bhedaghat

bhedaghat
भेड़ाघाट

Friday, February 26, 2010

मूर्तियों के प्रदेश में मौत मांगते किसान

उत्तर प्रदेश में एक तरफ मुख्यमंत्री मायावती ने पत्थर की मूर्तियां लगाने में लाखों करोड़ों रुपए पानी की तरह बहा दिया है वहीं प्रदेश के किसान सरकार की बेरुखी से मौत मांगते फिर रहे हैं। वैसे तो प्रदेश में सैकड़ों किसान बेहाल हैं लेकिन यह एक ऐसे किसान की कहानी है जो सोलह साल से भू माफियाओं से अपनी चार एकड़ जमीन को बचाने के लिए सत्ता से संघर्ष कर रहा है और अब वह थक-हार कर आत्महत्या करना चाहता है। लंबे संघर्ष और कोर्ट कचहरी के चक्कर ने न केवल गरीब चंदन सिंह बंजारा की कमर तोड़ दी है बल्कि उसके ऊपर हजारों का कर्ज भी लाद दिया है। 11 लोगों का परिवार चलाना उसके लिए अब मुश्किल हो गया है। उपर से अधिकारियों ने उसे एक लाख रूपये का ट्यूबेल के बिजली का बिल थमा दिया है। लिहाजा, चंदन सिंह अब दरबदर ठोकरें खाने की बजाए अपनी इहलीला ही समाप्त कर देना चाहता है। लेकिन आत्महत्या करना यहां कानूनन जुर्म है। चंदन सिंह बंजारा अधिकारियों के सामने कई बार आत्महत्या का प्रयास कर चुका है। लेकिन हर बार लोगों ने उसे बचा लिया। एक बार जिला मजिस्ट्रेट के सामने आत्महत्या के करने के प्रयास में चंदन सिंह को 14 दिन हवालात में भी बिताने पड़े। जब चंदन ने हवालात से बाहर आने से इनकार कर दिया (चंदन का कहना था कि हवालात में उसे रोटी मिल रही है घर में भूखा रहना पड़ता है) तो पुलिस उसे जबरन गांव छोड़ गई। लिहाजा, इस बार वह राष्ट्रपति से मय परिवार सामूहिक आत्महत्या की इजाजत देने की गुहार लगा रहा है। उधर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव कहते हैं कि 'यह तो एक उदाहरण भर है। दलितों के नाम पर पार्टी बनाने और उन्हीं के वोट से सत्ता सुख भोग रही बहनजी अब दलितों को भूल गई हैं।Ó वैसे देखा जाए तो मुलायम सिंह यादव की भी कथनी-करनी अगर सही रहती तो यह हालात पैदा नहीं होते।पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरपुर जिले के कैराना तहसील याहियापुर गांव के रहने वाले अनुसूचित जनजाति के साठ वर्षीय चंदन सिंह बंजारा के जीवन में 20 साल पहले एक सरकारी घोषणा ने जहर घोल दिया। किसानों के लिए लाभदायी इस घोषणा ने चंदन सिंह को लाभ पहुंचाने की बजाए मौत को गले लगाने के लिए विवश कर दिया है। सरकारी अमले में बैठे भ्रष्ट अधिकारियों ने धोखे से चंदन सिंह बंजारा की जमीन को भूमाफियाओं को बेच दिया। बात सन 1985 की है, ये दिन चंदन सिंह की खुशहाली के दिन थे। तब मेहनतकश इस किसान ने अपने खेतों में ट्यूबेल लगवाने के लिए सरकार से 10 हजार रुपए का कर्ज लिए थे। पांच सालों में उसने कर्ज के करीब 5,700 रुपये वापस कर दिए। इसी दौरान जनता दल की वीपी सिंह सरकार ने किसानों के 10 हजार रुपये तक के कर्ज माफ करने की घोषणा की। इस घोषणा से चंदन सिंह फूले नहीं समाए। चंदन सिंह बंजारा कहते हैं, ''तब एक दिन कुछ सरकारी कर्मचारी मेरे घर आए और बताया कि तुम्हारा कर्जा माफ हो जाएगा, लेकिन इसके लिए तुम्हें हमें दो हजार रुपये देने पड़ेंगे।ÓÓ चंदन सिंह बंजारा के तब इतने पैसे नहीं थे। एक बार उन्होंने सोचा की साहूकार से कर्ज लेकर वह कर्मचारियों को रिश्वत दे दें, लेकिन फिर उन्हें लगा कि जब सरकार ने घोषणा कर दी है तो जब सबका कर्ज माफ होगा तो उनका भी होगा। लेकिन चंदन सिंह ने गलत सोचा था। रिश्वत के भूखे सरकारी बैंक के कारिंदों ने चंदन सिंह का नाम कर्ज माफी की सूची में शामिल नहीं किया। लेकिन इसके बाद जो कुछ हुआ उसने चंदन सिंह की कमर तोड़ दी। फरवरी, 1992 में उन्हें तहसीलदार के यहां से एक नोटिस मिलता है तो उनके पांव के नीचे से जमीन खिसक जाती है। यह कर्ज की रिकबरी का आदेश था। इस रिकबरी आदेश के मुताबिक चंदन सिंह की बकाया कर्ज राशि मय ब्याज सहित 12,384 रूपये हो चुकी थी और इसे फौरन सरकारी खजाने में जमा करने का आदेश था। चंदन सिंह के पास इतने पैसे नहीं थे। लिहाजा, कर्ज अदायगी न कर पाने के बाद पुलिस चंदन सिंह को पकड़ कर थाने ले गई और उन्हें 14 दिन तक हिरासत में रखा। अंगूठाटेक चंदन सिंह बंजारा भोलेपन में कहते हैं कि ''मैं पढ़ा लिखा नहीं हूं, मुझे लगा कि जब मुझे जेल हो गई तो अब मेरा कर्ज माफ हो गया और पैसा नहीं देना पड़ेगा। इसके बाद मुझे कभी रिकबरी का नोटिस भी नहीं आया।ÓÓ इस घटना के करीब तीन साल बाद एक दिन चंदन सिंह बंजारा की जमीन पर कब्जा करने कुछ लोग आते है और पता चलता है कि सरकार ने कर्ज अदायगी न कर पाने के एवज में उनकी 21 बीघे जमीन को 19 जुलाई, 1994 को हरबीर सिंह को नीलाम कर दिया है। हैरान परेशान चंदन सिंह भारतीय किसान यूनियन के नेताओं से संपर्क करते हैं। यूनियन और गांव के लोगों ने मिल कर फिलहाल तब जमीन पर कब्जा नहीं होने दिया। इसके पीछे किसानों की एक जुटता थी जब जमीन मालिक चंदन से कब्जा लेते आता गांव और यूनियन के लोग एकजुट होकर उसे गांव से भगा देते। यूनियन के नेताओं की तहकीकात से इस बात का खुलासा हुआ की कैसे तहसीलदार और पटवारी की मिलीभगत से चंदन सिंह की जमीन को गुपचुप तरीके बेच दिया गया। इस मामले को लेकर आंदोलन चलाने वाले भारतीय किसान यूनियन के प्रदेश उपाध्यक्ष चौधरी देश पाल सिंह कहते हैं, ''कर्ज अदायगी न कर पाने पर सरकार जब किसी की जमीन नीलाम करती है तो इसके बारे में संबंधित व्यक्ति के दरवाजे पर न केवल नोटिस चिपकाया जाता है बल्कि इस बारे में गांव में मुनादी कराई जाती है और अखबारों में इश्तहार भी दिया जाता है। लेकिन चंदन के मामले में ऐसा कुछ भी नहीं किया गया। चंदन की 21 बीघे यानी करीब चार एकड़ जमीन को महज 90 हजार रूपये में नीलाम कर दिया गया। जबकि उस समय इस जमीन का बाजार भाव 15 लाख रूपये से कहीं ज्यादा था। इस समय तो इस जमीन की कीमत करीब 50 लाख है.ÓÓन्याय की मांग को लेकर चंदन सिंह बंजारा पिछले 10 सालों में दर्जनों बार तहसीलदार से लेकर एसडीएम और डीएम के सामने धरना दे चुके हैं। कई बार तो आत्महत्या का भी प्रयास कर चुके हैं। मामले की जांच भी हुए। सिटी मजिस्ट्रेट ने अपनी जांच में साफ पाया कि तहसील अधिकारियों अधिकारियों ने चंदन सिंह की बिना जानकारी के और नियम-कानूनों की धजिज्यां उड़ाते हुए उसकी जमीन को सस्ते में नीलाम कर दिया। सिटी मजिस्ट्रेट की जांच रिपोर्ट और दूसरे ऐसे कई दस्तावेज मौजूद है जिससे साबित होता है कि है तहसील अधिकारियों और भू माफियाओं की सांठगांठ ने चंदन सिंह के साथ धोखाधड़ी कर जमीन को नीलाम करवा दिया। जांच रिपोर्ट में साफ लिखा है, ''वसूली मांग पत्र में अंतर्निहित धनराशि 12,384.50 रूपये के सापेक्ष निलाम की गई भूमि का सर्किल मूल्य 1,60,080 रूपये है। इतनी छोटी धनराशि के सापेक्ष इतने बड़े भूखंड को नीलाम किया जाना संदेह की स्थित पैदा करता है। इस छोटी धनराशि की वसूली कुर्क शुदा भूमि पर लगी आवर्ती फसलों की नीलामी से भी की जा सकती थी। सिटी मजिस्ट्रेट की जांच के बाद साफ हो गया कि चंदन सिंह के साथ नाइंसाफी हुई है। इस जांच रिपोर्ट के आधार पर कमिश्नर ने एक आदेश जारी किया कि कर्ज की रकम मय ब्याज सहित जितनी बनती है उसका एक माह में भुगतान कर चंदन सिंह अपनी जमीन को वापस पा सकता है। भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत कहते हैं, ''तत्कालीन कमिश्नर का यह आदेश भी तर्क संगत नहीं था। होना यह चाहिए था कि दोषी अधिकारियों को सजा दी जाती और चंदन सिहं को उसकी जमीन का मालिकाना हक बिना किसी हर्जाने के वापस कर दिया जाता। लेकिन सरकार ने गरीब और निर्दोष चंदन सिंह से कर्ज की राशि 8,464 रूपये के एवज में करीब 60,000 रूपये वसूले। जबकि कर्ज की यह राशि भी वीपी सिंह सरकार ने माफ कर दिया था।ÓÓ वे सवाल करते हुए कहते हैं, ''उत्तर प्रदेश में दलितों की सरकार है। अगर मायावती के राज में अनुसूचित जनजाति के चंदन सिंह बंजारा को न्याय नहीं मिलेगा तो कब मिलेगा। दोषी अधिकारियों को तो जेल होनी चाहिए लेकिन सजा दिलाने की बजाए अधिकारी उन्हें बचाने में लगे हैं। ÓÓ यह जानते हुए कि कर्ज की मय ब्याज सहित रकम करीब 60 हजार रूपये का फौरन भुगतान करना चंदन सिंह के बस की बात नहीं है। मजबूरन कर्ज लेकर सरकार को अदा करने वाले चंदन सिंह के मित्र और मददगार योगेंद्र सिंह कहते हैं, ''मैने अपनी जमानत पर प्रति माह पांच रूपये सैकडे की दर से शहर के एक व्यापारी से चंदन सिंह को 50,000 रूपये कर्ज दिलवाया है। रकम भरने के बाद भी अधिकारी जमीन चंदन सिंह के नाम करने में हिल्ला हवाली कर रहे हैं। लिहाजा, न्याय की आस छोड़ झुके चंदन अब हुक्करानों के आगे गिड़गिड़ाने की बजाए, अपना जीवन ही समाप्त कर लेना चाहते हैं।

Thursday, February 25, 2010

बे-कार मुख्यमंत्री है शिवराज

मध्य प्रदेश विधान सभा में आज मुख्यमंत्री शिवराज सिंह को मुख्यमंत्री बने और उसके बाद दोबारा मुख्यमंत्री बने काफी वक्त हो गया और वे अभी तक अपनी कार नहीं खरीद सके। मुख्यमंत्री के नाते उनके पास कारो का काफिला है मगर निजी तौर पर उनकी पत्नी साधना सिंह के पास दस साल पुरानी एक एंबेसडर कार है जिसका बाजार भाव किसी भी हाल में एक लाख रुपए से ज्यादा नहीं होगा।
शिवराज सिंह अकेले मंत्री हैं जिन्होंने विधानसभा में अपनी संपत्ति का ब्यौरा दिया है। यह ब्यौरा चौकाने वाला भी है और उन लोगों को चुप कराने वाला भी जो शिवराज सिंह और उनके परिवार पर मोटी कमाई के इल्जाम लगाते रहे हैं। मुख्यमंत्री द्वारा पेश सम्पत्ति के ब्यौरे के अनुसार उनके नाम पर कोई वाहन नहीं हैं और उनकी पत्नी साधना सिंह के पास वर्ष 2000 माडल की एक एम्बेसडर भर है। चौहान ने आज सदन में अपनी सम्पत्ति का ब्यौरा पटल पर रखा।
सदन में केवल मुख्यमंत्री ने अपनी और अपनी पत्नी की सम्पत्ति का ब्यौरा रखा जबकि मंत्रिमंडल के किसी अन्य सदस्य ने सम्पत्ति का ब्यौरा पेश नहीं किया। सदन में पेश किए गए ब्यौरे के अनुसार मुख्यमंत्री की स्वंय की एलआईसी का वार्षिक प्रीमियम 6617 दोनो पुत्रों की एलआईसी 10610 का वार्षिक प्रीमियम, नेशनल सेविंग सार्टिफिकेट 60000 रुपए तथा 64 ग्राम सोना और जेवरात हैं। साथ ही उनके पास जहां एक रिवाल्वर है वहीं एक लाख 80 हजार का घरेलू सामान भी है जबकि 14 लाख रुपए उन्होंने अपनी पत्नी साधना सिंह को एडवांस के रुप में दिए हैं। इसके अलावा चौहान एवं उनके दोनो पुत्रों के नाम बैंकों में 13 लाख रुपए जमा हैं। इसके अलावा ग्राम जैत में 4.79 एकड़ विदिशा जिले के ग्राम वैश्य में 1.29 हैक्टर, विदिशा के एम।पी।नगर में एक मकान तथा विधायक परिसर में 23 लाख रुपए के बैक ऋण पर एक मकान है जबकि इस ऋण में से 16 लाख रुपए का रिण बकाया है। मुख्यमंत्री ने अपनी पत्नी साधना सिंह की सम्पत्ति का ब्यौरा भी सदन में पेश किया। इसके अनुसार उनके पास एक एम्बेसडर कार 2000 माडल, स्वयं की एलआईसी पालिसी का वार्षिक प्रीमियम 6287 रुपए, नेशनल सेविंग सर्टिफिकेट 20 हजार रुपए सोना एवं जेवरात 470 ग्राम हैं जबकि नगद एवं बैंकों में जमा राशि 4.70 लाख रुपए हैं। इसके अलावा साधना सिंह के पास विदिशा जिले के ग्राम वैश्य में 4.725 हैक्टर कृषि भूमि जिसमें 45 हजार वर्गफुट पर वेयर हाउस बना है, अरेरा कालोनी भोपाल में एक फ्लैट, विदिशा स्थित वेयर हाउस पर 36 लाख का रिण और सर्वधर्म कालोनी में प्लाट के लिए 41 हजार रुपए का अग्रिम जमा है।

मौत यहां अतिथि नहीं

मौत के मामले में देखा जाए तो वह यहां किसी अतिथि की तरह न आकर हमेशा डेरी डाले रहती है। भारत में अधिकत्तर मौतें भोजन के अभाव में होती हैं जबकि अनाज से और खास तौर पर निर्यात होने वाले चावल से भारतीय खाद्य निगम के गोदाम भरे पड़े हैं। बाजारों में महंगी से महंगी शराबे मिलती है। छतों पर डिश एंटिना लगे हुए हैं। होटलों में शाही पनीर और मुर्गे की टांग मिलती है। फिर भी यहां भूख है।
भूख से मौत के लिए वैसे तो उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश भी कुख्यात हैं लेकिन उड़ीसा को तो जैसे इसका शाप मिला हो। पूरे देश से सूखे और अकाल की आ रही है लेकिन इन खबरों में कालाहांडी का नाम नहीं हैं। कालाहांडी भूख और अकाल से होने वाली मौतों का एक ऐसा मुहावरा बन गया है कि वहां भूख और अकाल अब खबर नहीं बनते। पश्चिमी उड़ीस के बोलांगीर मेें तो इथियोपिया के बाद सबसे ज्यादा मौत की खबरे आती है। वह भी भूख से मौत की खबरे। वैसे भारत में अकाल और आपदाओं के उपकारधर्मी पर्यटन का, कालाहांडी एक तीर्थ भी हैं। यहां आम तौर पर देश, विदेश से चंदा ले कर चलने वाले, और अकाल मिटाने का दावा करने वाले तमाम सामाजिक संगठन है जिन्हें बोलचाल की भाषा में एनजीओ कहा जाता है आते रहते हैं। इस सूखे के मौसम में भी कालाहांडी हरा भरा है। धान के खेतों में पानी भरा है। फसल पिछली बार भी अच्छी हुई थी और इस बार भी अच्छी होने की उम्मीद है। सबसे ज्यादा इस इलाके में धान ही होता है और वह भी इस स्तर का कि आम तौर पर निर्यात किया जाता है। ये धान उगाने वाले किसान भूखे रहते है या अपने ही खेतों पर मजदूरी करते है। इस पूरे इलाके में सूदखोरी का धंधा इतनी निर्लज्जता से चलता है कि बड़े से बड़ा बेशर्म शर्मा जाए। एक रुपए पर अस्सी पैसा ब्याज यानी ब्याज का प्रतिशत 80 फीसदी और वह भी प्रति माह। डागोस और जेनेवा में भारतीय निर्यात और विकास दर की घोषणा करने वाले हमारे सत्ता के सूत्रधार जानते हैं कि 13 प्रतिवर्ष से ज्यादा ब्याज लेना अपराध है लेकिन पश्चिमी उड़ीसा के ज्यादातर जिलों में यह अपराध सामाजिक और सामुदायिक आधार पर चलता रहता है और किसी को ऐतराज नहीं होता। कालाहांडी की ओर सबसे पहले ध्यान दिया था इंदिरा गांधी ने। वे 1980 में कालाहांडी के दौरे पर गई थी और केबीके विकास बोर्ड की घोषणा कर के आई थी। इस कोष में सारा पैसा केंद्र सरकार को देना तय हुआ था। मगर सरकारी माल आ रहा है और उसका बंटवारा होना है तो स्थानीय विधायकों और सांसदों में बोर्ड का सदस्य बनने की होड़ मच गई और वोट बैंक की राजनीति में बोर्ड बन ही नहीं पाया। भारतीय जनतंत्र को भूख तंत्र भी कहा जा सकता है। 1984 में राजीव गांधी यहां आए। उन्होने काफी फिल्मी अंदाज में एक खेत की जमीन से उठा कर कहा कि वे अपनी मां के वायदे को पूरा करेंगे। मगर जल्दी हीे अरुण नेहरू, अरुण सिंह और रोमी छाबड़ा जैसे उनके चमचों ने जो क्लब और कॉरपोरेट संस्कृति के अलावा कुछ नहीं जानते थे, ने राजीव गांधी को कंप्यूटरों की दुनिया में फंसा दिया और फिर बोफोर्स का बवाल आया और राजीव गांधी कालाहांडी भूल गए। सोनिया गांधी 2004 में यूपीए सरकार बनने के बाद यहां आई और विकास का वायदा कर के चली गईं। राहुल गांधी तो अभी 2008 में वहां गए और कहा कि वे सरकार को विकास के लिए मजबूर करेंगे। भारतीय जनता पार्टी का रिकॉर्ड भी कालाहांडी की भूख के मामले में बहुत उज्जवल नहीं हैं। अटल बिहारी वाजपेयी जब प्रधानमंत्री थे तो मैं खुद कालाहांडी के कई निवासियों को अपनी पहल पर उनसे मिलवाने ले कर गया था। मेरी गोद में नुआपाड़ा जिले के खरियार ब्लॉक के एक गांव की चार साल की लड़की कुंजबनी भी थी। कुंजबनी जब पैदा हुई थी तो उसके पिता ने अस्पताल के खर्चे के लिए 1600 रुपए का कर्ज लिया था और उन चार सालों में वह अभागा पिता 12 हजार रुपए चुका था मगर सूद के आठ हजार रुपए बाकी थे और मूलधन अलग से। श्री वाजपेयी ने धीरज से सुना था और कुंजबनी के माथे पर हाथ रख कर कहा था कि कालाहांडी के लोगों के साथ न्याय किया जाएगा। कुंजबनी अब 15 साल की हो चुकी है। उसके जन्म के लिए जो कर्ज लिया गया था वह अभी तक चुका नहीं हैं और वह भोली बच्ची अब बंधक मजदूर के तौर पर काम कर रही है। अटल बिहारी वाजपेयी को पोखरण और पाकिस्तान से ही फुरसत नहीं मिली। कालाहांडी हमारे अति विशिष्ट महानुभावों की राजनैतिक रासभूमि हैं और इसीलिए नुआपाड़ा में एक हवाई अड्डा बनाया गया है। कालाहांडी का इतना ही विकास हुआ है। कई वर्ष पहले जब गुजरात के कच्छ इलाके में भयानक चक्रवात आया था तो संयोग से मैं वहीं था। इसे आप मेरी नियति कहें या कोई विधि का विधान कि कई महासंकटों में मैं उसी क्षण उसी जगह मौजूद रहा हूं। एक दिन देर हो जाती तो कांधार ले जाए गए विमान में भी मैं होता। एक दिन पहले काठमांडू से लौटा था। कच्छ और गांधीधाम इलाके में मैं गया था नमक पैदा करने के व्यापार ओैर आयोडाइज्ड नमक के मिथक को ठीक से समझने मगर चक्रवात के बाद वहीं रह गया। जब लाशे गिनी गई तो उनमें से 200 से ज्यादा कालाहांडी और आसपास के जिलों के लोगों की थी। वे बेचारे अपने खेत, घर और खलिहान छोड़ कर गुजरात के समुद्र तट पर मजदूरी करने गए थे और उनमें से ज्यादातर के नाम ठेकेदारों ने रजिस्टरों मे लिखे ही नहीं थे इसलिए उन्हें कोई मुआवजा नहीं मिला। ये उस कालाहांडी के वासी थे जहां भारतीय कृषि मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार भारत में सबसे ज्यादा प्रति व्यक्ति खाद्यान्न पैदा होता है। लेकिन उनके लिए नही। अपने रायपुर में ज्यादातर रिक्शा चलाने वाले उड़ीसा के इसी इलाके के हैं। उनकी जमीन पर सूदखोरों ने कब्जा कर लिया हैं। कानून के अनुसार दलितों और आदिवासियों की जमीन पर कोई गैरआदिवासी या गेैर दलित स्वामित्व नहीं दिखा सकता इसलिए सूदखोरों के बहुत सारे आदिवासी और दलित नौकर हैं जो कालाहांडी, बोलांगिर और कोरापुट में साइकिलो पर घूमते रहते हैं और उन्हें पता भी नहीं हैं कि वे हजारों एकड़ जमीन के मालिक है। दस्तावेज उनके मालिकों के पास रखे हैं। उन्होंने तो सिर्फ अंगूठा लगाया है। उड़ीसा के लिए भारत सरकार ने एक केंद्रीय विश्वविद्यालय स्थापित करने का ऐलान किया है। 1988 से यह मांग चल रही है कि केबीके जिलों में से किसी में यह विश्वविद्यालय स्थापित किया जाए। लिख कर ले लीजिए कि नवीन पटनायक ऐसा नहीं होने देंगे। उन्हें अपने समुद्र तटीय इलाके से प्रेम हैें। कालाहांडी की जमीन अब खनिज उत्पादन के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों को लीज पर दे दी गई है और उससे इन किसानों का कोई लाभ नहीं होने वाला।

Wednesday, February 24, 2010

मोहंती पर सरकार ने कसा शिकंजा


सात अरब के घोटाले के आरोपी के खिलाफ विभागीय जांच के आदेश

औद्योगिक विकास निगम में हुए लगभग सात सौ चौदह करोड़ के घोटाले में फंसे तत्कालीन प्रबंधक एसआर मोहंती पर राज्य सरकार ने शिकंजा कसते हुए विभागीय जांच के आदेश दिए हैं। सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित रहने के कारण मंत्रालय में लगभग तीन वर्ष से लंबित इस प्रकरण में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने हस्ताक्षर करते हुए विभागीय जांच की अनुंशा कर समयसीमा में रिर्पोट प्रस्तुत करने का आदेश दिया है।
उल्लेखनीय है कि औद्योगिक विकास निगम के तत्कालीन प्रबंध संचालक एसआर मोहंती ने बिना किसी नियम का पालन करते हुए देशभर की लगभग 177 कंपनियों को 714 करोड़ का ऋण बांट दिया था। इस मामले में 30.11.1998 को तत्कालीन प्रबंधक संचालक एमपी राजन ने संचालक मंडल की बैठक में यह प्रस्ताव भी पारित कराया था कि एमपीएसआईडीसी किसी भी संस्थान से 175 करोड़ के स्थान पर 500 करोड़ तक की सहायता राशि प्राप्त करें। शासन द्वारा इस प्रस्ताव के संबंध में आपत्ति भी की गई। लेकिन इन अधिकारियों ने जानबूझकर प्रस्ताव के संबंध में शासन को गुमराह करते हुए किसी तरह का अनुमोदन नहीं लिया और न ही कार्पोरेट डिपाजिट दिए जाने के लिए कोई नियम ही बनाए। इस तरह अल्प अवधि के लिए दिये जाने वाले डिपाजिट (एक वर्ष से कम अवधि के लिए) को प्रबंध संचालक द्वारा तीन वर्ष एवं पांच वर्ष तक की अवधि में तब्दील कर एमपीएसआईडीसी के तात्कालीन प्रबंध संचालक एमपी राजन एवं एसआर मोहंती ने अनाधिकृत रूप से डिपाजिट प्राप्त किया एवं उसे आईसीडी के रूप में वितरित कर दिया। जबकि प्रस्ताव में यह पारित कराया गया था कि एमपीएसआईडीसी के सरप्लस फंड का उपयोग किया जाएगा। प्रबंध संचालकों ने कार्पोरेट डिपाजिट के रूप में वितरित की जाने वाली राशि बिना सिक्योरिटी जमा कराए ही वितरित कर दी। जिसमें इस तथ्य को भी नजर अंदाज किया गया कि उपरोक्त राशि वापस होने की संभावना है या नहीं। घोटाला उजागर होने पर सरकार ने एमपीएसआईडीसी द्वारा जिन 42 कम्पनियों को आईसीडी की राशि वितरित की गई उसका मूल रिकॉर्ड जब्त किया गया एवं 23 अधिकारियों / कर्मचारियों से पूछताछ कर कथन भी लिए गए थे। मामले में तात्कालीक चेयरमैन और दोनों पूर्व प्रबंध संचालकों के अलावा जिन कंपनियों को ऋण वितरित किया गया उनमें से 17 कम्पनियों के संचालकों से पूछताछ की जा चुकी है। तत्कालीन मुख्यमंत्री उमाभारती ने लगभग सात अरब रुपए के घोटाले पर कार्रवाई करने के निर्देश देते हुए आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो में प्रकरण दर्ज कराया। आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो ने प्रकरण क्रमांक 25/04 अंडरसेक्शन 409, 420, 467, 468, 120 बी, 13 (आई) (डी) आरडब्ल्यू 13 (आईआई) पीसी-एसीटी का समावेश कर श्री मोहंती के विरुद्ध एफआईआर दर्ज की। इस मामले में मुख्य सचिव विजय सिंह के दबाब में सामान्य प्रशासन विभाग ने उपसचिव सामान्य प्रशासन विभाग के माध्यम से माननीय उच्च न्यायालय में 18 जनवरी 06 को हलफनामा प्रस्तुत किया। इस मामले में एसआर मोहंती ने हलफनामा प्रस्तुत करने के दिन 18 जनवरी 06 ही माननीय उच्च न्यायालय में आवेदन लगाकर जल्दी सुनवाई करने का निवेदन किया। राज्य सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा श्री मोहंती के पक्ष में हलफनामा प्रस्तुत करने से उच्च न्यायालय ने भी मोहंती के पक्ष में निर्णय दिया। न्यायालय द्वारा अरबों रुपए के घपले में फसे सुधी रंजन मोहंती को क्लीन चिट देने की जानकारी जब समाचार पत्रों द्वारा प्रमुखता से प्रकाशित हुई तब मुख्यमंत्री ने अपना स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि उन्हें अंधेरे में रखते हुए शपथपत्र तैयार कर न्यायालय में प्रस्तुत किया गया। बताया जाता है कि इस अरबों रुपए के घोटाले में प्रदेश के तत्कालीन मुख्य सचिव ने बिना मुख्यमंत्री को विश्वास में लिए ही उच्च न्यायालय में शपथपत्र प्रस्तुत कराया था। इससे खिन्न होकर मुख्यमंत्री ने तत्कालीन मुख्य सचिव को बुलाकर अप्रसंन्नता व्यक्त करते हुए नाराजगी जाहिर की और मुख्य सचिव बदल दिया। चूंकि मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। इसके चलते हो रही देरी को ध्यान में रखते हुए शासन ने आदेश देकर श्री मोहंती के विरुद्ध पुन: कार्रवाई आरंभ करने कि निर्देश दिए हैं।
कम्पनियों को वितरित ऋण की सूची
1. एस. कुमार पॉवर कार्पोरेशन 4475.00 लाख, 2. मोडक रबर एंड टेक्सरीज 325.00 लाख, 3.प्रोग्रेसिव इक्सटेंशन एंड एक्सपोर्ट 675.00 लाख, 4. सूर्या एग्रो लिमि. 1475 लाख, 5. एलपिन इंडस्ट्रीज लिमि. 2845 लाख, 6. स्नोकम इंडिया लिमि. 2800 लाख, 7. किलिक निक्सोन लिमि. 1500 लाख, 8. स्टील ट्यूब ऑफ इंडिया लिमि. 1700 लाख, 9. एसटीआई प्रोड्क्स 800 लाख, 10. सोम डिस्टलरीज लिमि. 1475 लाख, 11. सोम डिस्टलरीज एंड बेवरीज 700 लाख, 12. सोम पॉवर लिमि. 200 लाख, 13. सिद्धार्थ ट्यूब्स लिमि.1450 लाख, 14. भानू आयरन एंड स्टील कम्पनी 1000 लाख, 15. रिस्टसपिन साइट्रिक्स लिमि. 1100 लाख, 16 आईसर आलोयस एंड स्टील 1050 लाख, 17. आइसर एग्रो लिमि. 200 लाख, 18. हेरीटेज इंवेस्टमेंट 70 लाख, 19. आइसर फाइनेंस प्राइवेट लिमि. 250 लाख, 20. एईसी इंटरप्राइज लिमि. 1010 लाख, 21. एईसी इंडिया लिमि. 150 लाख, 22. राजेंद्र स्टील लिमि. 855 लाख, 23. भास्कर इंडस्ट्रीज लिमि. 669.50 लाख, 24. अर्चना एयरवेज लिमि. 300 लाख, 25. माया स्पिनरर्स 200 लाख, 26. गजरा बेवल गेयर्स 100 लाख, 27. बीएसआई लिमि. 100 लाख, 28. पसुमाई ऐरीगेशन 50 लाख, 29. जीके एक्जिम 2400 लाख, 30. गिल्ट पैक लिमि. 150 लाख। कुल- 30074.50 लाख। 1. एनबी इंडस्ट्रीज लिमि. 3000 लाख, 2. सूर्या एग्रो आइल्स लिमि. 1500 लाख, 3. फ्लोर एंड फूड्स लिमि. 40 लाख, 4. स्टील ट्यूब्स ऑफ इंडिया लिमि. 878.11 लाख, 5. एसटीआई प्रोड्क्स लिमि. 155 लाख, 6. एसटीएल एक्सपोर्ट लिमि. 165.86 लाख, 7. भानू आयरन एंड स्टील कम्पनी 440 लाख, 8. जमुना ऑटो इंडस्ट्रीज 400 लाख, 9. वेस्टर्न टोबेको 350 लाख, 10. सरिता साफ्टवेयर इंडस्ट्रीज 300 लाख, 11. केएन रिसोर्सेज 27.01 लाख, 12. इटारसी ऑयल एंड फ्लोर्स लिमि. 126.13, 13. गजरा बेवल गेयर्स 50 लाख, 14. गरहा यूटीब्रोक्सेस लिमि. 134.55 लाख, 15. बैतूल आयल एंड फ्लोर्स 80 लाख, 16. पोद्दार इंटरनेशनल 72.60 लाख, 17. महामाया स्टील 100 लाख। कुल-7819.26 लाख।

अब कांग्रेस करेगी रथयात्रा की राजनीति

लोकसभा चुनाव में बदली सूरत से उत्साहित कांग्रेस भी अब उत्तर प्रदेश में अपना आधार बढ़ाने के लिए रथयात्रा करेगी। उत्तर प्रदेश में पार्टी की सदस्यता में आश्चर्यजनक इजाफे के मद्देनजर इसका भी सियासी फायदा उठाने के लिए रथयात्रा की यह रणनीति तैयार की गई है। इस रथयात्रा के जरिए कांग्रेस उत्तर प्रदेश में बसपा सुप्रीमो मायावती की सत्ता को चुनौती देते हुए दिखने की कोशिश करेगी। इसमें मायावती के मुकाबले कांग्रेस राहुल गांधी का चेहरा ही दिखाएगी। इसी रणनीति के तहत कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में अपनी सियासी रथयात्रा के लिए ने दलितों के मसीहा बाबा साहब भीमराव अंबेडकर की जयंती 14 अप्रैल को चुना है। पार्टी की यह रथयात्रा एक साथ सूबे की दस दिशाओं के लिए निकलेगी और उसकी सियासी थीम अतीत की नींव पर भविष्य का निर्माण ही रहेगी। कांग्रेस ने पिछले साल आम चुनाव के दौरान राहुल गांधी का युवा चेहरा और पार्टी की विरासत की तस्वीर पेश करने के लिए इसी जुमले का सहारा लिया था। पार्टी को इस नारे का अच्छा फीडबैक मिला था। इसीलिए उत्तर प्रदेश में फिर इस पुराने आजमाए जुमले को ही चुना गया है। कांग्रेस के दस रथों के इस काफिले में प्रदेश के नेता ही सवार होंगे और राहुल की इसमें सीधी भागीदारी की उम्मीद नहीं है मगर रथ पर मुख्य नायक के रूप में उनकी ही तस्वीर होगी। साथ ही होंगी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तस्वीरें, जिनके साथ दिखाया जाएगा संप्रग सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का आईना। 45 दिनों की इस सियासी यात्रा में प्रदेश के सभी ब्लाकों और 403 विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस की यह रथ पहुंचेगी। इस दौरान प्रदेश नेताओं का जोर कांग्रेस के अतीत और भविष्य के साथ-साथ मायावती सरकार की कथित नाकामियों को उजागर करने पर भी रहेगा। कांग्रेस उत्तर प्रदेश में 2012 में होने वाले विधानसभा चुनाव में बसपा का विकल्प बनते हुए दिखना चाहती है। इसीलिए पार्टी की सदस्यता अभियान में इजाफे को देख तत्काल यह फैसला किया गया है। गौरतलब है कि कांग्रेस की राष्ट्रीय स्तर पर सदस्यता में इस बार फोटो पहचान पत्र की वजह से कमी आने के पुख्ता संकेत हैं। पिछले संगठन चुनाव से पूर्व फोटो पहचान की अनिवार्यता नहीं थी इसलिए फर्जी सदस्यता के सहारे काफी पार्टी नेता अपनी सियासत चमकाते थे। लेकिन अब इसकी गुंजायश नहीं बची है और इसीलिए देश में कांग्रेस की सदस्यता इस बार चार करोड़ से घटकर तीन करोड़ के आस-पास रहने की उम्मीद है। इस लिहाज से उत्तर प्रदेश में सदस्यता अभियान में इजाफे को पार्टी उसकी ओर लोगों के बढ़ते रूझान का संकेत मान रही। पिछली बार उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सदस्यता 36 लाख थी जो इस बार डेढ़ गुने से ज्यादा बढ़कर 57 लाख के करीब पहुंच गई है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी ने सदस्यता अभियान में इस इजाफे की पुष्टि भी की।

सेना चाहती है जवान सिर्फ उसके हों

सुरक्षा की बढ़ती चुनौतियों और खराब होते हालात में सरकार सेना के कमांडर से लेकर पुलिस कांस्टेबल तक, हर स्तर पर साझेदारी पर जोर दे रही है। दूसरी ओर, फौज अपने खास दर्जे और अहमियत के साथ किसी समझौते को राजी नहीं है। यहां तक कि उसे तो अ‌र्द्धसैनिक बलों और पुलिस वालों के जवान कहलाने पर भी ऐतराज है। जी हां! फौज ने बाकायदा मीडिया से गुजारिश भी की है कि जवान शब्द का प्रयोग सिर्फ भारतीय सेना के सैनिकों के लिए किया जाए। भावी सेना प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल वी.के. सिंह की अगुवाई वाली पूर्वी कमान से जारी वक्तव्य में मीडिया से आग्रह किया है कि पुलिस या अ‌र्द्धसैनिक बलों में सैन्य जवानों के समकक्ष कर्मचारियों के लिए पुलिस वाले या अ‌र्द्धसैनिक कर्मी या संगठन के अनुरूप शब्दावली का प्रयोग किया जाए। सेना की फिक्र इस बात को लेकर भी है कि जवान शब्द का गलत प्रयोग राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी संगठन की अवांछित छवि बना सकता है। जवान पर कापीराइट कायम करने की कवायद में सेना पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का हवाला देती है। दैनिक जागरण से बातचीत में कोलकाता स्थित रक्षा मंत्रालय के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी विंग कमांडर महेश उपासने कहते हैं कि शास्त्री जी ने सबसे पहले जय जवान, जय किसान का नारा दिया था। उसके बाद से ही जवान शब्द भारतीय फौज के सैनिकों का पर्याय बन चुका है। हालांकि फौज की इस राय से पुलिस और अ‌र्द्धसैनिक बल के आला अधिकारी न केवल असहमति जताते हैं, बल्कि आहत भी नजर आते हैं। सीमा सुरक्षा बल के पूर्व महानिदेशक एम.एल. कुमावत कहते हैं कि जवान शब्द के प्रयोग पर इस तरह का एकाधिकारपूर्ण रवैया ठीक नहीं है। किसी को भी यह नहीं भूलना चाहिए कि इस देश और लोकतंत्र को बचाने के लिए सैनिकों की शहादत से कहीं ज्यादा बलिदान पुलिस बल के लोगों ने दिया है। वहीं उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक प्रकाश सिंह के अनुसार जवान शब्द का इस्तेमाल हर उस वर्दीधारी जांबाज के लिए किया जा सकता है जो देश के लिए जान न्यौछावर करने को तैयार है। सिंह के अनुसार सेना और पुलिस बलों के बीच अंतर बना रहना जरूरी है, लेकिन आम बोलचाल में पुलिस के जवान या अ‌र्द्धसैनिक बल के जवान कहा जाता है। लिहाजा संदर्भ के साथ यह स्पष्ट हो जाता है कि बात किस बल के जवानों के बारे में हो रही है। बीते दिनों सेना ने फौजी वर्दी के दुरुपयोग को रोकने की कवायद में न केवल वर्दी पहनने के नियम बदले थे, बल्कि उसके कपड़े और डिजाइन का भी पेटेंट करवाया था। अब सेना का नया आग्रह इस दिशा में एक अलग ही पहल है।
.. जवान बोले तो शास्त्री जी ने सबसे पहले जय जवान, जय किसान का नारा दिया था। उसके बाद से ही जवान शब्द भारतीय फौज के सैनिकों का पर्याय बन चुका है।
विंग कमांडर महेश उपासने, कोलकाता
स्थित रक्षा मंत्रालय के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी जवान शब्द का इस्तेमाल हर उस वर्दीधारी जांबाज के लिए किया जा सकता है जो देश के लिए जान न्यौछावर करने को तैयार है।
प्रकाश सिंह, उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक
जवान शब्द के प्रयोग पर एकाधिकारपूर्ण रवैया ठीक नहीं है। हीं भूलना चाहिए कि इस देश की खातिर सैनिकों की शहादत से कहीं ज्यादा बलिदान पुलिस बल के लोगों ने दिया है।
एम.एल. कुमावत,

लड़ाकू विमानों को धराशायी होने की बीमारी

भारतीय वायुसेना के लड़ाकू विमानों को धराशायी होने की बीमारी है, जो लगातार बढ़ रही है। इसके चलते बीते तीन महीनों में पहले सुखोई-30 और अब मिग-27 के बेड़े को जमीन पर खड़ा करना पड़ा है। आलम यह है कि पिछले चौदह महीनों में वायुसेना के 15 विमान दुर्घटनाग्रस्त हो चुके हैं। मतलब हर माह एक का औसत। वायुसेना पहले ही निर्धारित से कम स्क्वाड्रन संख्या से काम चला रही है। उस पर से विमानों के लगातार गिरने की इस बीमारी ने उसे परेशान कर डाला है। बीते एक सप्ताह में हुए दो हादसों के बाद वायुसेना ने उच्च स्तर पर घटनाओं को खंगालना शुरु कर दिया है। कोर्ट आफ इंक्वायरी के साथ-साथ वृहद स्तर पर भी दुर्घटनाओं की रफ्तार रोकने की कवायद तेज की गई है। रक्षा मंत्रालय द्वारा संसद में पेश किए गए आंकड़ों पर गौर करें तो बीते दो दशकों में हुए हादसों के कारण वायुसेना करीब 14 स्क्वाड्रन के बराबर विमान खो चुकी है। अप्रैल 1989 से लेकर अब तक 267 मिग विमानों से जुड़े हादसों में 97 सैन्यकर्मी और 44 नागरिकों को भी जान गंवाना पड़ी है। बागडोगरा में हुई दुर्घटना के बाद वायुसेना ने जांच के लिए जिन मिग-27 विमानों को जमीन पर खड़ा रखने का फैसला किया है उनके खाते में जनवरी 2009 से लेकर अब तक चार दुर्घटनाएं दर्ज हैं। लगातार होते हादसों के चलते ही वायुसेना को मजबूरन अपने एचपीटी प्रशिक्षण विमानों के पूरे बेड़े को रिटायर करने का फैसला लेना पड़ा। आला अफसरों के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं है कि तमाम उपायों के बावजूद विमान हादसे रुक क्यों नहीं रहे हैं। हालांकि पूछे जाने पर वे यह बताना नहीं भूलते कि हादसे रोकने के लिए पायलट प्रशिक्षण व दक्षता विकास के नए कार्यक्रम तैयार किए जा रहे हैं। इसके अलावा रूसी मूल के विमानों की खामियां दूर करने के लिए मूल उत्पादक कंपनी के विशेषज्ञों की भी मदद ली जा रही है।