ही नहीं आती। जंगल के उस पार का सच विज्ञापन की इन तस्वीरों से भी भयानक है। वजह यही है कि जंगल में या तो पुलिस का शासन चलता है या नक्सलियों का। पुलिस ने भी नक्सलियों के नाम पर आम आदिवासियों के बेहिसाब एनकाउंटर किए हैं। पीयूसीएल की रिपोर्ट में ऐसी अनेक मुठभेड़ों का जिक्त्र है, जिनकी भनक कभी दुनिया को नहीं लगी। मिसाल के तौर पर बस्तर में मद्देड़ के सरपंच बंडे को तो सीआरपीएफ ने सिर्फ चुहलबाजी में मौत के घाट उतार दिया। उसने सीआरपीएफ की जीप के करीब से मोटरसाइकिल आगे निकालने की गुस्ताखी कर दी थी। जवानों द्वारा बस्तर के जंगलों में बलात्कार के दो चश्मदीदों को नदी में मरते दम तक डुबाया गया। इनमें से कोई भी नक्सली नहीं था मगर बस्तर कोई कश्मीर तो है नहीं, जिस पर पूरी दुनिया की निगाह लगी हो और जरा-सी जुंबिश होते ही सरकार को अपनी निष्पक्षता जताने कि लिए जांच बैठानी पड़े। इसलिए रोजमर्रा ऐसे जघन्य अत्याचारों के बावजूद आदिवासी इलाकों में इनका पर्दाफाश करने या विरोध के लिए न तो प्रेस में कोई खबर छपती है और न ही कोई आंदोलन हो पाता है। ये तथा अनेक ऐसे ही और भी तथ्य हैं, जिन्होंने मेहमान बनकर आए नक्सलियों का आदिवासियों से अटूट रिश्ता बना दिया।
शहरों में बैठे लोग यह कल्पना ही नहीं कर सकते कि पुलिस और प्रशासन के छुटभैये अफसर गांव और जंगलों में कैसे बिगड़ैल रईसजादों या शहंशाहों की तरह बर्ताव करते हैं। नक्सलियों ने कभी जंगल से बाहर न झांकने वाले आम आदिवासी को ऐसे ही लोगों के शोषण से निजात दिलाने में मदद की। यही वजह है कि आदिवासी उन्हें अपना सगा, रक्षक और मसीहा मानने लगे। उन्हें तो जो भी सुरक्षित जीवन की गारंटी देगा, उनका अपना हो जाएगा। नक्सली कौन हैं? शायद वे अब भी नहीं जानते। उन्हें यह भी नहीं पता कि वे किसी मकसद या सिद्धांत के लिए जीने-मरने वाले लोग है। आम आदिवासी को तो सिर्फ इतना पता है कि वे मुसीबत में उनके काम आते हैं और उनके डर से पुलिस और फॉरेस्ट विभाग का आतंक कम हुआ है। उनसे मिट्टी के मोल नमक के बदले कीमती चिरौंजी और शहर की छह झाड़ुओं के बराबर एक फूलझाड़ू मिट्टी के मोल खरीदने वाले व्यापारी अब उन्हें घर के दरवाजे पर अच्छी रकम दे जाते हैं। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस नेता महेंद्र कर्मा के नेतृत्व में सरकार समर्थित सलवा जुड़ूम को आदिवासियों ने इसीलिए पसंद नहीं किया। पूरी दुनिया में सलवा जुड़ूम को ऐसे प्रचारित किया गया, जैसे वह कोई अहिंसक गांधीवादी आंदोलन हो। असलियत यह थी कि सलवा जुड़ूम के नाम पर पुलिस के हाथों आदिवासी प्रताड़ना का जबर्दस्त दौर चला। गांव के गांव खाली हो गए। सिर्फ अपनी नाक बचाने के लिए आदिवासियों को सलवा जुड़ूम के कैंप में ऐसे ठूंस दिया गया, मानो उनका गांव में रह पाना मुश्किल हो गया हो। सलवा जुड़ूम से आदिवासियों का जो हुआ सो हुआ, पर भाजपा और कांग्रेस के छुटभैये नेताओं की दुकानें खुल गई। इस अभियान की लोकप्रियता का सबूत देखिए कि आंदोलन के सिरमौर और छत्तीसगढ़ विधान सभा में विपक्ष यानी कांग्रेस विधायक दल के नेता महेंद्र कर्मा अपने ही गृहक्षेत्र दंतेवाड़ा में 2008 का विधानसभा चुनाव बुरी तरह से हार गए। अब रहा सवाल बातचीत या कार्रवाई का। अगर कार्रवाई हुई तो मरेगा आदिवासी ही।
नक्सलियों के बड़े नेताओं तक सुरक्षा बल शायद ही पहुंच पाएं। वे अब तक आपातकाल में बस्तर के अबूझ माड़ में पनाह लेते थे, पर उनका इतिहास बताता है कि वे अब तक वहां से भी किसी अधिक सुरक्षित स्थान पर पनाह ले चुके होंगे। नक्सल इलाकों में अब सिर्फ चौथे, पांचवें, छठे क्रम के यानी नामालूम किस्म के नेता बचे हैं। इन्हें ही मारकर श्रेय लेना हो तो बात अलग है। इनमें ज्यादातर स्थानीय आदिवासी हैं। ऐसे में आम आदिवासी और छुटभैये नक्सली नेता की पहचान कर पाना आसान नहीं है। सरकार को आदिवासियों की पहचान का भी कोई पक्का फार्मूला निकालना होगा ताकि उस पर निर्दोष लोगों की हत्या का कलंक न लगे।। कहीं ऐसा न हो कि आखिरी पंक्ति की इन नेताओं के चक्कर में सड़क चलते आदिवासी मार दिए जाएं। आदिवासियों की फितरत आम शहरियों से अलग है। वे आम लोगों में घुलने-मिलने से कतराते हैं। सरकारी योजनाओं को शक की नजर से देखते हैं।
इस अविश्र्वास का कारण है 1966 में बस्तर सरकारी गोलीकांड में वहां के शासक महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव की हत्या। इस कांड के लिए 2003 में कांग्रेस की तरफ से छत्तीसगढ़ के तत्कालीन मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने वहां की जनता से माफी मांगी थी और आदिवासी मान भी गए थे। इसके अलावा पिछले कुछ वर्षो में शिक्षा के प्रसार से भी उनमें मेलजोल का जज्बा जागने लगा था, पर यदि अबकी बार केंद्र और राज्य सरकारों ने कोई बड़ी दमनात्मक कार्रवाई की तो आदिवासियों का विश्र्वास फिर टूट जाएगा। और मुख्यधारा में शामिल होने के बजाय डरे-सहमे आदिवासी घने जंगलों में फिर से गरीबी और पिछड़ेपन के अभिशाप से ढक जाएंगे। इसलिए यह जरूरी है कि सरकार आदिवासियों के बीच जो भी कार्रवाई करे, ठोक बजा कर करे। इस बात पर कड़ाई से अमल हो कि मारे गए नक्सलियों के आंकडे़ बढ़ाने के लिए निर्दोष आदिवासियों को विद्रोहियों की वर्दी पहनाकर फर्जी एनकाउंटर न किए जाएं। पहले से पूरी खुफिया जानकारी लेकर चुनींदा ठिकानों पर छापे मारे जाएं और त्वरित कार्रवाई के जरिए अपना लक्ष्य हासिल करें, क्योंकि लंबे अभियानों में जंगली इलाकों में पुलिस या अर्द्ध सैनिक बलों के लिए नक्सलियों के सामने टिक पाना कठिन होगा और रिकार्ड बताता है कि उसमें ज्यादातर अभी तक सरकारी बलों के लोगों की जान गई है।
इसके अलावा केंद्रीय गृहमंत्री सरकारी ईमानदारी जताने और आदिवासियों के नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए निष्पक्ष पर्यवेक्षक भी वहां तैनात कर सकते हैं। इतना ही नहीं, केंद्र और राज्य सरकारों को हथियारबंद कार्रवाई से पूर्व आदिवासियों का विश्र्वास अर्जित करने के लिए आजादी के बाद से उनके विकास के लिए सरकारी खजाने से खर्च हुए अरबों रुपये का समग्र ऑडिट भी करवाना चाहिए। इसके अंतर्गत यह जांच होनी चाहिए कि जिन परियोजनाओं के मद में सरकारी पैसे के खर्च का हिसाब सरकारी खातों में दर्ज है, वे वास्तव में लागू भी की गई या फिर उनके पैसों से जगदलपुर, राजनांदगांव, अंबिकापुर, जशपुर, रायपुर, रांची, जमशेदपुर, नागपुर, गोंदिया, कटक, भुवनेश्र्वर, संबलपुर, जबलपुर, मंडला, बैतूल, वारंगल, महबूब नगर, हैदराबाद और उत्तर बंगाल के नगरों में सरकारी विभागों के कर्मचारियों और अफसरों ने आलीशान बंगले और शॉपिंग सेंटर बना लिए।
नर्मदा पर बांध से पर्यावरण को नुकसान
भारत सरकार द्वारा गठित एक समिति की रिपोर्ट के मुताबिक सरदार सरोवर नर्मदा निगम लिमिटेड, गुजरात सरकार व नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र सरकार द्वारा शर्तों के घोर उल्लंघन के चलते पर्यावरण को भारी नुकसान हो रहा है।
भारत सरकार के पर्यावरण व वन मंत्रालय ने, नर्मदा घाटी में सरदार सरोवर और इन्दिरा सागर जैसे विवादास्पद बांधों के सुरक्षा उपायों को ध्यान में रखते हुए, भारतीय वन सर्वेक्षण के पूर्व महानिदेशक डाक्टर देवेन्द्र पाण्डेय की अध्यक्षता में 10 सदस्यों की एक विशेष समिति नियुक्त की थी। इस समिति ने अब दोनों बांध परियोजनाओं के सुरक्षा उपायों से जुड़े अपने सर्वेक्षण और अध्ययन की दूसरी अन्तरिम रिपोर्ट मंत्रालय को पेश की है, जिसमें जलग्रहण-क्षेत्र ट्रीटमेंट, लाभ-क्षेत्र विकास, वहन-क्षमता, क्षतिपूरक-वनीकरण, जीव-जन्तुओं और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असरों से संबंधित कई चौंकाने वाले तथ्य उजागर हुए हैं। साथ ही ऐसे कई अहम पर्यावरण पहलुओं को भी प्रकाशित किया गया है, जिनका अनुपालन नहीं हुआ है।
इस रिपोर्ट के मुताबिक सरदार सरोवर नर्मदा निगम लिमिटेड, गुजरात सरकार व नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र सरकार द्वारा शर्तों के घोर उल्लंघन के चलते पर्यावरण को भारी नुकसान हो रहा है। सरदार सरोवर और इन्दिरा सागर बांध परियोजनाओं को 1987 में सशर्त पर्यावरणीय मंजूरी मिलने के 23 साल बाद भी इन सबका अनुपालन नहीं हुआ है। जब तक ऐसा नहीं होता तब तक लाभों की प्राप्ति, टिकाऊ प्रवाह, पर्यावरणीय लागत और क्षति का न्यूनीकरण या हानिपूर्ति सम्भव नहीं है।
समिति ने सुझाव दिया है कि इन दोनों परियोजनाओं के जलाश्य को तब तक नहीं भरा जाए जब तक कि इनके जलग्रहण-क्षेत्र का पूरी तरह ट्रीटमेंट न हो जाए, जब तक कि जीव-जन्तुओं के संरक्षण के लिए मास्टर प्लान तैयार करने और वन्य जीवन अभ्यारण्य तैयार करने सहित बची हुई बहुत सारी आवश्यकताएं पूरी न हो जाएं। समिति मानती है कि नहर के नेटवर्क निर्माण का काम और आगे न किया जाए और यहां तक कि मौजूदा नेटवर्क से भी सिंचाई की अनुमति तब तक न दी जाए जब तक कि जल प्रबंध के अलावा लाभ-क्षेत्र के विभिन्न पर्यावरणीय मानदण्डों का पालन साथ-साथ न पाए। यह रिपोर्ट केन्द्रीय जल संसाधन मंत्रालय द्वारा 11,000 करोड़ रुपये (6777 करोड़ रुपये सरदार सरोवर परियोजना की नहरों के लिए और 4,000 करोड़ रुपये सरदार सरोवर के लाभ-क्षेत्र विकास के लिए) दिये जाने के निर्णय पर भी गंभीर सवाल उठाती है, जिसे अभी तक अंतिम रूप से मंजूरी नहीं दी गई है।
गौर करने लायक बात यह है कि गुजरात सरकार सरदार सरोवर बांध में 17 मीटर ऊंचे गेट लगाकर ऊंचाई को 122 मीटर से बढ़ाकर 138.68 मीटर करने की राजनैतिक मांग कर रही है, जबकि रिपोर्ट का सुझाव इसके बिल्कुल विपरीत है। दूसरी तरफ नर्मदा बचाओ आन्दोलन ने न केवल बहुत सारे पर्यावरणीय उपायों के उल्लंघन को उजागर किया है बल्कि कई पुनर्वास के फर्जीवाड़ों का भी पर्दाफाश किया है। नर्मदा बचाओ आन्दोलन की रिपोर्ट कहती है कि सरदार सरोवर के डूब क्षेत्र में 2 लाख से ज्यादा लोग रहते हैं, जबकि हजारों आदिवासी परिवारों ने अपनी जमीन और घरों को खो दिया है, फिर भी उनका पुनर्वास नहीं हुआ है।
भारत सरकार के पर्यावरण व वन मंत्रालय ने, नर्मदा घाटी में सरदार सरोवर और इन्दिरा सागर जैसे विवादास्पद बांधों के सुरक्षा उपायों को ध्यान में रखते हुए, भारतीय वन सर्वेक्षण के पूर्व महानिदेशक डाक्टर देवेन्द्र पाण्डेय की अध्यक्षता में 10 सदस्यों की एक विशेष समिति नियुक्त की थी। इस समिति ने अब दोनों बांध परियोजनाओं के सुरक्षा उपायों से जुड़े अपने सर्वेक्षण और अध्ययन की दूसरी अन्तरिम रिपोर्ट मंत्रालय को पेश की है, जिसमें जलग्रहण-क्षेत्र ट्रीटमेंट, लाभ-क्षेत्र विकास, वहन-क्षमता, क्षतिपूरक-वनीकरण, जीव-जन्तुओं और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असरों से संबंधित कई चौंकाने वाले तथ्य उजागर हुए हैं। साथ ही ऐसे कई अहम पर्यावरण पहलुओं को भी प्रकाशित किया गया है, जिनका अनुपालन नहीं हुआ है।
इस रिपोर्ट के मुताबिक सरदार सरोवर नर्मदा निगम लिमिटेड, गुजरात सरकार व नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र सरकार द्वारा शर्तों के घोर उल्लंघन के चलते पर्यावरण को भारी नुकसान हो रहा है। सरदार सरोवर और इन्दिरा सागर बांध परियोजनाओं को 1987 में सशर्त पर्यावरणीय मंजूरी मिलने के 23 साल बाद भी इन सबका अनुपालन नहीं हुआ है। जब तक ऐसा नहीं होता तब तक लाभों की प्राप्ति, टिकाऊ प्रवाह, पर्यावरणीय लागत और क्षति का न्यूनीकरण या हानिपूर्ति सम्भव नहीं है।
समिति ने सुझाव दिया है कि इन दोनों परियोजनाओं के जलाश्य को तब तक नहीं भरा जाए जब तक कि इनके जलग्रहण-क्षेत्र का पूरी तरह ट्रीटमेंट न हो जाए, जब तक कि जीव-जन्तुओं के संरक्षण के लिए मास्टर प्लान तैयार करने और वन्य जीवन अभ्यारण्य तैयार करने सहित बची हुई बहुत सारी आवश्यकताएं पूरी न हो जाएं। समिति मानती है कि नहर के नेटवर्क निर्माण का काम और आगे न किया जाए और यहां तक कि मौजूदा नेटवर्क से भी सिंचाई की अनुमति तब तक न दी जाए जब तक कि जल प्रबंध के अलावा लाभ-क्षेत्र के विभिन्न पर्यावरणीय मानदण्डों का पालन साथ-साथ न पाए। यह रिपोर्ट केन्द्रीय जल संसाधन मंत्रालय द्वारा 11,000 करोड़ रुपये (6777 करोड़ रुपये सरदार सरोवर परियोजना की नहरों के लिए और 4,000 करोड़ रुपये सरदार सरोवर के लाभ-क्षेत्र विकास के लिए) दिये जाने के निर्णय पर भी गंभीर सवाल उठाती है, जिसे अभी तक अंतिम रूप से मंजूरी नहीं दी गई है।
गौर करने लायक बात यह है कि गुजरात सरकार सरदार सरोवर बांध में 17 मीटर ऊंचे गेट लगाकर ऊंचाई को 122 मीटर से बढ़ाकर 138.68 मीटर करने की राजनैतिक मांग कर रही है, जबकि रिपोर्ट का सुझाव इसके बिल्कुल विपरीत है। दूसरी तरफ नर्मदा बचाओ आन्दोलन ने न केवल बहुत सारे पर्यावरणीय उपायों के उल्लंघन को उजागर किया है बल्कि कई पुनर्वास के फर्जीवाड़ों का भी पर्दाफाश किया है। नर्मदा बचाओ आन्दोलन की रिपोर्ट कहती है कि सरदार सरोवर के डूब क्षेत्र में 2 लाख से ज्यादा लोग रहते हैं, जबकि हजारों आदिवासी परिवारों ने अपनी जमीन और घरों को खो दिया है, फिर भी उनका पुनर्वास नहीं हुआ है।
नर्मदा पर बांध से पर्यावरण को नुकसान
नर्मदा पर बांध से पर्यावरण को नुकसान
भारत सरकार द्वारा गठित एक समिति की रिपोर्ट के मुताबिक सरदार सरोवर नर्मदा निगम लिमिटेड, गुजरात सरकार व नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र सरकार द्वारा शर्तों के घोर उल्लंघन के चलते पर्यावरण को भारी नुकसान हो रहा है।
भारत सरकार के पर्यावरण व वन मंत्रालय ने, नर्मदा घाटी में सरदार सरोवर और इन्दिरा सागर जैसे विवादास्पद बांधों के सुरक्षा उपायों को ध्यान में रखते हुए, भारतीय वन सर्वेक्षण के पूर्व महानिदेशक डाक्टर देवेन्द्र पाण्डेय की अध्यक्षता में 10 सदस्यों की एक विशेष समिति नियुक्त की थी। इस समिति ने अब दोनों बांध परियोजनाओं के सुरक्षा उपायों से जुड़े अपने सर्वेक्षण और अध्ययन की दूसरी अन्तरिम रिपोर्ट मंत्रालय को पेश की है, जिसमें जलग्रहण-क्षेत्र ट्रीटमेंट, लाभ-क्षेत्र विकास, वहन-क्षमता, क्षतिपूरक-वनीकरण, जीव-जन्तुओं और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असरों से संबंधित कई चौंकाने वाले तथ्य उजागर हुए हैं। साथ ही ऐसे कई अहम पर्यावरण पहलुओं को भी प्रकाशित किया गया है, जिनका अनुपालन नहीं हुआ है।
इस रिपोर्ट के मुताबिक सरदार सरोवर नर्मदा निगम लिमिटेड, गुजरात सरकार व नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र सरकार द्वारा शर्तों के घोर उल्लंघन के चलते पर्यावरण को भारी नुकसान हो रहा है। सरदार सरोवर और इन्दिरा सागर बांध परियोजनाओं को 1987 में सशर्त पर्यावरणीय मंजूरी मिलने के 23 साल बाद भी इन सबका अनुपालन नहीं हुआ है। जब तक ऐसा नहीं होता तब तक लाभों की प्राप्ति, टिकाऊ प्रवाह, पर्यावरणीय लागत और क्षति का न्यूनीकरण या हानिपूर्ति सम्भव नहीं है।
समिति ने सुझाव दिया है कि इन दोनों परियोजनाओं के जलाश्य को तब तक नहीं भरा जाए जब तक कि इनके जलग्रहण-क्षेत्र का पूरी तरह ट्रीटमेंट न हो जाए, जब तक कि जीव-जन्तुओं के संरक्षण के लिए मास्टर प्लान तैयार करने और वन्य जीवन अभ्यारण्य तैयार करने सहित बची हुई बहुत सारी आवश्यकताएं पूरी न हो जाएं। समिति मानती है कि नहर के नेटवर्क निर्माण का काम और आगे न किया जाए और यहां तक कि मौजूदा नेटवर्क से भी सिंचाई की अनुमति तब तक न दी जाए जब तक कि जल प्रबंध के अलावा लाभ-क्षेत्र के विभिन्न पर्यावरणीय मानदण्डों का पालन साथ-साथ न पाए। यह रिपोर्ट केन्द्रीय जल संसाधन मंत्रालय द्वारा 11,000 करोड़ रुपये (6777 करोड़ रुपये सरदार सरोवर परियोजना की नहरों के लिए और 4,000 करोड़ रुपये सरदार सरोवर के लाभ-क्षेत्र विकास के लिए) दिये जाने के निर्णय पर भी गंभीर सवाल उठाती है, जिसे अभी तक अंतिम रूप से मंजूरी नहीं दी गई है।
गौर करने लायक बात यह है कि गुजरात सरकार सरदार सरोवर बांध में 17 मीटर ऊंचे गेट लगाकर ऊंचाई को 122 मीटर से बढ़ाकर 138.68 मीटर करने की राजनैतिक मांग कर रही है, जबकि रिपोर्ट का सुझाव इसके बिल्कुल विपरीत है। दूसरी तरफ नर्मदा बचाओ आन्दोलन ने न केवल बहुत सारे पर्यावरणीय उपायों के उल्लंघन को उजागर किया है बल्कि कई पुनर्वास के फर्जीवाड़ों का भी पर्दाफाश किया है। नर्मदा बचाओ आन्दोलन की रिपोर्ट कहती है कि सरदार सरोवर के डूब क्षेत्र में 2 लाख से ज्यादा लोग रहते हैं, जबकि हजारों आदिवासी परिवारों ने अपनी जमीन और घरों को खो दिया है, फिर भी उनका पुनर्वास नहीं हुआ है।
भारत सरकार द्वारा गठित एक समिति की रिपोर्ट के मुताबिक सरदार सरोवर नर्मदा निगम लिमिटेड, गुजरात सरकार व नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र सरकार द्वारा शर्तों के घोर उल्लंघन के चलते पर्यावरण को भारी नुकसान हो रहा है।
भारत सरकार के पर्यावरण व वन मंत्रालय ने, नर्मदा घाटी में सरदार सरोवर और इन्दिरा सागर जैसे विवादास्पद बांधों के सुरक्षा उपायों को ध्यान में रखते हुए, भारतीय वन सर्वेक्षण के पूर्व महानिदेशक डाक्टर देवेन्द्र पाण्डेय की अध्यक्षता में 10 सदस्यों की एक विशेष समिति नियुक्त की थी। इस समिति ने अब दोनों बांध परियोजनाओं के सुरक्षा उपायों से जुड़े अपने सर्वेक्षण और अध्ययन की दूसरी अन्तरिम रिपोर्ट मंत्रालय को पेश की है, जिसमें जलग्रहण-क्षेत्र ट्रीटमेंट, लाभ-क्षेत्र विकास, वहन-क्षमता, क्षतिपूरक-वनीकरण, जीव-जन्तुओं और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असरों से संबंधित कई चौंकाने वाले तथ्य उजागर हुए हैं। साथ ही ऐसे कई अहम पर्यावरण पहलुओं को भी प्रकाशित किया गया है, जिनका अनुपालन नहीं हुआ है।
इस रिपोर्ट के मुताबिक सरदार सरोवर नर्मदा निगम लिमिटेड, गुजरात सरकार व नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र सरकार द्वारा शर्तों के घोर उल्लंघन के चलते पर्यावरण को भारी नुकसान हो रहा है। सरदार सरोवर और इन्दिरा सागर बांध परियोजनाओं को 1987 में सशर्त पर्यावरणीय मंजूरी मिलने के 23 साल बाद भी इन सबका अनुपालन नहीं हुआ है। जब तक ऐसा नहीं होता तब तक लाभों की प्राप्ति, टिकाऊ प्रवाह, पर्यावरणीय लागत और क्षति का न्यूनीकरण या हानिपूर्ति सम्भव नहीं है।
समिति ने सुझाव दिया है कि इन दोनों परियोजनाओं के जलाश्य को तब तक नहीं भरा जाए जब तक कि इनके जलग्रहण-क्षेत्र का पूरी तरह ट्रीटमेंट न हो जाए, जब तक कि जीव-जन्तुओं के संरक्षण के लिए मास्टर प्लान तैयार करने और वन्य जीवन अभ्यारण्य तैयार करने सहित बची हुई बहुत सारी आवश्यकताएं पूरी न हो जाएं। समिति मानती है कि नहर के नेटवर्क निर्माण का काम और आगे न किया जाए और यहां तक कि मौजूदा नेटवर्क से भी सिंचाई की अनुमति तब तक न दी जाए जब तक कि जल प्रबंध के अलावा लाभ-क्षेत्र के विभिन्न पर्यावरणीय मानदण्डों का पालन साथ-साथ न पाए। यह रिपोर्ट केन्द्रीय जल संसाधन मंत्रालय द्वारा 11,000 करोड़ रुपये (6777 करोड़ रुपये सरदार सरोवर परियोजना की नहरों के लिए और 4,000 करोड़ रुपये सरदार सरोवर के लाभ-क्षेत्र विकास के लिए) दिये जाने के निर्णय पर भी गंभीर सवाल उठाती है, जिसे अभी तक अंतिम रूप से मंजूरी नहीं दी गई है।
गौर करने लायक बात यह है कि गुजरात सरकार सरदार सरोवर बांध में 17 मीटर ऊंचे गेट लगाकर ऊंचाई को 122 मीटर से बढ़ाकर 138.68 मीटर करने की राजनैतिक मांग कर रही है, जबकि रिपोर्ट का सुझाव इसके बिल्कुल विपरीत है। दूसरी तरफ नर्मदा बचाओ आन्दोलन ने न केवल बहुत सारे पर्यावरणीय उपायों के उल्लंघन को उजागर किया है बल्कि कई पुनर्वास के फर्जीवाड़ों का भी पर्दाफाश किया है। नर्मदा बचाओ आन्दोलन की रिपोर्ट कहती है कि सरदार सरोवर के डूब क्षेत्र में 2 लाख से ज्यादा लोग रहते हैं, जबकि हजारों आदिवासी परिवारों ने अपनी जमीन और घरों को खो दिया है, फिर भी उनका पुनर्वास नहीं हुआ है।
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