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भेड़ाघाट

Friday, March 12, 2010

दागी अफसरों पर क्यों नहीं गिरी गाज?

पन्ना राष्ट्रीय उद्यान से बाघों के गायब होने मामले में नया मोड़

वन मंत्री सरताज सिंह के कड़े रुख से पन्ना राष्ट्रीय उद्यान से बाघों के गायब होने का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। उन्होंने यह मामला सीबीआई को सौंपने का निर्णय लिया है और इससे संबंधित प्रस्ताव विभाग की ओर से राज्य सरकार के पास भेज भी दिया गया है। श्री सिंह का कहना है, उचेहरा में एक बाघ के शिकार तथा पकड़े गए आरोपी के भाग जाने का मामला सीबीआई को सौंपने का निर्णय लिया गया था लेकिन यहां तो कम से कम 20 और ज्यादा से ज्यादा 34 बाघों के गायब होने का सवाल है जिनकी आज तक लाश तक नहीं मिली। इसलिए उचेहरा प्रकरण के साथ इसे भी जोड़ दिया गया। सरताज सिंह का कहना है, पन्ना से बाघों के गायब होने का प्रकरण इतना गंभीर है कि इसे बहुत पहले सीबीआई को सौंप देना चाहिए था। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि जिस दौरान बाघ गायब हुए, भले मौजूदा मुख्य सचिव अवनि वैश्य तब वन विभाग के प्रमुख सचिव थे लेकिन मुझे नहीं लगता कि उन्हें सीबीआई जांच में कोई आपत्ति होगी। बहरहाल, राज्य सरकार सीबीआई जांच के लिए यह मामला भेजती है या नहीं और सीबीआई इसे जांच के लिए स्वीकार करती है या नहीं, यह बात अलग है लेकिन फिलहाल वनमंत्री के कदम से वन महकमे के उन आला अफसरों में हड़कंप की स्थिति है जो इस मामले से किसी न किसी रूप में जुड़े रहे हैं। जुड़े हो सकते हैं अंतर्राष्ट्रीय तस्कर वन मंत्री ने कहा कि गणना में बाघों की संख्या 20 रही हो या 34 लेकिन वे गायब हुए इसलिए मामला बड़ा और गंभीर है। फिर किसी बाघ की कोई बाडी नहीं मिली, कोई पकड़ा नहीं गया, इसलिए इस मामले से अंतर्राष्ट्रीय तस्करों के जुड़े होने से इंकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि रिपोर्ट विरोधाभाषी है और सीबीआई जांच होने पर सारी स्थिति अपने आप स्पष्ट हो जाएगी। वैसे भी जनता को इस मामले की सच्चाई जानने का अधिकार है।

ऐसा लगता है, वन मंत्री सरताज सिंह ने अब चौके-छक्के लगाने का मन बना लिया है। यही वजह है कि पहले उन्होंने प्रदेश के सबसे चर्चित पन्ना राष्ट्रीय उद्यान से बाघों का खात्मा मामले की सीबीआई से जांच कराने का निर्णय लिया और दूसरा, विभिन्न मामलों में आरोपों से घिरे कोई 67 वन अफसरों पर नजर गड़ा दी। ये वे अफसर हैं, जिनके ऊपर अलग-अलग तरह के आरोप हैं लेकिन पहले तो इन्हें आरोप पत्र देकर विभागीय जांच बैठाने में देर की गई और इसके बाद मामले का निराकरण करने में विलंब किया गया। सरताज सिंह का कहना है कि मैंने सभी मामलों की फाइलें अपने पास बुला ली हैं। इनका परीक्षण किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि जो दोषी हैं उनके खिलाफ तो कार्रवाई होगी ही, इसके साथ जिन अफसरों ने इन्हें बचाने के उद्देश्य से जांच बैठाने तथा प्रकरण का निराकरण करने में विलंब किया उन्हें भी नोटिस जारी किए जाएंगे। जिन अफसरों के खिलाफ प्रकरण लंबित हैं उनमें एक दर्जन से ज्यादा आईएफएस अफसरों के साथ राज्य वन सेवा के अफसर तथा अन्य वन कर्मचारी शामिल हैं। सूत्रों का कहना है कि ये मामले लंबे समय से लंबित हैं, इनमें कई अफसर सेवानिवृत्त भी हो गए लेकिन उनके खिलाफ जांच का निराकरण नहीं हुआ। वन मंत्री श्री सिंह सभी प्रकरणों का परीक्षण करा रहे हैं। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि प्रकरणों के निराकरण में बहुत विलंब हुआ है इससे स्पष्ट है कि दोषियों को बचाने की कोशिश हुई। उन्होंने कहा कि प्रकरणों का निराकरण समयसीमा में कराया जाएगा और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई भी की जाएगी।

वनमंत्री ने भले ही दागी अफसरों की फाइलें तलब कर ली हो, लेकिन अभी तक इन अफसरों पर कोई मंत्री लगाम नहीं कस सकाह है। वन विभाग में आधा दर्जन से अधिक अधिकारियों पर आर्थिक गड़बड़ी सहित अन्य आरोप लगे हैं और इसके बावजूद ये भारतीय वन सेवा के अधिकारी मनचाहा पद प्राप्त करने में सफल रहे हैं।

वन विभाग में आधा दर्जन से अधिक अधिकारियों ने अनुशासहीनता सहित अन्य मामलों में फंसे हैं, लेकिन विभागीय जांच का हवाला देकर इन मामलों को ठंडे बस्ते में भेज दिया गया। यहां तक विभाग की जांच शाखा ने वन मुखिया को दागी अफसरों पर कार्रवाई करने के लिए पत्र लिखा तो उल्टा उन्हीं पर विभाग के मुखिया ने कार्रवाई कर दी और उनकी शाखा ही बदल दी। इसका सबसे बड़ा उदाहरण हाल ही में वन विभाग के मुख्य वन संरक्षक जेपी शर्मा है। जिनका तबादला सिर्फ इसी कारण से किया गया कि उन्होंने वन मुखिया को दागी अफसरों पर कार्रवाई करने के लिए पत्र लिखा था।

डाबास ने फिर लिखा पत्र
वर्तमान में झाबुआ में पदस्थ एएस डाबास ने एक बार फिर विभाग की पोल खोल दी है। उन्होंने एक पत्र वन मुखिया को लिखा है, जिसमें उन्होंने यह बताया है कि वन विभाग की कोई भी योजना जमीनी स्तर झाबुआ में क्रियान्वित नहीं हुई। सभी योजनाएं विफल है और भ्रष्टाचार जारी है।

ये विभाग के दागी अफसर

एके दुबे, पीसीसीएफ, वन विभाग – वर्तमान में वन विभाग के दागी अफसरों में वन मुखिया एके दुबे स्वयं ही शामिल है। इनके खिलाफ लोकायुक्त में एक प्रकरण दर्ज है। इसके बावजूद भी शासन द्वारा इनको मुखिया बनाया गया। फिलहाल जांच प्रक्रिया में है।
रविन्द्र सक्सेना, एपीसीसीएफ, वन विभाग – ज्वाइंट फारेस्ट मैनेजमेंट के एपीसीसीएफ रविन्द्र सक्सेना पर आर्थिक अनियमितता सहित कई आरोप लगे हैं। वर्ष 1993 में उनके कार्यकाल में डेम के निर्माण, फोन बिल में सहित अन्य मामले में अनियमितता उजागर हुए। विभागीय जांच में भी सही पाया गया, लेकिन अभी तक इन पर कार्रवाई नहीं हुई। बकायदा शासन द्वारा इन्हें पदोन्नति दी गई।
अनिल ओबेराय, एपीसीसीएफ आईटी – पीडीए क्रय खरीदी हुई गड़बड़ी सहित अन्य आरोप लगे हैं, लेकिन विभागीय जांच के बाद इसको दबा दिया गया। जबकि पीडीए क्रय खरीदी के पेपर ही इनकी करतूत बयां करता है, लेकिन आला अफसरों का सहयोग होने के कारण पूरा मामला ठंडे बस्ते में है। खास बात यह है कि साहब का कोई भी प्रोजेक्ट जमीनी स्तर पर सफल नहीं है।
भानु गुप्ता, सीसीएफ, जनसंपर्क, वन विभाग – सागर में सीसीएफ पद पर पदस्थ भानु गुप्ता को विभाग की विजीलेंस शाखा ने एक मामले में उनका वेतन काट लेने के निर्देश दिए थे, लेकिन वन मुखिया में कोई कार्रवाई नहीं। वर्ष 2009 में भानु गुप्ता द्वारा एक ट्रक सामान सागर से भोपाल भेजा जा रहा था। जिसे नाका चेकिंग में पकड़ लिया गया और उक्त अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई करने की जगह विभाग ने पूरा मामला ही दबा लिया।
सत्येंद्र बहादुर, सीसीएफ, सिवनी – खंडवा में पदस्थापना के दौरान अवैध वनों की कटाई का मामला ईओडब्ल्यू में दर्ज है, लेकिन अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। साहब अभी भी सर्किल में पदस्थ है।
आरडी महला – एक करोड़ रुपए की वर्गीकरण की क्षतिपूर्ति का मामला वर्ष 2002 में दर्ज हुआ, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई।
आशीष गोपाल, सीसीएफ मंत्रालय वित्त सचिव – डीएफओ सिवनी में पदस्थापना के दौरान परिवहन अनुज्ञा पत्र के मामले में आरोप पत्र जारी हुआ, लेकिन अभी तक कोई कार्रवाई नहीं।
आरजी सोनी, सीसीएफ, बालाघाट – विधानसभा में गलत जानकारी देने, पेंशन में लाखों रुपए का घोटाला। इसके बावजूद भी सर्किल में पदस्थ है।

भ्रष्ट अधिकारियों के बारे में पढि़ए सनसनी खेज पर्चा

शिवराजसिंह सरकार के सामने आईएएस अधिकारियों की संपत्ति एवं उनके अवैध संबंधों को लेकर एक नया संकट खड़ा हो गया है।

वल्लभ भवन में पर्चे बंटे
हाल ही में वल्लभ भवन में आईएएस अधिकारियों के अवैध संबंधों को लेकर एक पर्चा जारी हुआ, जिसमें आईएएस अधिकारियों की पोल खोली गई है। इन पर्चो में आईएएस अधिकारियों की रंगरैलियों के किस्से दिए गए हैं। इन किस्सों को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। इसी तरह हाल ही में एक और पर्चा विधानसभा में जारी हुआ है, जिसमें 135 आईएएस अधिकारियों की अवैध संपत्ति का वर्णन विस्तार से किया गया है।

ऐसा लगता है कि होली के अवसर पर इन अधिकारियों की पोल पट्टी खोलकर एक नया माहौल बनाया जा रहा है। देखना यह है कि अब सरकार इन पर्चो को लेकर क्या रवैया अपनाती है।

पर्चे में अधिकारियों की तीन श्रेणी बताई गई है जिसमें भ्रष्टों को श्रेणी नं. I, महाभ्रष्ट को श्रेणी नं. II तथा अय्याश अफसरों को श्रेणी नं. III दी गई है। इनके नाम इस प्रकार हैं –

संदीप खन्ना 72 बैच श्रेणी नं.I–III, राकेश साहनी 72 बैच श्रेणी नं. II–III, जेमनी शर्मा 75 बैच श्रेणी नं. I–III, प्रशान्त मेहता 75 बैच श्रेणी नं. II–III, दिलीप मेहरा 75 बैच श्रेणी नं. I–III, उदय वर्मा 76 बैच श्रेणी नं. I, मलय राय 77 बैच श्रेणी नं. I, ओपी रावत 77 बैच श्रेणी नं. I, विश्वपाल द्विवेदी 77 बैच श्रेणी नं. I, सत्यप्रकाश 77 बैच श्रेणी नं. I–III, देवेन्द्र सिंघई 78 बैच श्रेणी नं. I, अरविन्द जोशी 79 बैच श्रेणी नं. II–III, स्वदीप सिंह 79 बैच श्रेणी नं.I, गोपाल कृष्ण 79 बैच श्रेणी नं. I–III, विमल जुल्की 79 बैच श्रेणी नं. II–III, टीनू जोशी 79 बैच श्रेणी नं.II–III, लवलीन कक्कड़ 79 बैच श्रेणी नं.I, इन्द्रनील दाणी 80 बैच श्रेणी नं.I, पुखराज गारू 80 बैच श्रेणी नं.II–III, प्रभूदयाल मीणा 80 बैच श्रेणी नं. I, स्वर्ण माला रावला 80 बैच श्रेणी नं.I–III, पी.के. दास 81 बैच श्रेणी नं. I, एम.एम. उपाध्याय 81 बैच श्रेणी नं. II–III, अजिता वाजपेयी 81 बैच श्रेणी नं. II–III, अमिता शर्मा 81 बैच श्रेणी नं. I–III, प्रवेश शर्मा 82 बैच श्रेणी नं. I–III, राकेश अग्रवाल 82 बैच श्रेणी नं. I, एस. आर. मोहंती 82 बैच श्रेणी नं. II–III,राघव चन्द्रा 82 बैच श्रेणी नं. II, देवराज विरदी 82 बैच श्रेणी नं.I, के सुरेश 82 बैच श्रेणी नं. 2, मनोज गोयल 83 बैच श्रेणी नं. 1, आर. के. स्वाई 84 बैच श्रेणी नं. II–III, जयदीप गोविन्द 84 बैच श्रेणी नं. I, सेवाराम 84 बैच श्रेणी नं. I, सुदेश कुमार 84 बैच श्रेणी नं. I, राघेश्याम जुलानियों 85 बैच श्रेणी नं. II , प्रभांशु कमल 85 बैच श्रेणी नं. I–III, अनिल श्रीवास्तव 85 बैच श्रेणी नं. II, के. के. सिंह 85 बैच श्रेणी नं. I, के.पी. सिंह 85 बैच श्रेणी नं. II, विनोद सेमबाल 85 बैच श्रेणी नं. I, एम.के. सिंह 85 बैच श्रेणी नं. II–III, अनिल जैन 86 बैच श्रेणी नं.I, पी. के. दास 86 बैच श्रेणी नं. II, राजगोपाल नायडू 86 बैच श्रेणी नं. II–III, जे.टी. इम्का 86 बैच श्रेणी नं. I, सलीना सिंह 86 बैच श्रेणी नं. II–III, मनोज झलानी 87 बैच श्रेणी नं. I, शिवा दुबे 87 बैच श्रेणी नं. II–III, प्रवीण कृष्ण 87 बैच श्रेणी नं. I, संजय सिंह 87 बैच श्रेणी नं. I, आर.के. चतुर्वेदी 87 बैच श्रेणी नं. I, अजय तिस्की 87 बैच श्रेणी नं. I, एम मोहन राव 87 बैच श्रेणी नं. II–III, गोरी सिंह 87 बैच श्रेणी नं. I, वसीम अख्तर 87 बैच श्रेणी नं. I, प्रवीण गर्ग 88 बैच श्रेणी नं. I, वीरा राणा 88 बैच श्रेणी नं. I, मो. सुलेमान 89 बैच श्रेणी नं. II–III, संजय वदोंपाध्याय 88 बैच श्रेणी नं. II–III, आशीष उपाध्याय 89 बैच श्रेणी नं. II–III, विनोद कुमार 89 बैच श्रेणी नं. I, टी धर्माराव 89 बैच श्रेणी नं. I–III, एस.डी. अग्रवाल 89 बैच श्रेणी नं. I, कोमल सिंह 89 बैच श्रेणी नं. I, राजेश राजौरा 90 बैच श्रेणी नं. II, एस.एन. मिश्रा 90 बैच श्रेणी नं. I, पंकजराग 90 बैच श्रेणी नं. I, अशोक शाह 90 बैच श्रेणी नं. I–III, एस.के. वेद 90 बैच श्रेणी नं. I, वी. एस. निरंजन 90 बैच श्रेणी नं. I, पी.के. पराशर 90 बैच श्रेणी नं. I, अल्की उपाध्याय 90 बैच श्रेणी नं. I–III, प्रमोद अग्रवाल 91 बैच श्रेणी नं. I, अशोक वर्णमाल 91 बैच श्रेणी नं. I, मनु श्रीवास्तव 91 बैच श्रेणी नं. I, सतीश मिश्रा 91 बैच श्रेणी नं. I, विश्वमोहन उपाध्याय 91 बैच श्रेणी नं. II–III, एम. के. वाशष्णे 91 बैच श्रेणी नं. I, अरूण तिवारी 91 बैच श्रेणी नं. II, एस.के. मिश्रा 91 बैच श्रेणी नं. I, पंकज अग्रवाल 92 बैच श्रेणी नं. I, गुप्ता 92 बैच श्रेणी नं. II–III, बीएन कान्ताराव 92 बैच श्रेणी नं. I, कल्पना श्रीवास्तव 92 बैच श्रेणी नं. I, श्रीवास्तव 92 बैच श्रेणी नं. I, गौतम 92 बैच श्रेणी नं. I, अरूण पाण्डे 92 बैच श्रेणी नं. II–III, बी.के. बाथम 92 बैच श्रेणी नं. II–III, नीरज मंडलोई 93 बैच श्रेणी नं. I, अनुपम राजन 93 बैच श्रेणी नं. II, अनिरूद्ध मुखर्जी 93 बैच श्रेणी नं. I, देवनी मुखर्जी 93 बैच श्रेणी नं.I, अन्जू बघेल 93 बैच श्रेणी नं. II , एस.वी. सिंह 93 बैच श्रेणी नं. II, राकेश श्रीवास्तव 93 बैच श्रेणी नं. I, अरूण भट्ट 93 बैच श्रेणी नं. I, संजय शुक्ला 94 बैच श्रेणी नं. II–III, विवेक अग्रवाल 94 बैच श्रेणी नं. II , हरि रंजन राव 94 बैच श्रेणी नं. I–III, शेखर शुक्ला 94 बैच श्रेणी नं. I, मनीष श्रीवास्तव 95 बैच श्रेणी नं. II, एस.के. पाल 94 बैच श्रेणी नं.I, अमित राठौर 96 बैच श्रेणी नं. I, उमाकान्त उमराव 96 बैच श्रेणी नं. I, सिंह 97 बैच श्रेणी नं. I, एम. गीता 97 बैच श्रेणी नं. III, सुखवीर सिंह 97 बैच श्रेणी नं.I, गुलशन 97 बैच श्रेणी नं. I, आकाश त्रिपाठी 98 बैच श्रेणी नं. II–III, मुकेश गुप्ता 98 बैच श्रेणी नं. I, निकुंज श्रीवास्तव 98 बैच श्रेणी नं. II, के.पी. राही 98 बैच श्रेणी नं. II, पवन शर्मा 98 बैच श्रेणी नं. II, ई रमेश कुमार 99 बैच श्रेणी नं. II, केदार शर्मा 99 बैच श्रेणी नं. II, शोभित जैन 2000 बैच श्रेणी नं. II, विवेक पोडवाल 2000 बैच श्रेणी नं. II–III, संदीप यादव 2000 बैच श्रेणी नं. I, ए.के. सिंह 2000 बैच श्रेणी नं. II–III, नवनीत कौठारी 2001 बैच श्रेणी नं. I, अखलेश श्रीवास्तव 2001 बैच श्रेणी नं. II, निशाद वडबडे 2003 बैच श्रेणी नं. I–III।

Thursday, March 11, 2010

आईएएस अफसरों की विश्वसनीयता संकट में

आईएएस अफसरों की विश्वसनीयता संकट में

जब हमारा देश आजाद हुआ, उस समय देश का प्रशासन आईसीएस (इंडियन सिविल सर्विसेस) के हाथ में था। नया संविधान 1952 में लागू हुआ, तब इन अफसरों का पदनाम बदलकर आईएएस हो गया यानी इंडियन एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस, भारतीय प्रशासनिक सेवा। इन अफसरों के हाथ में देश के प्रशासन की बागडोर सौंपी गई और उन्हें दिए गए खजाने की राशि खर्च करने के अधिकार। आईएएस अफसर की सेवाएं मुख्य रूप से भारत सरकार के अधीन है, फिर इनका कैडर बनाया गया, जिनमें हर राज्यों का कोटा फिक्स किया गया। यह अधिकारी जिस प्रदेश में हैं, उन्हें प्रदेश के कैडर में शामिल किया गया। इनका स्थानांतरण राज्यों से हटकर केन्द्र में भी होता है। हर राज्य में कलेक्टर, मुख्य सचिव तक के अधिकारी आईएएस ही होते हैं। इनके अधिकार और कर्तव्य की बकायदा एक संहिता होती है। इनका काम है विधानसभा द्वारा पारित प्रस्तावों का क्रियान्वयन करना तथा प्रदेश में लागू अलग-अलग विभाग के नियम और कानूनों का पालन करना। उदाहरण के लिए जिस जिले का जो कलेक्टर है, उसके असीमित अधिकार हैं। पूरे जिले की सरकारी जमीन, जंगल, नदी, पहाड़ के अलावा राज्य सरकार और केन्द्र सरकार की विभिन्न योजनाओं की राशि भी कलेक्टर की अनुमति से ही खर्च होती है। कलेक्टर के पास कानून व्यवस्था कायम करने का भी दायित्व है, वह एक तरह से संविधान की धाराओं का पालन कराने के लिए कटिबद्ध है और करने पर वह दंड भी दे सकता है। राज्यों में इसी प्रकार के दायित्व संभागायुक्त, विभागीय आयुक्त, उपसचिव, प्रमुख सचिव और मुख्य सचिव के पास हंै। केन्द्र में बैठे एक आईएएस अफसर के पास कई हजार करोड़ का बजट रहता है तो राज्यों में भी इन अफसरों के पास सौ करोड़ से लेकर एक हजार करोड़ तक बजट है। पिछले कु छ वर्षों से देश के आईएएस अफसर मंत्रियों की तरह भ्रष्टïाचार, घोटाले और सेक्स स्कैंडल में पकड़े गए हैं। 1970 के पूर्व तक 10 प्रतिशत आईएएस भ्रष्टï थे, जो कि 2010 तक आते-आते 90 प्रतिशत आईएस भ्रष्टï हो गए हैं। यह लोग राजनेताओं से मिलकर ही यह घोटाला कर रहे हैं। अभी तक यह माना जाता रहा है कि नेता तो भ्रष्टï होते ही हैं, लेकिन अब यह माना जाने लगा है कि आईएएस उनसे ज्यादा भ्रष्टï होते हैं, हाल ही म.प्र. और छत्तीसगढ़ में जो आईएएस अफसर पकड़े गए हैं, उनके पास 50 से 500 करोड़ रुपए तक की सम्पत्ति मिली है। यह तो वे लोग हैं, जो पकड़े गए हैं। हाल ही में भोपाल में एक पर्चा निकला है, जिसमें 23 आईएएस अफसरों के बारे में जानकारी दी गई है, जिसमें लिखा है कि किस अफसर के पास कितनी सम्पत्ति है तथा उनकी जमीन, मकान, प्लाट आदि कहां हैं? इसी तरह के पर्चे उत्तरप्रदेश के लखनऊ में भी निकाले गए थे, जब उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री के मुख्य सचिव के पास अरबों की सम्पत्ति मिली थी। यहां यह सवाल उठता है कि हमारे ये आईएएस अफसर कितने गिर चुके हैं, इनका चरित्र, चाल और चेहरे कितने काले हैं। दरअसल, इन अफसरों को बेइमान किसने बनाया? क्या इन्हें भ्रष्टाचार करने की ट्रैनिंग दी गई है या यह परिस्थितिवश भ्रष्टï हुए हैं? हकीकत यह है कि जब से प्रदेशों में गैर कांग्रेसी सरकारें आई हैं, चाहे वे मुलायम, लालू, मायावती, करुणानिधि, प्रकाशसिंह बादल की हो, सभी जगह यही आलम है। क्षेत्रीय दलों के नेताओं ने बाहुबल से इन अफसरों से दबाव डालकर काम करवाया। यह करते हुए धीरे-धीरे आईएएस भी भ्रष्टï होते गए। अब स्थिति यह है कि आईएएस अपनी नियुक्ति के लिए बकायदा करोड़ों रुपए देते हैं और उसके बाद वे अरबों कमा रहे हैं। आखिर यह कब तक चलेगा? आईएएस अफसरों की विश्वसनीयता, ईमानदारी और कार्यप्रणाली संकट में है और संकट में है देश की सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था, इसलिए हम देखते हैं कि एक नेता जो कभी गुंडा था, वह करोड़ों में खेल रहा है, क्योंकि उसे न तो कलेक्टर का भय है और न ही एसपी का। समाज की कमजोरी यह है कि वह गुंडेनुमा नेता का विरोध इसलिए नहीं कर पाता है, क्योंकि प्रशासन उसकी जेब में है, इसलिए अंधेर नगरी और चौपट राजा वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। ऐसा कोई सरकारी दफ्तर नहीं है, जहां बिना पैसा दिए काम होता हो। क्या यह हमारे विधायक, सांसद या अन्य जनप्रतिनिधि नहीं जानते। सभी जानते हैं, लेकिन वे स्वयं भी इसी में लिप्त हैं। यही कारण है कि देश की गरीबी 63 वर्ष में दूर नहीं हो पा रही है, क्योंकि जो पैसा गरीबी दूर करने में लगाना था, वह तो नेताओं और अफसरों की जेब में जा रहा है, हर शहर और गांव में यदि किसी का बंगला बना है तो वह नेता का होगा या अफसर का। दरअसल, आईएएस अफसरों का भ्रष्ट होना एक कलंक है। यह देश के स्वास्थ्य के लिए खतरा है और यह भविष्य में देश की एकता और अखंडता को भी खतरे में डालने वाला है। आईएएस अफसर के पास कई लुप्त सूचनाएं होती हैं, जिन्हें बेचकर वह अमीर हो सकता है, लेकिन इससे देश गुलाम बन सकता है। देश में अरबों रुपए के नकली नोट क्यों चल रहे हैं, क्योंकि कहीं न कहीं आईएएस और आईपीएस उनसे मिले हुए हैं। अरबों के नकली स्टाम्प वर्षों तक चलते रहे और एक भी अफसर सस्पैंड नहीं हुआ, इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है? कहीं न कहीं आईएएस अफसरों पर लगाम लगानी होगी। इसके लिए केन्द्र सरकार को चाहिए कि वह एक कमेटी बनाकर इन अफसरों की जांच कर नए सिरे से इनके अधिकार और कर्तव्यों की व्याख्या करे वरना यह देश फिर किसी दिन गुलाम बन जाएगा।

चर्चित पर्चे की पोल

- 133 अफसरों के खिलाफ बंटा पर्चा तो फुस्सी बम निकला
- इन्दौर में रह चुके कलेक्टरों को बताया महाभ्रष्टï, बिल्डर के रूप में सिर्फ पंकज संघवी का नाम

भोपाल में 133 आईएएस अफसरों के खिलाफ बंटे चर्चित पर्चे को लेकर बवाल मचा है और मुख्यमंत्री तक इस पर्चे से चिंतित हो गए। जब इस पर्चे की हकीकत जानी तो ये फुस्सी बम ही साबित हुआ। इन्दौर के सभी पूर्व कलेक्टरों को महाभ्रष्टï बताने वाले इस पर्चे में इन्दौर के बिल्डर के रूप में सिर्फ पंकज संघवी का ही नाम है, जिनके यहां अफसरों का करोड़ों रुपया इन्वेस्टमेंट होना बताया गया।
आयकर विभाग ने वरिष्ठï आईएएस दंपत्ति अरविंद जोशी और उनकी पत्नी श्रीमती टीनू जोशी के यहां छापा मारकर करोड़ों रुपए नगद तो जब्त किए ही, वहीं बेनामी संपत्तियां भी पाईं। उसके बाद से ही भोपाल में भ्रष्टï आईएएस अफसरों के खिलाफ मुहिम शुरू हो गई और मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान की नींद भी उड़ गई। उन्होंने इन अफसरों की बैठक ली और उन्हें दो टूक कहा कि कुछ तो शर्म करो। इसके पश्चात आईएएस लॉबी में हलचल मच गई और एक नौ पेज का पर्चा भी निकाला गया, जिसमें 133 भ्रष्टï आईएएस अफसरों की सूची बनाई गई, जिसमें 4 कैटेगरी में इन अफसरों को रखा गया। कैटेगरी-1 में भ्रष्टï, कैटेगरी-2 में महाभ्रष्टï, कैटेगरी-3 में अय्याश और कैटेगरी-4 में इन अफसरों का इन्वेस्टमेंट दिल्ली, मुंबई, भोपाल, ग्वालियर से लेकर इन्दौर और यहां तक कि विदेशों में भी बताया गया। इनमें से कई अफसर तो दो से तीन कैटेगरी में रखे गए। मजे की बात यह है कि इन्दौर में रहे सभी कलेक्टरों को महाभ्रष्टï और अन्य अफसरों को इसी कैटेगरी में रखा गया है। अग्निबाण ने जब इस पर्चे को हासिल किया और उसका विश्लेषण समझा तो पता लगा कि पर्चे में ठोस जानकारी नहीं दी गई है, सिर्फ अनुमान ही लगाया है कि फलां अफसर महाभ्रष्टï या अय्याश है और उसने इन्दौर से लेकर अन्य शहरों में अचल संपत्तियां खरीद रखी हैं, लेकिन इन आरोपों के कोई प्रमाण इस पर्चे में नहीं दिए गए, बल्कि जनरल होने वाली चर्चा के आधार पर ही पर्चा तैयार कर बंटवा दिया गया। इस पर्चे में इन्दौर के पूर्व कलेक्टरों, जिनमें एस.आर. मोहंती, एम. गोपाल रेड््डी, मनोज श्रीवास्तव, मोहम्मद सुलेमान, राजेश राजौरा, विवेक अग्रवाल से लेकर मौजूदा कलेक्टर राकेश श्रीवास्तव का नाम भी शामिल है। वहीं अन्य विभागों में रहे विश्वपति द्विवेदी, अशोक दास, प्रभुदयाल मीणा से लेकर हीरा राणा, आशीष उपाध्याय, प्रभात पाराशर, प्रमोद अग्रवाल, नीरज मंडलोई, संजय शुक्ला, राघवेंद्र सिंह, आकाश त्रिपाठी से लेकर वर्तमान निगमायुक्त सी.बी. सिंह के नाम भी शामिल हैं। मजे की बात यह है कि इन्दौर में रहे इन तमाम आईएएस अधिकारियों का जो पैसा बिल्डर के यहां इन्वेस्टमेंट करना बताया गया, उन सभी में एक ही नाम पंकज संघवी का शामिल किया गया है, जबकि पंकज संघवी राजनेता हैं और जमीनी कारोबार से सीधा उनका नाता कम ही है। अलबत्ता उनका परिवार अवश्य जमीन के धंधे में शामिल है। इन सभी 133 आईएएस अफसरों के पास 10 करोड़ से लेकर 500 करोड़ रुपए तक का काला धन बताया गया है, लेकिन एक भी अफसर के खिलाफ कोई पुख्ता प्रमाण नहीं दिए गए। यहां तक कि भोपाल की ही अरेरा कॉलोनी, कोलार रोड, भदभदा से लेकर अन्य कॉलोनियों और फार्महाउसों में इन अफसरों का बेनामी पैसा लगा होना बताया गया है। कुल मिलाकर यह पूरा पर्चा 'खोदा पहाड़ और निकली चूहियाÓ का ही प्रतीत होता है, क्योंकि इसमें एक भी अफसर के खिलाफ पुख्ता जानकारी नहीं है, सिर्फ कयास ही लगाए गए हैं।
राज टॉवर तोड़ा तो करोड़ों का इन्वेस्टमेंट कैसे?
पर्चे में शामिल 133 आईएएस अफसरों की सूची में कई ईमानदार और कड़क छवि वाले अफसरों को भी जबरन घसीट लिया गया है। इसका एक ही उदाहरण इन्दौर के पूर्व कलेक्टर रहे मनोज श्रीवास्तव का भी है। पर्चे में उनका नाम भी शामिल है और पंकज संघवी बिल्डर के यहां करोड़ों रुपए का इन्वेस्टमेंट बताया गया, जबकि हकीकत यह है कि मनोज श्रीवास्तव ने ही संघवी परिवार के बहुचर्चित राज टॉवर को ध्वस्त किया था और इन्दौर में ही करोड़ों-अरबों रुपए के जमीनों के घोटालों का पर्दाफाश भी किया। इसी कारण मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने प्रदेशभर के जमीन घोटालों की जांच की जो एक सदस्यीय कमेटी बनाई, उसका मुखिया भी मनोज श्रीवास्तव को ही बनाया गया। ऐसे दबंग और ईमानदार अफसर को भी इस पर्चे में शामिल किया गया। जिस बिल्डर के खिलाफ सबसे बड़ी कार्रवाई की, उसी के यहां करोड़ों का इन्वेस्टमेंट कैसे संभव है। पर्चे में इसी तरह कई अच्छी छवि वाले अफसरों को भी जबरन घसीटा गया है।

Saturday, March 6, 2010

मप्र से 'टाइगर स्टेट का 'ताज छिनने का खतरा

प्रदेश में बाघों की कम होती तादाद को लेकर सरकार के कड़े रुख के बीच राजधानी के वन विहार में एक और बाघिन की मौत ने वन्यजीव प्रेमियों की चिंताएं फिर बढ़ा दी हैं। यह सवाल भी खड़ा हो गया है कि क्या मध्यप्रदेश 'टाइगर स्टेटÓ का अपना 'ताजÓ बरकरार रख पाएगा? हाल ही में पन्ना टाइगर रिजर्व में एक भी बाघ नहीं होने के खुलासे के बाद तो प्रदेश में सर्वाधिक बाघों की मौजूदगी के दावे पर ही सवाल खड़ा हो गया है।
बाघों की मौत को लेकर मध्यप्रदेश सुर्खियों में है, लेकिन वन्यजीवों का इलाज करने वाले दक्ष डॉक्टरों का अकाल है। गिने-चुने डॉक्टर हैं और उन्हें भी वन्यजीवों की शारीरिक संरचनाओं का सामान्य ज्ञान नहीं है। भारी-भरकम वन विभाग की अनगिनत शाखाओं में एक अदद चिकित्सा शाखा तक नहीं है और वाइल्ड लाइफ हेल्थ एंड फोरेंसिक सेंटर मंजूरी के बावजूद कागजों पर है। टाइगर स्टेट कहलाते वक्त दुनिया भर के 10 फीसदी और भारत के 19 फीसदी बाघ मप्र में ही थे। यहां पांच टाइगर रिजर्व हैं, और बाघ कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं। पन्ना से इनके गायब होने के खुलासे ने दुनिया भर के वन्यजीव प्रेमियों को चौंकाया।
चार राष्ट्रीय उद्यानों के संचालकों को यहां-वहां कर दिया गया, लेकिन वन्यजीवों के खतरे में पड़े संसार में उनकी बीमारियों की जांच, इलाज और शोध के कोई इंतजाम नहीं हैं। सूत्रों के मुताबिक सिर्फ पांच डॉक्टर हैं, जिन्होंने बीबीएससी के अलावा साल भर की ट्रेनिंग वन्यप्राणी संस्थान देहरादून में ली हुई है। वेटनरी कॉलेज जबलपुर ने डेढ़ साल पहले वन विभाग को वाइल्ड लाइफ हेल्थ एंड फोरेंसिक सेंटर की स्थापना का प्रस्ताव दिया था। वाइल्ड लाइफ बोर्ड की बैठक में मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान की अध्यक्षता में जून 2008 में इसे मंजूरी भी दे दी गई, लेकिन साढ़े चार करोड़ रुपए के इस प्रस्ताव पर अब तक कोई कदम नहीं उठे।

इलाज लाइलाज-प्रदेश में वन्यजीवों के शोध की कोई व्यवस्था नहीं है। वन्यजीवों को बेहोश करने का काम जंगलों में फॉरेस्ट गार्डे से लिया जाता है और इलाज करने वाले ही पोस्टपार्टम भी करते हैं। जबकि पैथॉलॉजी, एनाटॉमी, फिजियोलॉजी, मेडिसिन, सर्जरी, न्यूट्रीशन और माइक्रोबायलॉजी जैसी हर शाखा में पर्याप्त दक्ष चिकित्सा स्टाफ और तकनीकी साधनों से लैस प्रयोगशालाओं की जरूरत है। देश भर में ऐसा कोई केंद्र ही वन्यजीवों के लिए नहीं है। जानकारों का कहना है जंगलों के सिकुडऩे, मानवीय गतिविधियों के बढऩे और आबादी के दबाव के चलते वन्यजीवों में बीमारियां भी बढ़ रही हैं, लेकिन वन विभाग यह मानने को तैयार नहीं है कि उनके घटने का कारण शिकार के अलावा बीमारियां भी हो सकती हैं।

एक डॉक्टर ऐसा भी- शासकीय नियमों के मुताबिक वन्यजीवों के रोग उपचार के लिए बरेली स्थित भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान से डिप्लोमा जरूरी है, लेकिन इस कसौटी पर विभाग का एक भी डॉक्टर खरा नहीं उतरता। तत्कालीन पशुपालन मंत्री रमाकांत तिवारी विधानसभा में एक सवाल के जवाब में यह स्वीकार भी कर चुके हैं। पशुपालन विभाग के डॉ. अनिल शर्मा अकेले डॉक्टर हैं, जिनके पास यह पात्रता है। वे चार देशों में वन्यजीवों के स्वास्थ्य संबंधी पद्धतियों को देखकर आए हैं। वे पहले वन विभाग में रहे भी रहे हैं। विभाग में अब भी वन्यजीवों की स्वास्थ्य सेवा के लिए नि:शुल्क सेवाओं का प्रस्ताव लंबित है।
पांच साल में 15 मौत : पिछले पांच साल में वन विहार नेशनल पार्क में 15 बाघ, पांच तेंदुआ और तीन सिंह की मौत हो चुकी है। इसमें से सर्वाधिक जानवरों की मौत 12 फरवरी 05 से अब तक हुई है। जबकि वर्ष 2004 में सिर्फ दो जानवरों की मौत हुई है। जिसमें एक सफेद बाघ (रुस्तम) और एक तेंदुआ (मांडवी) की मौत हुई है।
कछुआ बाड़े के नजदीक स्थित डिस्प्ले जोन (बाड़ा) में बाघिन ईरा को डेढ़ माह पहले शिफ्ट किया गया था। इससे पहले इस बाड़े में बाघिन सारा को रखा गया था, जो 15 अप्रैल को सफेद बाघ के जोड़े ललिता और भगत के बदले नंदन कानन नेशनल पार्क, भुवनेश्वर भेजी गई है।
पिछली गणना 2007 के आंकड़ों के अनुसार देश में मध्यप्रदेश में सर्वाधिक 300 बाघों की मौजूदगी बताई गई थी। इसमें पन्ना के 24 बाघ भी शामिल थे। 290 बाघों के साथ कर्नाटक दूसरे नंबर पर था। गौरतलब है केंद्र सरकार ने पन्ना रिजर्व में बाघों की संख्या जांचने के लिए राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के पूर्व निदेशक पीके सेन की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय कमेटी भेजी थी।
कमेटी ने पन्ना रिजर्व का दौरा कर जानकारी दी थी कि वहां कान्हा और बांधवगढ़ से लाई गई दो बाघिनों के अलावा एक भी नर बाघ नहीं है। कमेटी के इस खुलासे के बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बाघों की स्थिति की गहराई से छानबीन करने के लिए विशेषज्ञों की कमेटी बनाई जिसे तीन महीने में रिपोर्ट देना है। इस बीच मुख्यमंत्री ने कान्हा, पन्ना और बांधवगढ़ के क्षेत्र संचालकों को हटा दिया था। दूसरी ओर मुख्य वन्य प्राणी अभिरक्षक डॉ. एचएस पाबला का मानना है कि पन्ना में जरूर बाघ कम हुए हैं लेकिन दूसरे इलाकों में इनकी संख्या स्थिर है। विभिन्न उद्यानों में शावकों की संख्या भी बढ़ रही है।
इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर की रिपोर्ट के अनुसार विश्व में कुल 3402 से 5140 के बीच बाघ हैं। इनमें भारत में सर्वाधिक 1411 हैं। पिछले कुछ सालों में बाघों की संख्या में सबसे ज्यादा कमी भी भारत में दर्ज हुई है। तत्कालीन केंद्रीय वन एवं पर्यावरण राज्य मंत्री कमलनाथ के कार्यकाल के दौरान मप्र को 'टाइगर स्टेटÓ का दर्जा मिला था।
प्रदेश के वन विहार, बांधवगढ़, कान्हा किसली और पन्ना टाइगर रिजर्व में एक के बाद एक शेरों की मौत से सरकार अब टाइगर स्टेट का दर्जा बनाए रखना बड़ा मुश्किल मान रही है। कहा जाता है कि अब गुजरात में गिरी के जंगलों से प्रदेश में शेर लाना आसान काम नहीं होगा। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान को वन विभाग के अधिकारियों ने विभागीय गतिविधियों की समीक्षा के दौरान वर्तमान स्थिति से अवगत कराया है।

मामला अदालत में : वन विभाग के अधिकारियों ने मुख्यमंत्री को बताया है कि गुजरात के गिर अभ्यारण्य से शेर लाने का मामला सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है और जब तक उस पर फैसला नहीं होता, वहां से शेर लाना संभव नहीं।
मोदी ने बदला रुख : उधर, इस मामले में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्रसिंह मोदी ने भी अपना रुख बदल लिया है। वे मप्र को गिर के अभ्यारण्य से टाइगर देने के इच्छुक नहीं हैं।

मौसम ठीक नहीं टाइगर के लिए: वन विभाग के अधिकारियों ने मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान को बताया कि गिर अभ्यारण्य से लाए जाने वाले टाइगर के लिए मप्र का मौसम ठीक नहीं है। वन विभाग की समीक्षा के दौरान मुख्यमंत्री ने अधिकारियों से विश्व स्तरीय जू बनाने और वन्यप्राणियों के संबंध में अन्य जानकारी प्राप्त की। मध्य प्रदेश में वन्यप्राणियों के संरक्षण तथा वन अपराधों पर अंकुश लगाने के नाम पर दो साल में करोड़ों रुपए खर्च कर विदेशी बंदूकें, पीडीए, लक्जरी वाहन तथा मोबाइल आदि खरीदे गए है,लेकिन वन अपराध कम होने होने की वजाए बढ़ रहे हैं। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी वन अपराध रोकने के लिए लगातार निर्देश दे रहे हैं लेकिन न तो वन अपराध और न ही वन्यप्राणियों का शिकार रुक पा रहा है। उधर केंद्र सरकार ने भी मध्य प्रदेश के जंगलों में शिकारियों और तस्कारों को पकडऩे के लिए दस करोड़ की राशि जारी कर दी है। इस राशि से मध्यप्रदेश में गठित टाइगर स्ट्राइक फोर्स को मजबूत बनाया जाएगा।

उल्लेखनीय है कि केन्द्र के निर्देश पर वन विभाग ने बाघों की सुरक्षा के लिए फोर्स का गठन तो कर लिया था लेकिन राशि और संसाधन न होने के कारण इसकी गतिविधियां सुस्त रही। इस बीच मप्र में लगातार हो रही बाघों की मौत को देखते हुए केंद्र सरकार ने हाल ही में दस करोड़ की राशि दी है। वन अपराधों के मामले में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान तथा वन मंत्री राजेन्द्र शुक्ल के गृह जिले भी पीछे नहीं हैं। मुख्यमंत्री का क्षेत्र अवैध कटाई में तीसरे नंबर पर है तो मंत्री का अवैध शिकार के मामले में। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि वनों तथा वन्यप्राणियों के संरक्षण के लिए आधुनिकीकरण के नाम पर की जा रही खरीदी का औचित्य क्या है?

बिक गई और बन गई पारो

जिस साल पारो और देवदास वाली फिल्म परदे पर धूम मचा रही थी, उसी साल सीमा की आंखों में दूर देश के सुंदर सपने भर दिए गए। इससे पहले कि सीमा इस सपने का सच जान पाती, उसे पारो बना दिया गया।
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में देह व्यापार के आरोप में अपने कुछ अन्य साथियों के साथ पकड़ाने के बाद अगले दिन अदालत से बरी हुई सीमा से हमारी मुलाकात नादरा बस स्टैन्ड पर हुई,जहां वह एक युवक के साथ टे्रन छूट जाने के बाद बस पकडऩे आयी थी। मीडिया से जुड़े होने के कारण वह युवक मुझे जानता था। मुझे देखते ही युवक ने पास आकर नमस्कार किया और अपने आने का कारण भी बयां कर दिया।
मैंने उस युवक से कह कर सीमा से मुलाकात की और अपना परिचय देते हुए जब उससे देह व्यापार के इस घिनौने क्षेत्र में आने का कारण पूछा तो वह फफक पड़ी। वह बोली,मुझे एक ट्रक ड्राइवर लेकर आया था। 500 रुपये उसने मेरे सौतेले बाप को सौंपा और मेवात के इलाके में लाकर किसी के घर छोड़ कर चला गया। वो आदमी मुझसे धंधा करवाना चाहता था। उसने कहा-जा कमा कर ला। मैं यह काम नहीं करना चाहती थी, लेकिन भूख मिटाने के लिए शुरू किया धंधा अब नासूर बन गया है। उसने बताया मेवात के इलाके में ऐसी सैकड़ों पारो हैं। पारो यानी राज्य की सीमा पार से खरीद कर लाई गई वह लड़की, जिसका मनचाहा इस्तेमाल किया जा सकता है। बीवी बनाने से लेकर बच्चा पैदा करने की मशीन या फिर देह व्यापार कराने तक।
उसे लगा कि मैं उसकी व्यथा पर विश्वास नहीं कर रहा हूं,इस लिए अपने पर्स से कुछ फोटों निकाल कर मेरे हाथ पर रखते हुए कहा, आप खुद ही देख लिजिए।
सीमा के साथ आए युवक ने बताया कि दिल्ली से सटे आईटी सिटी गुडग़ांव के पास है मेवात का इलाका। 6,662 बूचडख़ाने वाले आधा हरियाणा और आधा राजस्थान के इस इलाके को गोकशी के लिए जाना जाता है, टकलू क्राइम यानी सोने की ईंट बेचने के धंधे के लिए जाना जाता है और पारो की खरीद फरोख्त के लिए मेव, जाट और अहीर बहुल इस इलाके में 'पारोÓ का खूब चलन है। बेचारगी के साथ दलील दी जाती है कि गरीबों को यहां का कोई धनाढय़ व्यक्ति अपनी लड़की नहीं देता। ऐसे में हमारे पास 'पारोÓ के अलावा कोई विकल्प नहीं है।
वहां हर कदम पर पारो मिलेगी। कई गांवों में आधी संख्या पारो की है। ये अलग बात है कि लोग अपने घरों में कैद पारो के मुद्दे पर बात करने से बचना चाहते हैं। थोड़ी चालाकी के साथ बात करें या फिर घरवालों को लगे कि बात करने का कोई लाभ मिल सकता है तो लोग थोड़ा-थोड़ा खुलने लगते हैं। तरह-तरह के किस्से आपके सामने आने लगेंगे। मध्य प्रदेश,झारखंड, आंध्र प्रदेश, असम, बंगाल और देश के अलग-अलग हिस्सों से खरीद कर, बहला फुसला कर या जबरन उठा कर लाई गई हर पारो के पास अपनी-अपनी कहानी है लेकिन सबके हिस्से का दुख एक जैसा है, पहाड़ सा।
सीमा ने मुझसे आग्रह किया की कुछ मीडिया कर्मियों के साथ आप वहां का दौरा करें तो उन्हें न्याय मिल सकता है। युवक ने बताया कि मैंने तो पूरे क्षेत्र को देखा है। वहां सलमबा गांव में एक पारो मिली,रुक्सिना। असम की हैं, पिछले सात साल से यही हैं। अपने गांव घर का रास्ता भूल चुकी हैं। किस्मत ने उन्हें एक अधेड़ मर्द अकबर की दूसरी बीबी बना दिया हैं। जब वह हमें मिलीं तो उनकी गोद में एक बच्चा था। बच्चे को गोद में चिपटाए, बेहद डरी सहमी-सी। घरवालो से घिरी हुई, पूछने पर टुकुर-टुकुर मुंह ताकने लगती हैं। साथ में खड़ी एक मेवाती महिला बताती हैं- इसका मायका गरीब है। रोटी के लाले पड़ते हैं, वहां जाकर क्या करेगी? यहां दो वक्त की रोटी तो नसीब हो रही है ना। दो वक्त की रोटी के नाम पर रुक्सिना की जिंदगी कैद में बदल गई, भूख का भूगोल जीवन के सारे पाठों पर भारी पड़ गया। सपने, तस्करी और पारो नूंह कस्बे में चार महीने पहले एक और पारो झारखंड से आई है, नाम है सानिया, उम्र कोई 15 वर्ष, ना वह सामने आई, ना उसके घरवालों ने बात की। पड़ोसियों ने बताया कि गरीबी की वजह से 50 वर्षीय मजलिस के साथ मेवात में किसी ने अपनी बेटी नहीं ब्याही। अंतत: वह किसी स्थानीय एजेंट के साथ झारखंड गया और अपने लिए कम पैसे में एक पारो का इंतजाम कर लाया। मजलिस ने अपने अरमान पूरे किए और सानिया के अरमानों पर उम्र के इस फासले ने हमेशा के लिए पानी फेर दिया।
अनवरी खातून की उम्र है 22 साल, वह मूल रूप से झारखंड के हजारीबाग की रहनेवाली हैं, पिछले साल उन्हें मेवात जिले के घासेड़ा गांव में लाकर एक अधेड़ व्यक्ति के घर में बिठा दिया गया। उन्हें झारखंड से यह झांसा देकर लाया गया कि दूर के रिश्तेदार के यहां मिलने जा रहे है। यहां आते ही अधेड़ व्यक्ति की ब्याहता बना दी गई, जबरन।
डरते-डरते अनवरी बताती हैं, एक आदमी ने मेरे पति से मेरे बदले दस हजार रुपये लिए। ये सिर्फ अनवरी की नहीं उनके जैसी अनेक लड़कियों की कहानी है। युवक तो पूरी तन्मयता से वृतांत सुना रहा था लेकिन मेरी हड्ï्डियों मेें दर्द होने लगा था । अब सीमा की बारी थी। उसने बताया कि साहब अरावली पहाडिय़ों से घिरे पूरे मेवात क्षेत्र में ऐसी अनेक लड़कियां हैं, जो तस्करी करके लाई गई हैं। जहां उन्हें या तो किसी खूंटे में बांध दिया जाता है या फिर नीलाम किया जाता है। कहीं-कहीं घर वाले धंधा करवाते हैं या दर-दर भीख मांगने पर मजबूर कर देते हैं। ऊपर से देखने पर मामला सिर्फ शादी और लड़का पैदा करने जैसा दिखाई देता है लेकिन अंदर-अंदर मौज मस्ती और कई तरह धंधे के साथ-साथ तस्करी का बहुत मजबूत तंत्र है जिसमें यहां का एख बहुत बड़ा वर्ग लिप्त है। तस्करी यहां एक कारोबार की तरह है, कुछ ट्रक ड्राइवर भी इसमें लिप्त हैं। कुछ स्थानीय दलाल है जो सौदा कराते हैं, पुलिस तक शिकायतें पहुंचती हैं, सामाजिक संस्थाएं भी काम कर रही हैं, जरूरत है कि पुलिस उदासीन रवैया छोड़कर यहां अभियान चलाए।
सीमा बताती है कि जान मोहम्मद की पत्नी रेहाना अब मेवात में रच-बस चुकी हैं और इज्जतदार जिंदगी जी रही है। उन्होंने भी हैदराबाद से 'पारोÓ लाकर अपने बेटों को दी है। पहले सिर्फ रेहाना को 'पारोÓ कहते थे, तो उन्हें बुरा लगता था, अब चार बहुएं 'पारोÓ हैं इसलिए रेहाना अकेली नहीं है। वह कहती हैं, हमें बुरा लगता है, जब कोई हमें पारो कहता है, हमें अब तक बाहरी मानते हैं, हम माहौल बदलना चाहते थे, इसलिए बाहर की पढ़ी-लिखी लड़कियां लाते हैं, चाहे कोई कुछ कहे। रेहाना की एक बहू जीनत भी पारो है, जो बमुश्किल यहां अपना सामंजस्य बिठा पाई है। जीनत बताती है, ये पैसे वाले इज्जतदार लोग हैं, इसलिए मैं सुरक्षित जिंदगी जी रही हूं, लेकिन मुझे साल भर बहुत दिक्कत आई, हमारी संस्कृति में बहुत फर्क है, जीनत खुशकिस्मत है। लेकिन ऐसी किस्मत दूसरी पारो की कहां होती है?
वहां तो कई किस्से और घटनाएं ऐसी हैं, जिसे सुनकर आपका दिल दहल जाए। 'पारोÓ सिर्फ दैहिक शोषण के लिए नहीं, बच्चा पैदा करने की मशीन भी हैं। कई 'पारोÓ को एक भाई के लिए लड़का पैदा करने के बाद दूसरे भाई के लिए लड़का पैदा करने को कहा जाता है। उनका तर्क सुनिए, गरीबों को भी तो परिवार आगे बढ़ाना है। वह बताती है घासेड़ा गांव की कुछ पारो वड़कली चौक पर भीख मांगती हुई दिखाई देती हैं। उनसे बात करें तो सच पता चलेगा। उनमें से कुछ अपने बीमार पति के लिए भीख मांग रही होती हैं तो कुछ घर का खर्चा चलाने के लिए ।
झारखंड के सामाजिक कार्यकर्ता संजय मिश्रा बताते है- सिर्फ झारखंड से 45 हजार लड़कियों को दूसरे राज्यों में ले जाकर बेच दिया गया है। कभी उन्हें काम का लालच दिखाया जाता है तो कभी फिल्मों में एक्टर बनाने का लोभ, लेकिन यहां से जाते ही उन्हें वस्तु की तरह भोग के लिए बेच दिया जाता है। पिछड़ापन और तस्करी का कारोबार
भारत में 1991 की जनगणना में प्रति हजार पुरुषों के पीछे 945 महिलाएं थीं और यह अनुपात 2001 की जनगणना में घटकर लगभग 927 रह गया था. पंजाब और हरियाणा में तो महिलाओं की स्थिति और दयनीय है। सन्ï 2001 की जनगणना के मुताबिक हरियाणा में प्रति हजार पुरुषों पर सिर्फ 861 महिलाएं हैं। हरियाणा में कन्या भ्रूण हत्या अपने चरम पर है। जाहिर है, ऐसे में 'पारोÓ का बाजार भी सजेगा और बोलियां भी लगेंगी।
दरअसल हरियाणा में कन्या भ्रूण हत्या के चलते लड़कियों की संख्या पुरुषों के मुकाबले लगातार गिर रही है। लड़कों को शादी के लिए लड़कियां नहीं मिल रही है। स्वयंसेवी संगठन पारो समस्या का सीधा संबंध इससे जोड़ते है स्थानीय पत्रकार कासिम खान कहते हैं, पारो को लाने का काम ट्रक ड्राइवरों ने शुरू किया। ये हर राज्य में जाते हैं। वहां से लड़कियां इधर-उधर करते हैं। धीरे-धीरे यहां का समाज इसका आदी हो गया। हालांकि मेवात का पिछड़ापन भी एक बड़ी वजह है।
मेवात के विकास के लिए यहां अलग से मेवात डेवलपमेंट एजेंसी अस्तित्व में है। यहां अल्पसंख्यको के लिए अलग से बजट का प्रावधान है। मगर विकास का कोई काम धरातल पर दिखाई नहीं देता। पानी, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य का मेवात से कोई नाता नहीं है। सरकारी योजनाएं फाइलों में ही बनती-बिगड़ती रहती हैं और इन सबके बीच कोई लड़की अपने हिस्से का नर्क लिए मेवात में धकेल दी जाती है, एक और पारो बनने के लिए।

अनुदान के लिए चल रहे मदरसे

मध्यप्रदेश में 8 हजार के करीब मदरसे संचालित हैं

भले ही मदरसों को कुछ सियासी लोग संदेह की नजर से देखें और मदरसों को लेकर सवाल खड़े किए जायें, लेकिन मदरसों की तादाद लगातार बढ़ रही है। वजह भी साफ है मदरसों को संचालित करने वाले लोगों को अनुदान के रूप में मिलने वाली राशि ने भोपाल में ही नहीं बल्कि मध्यप्रदेश में मदरसों की संख्या में अप्रत्याशित इजाफा कर दिया है।
दीनी तालीम के साथ आधुनिक शिक्षा देने की मंशा से 1998 में गठित किये गये मध्यप्रदेश मदरसा बोर्ड में मदरसों के रजिस्ट्रेशन की तादाद लगातार बढ़ रही है। यहां दर्ज मदरसों की संख्या गठन के बाद से दस गुना बढ़ गई है। वर्तमान में प्रदेश में 8 हजार के करीब मदरसे संचालित किये जा रहे हैं। जिनमें मदरसों में पंजीकृत मदरसों की संख्या तकरीबन 5 हजार है। इसमें से मान्यता प्राप्त मदरसे कुल 3962 है। दबी जुबान में मदरसा बोर्ड भी यह स्वीकारता है कि मदरसों की बढ़ती तादाद की वजह अनुदान है।
भले ही मदरसों पर सियासी पार्टियां तोहमत लगाकर कठघरे में खड़ा करें, लेकिन मदरसों की तादाद लगातार बढ़ रही है। यही वजह है कि मदरसों में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक शिक्षा से जोडऩे के लिए सरकार भी अब गंभीर हो गई है। मदरसों को आर्थिक सहायता देने के लिए केन्द्र ने कई नई योजनाएं शुरू की और उससे मदरसों को जोडऩे का प्रयास किया है। एसपीक्यूईएम नामक इस योजना से जुडऩे के साथ मदरसों में आधुनिक शिक्षा की गुणवत्ता के साथ मदरसों के बच्चे शिक्षा की मुख्य धारा से जुड़ जाएंगे। इस योजना के तहत विज्ञान, गणित, सामाजिक विज्ञान, भाषा, कम्प्यूटर अनुप्रयोग तथा विज्ञान विषयों के शिक्षण हेतु शिक्षकों के लिए पूर्णकालिक स्नातक शिक्षक को छह हजार रुपए और स्नातकोत्तर या बीएड शिक्षक को 12 हजार रुपए प्रतिमाह की दर से वेतन दिया जाएगा। शिक्षकों की नियुक्ति का राज्य सरकार/मदरसा बोर्ड को अधिकार रहेगा।
इस कार्यक्रम के अंतर्गत सहायता के लिए आवेदन करने के लिए वे मदरसे पात्र होंगे, जो कम से कम तीन वर्ष से अस्तित्व में है तथा केन्द्र अथवा राज्य सरकार के नियमों अथवा मदरसा बोर्ड अथवा वक्फ बोर्ड अथवा राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयीन शिक्षा के अंतर्गत पंजीकृत हैं।
पुस्तकालय को सुदृढ़ बनाने और प्राथमिक, मिडिल, माध्यमिक तथा वरिष्ठ माध्यमिक स्तरों पर अध्यापन सामग्री के लिए प्रत्येक मदरसे को 50 हजार रुपए की सहायता के साथ पांच हजार का वार्षिक अनुदान दिया जाएगा। वहीं विज्ञान व गणित किटों के लिए 15 सौ और विज्ञान एवं कम्प्यूटर प्रयोगशालाओं के लिए प्रत्येक को एक लाख की सहायता के साथ रखरखाव के लिए पांच हजार का वार्षिक अनुदान भी दिया जाएगा।
लेेेकिन मप्र मदरसा बोर्ड के एक फरमान ने मदरसा (स्टडी सेंटर) संचालकों को परेशानी में डाल दिया है। करीब 9 साल से संचालित स्टडी सेंटरों के संचालकों पर नवीनीकरण शुल्क थोप दिया गया है। स्टडी सेंटर की स्थापना से अब तक का बकाया शुल्क भी एकमुश्त मांगा जा रहा है।
मदरसा बोर्ड से संबद्ध परीक्षार्थियों के आवेदन मदरसा बोर्ड में जमा कराने के मकसद से वर्ष 2000 में स्टडी सेंटरों की स्थापना की गई थी। राजधानी में इस तरह के 50 और प्रदेशभर में 200 से ज्यादा सेंटर संचालित हैं। बोर्ड हर वर्ष मान्यता का नवीनीकरण करता है। इसका शुल्क नहीं लिया जा रहा था। सूत्रों के मुताबिक बोर्ड ने 12 फरवरी 09 को स्टडी सेंटर संचालकों को भेजे पत्र में मान्यता नवीनीकरण के बदले 500 रुपए शुल्क जमा करने के निर्देश जारी किए। इसके बाद 30 अप्रैल को पुन: इस आदेश को दोहराया गया। इसी क्रम में 23 जून को जारी किए गए पत्र में मदरसा बोर्ड ने इसमें संशोधन करते हुए नवीनीकरण शुल्क दोगुना कर दिया है। साथ ही स्टडी सेंटरों को स्थापना से अब तक का शुल्क जमा कराने की हिदायत भी दी गई है।
मप्र मदरसा बोर्ड के अध्यक्ष मोहम्मद गनी अंसारी इस संबंध में कहते है कि स्टडी सेंटर संचालक विद्यार्थियों से कमाई कर रहे हैं फायदे में चल रहे इन मदरसों से नवीनीकरण शुल्क मांगा जाना कहां गलत है? इस आदेश के विरूद्घ मदरसा संचालक भी लामबंद हो गए है। आधुनिक मदरसा कल्याण संघ के सचिव मोहम्मद शोएब कुरैशी का कहना है कि किसी नए नियम को वर्तमान तारीख से लागू किया जाता है, न कि पिछले कार्यकाल से। इस फरमान के खिलाफ मदरसा संचालक अदालत जाएंगे।
मदरसा आधुनिकीकरण योजना के तहत मदरसों के बच्चों को आधुनिक शिक्षा से जोडऩे के लिए मदरसों के बच्चों को सर्व शिक्षा अभियान के तहत उपलब्ध कराई जाने वाली पाठ्य पुस्तकें समय पर उपलब्ध नहीं करा पाए हैं। नए शिक्षा सत्र को शुरू हुए एक माह होने को आया लेकिन हालत यह है कि अभी तक किताबें मदरसों में नहीं पहुंची हैं। जिसकी वजह से सरकार की मदरसों को मुख्य धारा से जोडऩे की योजना बेेमानी साबित हो रही है।
बताया जाता है कि राजधानी के तकरीबन एक हजार से 12 सौ पंजीकृत मदरसों में से केवल 400 मदरसों को ही किताबें वितरित की जाती हैं, लेकिन इन मदरसों में भी किताबें समय पर नहीं पहुंची हैं। वहीं वर्षों से संचालित किए जा रहे तकरीबन 800 मदरसे तो सर्वशिक्षा अभियान से ही अछूते हैं। न तो इनमें तालीम पा रहे बच्चों को शासन की शिक्षा के क्षेत्र में चलाई जा रही योजनाओं का कोई लाभ मिल रहा है और न ही इन बच्चों को मध्यान्ह भोजन ही नसीब हो रहा है और न ही साईकिल। जिसके कारण मदरसों में शिक्षा के आधुनिकीकरण का काम पिछडऩे से इंकार नहीं किया जा सकता है।
अशोकागार्डन स्थित मदरसा सुल्तानिया के संचालक सरवर सुल्तान बताते है कि मदरसे में तकरीबन 80 बच्चे तालीम हासिल करते हैं, लेकिन इसके बावजूद यहां तुलवाओं को अभी तक किताबें उपलब्ध नहीं कराई गई है, जिससे बच्चों को परेशानी हो रही है। मदरसा तालिबीन संजय नगर की संचालिका शीबा सुल्तान प्रशानिक अधिकारियों को कटघरे में खड़ा करते हुए कहती है कि अभी तक पाठ्यपुस्तकें उपलब्ध नहीं कराई गई हैं, जिसके कारण बच्चों की पढ़ाई पर असर पड़ रहा है और बच्चों की पढ़ाई पिछड़ रही है। लेकिन मप्र मदरसा बोर्ड के सचिव मो. हनीफ कहते हैं कि मदरसा बोर्ड के माध्यम से अब सर्व शिक्षा अभियान के तहत पाठ्य पुस्तक वितरण नहीं की जाती। जिला परियोजना समन्वयक हरभजन सिंह तोमर की माने तो मदरसा बोर्ड से मान्यता प्राप्त जिले के 441 मदरसों में से मात्र 120 मदरसे ही शेष रह गए हैं जो अब तक किताबें लेने ही नहीं आए। बहरहाल आपसी खींचतान और विरोधाभासी बयानों के बीच नुकसान बच्चों को उठाना पड़ रहा है। वहंी मदरसों को सर्वशिक्षा अभियान से जोड़ कर बच्र्चो केा शिक्षित करने की शासन की महात्वाकांक्षी योजना पर भी पलीता लगता दिखाई पड़ रहा है। जामिया इस्लामिया अरबिया मस्जिद तरजुमे वाली मदरसे के संचालक मौलाना मोहम्मद अहमद इन सबके लिए शासन की योजनाओं का क्रियांवयन करने वाले अधिकारी और कर्मचारियों को दोषी मानते हुए कहते है कि मदरसों के लिए आई विशेष योजना के तहत दी जा रही सुविधाएं बड़े मदरसों के लिहाज से पहले से नाकाफी तो है ही लेकिन छोटे मदरसों को मिलने वाली सुविधाएं भी उन्हें नही मिल पा रही है। यहां तैनात अधिकारी और कर्मचारी मदरसों को मिलने वाले लाभ से वंचित करने में लगे हैं।