Saturday, July 2, 2016
भ्रष्टाचार का गढ़ बना पीडब्ल्यूडी
भ्रष्टों ने लगाई 27,000 करोड़ की चपत
भोपाल। लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) मप्र में ही नहीं भारतभर में भ्रष्टाचार का गढ़ बना हुआ है। अकेले मप्र में ही भ्रष्ट अधिकारियों, नौकरशाहों, राजनेताओं और ठेकेदारों ने मिलीभगत से सरकार को पिछले एक दशक में करीब 27,000 करोड़ की चपत लगाया है। सरकार को यह चपत पूर्ण हो चुकी 14,714 सड़कों और 95 पुल-पुलियों के साथ ही निर्माणाधीन 16,783 सड़कों और 290 पुल-पुलियों के घटिया सड़क निर्माण, टेंडर में गड़बड़ी, पुरानी सड़कों पर पुन: निर्माण, पुल-पुलिया का मापदंड को दरकिनार कर बनाना, समय पर निर्माण नहीं होने से लागत बढऩे और भ्रष्टाचार से लगाई गई है। पीडब्ल्यूडी में भ्रष्टाचार की जड़ें किस तरह फैली हैं, इसका खुलासा अफसरों व कर्मचारियों पर छापामार कार्रवाई से हो रहा है, पर विभाग के जिम्मेदारों के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही। यही नहीं विभाग के भ्रष्टाचार की पोल कैग की रिपोर्ट में भी खुलती रही है। उधर, आम आदमी पार्टी ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। एक प्रेस कांफ्रेंस में पार्टी के पदाधिकारियों ने घोटालों का खुलासा किया। ट्विटर पर तस्वीर जारी कर और विभिन्न आंकड़ों के जरिए पार्टी ने सरकार पर लगभग 36,000 करोड़ से ज्यादा के घोटालों का आरोप लगाया है। जिसमें पीडब्ल्यूडी विभाग में 9765.22 करोड़ की वित्तीय अनियमित्ताएं भी हैं।
उल्लेखनीय है कि लोक निर्माण विभाग शासकीय भवनों, मार्गों तथा पुलों के सर्वेक्षण, रूपांकन, निर्माण एवं रख-रखाव आदि सभी कार्यों को सम्पन्न करने वाला प्रमुख विभाग है। यह विभाग मध्यप्रदेश के समस्त कार्य विभागों के ठेकेदारों के पंजीयन का कार्य भी करता है। मुख्यमंत्री युवा इंजीनियर कांट्रेक्टर योजना संचालित किए जाने का नोडल विभाग है। इतनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी वाले इस विभाग को हर साल राज्य सरकार द्वारा हजारों करोड़ रूपए का बजट मुहैया कराया जाता है। वित्तीय वर्ष 2015-16 में विभाग को राज्य सरकार नक 5911.80 करोड़ का बजट मुहैया कराया था वहीं वित्तीय वर्ष 2016-17 के लिए 7124.80 करोड़ का बजट दिया है। लेकिन इतना बड़ा बजट मिलने के बाद भी विभाग गुणवत्ता पूर्ण कार्य करने में असफल साबित हुआ है। विभाग में भर्राशाही और भ्रष्टाचार किस कदर है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि विभाग ने अब तक 179 ठेकदारों को ब्लैक लिस्टेड कर रखा है।
पीडब्ल्यूडी ने भारत में भ्रष्टाचार को बुनियादी स्तर पर सचमुच नए सिरे से परिभाषित किया है। अन्य विभागों के विपरीत, जहां रिश्वत, काम की रफ्तार को तेज करने का काम करता है, वहीं पीडब्ल्यूडी में इसकी भूमिका बदल जाती है। यह संभवत: उन चंद विभागों में से है, जहां, अधिकारी घटिया सेवाएं देने के लिए पैसे लेते हैं। यहां भ्रष्टाचार का पूरे समाज पर व्यापक असर पड़ता है। सड़कों के रखरखाव और जल निकासी की व्यवस्था के लिए काफी हद तक पीडब्ल्यूडी ही जिम्मेदार होता है। कोई भी साल ऐसा नहीं होता है, जब भारी बारिश के बाद प्रदेश के ज्यादातर शहरों में जिंदगी ठहर सी न जाती हो। हर साल, प्रदेश भर में, बारिश के बाद न केवल सड़कें बर्बाद हो जाती हैं, बल्कि नाले-नालियां भी उफनाने लगते हैं। इसीलिए उन शहरों को किस्मतवाला माना जाता है, जहां जल निकासी का अच्छा इंतजाम होता है। पीडब्ल्यूडी, मरम्मत का जो भी काम कराता है, वह चंद महीनों में ही बराबर हो जाता है। अगली बारिश में ही पता चल जाता है कि दरअसल क्या काम कराया गया था। नतीजा यातायात में रुकावट, सार्वजनिक जीवन में बाधा, सामग्री का नुकसान और बड़े पैमाने पर महामारी का प्रकोप। मप्र में हर साल सड़क की वजह से सरकार को सैकड़ों करोड़ रुपए का खामियाजा उठाना पड़ता है।
प्रदेश में सड़क माफिया, पीडब्ल्यूडी के कर्मचारियों, स्थानीय राजनेताओं, वेंडरों और ठेकेदारों का गठजोड़ इस हद तक पहुंच गया है कि किसी भी ईमानदार आदमी की प्रतिबद्धता खतरे में पड़ गई है। पीडब्ल्यूडी कई बार निजी कंपनियों के जरिए निर्माण कार्य करवाता है और पीडब्ल्यूडी की नाक के नीचे और दोनों की सुविधा के अनुसार, सड़कों, पुलों और बुनियादी सुविधाओं के निर्माण में धड़ल्ले से घटिया सामग्री का इस्तेमाल होता है। इसका परिणाम यह होता है कि हर साल करोड़ों रूपए खर्च करने के बाद भी प्रदेश की सड़के बदहाल हैं। पिछले एक दशक में मध्य प्रदेश ग्रामीण सड़क विकास प्राधिकरण ने करीब 14,000 से अधिक सड़कों का निर्माण कराया है लेकिन भ्रष्टाचार के कारण ये सड़कें ऐसी बनी हैं कि कईयों का अस्तित्व केवल कागजों पर है।
रिश्वतखोरों का स्वर्ग
लोक निर्माण विभाग में ें रिश्वत नारियल जैसा हो गया है, हर काम से पहले चढ़ाना ही पड़ता है। आलम यह है कि तमाम सतर्कता के बाद भी विभाग में रिश्वत लेने वाले अधिकारी-कर्मचारी हमेशा लोकायुक्त के हत्थे चढ़ रहे हैं। सही कहा जाए तो पीडब्ल्यूडी के ज्यादातर अधिकारी भ्रष्ट हैं। और नौकरशाहों और राजनेताओं से माफिया की मिलीभगत इस समस्या को और गंभीर बना देती है। इसकी वजह से प्रदेश को करदाताओं के पैसे का भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। न्यायिक विलंब इस गठजोड़ के लिए उत्प्रेरक का काम कर रहा है। एक समय था जब उम्मीद की किरण दिखाई दी थी, जब मध्य प्रदेश के देवास में पीडब्ल्यूडी के एक भ्रष्ट अधिकारी को एक स्थानीय न्यायाधीश ने पांच करोड़ रुपए का जुर्माना और तीन साल कैद की सजा सुनाई थी। इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ एक कड़ी सजा के तौर पर देखा गया था। लेकिन विभाग में भ्रष्टाचार के भष्मासूर इस कदर भरे पड़े हैं कि लगातार रिश्वत के मामले सामने आ रहे हैं। अक्टूबर 2015 में बिल्डर एसोसिएशन ऑफ इंडिया इंदौर सेंटर के चेयरमैन अरुण जैन ने पीडब्ल्यूडी के प्रमुख सचिव (पीएस) प्रमोद अग्रवाल से की शिकायत में कहा था कि पीडब्ल्यूडी ऑफिस में भ्रष्टाचार का बोलबाला हैं। वे यदि सत्यता जांचना चाहते हैं, तो एसी ऑफिस के रिकॉर्ड में अटकी फाइलें देख लें। एसोसिएशन ने सुझाव भी दिए थे, पर ध्यान नहीं दिया गया। पीडब्ल्यूडी में जनसुनवाई करने में भी कोई दिलचस्पी नहीं लेता है। इस कारण भ्रष्टाचार लगातार बढ़ रहे हैं।
इस साल इस ही पीडब्ल्यूडी में रिश्वतखोरी और लोकायुक्त की छापामार कार्रवाई में कई ऐसे मामले सामने आए हैं जो विभाग में चल रहे भ्रष्टाचार की पोल खोल रहे हैं। 8 मार्च को कार्यपालन यंत्री (ईई) ब्रजेन्द्र कुमार माथुर के खिलाफ लोकायुक्त ने सड़क घोटाले में प्राथमिकी दर्ज की थी। देपालपुर के गंगाजल खेड़ी से चिमनखेड़ी गांव के बीच 7.70 किमी की सड़क में दो ठेकेदारों का पेमेंट रोका और तीसरे ठेकेदार को ज्यादा राशि में टेंडर भरवाकर काम सौंप दिया। ठेकेदार राकेश कुमार सांवला ने अधिकारियों की बात की रिकार्डिंग और वीडियो बनाकर स्टिंग भी किया था। इससे पहले लोकायुक्त ने 29 जनवरी को रेसीडेंसी इलाके में माथुर को 30 हजार रुपए की रिश्वत लेते रंगेहाथ पकड़ा था। वह ठेकेदार ब्रजेश सोनी को सड़क की डीपीआर बनाने के भुगतान के लिए 50 हजार की रिश्वत मांग रहा था। पकड़े जाने के एक माह बाद माथुर का तबादला सागर कर दिया और विभागीय जांच की बात कहकर सस्पेंड होने से बचा लिया गया। 18 अप्रैल को लोकायुक्त पुलिस ने पीडब्ल्यूडी के एक रिश्वतखोर बाबू रजनीकांत केसरी को तीस हजार रूपए घूस लेते हुए धर- दबोचा। लोकायुक्त की इस कार्रवाई से पीडब्ल्यूडी विभाग में अफरा-तफरी मच गई। जानकारी के अनुसार फरियादी इंद्रर प्रजापति टीआई माल में स्थित विक्टोरिया रेस्टोरेंट में बार चलाने के लिए आबकारी विभाग में लाइसेंस के लिए आवेदन दिया था। इस पर आबकारी विभाग में जगह का प्राक्लन करने के लिए पीडब्ल्यूडी को निर्देशित किया था। आबकारी विभाग से जैसे ही यह फाइल पीडब्ल्यूडी के भ्रष्ट बाबू रजनीकांत केसरी के पास आई वैसे ही प्राक्लन के नाम पर फरियादी से पच्चास हजार रुपए की मांग की। इस पर आवेदक ने मना कर दिया। फरियादी इंदर प्रजापति महीनों भ्रष्ट बाबे केसरी का चक्कर काटता रहा, लेकिन वह फाइल बढ़ाने को तैयार ही नहीं होता था। अंत में किसी तरह दोनों के बीच तीस हजार रूपये में सौदा तय हुआ। इधर फरियादी इस पूरे मामले की शिकायत लोकायुक्त एसपी अरूण मिश्रा से कर दी। लोकायुक्त पुलिस ने जाल बिछाकर भ्रष्ट बाबू केसरी को दबोच लिया।
पीडब्ल्यूडी का बाबू केसरी कितना भ्रष्ट है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह अपने पद पर एक ही जगह सालो सें बैठा हुआ था। रसूख के चलते उसका तबादल कहीं नहीं होता था। विभाग के अधिकारियों को भी उसके खिलाफ शिकायत मिलती थी लेकिन कोई अधिकारी हाथ नहीं डालता था। इससे स्पष्ट है कि उसका विभाग में एक तरफा तूती बोलती थी। बताया जा रहा है कि पीडब्ल्यूडी में बिना उसके इशारे से एक काम भी नहीं होता था। जिस किसी को अपना काम विभाग में करवाना होता था सभी लोग केसरी से संपर्क करते थे। केसरी इतना शातिर था कि वह अपने ही विभाग के अधिकारियों को ब्लैकमेल करता रहता था। उसके इस आदत से विभाग का कोई बड़ा अधिकारी कोई कार्रवाई करने का साहस नहीं करता था। सूत्रों का कहना है कि वह अधिकारियों को खुले तौर पर धमकी देता था कि अगर उसका कोई काम नहीं करेंगे तो वह अधिकारियों की पोल खोल देगा। इसके डर से विभाग का कोई भी अधिकारी या कर्मचारी केसरी के खिलाफ कुछ भी कहने का साहस नहीं रखता था।
अधिकारियों के साथ विभाग के कर्मचारी भी भ्रष्टाचार कर मोटी कमाई करने में पीछे नहीं हैं। दो साल पहले लोकायुक्त ने टाइम कीपर कृपाल सिंह के तिलक नगर स्थित घर पर दबिश दी, तो 14 मकान, 20 एकड़ जमीन सहित कुल 12 करोड़ रुपए की संपत्ति का खुलासा हुआ था। वहीं डेली वेजेस से अपना कैरियर शुरू करने वाले पीडब्ल्यूडी के सब-इंजनीयर की आर्थिक सेहत लोकायुक्त छापे से पता चल गई है और अब इस भ्रष्ट सब इंजीनियर की भागीदारी वाली दो फर्मों की पूरी कुंडली लोकायुक्त पुुलिस खंगालेगी। उल्लेखनीय है कि इंदौर के इन्द्रपुरी में पुलिस ने पीडब्ल्यूडी के इंजीनियर राजेंद्र शर्मा के फ्लैट पर छापा मारा था तो आय से अधिक सम्पत्ति के साथ कई चौंकाने वाली जानकारी सामने आई थी। अटलांटा और ओरा नामक दो बिल्डर कंपनियों में राजेंद्र शर्मा के पिता की 27 प्रतिशत भागीदारी पता चली थी। बताते हैं कि इस अटलांटा और ओरा ने श्रीनगरमेन, इन्द्रपुरी, विजयनगर सहित प्रमुख इलाकों में 10 से अधिक बहुमंजिला इमारतें और बंगले बनाए हैं। पिता के नाम पर भागीदारी लेकर राजेंद्र शर्मा इन सब मामलों को डील कर रहा था। उसने यह सब निवेश उस समय शुरू किया, जब वह पीडब्ल्यूडी से हटाया गया था। फिलहाल उसका लॉकर खुलना बाकी है, लॉकर से भी कुछ महत्वपूर्ण जानकरियां मिल सकती हैं। लोकायुक्त पुलिस के सूत्रों के मुताबिक पुलिस दल आज अटलांटा और ओरा के ऑफिसों, उनके प्रमुख कार्यस्थल पर जाएगा और पता लगाएगा कि कौन-सा प्रोजेक्ट कब शुरू हुआ, कितने में जमीन खरीदी गई, कितने फ्लैट बनाये गये, कितना प्राफिट हुआ, 27 फीसदी के हिसाब से शर्मा के हिस्से में कितना आया, इस पैसे का निवेश कहां किया गया। यह सब बातें जांच का हिस्सा होंगी।
दागी सबसे अधिक शक्तिशाली
पीडब्ल्यूडी ऐसा विभाग है जहां दागी सबसे अधिक शक्तिशाली हैं। इसका अंदाज इससे लगता है कि विभाग में जिन इंजीनियरों को अनियमितता के आरोप में निलंबित किया जाता है उन्हें कुछ दिनों बाद बहाल कर दिया जाता है। पीडब्ल्यूडी हरदा के कार्यपालन यंत्री आरसी सिरोले, एसडीओ बीआर जगदेव और सब इंजीनियर आरके जैन 12 फरवरी 2015 में निलंबित किया गया। उन पर प्रथमदृष्टया आरोप था कि चारूवा-डेडगांव-दामोदरपुरके काम में गंभीर अनियमितताएं की हैं। उसी दिन उन्हें निलंबित कर दिया था। इसके तीन महीने बाद ही तीनों अफसरों सिरोले को मुख्य अभियंता कार्यालय पश्चिम परिक्षेत्र इंदौर, जगदेव को अधीक्षण यंत्री कार्यालय मंडल इंदौर और जैन को अधीक्षण यंत्री मंडल कार्यालय उज्जैन में पदस्थ कर दिया गया है।
सिंहस्थ में निर्माण कार्यों की कमान एक ऐसे इंजीनियर के हाथों में हैं, जो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के गृह जिले सीहोर में घटिया सड़क निर्माण कराने का दोषी है। इस महाआयोजन में 600 करोड़ रुपए के निर्माण कार्यों की मॉनिटरिंग की जिम्मेदारी पीडब्ल्यूडी के कार्यपालन यंत्री पीजी केलकर हैं। उनके वेतन से 42 लाख रु की वसूली हो रही है। खासबात यह है कि जांच में केलकर दोषी साबित हुए। उन्हें दंडित तो किया, लेकिन उज्जैन से नहीं हटाया गया। घोटाले की वजह से केलकर की कई पदोन्नतियां और वेतन वृद्धि रोकी गईं। उज्जैन में पदस्थ करने के बाद विभाग ने उन्हें एक नोटिस जारी किया था कि मप्र सिविल सेवा नियम 1966 के नियम 10 एवं 16 के अंतर्गत केलकर पर अनुशासनात्मक कार्रवाई का निर्णय लिया गया है। इसमें लोकायुक्त के सर्कलर की अनदेखी भी की गई है। लोकायुक्त का एक सर्कुलर है, जिसमें कहा गया है कि भ्रष्टाचार के लिए दोषी किसी भी अफसर की फील्ड पोस्टिंग नहीं की जाए। लेकिन केलकर की उज्जैन में पोस्टिंग करने के दौरान इस सर्कलर को दरकिनार किया गया है। इस मामले में पीडब्ल्यूडी मंत्री सरताज सिंह का कहना है कि केलकर के खिलाफ कार्रवाई की गई है। लेकिन इस मामले की जांच उन्हें उज्जैन में पदस्थ किए जाने के बाद पूरी हुई थी। उन्हें उज्जैन से इसलिए भी नहीं हटाया गया, क्योंकि यहां उनके द्वारा कराए जा रहे किसी भी काम की अभी तक कोई शिकायत नहीं मिली है। सूत्रों की माने तो केलकर की उज्जैन में पोस्टिंग कराने में उज्जैन कलेक्टर कवींद्र कियावत की भूमिका बताई जा रही है। यह दावे इसलिए भी सही हो सकते हैं, क्योंकि केलकर ने घोटाला उस अवधि में किया, जब कियावत सीहोर कलेक्टर रहे। केलकर दो साल सीहोर में रहे।
रीवा में 30 करोड़ का घपला
रीवा में चोरहटा बायपास से रतहरा तक सड़क निर्माण और सौंदर्यीकरण के नाम पर व्यापक पैमाने पर घपला किए जाने का आरोप लगाया गया है। कांग्रेस विधायक सुंदरलाल तिवारी ने कहा कि उन्हें मिले दस्तावेजों के आधार पर अब तक 30 करोड़ रुपए के भुगतान में अनियमितता की गई है। एक ही कार्य को कई ठेकेदारों के नाम पर भुगतान किया गया है। राशि का बंदरबाट करने के लिए शासन की आधा दर्जन एजेंसियों ने इस मार्ग में रुपए खर्च किए हैं।
उन्होंने कहा कि 14.40 किलोमीटर की इस सड़क के बारे में विधानसभा में सरकार ने पूरी जानकारी नहीं दी है। बीते छह वर्षों के अंतराल में पीडब्ल्यूडी ने 10.35 करोड़, राष्ट्रीय राजमार्ग परिक्षेत्र ने 9.95 करोड़, नगर निगम ने भी करीब दस करोड़ रुपए का भुगतान किया है। अभी कई कार्यों का भुगतान किया जाना बाकी है। नगर निगम ने वर्ष 2008 से अब तक इस मार्गमें 2.02 करोड़ रुपए का पौधरोपड़ करा दिया है जो कहीं पर भी नजर नहीं आ रहा। इसी तरह वन विभाग ने भी करीब 60 लाख रुपए चोरहटा से रतहरा के बीच पौधे लगाने में खर्च कर दिए। विधायक का आरोप है कि एक ही कार्य के लिए दो ठेकेदारों को भुगतान किया गया है। इस मार्गमें ब्रिज कार्पोरेशन ने चौराहों में रोटरी बनाया तो समान तिराहे का काम एमपीआरडीसी ने किया है। इस मार्ग में सड़क, नाली, डिवाइडर, सौंदर्यीकरण आदि कार्यों के लिए मेसर्स विजय शंकर मिश्रा, शांती कांस्ट्रक्शन, मे. अजीत सिंह, विजय कुमार द्विवेदी, मोहम्मद मकसूद, रमेश कुमार मंशानी, एबी कांस्ट्रक्शन एवं इंफ्रास्ट्रक्चर, गोपाल सिंह, रामसज्जन शुक्ला, श्रीजी कंस्ट्रक्शन आदि को अलग-अलग हिस्सों में कई बार काम देने और भुगतान किए जाने की जानकारी विधानसभा में दी गई है।
ढह गये 100 करोड़ के पुल
लोक निर्माण विभाग कितना गुणवतायुक्त निर्माण करवाता है इसका उदाहरण यह है कि 3 साल में करीब 100 करोड़ से अधिक की राशि से बने पुल ढह गए हैं। भिंड की क्वारी नदी, बेगमगंज के राहतगढ़, हरदा, बैतूल जिले में सारणी के पास राजडोह पर बने पुल, होशंगाबाद जिले के सिवनी-मालवा क्षेत्र में नर्मदा का निर्माणाधीन आंवलीघाट पुल इसके उदाहरण हैं। कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता केके मिश्रा कहते हैं कि प्रदेश सड़कों का निर्माण करने वाली अधिकांश कंपनियां राजनैतिक परिवारों और रिश्तेदारों से संबद्ध हैं? समूचा लोक निर्माण विभाग भ्रष्टाचार की कर्मस्थली के रूप में अपनी पहचान बना चुका है। वह कहते हैं कि जब मुख्यमंत्री और लोक निर्माण मंत्री के विधानसभा क्षेत्रों में ही भ्रष्टाचार, कमीशनखोरी और गुणवत्ताविहीन निर्माण सामग्री उस पुल को लील गई, तब अन्य क्षेत्रों की भयावहता क्या होगी? मिश्रा कहते हैं कि वर्ष 2011-12 में राजमार्गों की मरम्मत हेतु केंद्र द्वारा आवंटित 43 करोड़ 74 लाख रूपयों में से राज्य के केवल 23 करोड़ 59 लाख रूपए ही खर्च कर पाया। वर्ष 2012-13 में भी 110 करोड़ रूपयों की आवंटित राशि में 89 करोड़ 84 लाख रूपए ही खर्च हो सके। राजमार्गों के अलावा वर्ष 2011-12 में आवंटित 1568 करोड़ रूपए में से सिर्फ 1288 करोड़ रूपये ही खर्च हुए। इसी प्रकार वर्ष 2012-13 में भी आवंटित 1628 करोड़ रूपए में से मात्र 930 करोड़ 43 लाख रूपये ही खर्च हो पाए? अशोकनगर, ग्वालियर, शिवपुरी और दमोह में बिना किसी निर्माण कार्य कराये ही उनके विभाग ने ठेकेदारों को भुगतान कर दिया। जिसमें 18 इंजीनियर और ठेकेदार फसे, किंतु उनके विरूद्व कोई असरकारक कार्यवाही नहीं हुई। निर्धारित मानको के अनुरूप लगभग 6 हजार किलोमीटर सड़कें और 500 पुल बह गये हैं। यही नहीं, राजधानी भोपाल में करीब 300 किलोमीटर के मुख्य मार्ग में 150 किलोमीटर सड़कें बह गई हैं। इन संकेततात्मक स्थितियों में तो यही कहा जा सकता है कि लोक निर्माण विभाग सड़कों की ऊपरी मरम्मत और मरहम-पट्टी करवाकर भ्रष्टाचार को दबा नहीं सकता है। मिश्रा कहते हैं कि कि पिछले 11 वर्षों में सरकार करीब 1 लाख किलोमीटर सड़कों के निर्माण का दावा तो कर रही है, किंतु प्रदेश में आज भी 7 हजार गांव सड़क विहीन हैं।
सबसे भ्रष्टाचार वाला क्षेत्र
सड़क निर्माण को शायद सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार वाले क्षेत्र के तौर पर देखा जाता है। यही वजह है कि सड़क निर्माण में गुणवत्ता को लेकर हमेशा संशय बना रहता है। यह आम है कि भारी राशि खर्च करके कोई सड़क तैयार की जाती है और बारिश या वाहनों के दबाव से कुछ ही समय बाद उसके टूटने की खबर आ जाती है। शायद इसी के मद्देनजर ग्रामीण विकास योजनाओं की प्रगति की समीक्षा करते हुए प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के तहत बनाई जा रही सड़कों की गुणवत्ता की सख्त निगरानी सुनिश्चित करने के लिए प्रधानमंत्री ने एक प्रभावशाली तंत्र स्थापित करने का निर्देश दिया। छिपी बात नहीं है कि सड़क निर्माण की निविदा निकलने से लेकर सामग्री की खरीद, निर्माण और रख-रखाव तक भारी पैमाने पर भ्रष्टाचार पसरा हुआ है।
पिछले आठ-दस सालों के दौरान देश भर में सड़कों का जाल बिछाने की कोशिश की गई, बहुत सारे दूरदराज के इलाकों को मुख्य सड़कों से जोड़ा गया। खासकर जब से प्रधानमंत्री सड़क निर्माण योजना की शुरुआत हुई, उसके बाद इस क्षेत्र में बड़ी कामयाबी हासिल हुई। लेकिन सवाल है कि इतने बड़े पैमाने पर सड़क निर्माण के साथ क्या गुणवत्ता का भी खयाल रखा गया? इसका अंदाजा सिर्फ इसी से लगाया जा सकता है कि कई जगहों पर महज दो-तीन साल पहले की बनी हुई सड़कों को भी आज इस कदर दुर्दशा में देखा जा सकता है कि उस पर सहज तरीके से वाहन न चल पाएं। जब भोपाल में सड़कें धंसकने से लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है तो दूर-दराज इलाकों की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है।
ऐसा इसलिए संभव होता है कि किसी खास दूरी में सड़क निर्माण के लिए सब कुछ नाप-तौल कर बजट बनाया जाता है, मानक तय किए जाते हैं और राशि जारी की जाती है। लेकिन संबंधित महकमे के अधिकारियों से लेकर निचले स्तर के ठेकेदार तक भ्रष्ट तरीके से इसी राशि में से हिस्सा बंटाने के फेर में इस बात का ख्याल रखना जरूरी नहीं समझते कि इसका सड़क की गुणवत्ता पर क्या असर पड़ेगा। बचे हुए पैसे में काम पूरा करने की कोशिश का नतीजा यह होता है कि जिस सड़क को बनाने में जितनी और जिस स्तर की सामग्री का उपयोग होना चाहिए उसमें कभी मामूली तो कभी ज्यादा कटौती कर दी जाती है।
ऐसा शायद इसलिए हो पाता है कि राशि जारी करने से लेकर निर्माण की समूची प्रक्रिया के पूरा होने और फिर देखरेख पर निगरानी तंत्र की जवाबदेही सुनिश्चित नहीं है। ग्रामीण इलाकों में साधारण लोगों के बीच इस बात को लेकर जागरूकता कम है कि उनके उपयोग के लिए जो सड़क बनाई जा रही है, अगर वह तय मानकों के हिसाब से नहीं बनी है तो वे शिकायत करें। मगर अब तकनीक और संचार के बढ़ते दायरे के दौर में प्रधानमंत्री ने जिस अभिनव पहल की बात की है, उसके तहत 'मेरी सड़कÓ नामक ऐप के जरिए नागरिक शिकायतों के निवारण की भी व्यवस्था की जाएगी। जाहिर है, अगर सड़क निर्माण के क्षेत्र को भ्रष्टाचार और अनदेखी की समस्या से मुक्त करने के उपाय किए जा सके, तो यह जन-कल्याण के क्षेत्र में बड़ी कामयाबी होगी। यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि सड़कें केवल सुगम आवाजाही का जरिया नहीं, बल्कि वे किसी इलाके से लेकर समूचे देश की अर्थव्यवस्था का सबसे मुख्य आधार होती हैं।
600 करोड़ स्वाहा फिर भी नहीं मिल रही दो गज जमीन
मप्र में फुस्स हुई शांतिधाम योजना
भोपाल। मरने के बाद मृत शरीर का अंतिम संस्कार सम्मानजनक रूप से करना भारतीय संस्कृति का हिस्सा है लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में अंतिम संस्कार की समुचित व्यवस्था न होने से ग्रामीणों के लिए अंतिम क्रिया करने में तकलीफ उठानी पड़ती है। इसको देखते हुए मनरेगा की उपयोजना 'शांतिधामÓ में ग्रामीण क्षेत्रों में श्मशान घाट बनाने को शामिल किया गया है। प्रदेश में शांतिधाम योजना के साथ किस तरह का खिलवाड़ हुआ है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि करीब 600 करोड़ रूपए स्वाहा करने के बाद भी अधिकांश जगह लोगों को अंतिम संस्कार के लिए भटकना पड़ रहा है। सरकारी दावों के अनुसार, राज्य के 52 हजार गांवों में शांतिधाम उप-योजना में ग्रामीण अंचलों में श्मशान घाट और कब्रिस्तान की भूमि का विकास किया जा रहा है। शांतिधाम के निर्माण में भी भारी भ्रष्टाचार किया गया। शांतिधाम कागजों में ही बना दिए गए और इनका मूल्यांकन कराकर राशि हड़प ली गई। इस मामले की सूक्ष्मता से जांच कराई जाए तो अरबों रूपए का भ्रष्टाचार उजागर होगा। आलम यह है कि मनरेगा के अंतर्गत कार्य तो हितग्राहियों से कराया गया है लेकिन आज तक मजदूरी व सामग्री का भुगतान भी नहीं किया गया है।
उल्लेखनीय है कि मई 2011 में ग्रामीण क्षेत्रों में शांति धाम योजना के तीन हजार विकास कार्यो को मंजूरी दी गई इन कार्यों के लिए 428 करोड़ 57 लाख रूपए की राशि स्वीकृत की गई। आज स्थिति यह है कि शांतिधाम विकास के नाम पर राशि तो स्वाहा हो गई है लेकिन अधिकांश गांवों में शांतिधाम या तो बदहाल पड़े हैं या गायब हैं। आलम यह है इस योजना के तहत कितने शांतिधाम बने इसकी पड़ताल किए बिना ही फिर से राज्य सरकार प्रदेश में 11 हजार से अधिक नए श्मशान घाटों के निर्माण को मंजूरी दे दी। इन श्मशान घाटों के निर्माण के लिए 146 करोड़ 42 लाख रुपए का फंड भी जारी कर दिया गया। फिर भी आज स्थिति यह है कि प्रदेश के गांवों में ही नहीं बल्कि शहरों में भी शांतिधाम योजना के तहत श्मशान घाट और कब्रिस्तान का विकास नहीं हो सका।
यह होना है योजना के तहत
ग्रामीण क्षेत्रों में श्मशान भूमि, कब्रिस्तान आबादी से दूर एवं मूलभूत सुविधाओं से विहीन असुरक्षित और प्रदूषित होते हैं। वर्षाऋ तु में श्मशान भूमि पर शेड के अभाव में सूखी लकड़ी के भण्डारण की समुचित व्यवस्था नहीं होती है जिसके कारण दाह संस्कार करने में बाधा आती है। इसी तरह कब्रिस्तानों में कीचड़ होने से शव दफनाने में कठिनाई होती है। इसे मद्देनजर रखते हुए सरकार ने राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी स्कीम के तहत प्रत्येक गांव में शांतिधाम बनाने की योजना बनाई है। शांतिधाम योजना के तहत सबसे पहले उन गांवों को लिया गया है जहां श्मशान भूमि और कब्रिस्तान नहीं हैं। यह भी देखा गया है कि जिन गांवों में जिस समुदाय के लोगों की संख्या अधिक है। वहां अंतिम संस्कार के स्थल निर्माण की प्राथमिकता तय की जाएगी। शांतिधाम योजना के प्रथम चरण में ऐसे ग्रामों का चयन किया गया है जिनकी जनसंख्या पांच हजार से अधिक हो। द्वितीय चरण में पांच हजार से कम किन्तु तीन हजार से अधिक जनसंख्या वाले गांवों को और तृतीय चरण में ऐसे गांवों का चयन किया गया है जिनकी संख्या तीन हजार से कम है।
शांतिधाम उपयोजना का उद्देश्य श्मशान भूमि और कब्रिस्तान में मूलभूत सुविधाओं जैसे-पानी, छाया, सूखी लकड़ी, प्लेटफार्म, स्वच्छ व पवित्र वातावरण आदि की व्यवस्था करना है। शांतिधाम उपयोजना अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्रों में भूमि समतलीकरण के कार्य, श्मशान भूमि और कब्रिस्तान के चारों ओर छायादार वृक्ष जैसे - नीम, बरगद, पीपल, गुलमोहर, गूलर, पाकड़ आदि तथा फूल वाले जैसे- बोगनबेलिया, कन्हेर आदि तथा शांतिधाम स्थल के चारों कोने पर बांस का वृक्षारोपण आदि के कार्य शामिल हैं। इसके अलावा शांतिधाम के प्रस्तावित स्थल के अंदर या समीप पानी की व्यवस्था न होने पर कुआं अथवा स्थल के समीप नदी और नाला होने पर स्टापडेम या चैकडेम का निर्माण करना शामिल है। उसे आबादी स्थल से जोडऩे के लिए सिंगल लेन जीएसबी स्तर की सड़क का निर्माण भी किया जाना है। सुरक्षा के लिए शांति धाम स्थल के आस-पास ड्राई बोल्डर्स की दीवार या हेज आदि से उसका घेरा बनाया जाना है। श्मशान भूमि पर शवदाह के लिए दो कच्चे चबूतरे और कब्रिस्तानों में नमाज अदा करने के लिए कच्चे चबूतरे का निर्माण किया जाना है। शांतिधाम में पार्टीशनयुक्त छत वाले स्नानागार भी बनाए जाना है। प्रत्येक शांतिधाम में अंतिम संस्कार वाले व्यक्ति के यादगार को चिरस्थाई बनाने के लिये स्मृति वन भी बनाना है।
यही नहीं नियमत: शांतिधाम स्थल के निर्माण और विकास कार्य की गुणवत्ता पर भी पूरी निगरानी रखी जानी है। निर्माण कार्य में उपयोग होने वाली सामग्री का प्रयोगशाला से संबंधित विभाग द्वारा परीक्षण कराया जाएगा। गुणवत्ता सुनिश्चित हो इसके लिए ग्रामीण रोजगार गारंटी, ग्रामीण यांत्रिकी सेवा के संबंधित अधिकारी जिम्मेदार होंगे। शांतिधाम योजना को त्वरित गति से क्रियान्वित करने और कार्ययोजना बनाने के लिए समयबद्ध कार्यक्रम बनाया जाएगा। इसके लिए जिला स्तर पर एक समिति का गठन कलेक्टर की अध्यक्षता में होगा। जिसमें सदस्य सचिव मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत होंगे। पंचायतों के पदाधिकारी, जिला ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिकारी और समिति के अध्यक्ष द्वारा विभिन्न समुदायों के तीन प्रतिनिधि इसके सदस्य होंगे। यह समिति वित्तीय वर्ष में बनने वाले शांतिधाम की संख्या का निर्धारण करेगी और प्रस्तावित निर्माण कार्यों के संबंध में निर्णय लेगी। लेकिन विसंगति यह देखिए की तमाम तरह के नियम होने के बाद भी अफसरों की लापरवाही के कारण योजना अपने टारगेट को भी पूरा नहीं कर पाई।
आधे-अधूरे काम में खर्च हो गई मनरेगा की राशि
एक तरफ सरपंच, सचिव मनरेगा की राशि न मिलने का रोना रो रहे हैं, वहीं पिछले कुछ माह पूर्व उन्हें विकास कार्य के लिए मिली राशि से पंचायत में आधा-अधूरा कार्य करवाकर खातों से राशि आहरण कर उन्हें आपस में ही बांटकर बंटाधार कर गए। ऐसा ही मामला पटेरा विकासखंड की ग्राम पंचायत रुसल्ली का सामना आया है। जहां पर सरपंच, सचिव द्वारा आपस में मिलकर मनरेगा योजना के तहत कार्य की मात्र बानगी दिखाकर खातों से राशि निकाल हजम कर गए। ग्राम पंचायत रुसल्ली के रामनाथ कुर्मी, गोविन्द प्रसाद रजक, खुमान अहिरवार, झल्ले अहिरवार, गोपाल रजक, हे पटैल, बालचंद्र पटैल, पवन अहिरवार, सलकू रजक, हल्कीबहू, सियारानी, लटकारी अहिरवार आदि लोगों के द्वारा मुख्य कार्यपालन अधिकारी को दिए आवेदन में ग्राम पंचायत सरपंच व सचिव पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने बताया कि ग्राम रुसल्ली के शांतिधाम के लिए मनरेगा योजना के तहत लगभग 4.98 लाख रुपए की राशि में कुआं निर्माण, टीन शेड, बाउंड्रीबॉल व मुरमीकरण का कार्य किया जाना था लेकिन पंचायत सचिव ने बाउंड्रीवॉल का कुछ कार्य कराकर तीन लाख पचास हजार पांच सौ बानवे रुपए की राशि आहरण कर गोलमाल कर दी। जबकि स्वीकृत राशि से आधी-अधूरी बाउंड्रीवॉल के अलावा अन्य कार्य का श्रीगणेश भी नहीं हुआ। खाते से निकाली गई राशि का सरपंच, सचिव द्वारा किस कार्य पर व्यय किया गया, वो बताने को तैयार नहीं है।
वहीं बालाघाट के वारासिवनी के ग्राम पंचायत गटापायली के पूर्व सरपंच, सचिव और उपयंत्री द्वारा आर्थिक अनियमितता का मामला उजागर हुआ है। ग्राम पंचायत गटापायली के दो दर्जन ग्रामीणों ने पूर्व सरपंच, सचिव और उपयंत्री द्वारा निर्माण कार्य के नाम पर आर्थिक अनियमितता किए जाने की शिकायत की थी। जिसमें शांतिधाम योजना का फंड कागजों पर ही खर्च करने का आरोप है। शिकायतकर्ता तुलाराम जमरे, हरिचंद कावरे, देवराज बिसेन, धनराज सैय्याम सहित अन्य ने बताया कि शांतिधाम उपवन योजना के नाम पर राशि का गोलमाल किया गया है। यहां समतलीकरण व वृक्षारोपण के लिए 4 लाख 99 हजार रुपए स्वीकृत किए गए थे। लेकिन शांतिधाम में न तो समतलीकरण किया गया और न ही वहां पर वृक्षारोपण किया गया। इस तरह से पूर्व सरपंच, सचिव ने उपयंत्री के साथ मिलकर राशि की बंदरबाट कर ली है। जांच अधिकारी मेघराज गौतम के अनुसार दो दर्जन से अधिक ग्रामीणों के बयान दर्ज किए गए हैं। अग्रिम कार्रवाई के लिए प्रकरण तैयार कर एसडीएम को सौंपा जाएगा।
जिला अशोकनगर में इस उपयोजना के अंतर्गत जिला पंचायत के अंतर्गत 2014 में चारों ब्लाकों की जनपदों के अंतर्गत 335 ग्राम पंचायतों में 361 शांतिधाम बनाने की स्वीकृती दी गई थी। इसके अंतर्गत चारों ग्राम पंचायतों में 216 कार्य प्रारम्भ किए गए। इन पर 1458.18 लाख रूपए खर्च किए गए हंै। अभी तक जिले में 44 कार्य ही पूर्ण किए जा सके है। शेष कार्य योजना प्रारम्भ से अभी तक प्रगतिशील बने हुए है। न तो इस महत्वपूर्ण योजना पर जनप्रतिनिधियों का ध्यान है और न ही जिला प्रशासन के आला अधिकारी इस और ध्यान दे रहे है। जबकि हर जन सुनवाई में कभी न कभी ऐसे आवेदन देखे जा सकते है कि कब्रिस्तान की जमीन पर कब्जा कर लिया या शमशान की जमीन को दबंगों ने जोत लिया। अब गांव मे मुर्दा जलाने के लिए जगह नहीं है। जिला पंचायत में मनरेगा योजना के अनुसार मुंगावली जनपद क्षेत्र के अंतर्गत 4 ही कार्य पूर्ण हो सके है। शेष कार्य प्रगति पर बताए जा रहे है। 12 निर्माण कार्य प्रारम्भ ही नहीं हो सके है। चंदेरी जनपद के अंतर्गत 57 निर्माण कार्य स्वीकृत किए गए है जो प्रगतिशील बताए जा रहे है। इसी प्रकार अशोकनगर में 115 ग्रामों में शांतिधाम का निर्माण किया जाना था जिस पर 52 निर्माण कार्य चालू बताए गए है। ईसागढ़ जनपद द्वारा स्वीकृत शांतिधाम भी प्रगतिशील बताए जा रहे है।
खरगोन जिले की ग्राम पंचायत माकडख़ेड़ा के सचिव पर ग्रामवासियों ने मुक्तिधाम के निर्माण में घटिया काम का आरोप लगाया है। सचिव की अनियमितता की शिकायत उच्च अधिकारियों से कर कार्रवाई की मांग की है। मनरेगा के तहत पंचायत द्वारा बनाए जा रहे मुक्तिधाम के निर्माण की मांग ग्रामीणों द्वारा लंबे समय से की जा रही थी, लेकिन वर्तमान में किए जा रहे घटिया कार्य से ग्रामीणों में आक्रोश है। इसका कारण पंचायत सचिव द्वारा निर्माण में की जा रही लापरवाही व अनियमितता है। निर्माण में गुणवत्ताविहीन सामग्री इस्तेमाल होने के कारण नर्मदा के पहले बहाव में ही वह क्षतिग्रस्त हो गया है। जिले में बन रहे या बन गए कई शांतिधाम भी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़े हैं।
फौजी के शव को नहीं मिली दो गज जमीन
रीवा जिले के गोविन्दगढ़ थाना अंतर्गत रीवा जनपद के ग्राम पंचायत रौरा में ग्राम अमिलकी निवासी रिटायर्ड फौजी रामभिलाष आदिवासी (65) की मौत के बाद उसके शव को दो गज जमीन नसीब नहीं हुई। परिजन उनका अंतिम संस्कार करने बनाए गए नवनिर्मित मुक्ति धाम पहुंचे थे जहां ताला लगा हुआ था। जिससे परिजन आक्रोशित हो गए थे। सरपंच की समझाइस के बाद मामला शांत हो पाया। बताया जा रहा है कि एक घंटे पहले ही मुक्ति धाम का लोकार्पण सांसद जनार्दन मिश्रा ने किया था। बताया जा रहा है कि लोकार्पित शांतिधाम का निर्माण कार्य अधूरा है टिन शेड लगाया गया हैं। जबकि फर्श का कार्य अभी होना है। जिसके चलते लोकार्पण के बाद गेट में ताला लगा दिया गया था। निर्माण कार्य पूर्ण होने तक अंतिम संस्कार के लिए रोका गया था। शांतिधाम लोकार्पण के बाद अंतिम संस्कार के लिए मौके पर पहुंचे लोगो को जानकारी थी कि लोकार्पण के दिन यदि किसी का अंतिम संस्कार होगा तो उस परिवार के सदस्य को एक लाख रुपये मिलेंगे। जिसके चलते लोग अडिग रहे। हालांकि बाद में समझाइस के बाद मामला सुलझ गया और अंतत: घर के सदस्य शव इलाहाबाद लेकर अंतिम संस्कार के लिए चले गये। सरपंच रौरा प्रीति तिवारी कहती हैं कि अमिलकी गॉव से शव अंतिम संस्कार के लिये लाया गया था। चौकीदार से गेट भी खुलवाया गया था कि वे अपना शव रख ले, उन्हें जब पता चला कि इनाम की कोई योजना नही हैं वे शव इलाहाबाद ले जाने की बात कह कर, शव लेकर चले गये।
आष्टा विकासखंड के अधिकांश ग्रामों में मृतकों के अंतिम संस्कार के लिए बनाए गए श्मशानों की निस्तार भूमि पर अतिक्रमणकारियों के कब्जे जमे हैं। जिस कारण ग्रामीणों को मृतकों के अंतिम संस्कार में परेशानी उठानी पड़ रही है। विकासखंड के ग्राम नौगांव में लोग बीच सड़क पर चिता का अंतिम संस्कार करते हैं, रास्ते पर चिता जलने के दौरान ग्रामीण चिता को लांघकर निकलते हैं। ग्राम नौगांव में लगभग 5 एकड़ श्मशान भूमि पर दबंगों द्वारा अतिक्रमण कर निर्माण कर लिए गए हैं। इसी के चलते मजबूरन ग्रामीणों को श्मशान भूमि के नजदीक के मार्ग के बीचों बीच मृतकों का अंतिम संस्कार करना पड़ रहा है। ग्राम नौगांव में शासन द्वारा श्मशान घाट हेतु लगभग 5 एकड़ भूमि आरक्षित की गई थी जिसमें श्मशानघाट का निर्माण होना था। किन्तु ग्राम के कुछ दबंग लोगों द्वारा उक्त समस्त श्मशान भूमि पर अतिक्रमण कर कच्चे पक्के निर्माण कर लिये गये। जिसके कारण ग्रामीणों को मजबूरीवश ग्राम के मुख्य मार्ग पर पत्थर जमाकर मृतकों का अंतिम संस्कार करना पड़ रहा है। मार्ग पर होने वाले अंतिम संस्कार के कारण मार्ग से गुजरने वाले राहगीरों को भी परेशानी का समाना करना पड़ रहा है। ग्रामीणों द्वारा अंतिम संस्कार में आ रही परेशानीयों एवं श्मशान भूमि को अतिक्रमण मुक्त करने की मांग को लेकर वर्ष 2013 व 14 में सिहोर पहुंचकर दो बार आवेदन भी दिया जा चुका है। इसके अतिरिक्त ग्रामीणों द्वारा तहसील कार्यालय आष्टा में भी उक्त आशय को लेकर अनुविभागीय अधिकारी को आवेदन दिया था।
विदिशा में भी लिंक रोड स्थित श्मशान की जमीन पर दबंगों ने कब्जा कर लिया है। श्मशान के सीमांकन के दौरान यह बात सामने आई। नपा द्वारा श्मशान के सीमांकन के बाद तार फेंसिंग करवाने का निर्णय लिया है। श्मशान की भूमि पर लंबे समय से अतिक्रमण की शिकायतें आ रही हैं। प्रशासन की अनदेखी के कारण यह श्मशान कचरा घर के रूप में तब्दील होता जा रहा है। श्मशान पर से अतिक्रमण हटाने तथा सफाई के लिए नागरिकों द्वारा नपा से निवेदन किया गया था। नपा में सांसद प्रतिनिधि रमेश यादव तथा स्थानीय पार्षद संतोष रघुवंशी, शहर पटवारी नीरज विश्वकर्मा को लेकर मौके पर पहुंचे। उन्होंने जब श्मशान की भूमि का सीमांकन किया तो हैरत में पड़ गए। श्मशान की करीब साढ़े 3 बीघा जमीन के काफी बड़े हिस्से पर दंबगों ने अतिक्रमण कर रखा है। सांसद प्रतिनिधि यादव ने बताया की सीमांकन की प्रक्रिया में बाधा बन रहे अतिक्रमण को शीघ्र ही हटाया जाएगा। श्मशान के चारों ओर तार फेंसिंग एवं सफाई करवाकर वहां पर पौधरोपण किया जाएगा।
दतिया जिले में भी कागजों पर शांतिधाम बनाने का मामला सामने आया है। जिले के गांवों में मनरेगा के तहत पार्क व श्मशान घाट बनाए गए हैं जिनमें कईस्थानों पर निर्माण कार्य सिर्फ कागज पर ही हुए हैं।
राजगढ की ग्राम पंचायत अभयपुर ने तो शांतिधाम के नाम पर कुआं, रास्ता, मंजूर करवा कर लाखों रूपए की राशि पर हाथ साफ करके मानवता का शर्मसार कर दिया। अभयपुर में सदियों से शवदाह नैवज नदी तट पर किया जाता है। इस प्राकृतिक श्मशान में शांतिधाम योजना के तहत ग्राम पंचायत ने शेड, वहां तक पहुुंचने के लिए रास्ता और कुंआ भी बना दिया। लेकिन दिलचस्प यह है कि यहां एक पेड़ के सिवा और कुछ नहीं दिखता है। यानी पूर्व सरपंच और कागजों के सिवा किसी भी ग्रामीण को न शेड, न रास्ता और न कुंआ दिखता है। यही नहीं जांचकर्ताओं ने पता नहीं कौन से चश्मे से भौतिक सत्यापन करके कागजों का पेट भर दिया।
शिवपुरी जिले के पोहरी क्षेत्र की ग्राम पंचायतों में पिछले तीन वर्षों में लगभग पांच लाख की लागत से शांतिधाम निर्माण कार्य किए गए परंतु शांतिधाम आज भी अपनी दुर्दशा पर आंसु बहा रहे हैं, जितनी राशि का व्यय किया जाना कागजों में दर्शाया गया उतनी से आधी राशि भी यदि ईमानदारी से खर्च की जाती तो आज मुक्तिधामों की दशा इतनी बदतर नहीं होती। शांतिधाम निर्माण के नाम पर दाह संस्कार हेतु चबूतरा, टीनशेड, चारों ओर की बाउण्ड्रीबाल एवं स्थल का समतलीकरण निर्माण किया जाता है, जिसमें कई पंचायतों में महज खानापूर्ति की गई है। इस पूरे फर्जीवाडे में केवल सरपंच सचिव ही जिम्मेदार नहीं है बल्कि इंजीनियर, एसडीओ, मनरेगा अधिकारी भी बराबर के हिस्सेदार हैं।
वहीं पन्ना जिले में जनपद पंचायत पन्ना के अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायत जनकपुर में स्थित शंातिधाम इसका एक उदाहरण मात्र है। इस पंचायत के अंतर्गत आने वाले गांधी ग्राम में पंचायत द्वारा 3 लाख 71 हजार रूपए की लागत से वर्ष 2011 में शांतिधाम का निर्माण कराया गया था। लेकिन शांतिधाम की हालत देखकर तो यही प्रतीत होता है कि रिकार्ड में खर्च की गई राशि 25 फीसदी भी यहां व्यय नहीं किया गया। निर्माण के नाम पर शांतिधाम में लोहे का एक गेट लगवाया गया है तथा थोड़ी सी पत्थर की खखरी बनी है। आश्चर्य की बात तो यह है कि यहां पर लगवाये गए लोहे के गेट का एक पल्ला भी नदारत है। इस रिक्त हुए स्थल को कटीली झाडिय़ों से बंद कर दिया गया है। गेट के भीतर का नजारा और भी हैरत में डाल देने वाला है। क्योंकि वहां बड़ी-बड़ी झाडिय़ों व जंगली घास उगी हुई है। कोई चाहकर भी इस स्थल में प्रवेश नहीं कर सकता। जाहिर है कि जिस मंशा व उद्देश्य से सार्वजनिक उपयोग व महत्व के इस स्थल का निर्माण कराया गया। उस उद्देश्य की पूर्ति वहां नहीं हो पा रही है। वजह साफ है कि निर्माण एजेन्सी व जिम्मेदार लोगों ने शांतिधाम के बजट का सदुपयोग करने के बजाय मिल बांटकर उसे साफ कर दिया। स्थानीय निवासी उदय प्रकाश मिश्रा ने बताया कि शांतिधाम का निर्माण यहां पर हुए दो साल हो गए लेकिन आज तक किसी भी व्यक्ति का दाह संस्कार यहां नहीं हो सका।
दूर-दराज की बात छोडि़ए राजधानी भोपाल में ही कई कब्रिस्तानों पर रसूखदारों का कब्जा है। नगर निगम के रिकार्ड में शहर में 181 कब्रिस्तान दर्ज हैं, लेकिन इनमें से 159 अतिक्रमण की आंधी में कभी के नेस्तनाबूद हो चुके हैं और बाकी बचे 22 कब्रिस्तानों की हालत भी ठीक नहीं है। यही हाल रहा तो हो सकता है आने वाले दिनों लाशें दफनाने के लिए हमें आसपास के जंगलों की ओर रुख करना पड़े। अतिक्रमण के खिलाफ समय-समय पर कार्रवाई होती रहती है, लेकिन आज भी श्मशानों और कब्रिस्तानों के सैकड़ों अतिक्रमण चुनौती बने हुए हैं। जैसे कि आरटीओ कार्यालय के सामने कब्रिस्तान पर झुग्गी-बस्ती आबाद हो गई है तो जोगीपुरा, भोईपुरा में कब्रिस्तान की भूमि शेष ही नहीं बची। छावनी कब्रिस्तान की आधी भूमि पर कई पक्के मकान बन गए हैं। बस स्टैंड के पास, बाग उमराव दूल्हा, इब्राहिमगंज में भी अब कब्रिस्तान का नामोनिशान इक्का-दुक्का कब्रों से दिखाई देता है। कई कब्रिस्तानों पर शासकीय कार्यालय भी खुल गए हैं। पुलिस लाइन, लांबाखेड़ा, फतेहगढ़ का घाट पच्चीसा, शाहपुरा आदि कब्रिस्तान शासकीय कार्यालयों के नीचे दफन हो चुके हैं। एक अनुमान के मुताबिक कब्रिस्तान के उपयोग के लिए दान में दी गई पांच हजार एकड़ से ज्यादा वक्फिया जमीन पर अतिक्रमणकारियों का कब्जा है।
पूरे राज्य में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिनमें अधिकांश मामले राज्य के बड़े शहरों में हुए हैं़ सबसे ज्यादा अतिक्रमण ग्वालियर जिले में 150, भोपाल जिले में 88, इंदौर जिले में 43 होना पाया गया है। ये मामले वे हैं जो वक्फ के सामने आए और वक्फ ने इन अतिक्रमण को हटाने के लिए कानूनी कार्यवाही की है। इसके अलावा ऐसे भी कई मामले हैं जिन पर वक्फ बोर्ड कार्यवाही नहीं कर पाया है। वक्फ बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष गुफरान-ए-आजम स्वयं इस बात को लेकर सहमत हैं कि राज्य के कई शहरों में कब्रिस्तान की जमीन पर लोगों ने अतिक्रमण किया है।
अव्यवस्थाओं से घिरे कब्रिस्तान-श्मशान
आलम यह है कि भोपाल सहित पूरे प्रदेश में कब्रिस्तान और श्मशान अव्यवस्थाओं से घिरे हैं। इनकी सुध न तो नगर निगम ले रहा है और न ही वक्फ बोर्ड। जमीअत उलेमा हिंद पिछले कई सालों को कब्रिस्तानों को सुरक्षित करने व अन्य व्यवस्थाएं करने की मांग को लेकर धरना, प्रदर्शन कर रहा है। इसके बाद भी हालात नहीं सुधर रहे हैं। आलम ये है कि कहीं कब्रिस्तान गंदगी से घिरे हैं तो कहीं गेट के सामने ही दुकानें लग रही हैं। सुरक्षा की कमी है। ऐसे में कब्रिस्तानों को व्यवस्थित किए जाने की जरूरत है। लोगों ने अपनी जमीन-जायदाद वक्फ करते वक्त यही तसव्वुर किया होगा कि आने वाली नस्लों को इससे फायदा पहुंचेगा, बेघरों को घर मिलेगा, जरूरतमंदों को मदद मिलेगी, लेकिन उनकी रूहों को यह देखकर कितनी तकलीफ पहुंचती होगी कि उनकी वक्फ की गई जमीन-जायदाद चंद सिक्कों के लिए जरूरतमंदों और हकदारों से छीनकर दौलतमंदों को बेची जा रही है। मस्जिदों, मजारों और वक्फ की अन्य संपत्तियों पर कब्जे कर लिए गए हैं या करा दिए गए हैं। हालत यह है कि कब्रिस्तान तक को भी नहीं बख्शा गया। कब्रिस्तान से कब्रों को खोदकर मुर्दों की हड्डियां निकालकर, उन्हें खुर्दबुर्द किया जा रहा है, ताकि कब्रिस्तान का नामो-निशान तक मिट जाए। मुस्लिम समुदाय के लोगों को मरने के बाद दो गज जमीन तक मयस्सर नहीं हो पा रही है। मुर्दों को दफनाने के लिए उनके परिवार वालों को प्रशासन और पुलिस की मदद लेनी पड़ रही है। राजधानी समेत प्रदेश भर में कमोबेश यही हालत है।
28,40,28,23,40,000 की वन भूमि हड़प ली रसूखदारों ने
30 साल में मप्र में 5,747 वर्ग किमी वन भूमि पर हुआ कब्जा
भारत वन स्थिति रिपोर्ट 2015 में सामने आए तथ्य
भोपाल। यह आश्चर्यजनक लेकिन सत्य है कि मप्र में पिछले 30 साल में रसूखदारों ने 5,747 वर्ग किमी वन भूमि पर कब्जा जमा लिया है, जिसका न्यूनतम बाजार मूल्य करीब 28,40,28,23,40,000 रूपए है। इसका खुलासा हाल ही में प्रस्तुत भारत वन स्थिति रिपोर्ट 2015 में हुआ है। इतनी वन भूमि को कब्जाने के लिए हजारों वन्य प्राणियों और पेड़ों की बलि दी गई है। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि वन क्षेत्र में लगातार अतिक्रमण हो रहा है। इस कारण बाघ, हिरण, भालू, तेंदुआ आदि के शिकार के भी मामले बढ़े हैं, लेकिन सरकार के तरफ से इन्हें रोकने के लिए कोई कठोर कानून नहीं बनाए जा सके हैं। मप्र के बाद असम में 3,172 में वर्ग किमी, कर्नाटक में 1,872 वर्ग किमी, उड़ीसा में 785 वर्ग किमी और महाराष्ट्र में 670 वर्ग किमी वन भूमि पर अक्रिमण हुआ है।
भारत वन स्थिति रिपोर्ट 2015 के अनुसार, अब भारत का वन 701,673 वर्ग किलोमीटर यानी 21.34 फीसदी क्षेत्र तक फैला है जबकि 29 वर्ष पहले यह 640,819 वर्ग किलोमीटर तक फैला था। यह वृद्धि का स्पष्टीकरण पेड़ों को लगाने, विशेष रुप से मोनोकल्चर के जरिए बताया गया है, जो परिवर्तित प्राकृतिक वनों का स्थान नहीं लेते हैं एवं और स्थायी रुप से खत्म हो रहे हैं। आंकड़ों के अनुसार 30 वर्षों में वनों के स्थान पर 23,716 औद्योगिक परियोजनाएं शुरु हुई हैं। यानी औद्योगिकरण, शहरीकरण और जंगलों में बढ़ती पर्यटन गतिविधियों के कारण देशभर के वनों में अतिक्रमण हो रहा है। इस कारण पिछले तीन दशकों में भारत के वन का 14,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र साफ कर दिया गया है। सबसे बड़ा क्षेत्र (4947 वर्ग किलोमीटर) खनन को दिया गया है। रक्षा परियोजनाओं को 1,549 वर्ग किलोमीटर और जल विद्युत परियोजनाओं के 1,351 वर्ग किमी क्षेत्र दिया गया है सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले 30 वर्षों में हरियाणा के करीब दो-तिहाई आकार के वन अतिक्रमण (15,000 वर्ग किलोमीटर) और औद्योगिक परियाजनाओं (14,000 वर्ग किमी) की भेंट चढ़ गए हैं और जैसा कि सरकार ने स्वीकार किया है कि कृत्रिम वन इनकी जगह नहीं ले सकते हैं।
मप्र सबसे आसान क्षेत्र
मध्यप्रदेश अपनी विविधता के लिए जाना-पहचाना जाता है। विकास और सामाजिक परिवर्तन के प्रयासों के संदर्भ में भी जितने प्रयोग और परीक्षण इस पदेश में हुए हैं; संभवत: इसी कारण इसे विकास की प्रयोगशाला कहा जाने लगा है। मध्यप्रदेश में राजस्व और वनभूमि के संदर्भ में भी विवाद ने नित नए रूप लिए हंै। और अफसोस की बात यह है कि यह विवाद सुलझने के बजाए उलझता जा रहा है। इस विषय को विवादित होने के कारण नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है। जंगलों का मामला सत्ता, पूंजी और सामुदायिक सशक्तिकरण के बीच एक त्रिकोण बनाता है। इतिहास बताता है कि प्राकृतिक संसाधनों (खासतौर पर जल और जंगल) के किनारों पर ही सभ्यतायें बसती और विकास करती हैं। जंगलों और नदियों के संरक्षण से ही प्रकृति का संतुलन बनता है किन्तु विकास की जिस परिभाषा का आज के दौर में राज्य पालन कर रहा है उससे सामाजिक असंतुलन के नए प्रतिमान खड़े हो रहे हैं। अत: यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि जंगल के सवाल का जवाब खोजने के लिए व्यापक प्रयास किए जाएं। उल्लेखनीय है कि देश के कुल वन क्षेत्र का 11 फीसदी यानी सबसे अधिक क्षेत्र मध्यप्रदेश में है। इसके बाद 10 फीसदी के साथ अरुणाचल प्रदेश दूसरा और 8 फीसदी के साथ छत्तीसगढ़ का तीसरा स्थान है। पूर्वोत्तर राज्यों के क्षेत्रफल का 70 फीसदी से अधिक हिस्से में वन फैला है, सिवाय असम के जहां 35 फीसदी में वन है। रिपोर्ट के अनुसार मप्र को अतिक्रमण, वनों की कटाई, वन्य प्राणियों के शिकार के लिए सबसे आसान क्षेत्र माना गया है। इसलिए देश में सर्वाधिक मामले मप्र में सामने आए है। पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, अरुणाचल प्रदेश ने पिछले 30 वर्षों में सबसे अधिक वन (3338 वर्ग किलोमीटर) का सफाया किया है। वहीं मध्य प्रदेश ने 2,477 वर्ग किलोमीटर और आंध्र प्रदेश ने 1,079 वर्ग किमी वन साफ कर दिया है। जम्मू-कश्मीर, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल गैर वन उपयोगों के लिए कम से कम वन भूमि जारी किया है। वन भूमि के भीतर कई परियोजनाओं की अनुमति दी जाती है एवं यह प्रक्रिया मानव और वन्य प्राणियों दोनों के जीवन के विघटनकारी है। सरकार के लेखा परीक्षक ने कहा है कि, जिसके तहत इन परियोजनाओं को वन भूमि दिए गए हैं, उनका व्यापक रुप से उल्लंघन हो रहा है और विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारी आंकड़े अनुमान के नीचे हैं। टी वी रामचंद्र, एसोसिएट फैक्लटी सेंटर फॉर इकोलोजिकल साइंस एवं बंगलौर स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस के अनुसार सरकारी आंकड़े बहुत कम हैं। हमारे अध्ययन से पता चलता है, पिछले एक दशक में उत्तरी, मध्य और दक्षिणी पश्चिमी घाट में घने वन क्षेत्रों में 2.84 फीसदी, 4.38 फीसदी और 5.77 फीसदी की कमी हुई है। हाल ही में संसद ने बताया है कि वर्तमान में 25,000 हेक्टेयर तक जंगल 250 वर्ग किलोमीटर या चंडीगढ़ के क्षेत्र से दो गुना अधिक रक्षा परियोजनाओं, बांधों, खनन, बिजली संयंत्र, उद्योगों और सड़कों सहित गैर वानिकी गतिविधियों को सौंपा गया है।
वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि प्रदेश सरकार की उदारता पूर्ण नीतियों के कारण वनों में लगातार घुसपैठ बढ़ रही है। मप्र के साढ़े चार लाख हेक्टेयर से अधिक वन क्षेत्र पर अतिक्रमण है। यह आंकड़ा कम होने के बजाय बढ़ रहा है। जो जहां रह रहा है, उसे उस जमीन का मालिकाना हक दिया जाएगाÓ सरकार के मुखिया शिवराज सिंह चौहान के इस ऐलान के बाद कब्जे के मामले बढ़ गए हैं। बीते पांच साल में 16 हजार 518 हेक्टेयर वन क्षेत्र पर अतिक्रमण कर लिया गया। यह सरकारी आंकड़ा है। असल में यह दोगुना से ज्यादा है। प्रदेश का 3,08,245 वर्ग किलोमीटर भौगोलिक क्षेत्र हैं। इसमें करीब 31 फीसदी क्षेत्र (94668 वर्ग किमी) वन क्षेत्र है। वन विभाग खुश हो सकता है कि देश में सर्वाधिक वन क्षेत्र वाले पांच राज्यों में मध्यप्रदेश शामिल है, लेकिन इससे इतर लगातार वन क्षेत्र में अतिक्रमण तेजी से बढ़ रहा है। इसे रोक पाने में वन महकमा असहाय है। सूत्रों के मुताबिक, वर्ष 2010 से पहले सरकारी रिकॉर्ड में 4.37 लाख हेक्टेयर वन क्षेत्र में अतिक्रमण था। अब इसमें 16 हजार हेक्टेयर से अधिक की बढ़ोतरी हो गई है। वर्ष 2013 के बाद से इसमें ज्यादा वृद्धि हुई। वन विभाग के अनुसार राज्य सरकार ने जबसे जो जहां रह रहा है, उसे वहां का पट्टा देने की घोषणा की है, तब से नए अतिक्रमण के मामले बढ़ गए हैं। प्रदेश में अतिक्रमणकारियों के हौसले इतने बुलंद हैं कि उन्होंने नेशनल पार्कों तक को नहीं बख्शा। सर्वाधिक अतिक्रमण के मामले संजय टाइगर रिजर्व सीधी में सामने आए। यहां वर्ष 2010 से 2015 के बीच 268 हेक्टेयर में कब्जा कर लिया। पन्ना टाइगर रिजर्व में वर्ष 2014 में दस हेक्टेयर में अतिक्रमण किया गया, जबकि इससे पहले वर्ष 2011 और 2012 में विभाग ने अतिक्रमण की कोशिश करने पर 10 प्रकरण पंजीबद्ध किए थे। कुनो वन्य प्राणी वन मंडल श्योपुर में भी 12 हेक्टेयर और बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व एवं सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में भी 5-5 हेक्टेयर में अतिक्रमण किया गया।
प्रदेश के वनों पर बढ़ते जैविक दबाव, बढ़ती जनसंख्या तथा कृषि हेतु जमीन की बढ़ती भूख के कारण वन क्षेत्रों में अतिक्रमण एक गंभीर समस्या है। वर्तमान में संगठित एवं हिंसक अतिक्रमण के प्रयास भी हो रहे है। कई अशासकीय संगठनों द्वारा भी वन क्षेत्र में अतिक्रमण को प्रोत्साहित करने की घटनाएं भी प्रकाश में आई है। प्रदेश के वन क्षेत्र में लगातार भूमाफिया का कब्जा होने से वनों की हदें सिमटती नजर आ रही हैं। वन विभाग इस भूमि को अतिक्रमण से मुक्त नहीं करा पा रहा है। वन विभाग के मुताबिक मानव जीवन बैलेंस बनाए रखने के लिए प्रदेश में कम से कम 33 प्रतिशत जंगलों का होना आवश्यक है। लेकिन कब्जाधारियों द्वारा वनभूमि पर अतिक्रमण करने से वनों में 8.21 फीसदी वनभूमि की कमी आई है। जंगलों की कमी से जनजीवन एवं वन्यप्राणियों के लिए खतरे का संकेत है। जानकारी के अनुसार जंगलों का निरंतर दोहन होने से विपरीत प्रभाव पड़ेगा। इससे तरह-तरह की बीमारियां जैसे स्वांस, दमा आदि कई बीमारियों का लोग शिकार होंगे। साथ ही प्रदूषण भी तेजी फैलेगा जिससे वन्यप्राणी, मनुष्य प्रभावित होंगे। वनों को काटने से तापमान में परिवर्तन आएगा, इससे बाढ़, भूकंप जैसी आपदाओं की स्थिति बनेगी। आपदाओं की रोकथाम करने में जंगलों की अहम भूमिका होती है। यही नहीं गर्मियों के दिनों में तूफान एवं लू के हालात भी बनेंगी। इसके अलावा वनों प्राणवायु मिलती है वनों का निरंतर दोहन होने से प्राण वायु में भी कमी आएगी। प्रदेश में 32 ऐसे जिले हैं जो बाढ़ ग्रसित की श्रेणी में आते हैं। कम बारिश होने के बाद भी जहां बाढ़ आने की ज्यादा उम्मीद रहती हैं। इनमें उज्जैन, इंदौर, जबलपुर, रतलाम, मंडला, हरदा, गुना, होशंगाबाद सहित और भी जिले शामिल हैं। जो बाढ़ से प्रभावी क्षेत्रो की श्रेणी में आते हैं। इसके अलावा 28 जिले ऐसे हैं जो भूकंप तीव्रता की दृष्टि से जोन-3 और 22 जिले जोन-2 की श्रेणी में आते हैं।
सरकार की दोहरी नीति घातक
देश की भाति मध्यप्रदेश में भी जंगल और जंगल के अधिकार का सवाल उलझा दिया गया है। यहां उलझा दिया गया कहना इसलिए जरूरी हो जाता है क्योंकि हमेशा से जंगलों पर राज्य या सरकारी सत्ता का नियंत्रण नहीं रहा है। औद्योगिक क्रांति के दौर में ब्रिटिश हुकूमत को पहले पानी के जहाज बनाने और फिर रेल की पटरियां बिछाने के लिये लकड़ी की जरूरत पड़ी। इसी जरूरत को पूरा करने के लिए उन्होंने जंगलों में प्रवेश करना शुरू किया। जहां स्वायत्ता आदिवासी और वन क्षेत्रों में निवास करने वाले ग्रामीण समुदाय से आमना-सामना हुआ। इसके बाद विकास, खासतौर पर आर्थिक विकास के लिए जब संसाधनों की जरूरत पड़ी तब यह पता चला कि मूल्यवान धातुओं, महत्वपूर्ण रसायनों, जंगली वनस्पतियों, लकड़ी और खनिज पदार्थ ताते जंगलों से ही मिलेंगे। और फिर राजनैतिक सत्ता पर नियंत्रण करने की पद्धति अपनाई। वास्तव में अकूत प्राकृतिक संसाधनों का नियमन करने में कोई बुराई नहीं है किन्तु जंगलों के सम्बन्ध में जो कानून बने उनका मकसद समाज के एक खास तबके को लाभ पहुचाना रहा है और इसी भेदभावपूर्ण नजरिए के कारण आंतरिक संघर्ष की स्थिति निर्मित हुई। मध्य प्रदेश सरकार की भी ऐसी ही दोहरी नीति के कारण प्रदेश के जंगल तेजी से खत्म हो रहे हैं। एक तरफ तो सरकार जंगल बचाने और बढ़ाने के लिए हर साल करोड़ों रुपए खर्च कर रहे हैं वहीं दूसरी तरफ इन्हीं जंगलों में खदानों को अनुमति देकर राजस्व कमा रही हैं। सरकार की इस दोहरी नीति के कारण जंगल में माफिया हावी हो गया है। आलम यह है कि प्रदेश में पांच साल के अंदर 35590 हेक्टेयर जंगल की जमीन पर वैध रूप से खदानें खुद गई हैं तो माफियाओं ने सालभर में करीब 45,000 अवैध गड्ढे खोद डाले हैं। इतना ही नहीं इन गड्ढों से लाखों घन फुट पत्थर भी निकाला जा चुका है।
आज स्थिति यह है कि प्रदेश के जंगल गंजे होते जा रहे हैं। वर्ष 1995 तक यहां प्रति हेक्टेयर 52 घनमीटर जंगल की जगह 2015 में 38 घनमीटर ही रह गया और एक अनुमान के मुताबिक वर्तमान में यह 35 घनमीटर हो गया है। प्रदेश के 95 लाख हेक्टेयर वन भूमि में से मात्र सात फीसदी वन ही ऐसे बचे हैं जिन्हें सघन जंगल की श्रेणी में शुमार किया जा सकता है। 50 लाख हेक्टेयर से ज्यादा वन भूमि पर वन के नाम पर सिर्फ बंजर जमीन या उजड़ा जंगल बचा है। सत्रह लाख हेक्टेयर वन भूमि तो बिल्कुल खत्म हो चुकी है। 38 लाख हेक्टेयर वन भूमि पर दोबारा जंगल खड़ा करने के लिए 35 हजार करोड़ की रकम और बीस साल के वक्त की दरकार है लेकिन न तो रकम है और न इच्छाशक्ति। वन भूमि पर बढ़ते आबादी के दबाव के चलते जंगल तेजी से सिकुड़ रहे हैं।
वनवासियों के जिले में जंगल न के बराबर
वनवासियों के जिले झाबुआ में वन न के बराबर हैं। स्थिति ये है कि वन विभाग के पास वन क्षेत्र की जितनी जमीन है, उसमें से 70 प्रतिशत से ज्यादा वनविहीन है। वनों को बढ़ाने के सरकारी प्रयास नाकाफी साबित हुए। विभाग ने पिछले वर्षों में बड़े स्तर पर पौधारोपण किए, लेकिन इनमें से ज्यादातर काम राजस्व की भूमि पर हुआ। इसके अलावा कई जगह पौधे जीवित भी नहीं रह पाए। कुल मिलाकर जंगल बढ़ाने के सरकारी प्रयास नाकाफी हैं। झाबुआ के कुल क्षेत्रफल का 21.24 प्रतिशत क्षेत्र वन विभाग के पास वनभूमि के रूप में दर्ज है। ये क्षेत्र 734.953 वर्ग किलोमीटर है। इसमें से 70.36 प्रतिशत क्षेत्र ऐसा है, जो वनविहीन है यानी यहां न तो जंगली पेड़ हैं न जंगली जानवर। ये स्थिति काफी चौंकाने वाली है। ऐसा भी नहीं है कि बीते वर्षों में वनक्षेत्र में कोई खास कमी हुई हो। झाबुआ में बड़े वन नहीं होने से कटाई के बड़े मामले नहीं आए। फिर भी ये नहीं कहा जा सकता कि वनों की कटाई नहीं होती। कुछ वर्ष पहले वन कटाई को लेकर दो वनरक्षकों की हत्या का सनसनीखेज मामला हो चुका है। जिले में ये आंकड़ा आलीराजपुर जिले के अलग होने से अचानक बढ़ गया। आलीराजपुर में सघन वन क्षेत्र हैं और सम्मिलित जिला होने से ये प्रतिशत बेहतर था। हालांकि आलीराजपुर जिले में बड़े बांध प्रोजेक्ट के कारण वन क्षेत्र में कमी आई। इसके अलावा क_ीवाड़ा और उसके आसपास के क्षेत्र में वन कटाई के मामले सामने आते रहे हैं।
मध्यप्रदेश का सिवनी जिला पर्यावरण की दृष्टि से समृद्ध जिला रहा है। परंतु वन विकास की गलत नीतियों के कारण वन विभाग द्वारा ही बड़ी मात्रा में वनों का विनाश कर दिया गया है। इस प्रक्रिया में विभिन्न किस्मों के मिश्रित वन क्षेत्र मिटाए गए हैं वहीं सागौन, यूकेलिप्ट्स, जेट्रोफा जैसे वृक्षों का रोपण कर दिया गया है। इससे न केवल वनों की जैवविविधता नष्ट हुई है अपितु स्थानीय वनवासियों की आजीविका का भी विनाश हुआ है। वनवासियों का कहना हैं कि वन विकास निगम द्वारा भारी मात्रा में मिश्रित प्रजाति के जंगलों को नष्ट कर दिया गया है। यदि वन विकास निगम को वनों से भगाया नहीं गया तो बचे खुचे जंगल भी खत्म होंगे व जैवविविधता का भारी विनाश होगा एवं स्थानीय पर्यावरण पर भी इसके विपरीत परिणाम पड़ेंगे। वन लोगों की आजीविका के साधन रहे हैं परंतु वन विभाग की स्थापना के साथ ही स्थानीय आबादियों की आजीविका पर विपरीत प्रभाव पड़े हैं और जंगल के लोगों की गरीबी बढ़ी है।
इंडस्ट्री के लिए नीति बदलने की तैयारी
देश में लगातार घट रहे वन क्षेत्रों की नाजुक स्थिति को देखते हुए यूपीए सरकार ने परियोजनाओं को मंजूरी देने में पर्यावरण के लिहाज से नाजुक वन क्षेत्रों को अलग रखने की नीति बनाई थी। अब मोदी सरकार ने इस पॉलिसी को बदलने का मन बना लिया है। इसके चलते कुछ हाई प्रोफाइल और मोटे निवेश वाले प्रॉजेक्ट्स की राह खुल सकती है, जो वन क्षेत्र से जुड़े नियमों का उल्लंघन होने की आशंका के कारण स्थगित थे। प्रकाश जावड़ेकर के नेतृत्व वाले पर्यावरण मंत्रालय के इस कदम से कम से कम 10 पर्सेंट लंबित प्रोजेक्ट्स की राह खुलेगी। इनमें मध्य प्रदेश में 24,000 करोड़ रुपये का रियो टिंटो का डायमंड माइनिंग प्रॉजेक्ट भी है। साथ ही, 800 में से करीब एक तिहाई कोल ब्लॉक्स को विकसित किया जा सकेगा। मामले की जानकारी रखने वाले अधिकारियों ने बताया कि पर्यावरण मंत्रालय परियोजनाओं के लिए स्वीकृत और अस्वीकृत वन क्षेत्रों का वर्गीकरण जारी नहीं करेगा। इस वर्गीकरण की पॉलिसी जयराम रमेश ने बनाई थी, जो यूपीए शासन में पर्यावरण मंत्री थे। इसका मकसद पर्यावरण के लिहाज से नाजुक कुछ वन क्षेत्रों को किसी भी तरह की कमर्शियल या माइनिंग एक्टिविटी की जद से पूरी तरह दूर रखना था। मोदी सरकार बनने के बाद एक अलग कमेटी से इस पॉलिसी का रिव्यू कराया गया और अगस्त 2015 में उसने रिपोर्ट दी थी।
अधिकारियों का कहना है कि स्वीकृत और अस्वीकृत वन क्षेत्रों का नोटिफिकेशन जारी होने की गुंजाइश नहीं दिख रही है। अगर ऐसा नोटिफिकेशन नहीं आया तो अस्वीकृत वन क्षेत्रों में फंस सकने वाले प्रोजेक्ट्स पर काम शुरू हो सकता है। स्वीकृत और अस्वीकृत क्षेत्रों को नोटिफाई नहीं करने के निर्णय पर इस तथ्य से असर पड़ा है कि ऐसे वर्गीकरण के मसौदे में सामने आया था कि भारत के वन क्षेत्र का 10-11 पर्सेंट हिस्सा परियोजनाओं के लिए अस्वीकृत क्षेत्र के दायरे में आ जाएगा और कई बड़े प्रोजेक्ट इससे प्रभावित होंगे।एनडीए शासन ने इस संबंध में जिस क्लासिफिकेशन का प्रस्ताव किया था, उसमें यूपीए शासन की मूल योजना के मुकाबले इंडस्ट्रियल गतिविधियों के लिए ज्यादा वन क्षेत्र उपलब्ध हो जाता, लेकिन फिर भी कुछ बड़े प्रोजेक्ट्स फंस जाते। रियो टिंटो का प्रोजेक्ट भी फंस जाता। पर्यावरण मंत्रालय के तहत आने वाली वन सलाहकार समिति ने रियो टिंटो के मामले पर एक मीटिंग की थी और मध्य प्रदेश सरकार को प्रॉजेक्ट प्लान रिवाइज करने की सलाह दी गई थी।
सरकार के सारे प्रयास कागजी
उधर वनों की प्रभावी सुरक्षा हेतु क्षेत्रीय कर्मचारियों की गतिशीलता बढ़ाने हेतु केंद्र और राज्य सरकार ने जितने प्रयास किए हैं सारे विफल साबित हुए हैं। इसका परिणाम यह हुआ है कि वनों में लगातार अतिक्रमण और शिकार हो रहे हैं। वन क्षेत्रों में गस्त के लिए वाहन उपलब्ध कराए गए है। अतिसंवेदनशील वनक्षेत्रों में बीट व्यवस्था के स्थान पर सामूहिक गश्त हेतु वन चौकियों की स्थापना की गई है। वर्ष 2015 की स्थिति में 329 वन चौकियां कार्यरत हैं। प्रत्येक चौकी में गश्ती हेतु वाहन उपलब्ध है। परिक्षेत्र स्तर पर वन गश्ती एवं सुरक्षा हेतु वाहन अनुबंधित कर उपलब्ध कराये गये हैं। वन अपराधों पर नियंत्रण एवं त्वरित कार्यवाही हेतु प्रत्येक वन वृत्त में उडऩदस्ता दल कार्यरत है। उडऩदस्ता दल में पर्याप्त संख्या में वनकर्मी, शस्त्र एवं वाहन उपलब्ध हैं। ऐसे क्षेत्रों में जहां संगठित वन अपराधों की संभावना है, विशेष सशस्त्र बल की 3 कंपनियां भी तैनात की गई हैं। वर्ष 2015 में 1350 वन अपराधियों के विरूद्ध न्यायालय में प्रकरण प्रस्तुत किये गए तथा समस्त वन अपराधों में 2667 वाहन जप्त किए गए हैं जिसमें अवैध परिवहन में 1758 वाहन जप्त किए गए है। कर्तव्य के दौरान वन कर्मचारियां पर हमलें के 45 प्रकरण दर्ज हुए, जिसमें 48 कर्मचारी हमले में गम्भीर रूप से घायल हुआ। वर्ष 2015 में 3.57 करोड़ रूपए की राशि अभिसंधारित प्रकरणों में वसूल की गई।
सरकार के ताजा आंकड़ों के अनुसार, 1980 से साफ हुए 14,000 वर्ग किलोमीटर वन में से 6770 वर्ग किलोमीटर में नए सिरे से लगाए गए हैं या वनरोपण किया गया है। अप्रैल 2016 में, सरकार ने संसद में स्वीकार किया है कि प्रतिपूरक वनीकरण प्राकृतिक वनों के लिए विकल्प नहीं हो सकता। सरकारी बयान में कहा गया है कि यथासमय में प्रतिपूरक वनीकरण का इस्तेमाल वन परिवर्तन के प्रभाव का नुकसान को कम करने के लिए किया जाता है। अजय कुमार सक्सेना, दिल्ली के सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वाइरन्मन्ट के कार्यक्रम प्रबंधक (वानिकी) कहते हैं कि, प्राकृतिक वन की हानि की क्षतिपूर्ति संभव नहीं है, कम से कम एक सदी तक तो नहीं। सक्सेना आगे कहते हैं कि एक वन में प्राकृतिक पोषक तत्व प्रक्रियाओं के साथ हजारों वनस्पतियों और जीव एक जटिल पारिस्थितिकी मिश्रण में रहती हैं जो कि मोनोकल्चर वृक्षारोपण द्वारा दोबारा पाया नहीं जा सकता है।
वन भूमि का कानूनी परिवर्तन, अवैध कार्यों से बढ़ रहा है, मतलब कि कई लोग जिन्हें वन काटने की अनुमति मिल रही है, वह उन पर लगाए गए शर्तों का उल्लंघन करते हैं। 2013 की नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट कहती है कि परिवर्तन से संबंधित वन मंजूरी के कानूनों की निगरानी करने में पर्यावरण और वन मंत्रालय अपनी जिम्मेदारियों का उचित रूप से निर्वहन करने में विफल रहा है।
कैग रिपोर्ट कहती है, हमारी राय में वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 में निर्धारित दण्डात्मक खंड, अवैध और अनधिकृत प्रथाओं पर अंकुश डालने में काफी हद तक अपर्याप्त और अप्रभावी रहा है। पट्टों के अनधिकृत नवीकरण, अवैध खनन, खनन पट्टों निगरानी रिपोर्ट में प्रतिकूल टिप्पणी के बावजूद के बने रहना, परियोजनाओं के पर्यावरण मंजूरी के बिना काम करना, वन भूमि की स्थिति के अनधिकृत परिवर्तन एवं वानिकी मंजूरी के फैसले में मनमानेपन के कई उदाहरण देखे गए हैं। ठेकेदारों, राजनेताओं और कुछ वन विभाग के भ्रष्ट अधिकारियों की मिलीभगत इस स्थिति के लिए जिम्मेदार हैं। कई जि़ले जहां गैर जिम्मेदार वन विचलन के साथ बड़े पैमाने पर वनों की कटाई हुई है, वहां पानी की कमी और खाद्य असुरक्षा देखी जा रही है।
केवल 6 फीसदी क्षतिपूरक का इस्तेमाल
एक सरकारी आंकड़े के अनुसार, विकास परियोजनाओं के लिए इस्तेमाल वन भूमि के पुन: निर्माण के लिए सरकारी कोष 6 वर्षों में कंपनियों और संस्थाओं द्वारा एकत्र की गई राशि का 6 फीसदी से अधिक इस्तेमाल नहीं किया गया है। यह एक स्पष्ट संकेत है कि किस प्रकार कानून का उल्लंघन किया जा रहा है एवं वनों के कटने के बाद, उनके पुन: निर्माण के लिए किए गए वादों की अनदेखी की जा रही है। यहां तक की वन भूमि के पुन: निर्माण के लिए निर्धारित राशि का दुरुपयोग भी किया गया है। राशि का एक-तिहाई हिस्सा गैर वृक्षारोपण गतिविधियों जैसे कि सांस्कृतिक गतिविधियों, कंप्यूटर, फर्नीचर, लैपटॉप, वाहन और ईंधन के लिए इस्तेमाल किया गया है। राज्यसभा में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, 10 मार्च 2015 तक, प्रतिपूरक वनीकरण कोष, 35,853 करोड़ रुपए थी। केंद्र द्वारा राज्यों को इस राशि में 20 फीसदी (7,298 करोड़ रुपए) से अधिक नहीं सौंपा गया है। और इसमें से 6 फीसदी (2,357 रुपय करोड़ रुपए) से अधिक प्रतिपूरक वनीकरण के लिए इस्तेमाल नहीं किया गया है।
वनीकरण लक्ष्य हासिल करने में मप्र अव्वल
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले 36 वर्षों में विकास के लिए परिवर्तित 14,000 वर्ग किलोमीटर वन भूमि में से करीब 6747 वर्ग किलोमीटर में वनरोपण किया गया है। मध्य प्रदेश में सबसे अधिक भूमि (1,601 वर्ग किमी) को पुनर्जीवित किया गया है। जबकि महाराष्ट्र (962 वर्ग किमी) दूसरे स्थान पर है। अन्य राज्यों में वनीकरण नगण्य है। मप्र में जनभागीदारी एवं क्षेत्रीय इकाईयों की सक्रियता से वन अपराधों पर नियंत्रण के लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। विभाग द्वारा विगत पांंच वर्षों में पंजीबद्ध वन अपराध प्रकरणों का विवरण तालिका में दर्शित है : -
मप्र में पांच साल के वन अपराधों का विवरण
वन अपराध प्रकरण 2011 2012 2013 2014 2015
अवैध कटाई के प्रकरण 55699 54634 54011 52613 48988
अवैध चराई के प्रकरण 1325 1112 1031 877 933
अवैध परिवहन के प्रकरण 2282 2082 2239 2137 1968
अतिक्रमण प्रकरण संख्या 1479 2411 1699 1573 1658
नवीन प्रभावित क्षेत्र (हे.) 2010 4997 3679 3140 2622
अवैध उत्खनन प्रकरण संख्या 1014 758 1257 1186 986
प्रभावित क्षेत्र (हे.) 4357 3107 279 659 631
कुल पंजीबद्ध वन अपराध 66514 64910 62293 60411 56174
अवैध परिवहन मे जप्त वाहनों संख्या 1001 1592 1126 1295 1651
न्यायालय में प्रस्तुत प्रकरण 2110 2113 2885 3180 3227
वन अपराध में वसूल राशि (लाख में) 296.47 318.98 429.87 451.49 387.31
पर्यावरण एवं वनों की सुरक्षा की दृष्टि से काष्ठ के चिरान एवं व्यापार को लोकहित में विनियमन करने के लिये बनाये गये म0प्र0 काष्ठ चिरान अधिनियम 1984 के प्रावधानो का उल्लंघन करने पर दर्ज किये गये वन अपराध प्रकरण का विवरण तालिका में दर्शित है : -
वन अपराधों का विवरण
वर्ष 2011 2012 2013 2014 2015
प्रकरण संख्या 385 301 308 184 172
भोपाल। यह आश्चर्यजनक लेकिन सत्य है कि मप्र में पिछले 30 साल में रसूखदारों ने 5,747 वर्ग किमी वन भूमि पर कब्जा जमा लिया है, जिसका न्यूनतम बाजार मूल्य करीब 28,40,28,23,40,000 रूपए है। इसका खुलासा हाल ही में प्रस्तुत भारत वन स्थिति रिपोर्ट 2015 में हुआ है। इतनी वन भूमि को कब्जाने के लिए हजारों वन्य प्राणियों और पेड़ों की बलि दी गई है। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि वन क्षेत्र में लगातार अतिक्रमण हो रहा है। इस कारण बाघ, हिरण, भालू, तेंदुआ आदि के शिकार के भी मामले बढ़े हैं, लेकिन सरकार के तरफ से इन्हें रोकने के लिए कोई कठोर कानून नहीं बनाए जा सके हैं। मप्र के बाद असम में 3,172 में वर्ग किमी, कर्नाटक में 1,872 वर्ग किमी, उड़ीसा में 785 वर्ग किमी और महाराष्ट्र में 670 वर्ग किमी वन भूमि पर अक्रिमण हुआ है।
भारत वन स्थिति रिपोर्ट 2015 के अनुसार, अब भारत का वन 701,673 वर्ग किलोमीटर यानी 21.34 फीसदी क्षेत्र तक फैला है जबकि 29 वर्ष पहले यह 640,819 वर्ग किलोमीटर तक फैला था। यह वृद्धि का स्पष्टीकरण पेड़ों को लगाने, विशेष रुप से मोनोकल्चर के जरिए बताया गया है, जो परिवर्तित प्राकृतिक वनों का स्थान नहीं लेते हैं एवं और स्थायी रुप से खत्म हो रहे हैं। आंकड़ों के अनुसार 30 वर्षों में वनों के स्थान पर 23,716 औद्योगिक परियोजनाएं शुरु हुई हैं। यानी औद्योगिकरण, शहरीकरण और जंगलों में बढ़ती पर्यटन गतिविधियों के कारण देशभर के वनों में अतिक्रमण हो रहा है। इस कारण पिछले तीन दशकों में भारत के वन का 14,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र साफ कर दिया गया है। सबसे बड़ा क्षेत्र (4947 वर्ग किलोमीटर) खनन को दिया गया है। रक्षा परियोजनाओं को 1,549 वर्ग किलोमीटर और जल विद्युत परियोजनाओं के 1,351 वर्ग किमी क्षेत्र दिया गया है सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले 30 वर्षों में हरियाणा के करीब दो-तिहाई आकार के वन अतिक्रमण (15,000 वर्ग किलोमीटर) और औद्योगिक परियाजनाओं (14,000 वर्ग किमी) की भेंट चढ़ गए हैं और जैसा कि सरकार ने स्वीकार किया है कि कृत्रिम वन इनकी जगह नहीं ले सकते हैं।
मप्र सबसे आसान क्षेत्र
मध्यप्रदेश अपनी विविधता के लिए जाना-पहचाना जाता है। विकास और सामाजिक परिवर्तन के प्रयासों के संदर्भ में भी जितने प्रयोग और परीक्षण इस पदेश में हुए हैं; संभवत: इसी कारण इसे विकास की प्रयोगशाला कहा जाने लगा है। मध्यप्रदेश में राजस्व और वनभूमि के संदर्भ में भी विवाद ने नित नए रूप लिए हंै। और अफसोस की बात यह है कि यह विवाद सुलझने के बजाए उलझता जा रहा है। इस विषय को विवादित होने के कारण नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है। जंगलों का मामला सत्ता, पूंजी और सामुदायिक सशक्तिकरण के बीच एक त्रिकोण बनाता है। इतिहास बताता है कि प्राकृतिक संसाधनों (खासतौर पर जल और जंगल) के किनारों पर ही सभ्यतायें बसती और विकास करती हैं। जंगलों और नदियों के संरक्षण से ही प्रकृति का संतुलन बनता है किन्तु विकास की जिस परिभाषा का आज के दौर में राज्य पालन कर रहा है उससे सामाजिक असंतुलन के नए प्रतिमान खड़े हो रहे हैं। अत: यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि जंगल के सवाल का जवाब खोजने के लिए व्यापक प्रयास किए जाएं। उल्लेखनीय है कि देश के कुल वन क्षेत्र का 11 फीसदी यानी सबसे अधिक क्षेत्र मध्यप्रदेश में है। इसके बाद 10 फीसदी के साथ अरुणाचल प्रदेश दूसरा और 8 फीसदी के साथ छत्तीसगढ़ का तीसरा स्थान है। पूर्वोत्तर राज्यों के क्षेत्रफल का 70 फीसदी से अधिक हिस्से में वन फैला है, सिवाय असम के जहां 35 फीसदी में वन है। रिपोर्ट के अनुसार मप्र को अतिक्रमण, वनों की कटाई, वन्य प्राणियों के शिकार के लिए सबसे आसान क्षेत्र माना गया है। इसलिए देश में सर्वाधिक मामले मप्र में सामने आए है। पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, अरुणाचल प्रदेश ने पिछले 30 वर्षों में सबसे अधिक वन (3338 वर्ग किलोमीटर) का सफाया किया है। वहीं मध्य प्रदेश ने 2,477 वर्ग किलोमीटर और आंध्र प्रदेश ने 1,079 वर्ग किमी वन साफ कर दिया है। जम्मू-कश्मीर, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल गैर वन उपयोगों के लिए कम से कम वन भूमि जारी किया है। वन भूमि के भीतर कई परियोजनाओं की अनुमति दी जाती है एवं यह प्रक्रिया मानव और वन्य प्राणियों दोनों के जीवन के विघटनकारी है। सरकार के लेखा परीक्षक ने कहा है कि, जिसके तहत इन परियोजनाओं को वन भूमि दिए गए हैं, उनका व्यापक रुप से उल्लंघन हो रहा है और विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारी आंकड़े अनुमान के नीचे हैं। टी वी रामचंद्र, एसोसिएट फैक्लटी सेंटर फॉर इकोलोजिकल साइंस एवं बंगलौर स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस के अनुसार सरकारी आंकड़े बहुत कम हैं। हमारे अध्ययन से पता चलता है, पिछले एक दशक में उत्तरी, मध्य और दक्षिणी पश्चिमी घाट में घने वन क्षेत्रों में 2.84 फीसदी, 4.38 फीसदी और 5.77 फीसदी की कमी हुई है। हाल ही में संसद ने बताया है कि वर्तमान में 25,000 हेक्टेयर तक जंगल 250 वर्ग किलोमीटर या चंडीगढ़ के क्षेत्र से दो गुना अधिक रक्षा परियोजनाओं, बांधों, खनन, बिजली संयंत्र, उद्योगों और सड़कों सहित गैर वानिकी गतिविधियों को सौंपा गया है।
वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि प्रदेश सरकार की उदारता पूर्ण नीतियों के कारण वनों में लगातार घुसपैठ बढ़ रही है। मप्र के साढ़े चार लाख हेक्टेयर से अधिक वन क्षेत्र पर अतिक्रमण है। यह आंकड़ा कम होने के बजाय बढ़ रहा है। जो जहां रह रहा है, उसे उस जमीन का मालिकाना हक दिया जाएगाÓ सरकार के मुखिया शिवराज सिंह चौहान के इस ऐलान के बाद कब्जे के मामले बढ़ गए हैं। बीते पांच साल में 16 हजार 518 हेक्टेयर वन क्षेत्र पर अतिक्रमण कर लिया गया। यह सरकारी आंकड़ा है। असल में यह दोगुना से ज्यादा है। प्रदेश का 3,08,245 वर्ग किलोमीटर भौगोलिक क्षेत्र हैं। इसमें करीब 31 फीसदी क्षेत्र (94668 वर्ग किमी) वन क्षेत्र है। वन विभाग खुश हो सकता है कि देश में सर्वाधिक वन क्षेत्र वाले पांच राज्यों में मध्यप्रदेश शामिल है, लेकिन इससे इतर लगातार वन क्षेत्र में अतिक्रमण तेजी से बढ़ रहा है। इसे रोक पाने में वन महकमा असहाय है। सूत्रों के मुताबिक, वर्ष 2010 से पहले सरकारी रिकॉर्ड में 4.37 लाख हेक्टेयर वन क्षेत्र में अतिक्रमण था। अब इसमें 16 हजार हेक्टेयर से अधिक की बढ़ोतरी हो गई है। वर्ष 2013 के बाद से इसमें ज्यादा वृद्धि हुई। वन विभाग के अनुसार राज्य सरकार ने जबसे जो जहां रह रहा है, उसे वहां का पट्टा देने की घोषणा की है, तब से नए अतिक्रमण के मामले बढ़ गए हैं। प्रदेश में अतिक्रमणकारियों के हौसले इतने बुलंद हैं कि उन्होंने नेशनल पार्कों तक को नहीं बख्शा। सर्वाधिक अतिक्रमण के मामले संजय टाइगर रिजर्व सीधी में सामने आए। यहां वर्ष 2010 से 2015 के बीच 268 हेक्टेयर में कब्जा कर लिया। पन्ना टाइगर रिजर्व में वर्ष 2014 में दस हेक्टेयर में अतिक्रमण किया गया, जबकि इससे पहले वर्ष 2011 और 2012 में विभाग ने अतिक्रमण की कोशिश करने पर 10 प्रकरण पंजीबद्ध किए थे। कुनो वन्य प्राणी वन मंडल श्योपुर में भी 12 हेक्टेयर और बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व एवं सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में भी 5-5 हेक्टेयर में अतिक्रमण किया गया।
प्रदेश के वनों पर बढ़ते जैविक दबाव, बढ़ती जनसंख्या तथा कृषि हेतु जमीन की बढ़ती भूख के कारण वन क्षेत्रों में अतिक्रमण एक गंभीर समस्या है। वर्तमान में संगठित एवं हिंसक अतिक्रमण के प्रयास भी हो रहे है। कई अशासकीय संगठनों द्वारा भी वन क्षेत्र में अतिक्रमण को प्रोत्साहित करने की घटनाएं भी प्रकाश में आई है। प्रदेश के वन क्षेत्र में लगातार भूमाफिया का कब्जा होने से वनों की हदें सिमटती नजर आ रही हैं। वन विभाग इस भूमि को अतिक्रमण से मुक्त नहीं करा पा रहा है। वन विभाग के मुताबिक मानव जीवन बैलेंस बनाए रखने के लिए प्रदेश में कम से कम 33 प्रतिशत जंगलों का होना आवश्यक है। लेकिन कब्जाधारियों द्वारा वनभूमि पर अतिक्रमण करने से वनों में 8.21 फीसदी वनभूमि की कमी आई है। जंगलों की कमी से जनजीवन एवं वन्यप्राणियों के लिए खतरे का संकेत है। जानकारी के अनुसार जंगलों का निरंतर दोहन होने से विपरीत प्रभाव पड़ेगा। इससे तरह-तरह की बीमारियां जैसे स्वांस, दमा आदि कई बीमारियों का लोग शिकार होंगे। साथ ही प्रदूषण भी तेजी फैलेगा जिससे वन्यप्राणी, मनुष्य प्रभावित होंगे। वनों को काटने से तापमान में परिवर्तन आएगा, इससे बाढ़, भूकंप जैसी आपदाओं की स्थिति बनेगी। आपदाओं की रोकथाम करने में जंगलों की अहम भूमिका होती है। यही नहीं गर्मियों के दिनों में तूफान एवं लू के हालात भी बनेंगी। इसके अलावा वनों प्राणवायु मिलती है वनों का निरंतर दोहन होने से प्राण वायु में भी कमी आएगी। प्रदेश में 32 ऐसे जिले हैं जो बाढ़ ग्रसित की श्रेणी में आते हैं। कम बारिश होने के बाद भी जहां बाढ़ आने की ज्यादा उम्मीद रहती हैं। इनमें उज्जैन, इंदौर, जबलपुर, रतलाम, मंडला, हरदा, गुना, होशंगाबाद सहित और भी जिले शामिल हैं। जो बाढ़ से प्रभावी क्षेत्रो की श्रेणी में आते हैं। इसके अलावा 28 जिले ऐसे हैं जो भूकंप तीव्रता की दृष्टि से जोन-3 और 22 जिले जोन-2 की श्रेणी में आते हैं।
सरकार की दोहरी नीति घातक
देश की भाति मध्यप्रदेश में भी जंगल और जंगल के अधिकार का सवाल उलझा दिया गया है। यहां उलझा दिया गया कहना इसलिए जरूरी हो जाता है क्योंकि हमेशा से जंगलों पर राज्य या सरकारी सत्ता का नियंत्रण नहीं रहा है। औद्योगिक क्रांति के दौर में ब्रिटिश हुकूमत को पहले पानी के जहाज बनाने और फिर रेल की पटरियां बिछाने के लिये लकड़ी की जरूरत पड़ी। इसी जरूरत को पूरा करने के लिए उन्होंने जंगलों में प्रवेश करना शुरू किया। जहां स्वायत्ता आदिवासी और वन क्षेत्रों में निवास करने वाले ग्रामीण समुदाय से आमना-सामना हुआ। इसके बाद विकास, खासतौर पर आर्थिक विकास के लिए जब संसाधनों की जरूरत पड़ी तब यह पता चला कि मूल्यवान धातुओं, महत्वपूर्ण रसायनों, जंगली वनस्पतियों, लकड़ी और खनिज पदार्थ ताते जंगलों से ही मिलेंगे। और फिर राजनैतिक सत्ता पर नियंत्रण करने की पद्धति अपनाई। वास्तव में अकूत प्राकृतिक संसाधनों का नियमन करने में कोई बुराई नहीं है किन्तु जंगलों के सम्बन्ध में जो कानून बने उनका मकसद समाज के एक खास तबके को लाभ पहुचाना रहा है और इसी भेदभावपूर्ण नजरिए के कारण आंतरिक संघर्ष की स्थिति निर्मित हुई। मध्य प्रदेश सरकार की भी ऐसी ही दोहरी नीति के कारण प्रदेश के जंगल तेजी से खत्म हो रहे हैं। एक तरफ तो सरकार जंगल बचाने और बढ़ाने के लिए हर साल करोड़ों रुपए खर्च कर रहे हैं वहीं दूसरी तरफ इन्हीं जंगलों में खदानों को अनुमति देकर राजस्व कमा रही हैं। सरकार की इस दोहरी नीति के कारण जंगल में माफिया हावी हो गया है। आलम यह है कि प्रदेश में पांच साल के अंदर 35590 हेक्टेयर जंगल की जमीन पर वैध रूप से खदानें खुद गई हैं तो माफियाओं ने सालभर में करीब 45,000 अवैध गड्ढे खोद डाले हैं। इतना ही नहीं इन गड्ढों से लाखों घन फुट पत्थर भी निकाला जा चुका है।
आज स्थिति यह है कि प्रदेश के जंगल गंजे होते जा रहे हैं। वर्ष 1995 तक यहां प्रति हेक्टेयर 52 घनमीटर जंगल की जगह 2015 में 38 घनमीटर ही रह गया और एक अनुमान के मुताबिक वर्तमान में यह 35 घनमीटर हो गया है। प्रदेश के 95 लाख हेक्टेयर वन भूमि में से मात्र सात फीसदी वन ही ऐसे बचे हैं जिन्हें सघन जंगल की श्रेणी में शुमार किया जा सकता है। 50 लाख हेक्टेयर से ज्यादा वन भूमि पर वन के नाम पर सिर्फ बंजर जमीन या उजड़ा जंगल बचा है। सत्रह लाख हेक्टेयर वन भूमि तो बिल्कुल खत्म हो चुकी है। 38 लाख हेक्टेयर वन भूमि पर दोबारा जंगल खड़ा करने के लिए 35 हजार करोड़ की रकम और बीस साल के वक्त की दरकार है लेकिन न तो रकम है और न इच्छाशक्ति। वन भूमि पर बढ़ते आबादी के दबाव के चलते जंगल तेजी से सिकुड़ रहे हैं।
वनवासियों के जिले में जंगल न के बराबर
वनवासियों के जिले झाबुआ में वन न के बराबर हैं। स्थिति ये है कि वन विभाग के पास वन क्षेत्र की जितनी जमीन है, उसमें से 70 प्रतिशत से ज्यादा वनविहीन है। वनों को बढ़ाने के सरकारी प्रयास नाकाफी साबित हुए। विभाग ने पिछले वर्षों में बड़े स्तर पर पौधारोपण किए, लेकिन इनमें से ज्यादातर काम राजस्व की भूमि पर हुआ। इसके अलावा कई जगह पौधे जीवित भी नहीं रह पाए। कुल मिलाकर जंगल बढ़ाने के सरकारी प्रयास नाकाफी हैं। झाबुआ के कुल क्षेत्रफल का 21.24 प्रतिशत क्षेत्र वन विभाग के पास वनभूमि के रूप में दर्ज है। ये क्षेत्र 734.953 वर्ग किलोमीटर है। इसमें से 70.36 प्रतिशत क्षेत्र ऐसा है, जो वनविहीन है यानी यहां न तो जंगली पेड़ हैं न जंगली जानवर। ये स्थिति काफी चौंकाने वाली है। ऐसा भी नहीं है कि बीते वर्षों में वनक्षेत्र में कोई खास कमी हुई हो। झाबुआ में बड़े वन नहीं होने से कटाई के बड़े मामले नहीं आए। फिर भी ये नहीं कहा जा सकता कि वनों की कटाई नहीं होती। कुछ वर्ष पहले वन कटाई को लेकर दो वनरक्षकों की हत्या का सनसनीखेज मामला हो चुका है। जिले में ये आंकड़ा आलीराजपुर जिले के अलग होने से अचानक बढ़ गया। आलीराजपुर में सघन वन क्षेत्र हैं और सम्मिलित जिला होने से ये प्रतिशत बेहतर था। हालांकि आलीराजपुर जिले में बड़े बांध प्रोजेक्ट के कारण वन क्षेत्र में कमी आई। इसके अलावा क_ीवाड़ा और उसके आसपास के क्षेत्र में वन कटाई के मामले सामने आते रहे हैं।
मध्यप्रदेश का सिवनी जिला पर्यावरण की दृष्टि से समृद्ध जिला रहा है। परंतु वन विकास की गलत नीतियों के कारण वन विभाग द्वारा ही बड़ी मात्रा में वनों का विनाश कर दिया गया है। इस प्रक्रिया में विभिन्न किस्मों के मिश्रित वन क्षेत्र मिटाए गए हैं वहीं सागौन, यूकेलिप्ट्स, जेट्रोफा जैसे वृक्षों का रोपण कर दिया गया है। इससे न केवल वनों की जैवविविधता नष्ट हुई है अपितु स्थानीय वनवासियों की आजीविका का भी विनाश हुआ है। वनवासियों का कहना हैं कि वन विकास निगम द्वारा भारी मात्रा में मिश्रित प्रजाति के जंगलों को नष्ट कर दिया गया है। यदि वन विकास निगम को वनों से भगाया नहीं गया तो बचे खुचे जंगल भी खत्म होंगे व जैवविविधता का भारी विनाश होगा एवं स्थानीय पर्यावरण पर भी इसके विपरीत परिणाम पड़ेंगे। वन लोगों की आजीविका के साधन रहे हैं परंतु वन विभाग की स्थापना के साथ ही स्थानीय आबादियों की आजीविका पर विपरीत प्रभाव पड़े हैं और जंगल के लोगों की गरीबी बढ़ी है।
इंडस्ट्री के लिए नीति बदलने की तैयारी
देश में लगातार घट रहे वन क्षेत्रों की नाजुक स्थिति को देखते हुए यूपीए सरकार ने परियोजनाओं को मंजूरी देने में पर्यावरण के लिहाज से नाजुक वन क्षेत्रों को अलग रखने की नीति बनाई थी। अब मोदी सरकार ने इस पॉलिसी को बदलने का मन बना लिया है। इसके चलते कुछ हाई प्रोफाइल और मोटे निवेश वाले प्रॉजेक्ट्स की राह खुल सकती है, जो वन क्षेत्र से जुड़े नियमों का उल्लंघन होने की आशंका के कारण स्थगित थे। प्रकाश जावड़ेकर के नेतृत्व वाले पर्यावरण मंत्रालय के इस कदम से कम से कम 10 पर्सेंट लंबित प्रोजेक्ट्स की राह खुलेगी। इनमें मध्य प्रदेश में 24,000 करोड़ रुपये का रियो टिंटो का डायमंड माइनिंग प्रॉजेक्ट भी है। साथ ही, 800 में से करीब एक तिहाई कोल ब्लॉक्स को विकसित किया जा सकेगा। मामले की जानकारी रखने वाले अधिकारियों ने बताया कि पर्यावरण मंत्रालय परियोजनाओं के लिए स्वीकृत और अस्वीकृत वन क्षेत्रों का वर्गीकरण जारी नहीं करेगा। इस वर्गीकरण की पॉलिसी जयराम रमेश ने बनाई थी, जो यूपीए शासन में पर्यावरण मंत्री थे। इसका मकसद पर्यावरण के लिहाज से नाजुक कुछ वन क्षेत्रों को किसी भी तरह की कमर्शियल या माइनिंग एक्टिविटी की जद से पूरी तरह दूर रखना था। मोदी सरकार बनने के बाद एक अलग कमेटी से इस पॉलिसी का रिव्यू कराया गया और अगस्त 2015 में उसने रिपोर्ट दी थी।
अधिकारियों का कहना है कि स्वीकृत और अस्वीकृत वन क्षेत्रों का नोटिफिकेशन जारी होने की गुंजाइश नहीं दिख रही है। अगर ऐसा नोटिफिकेशन नहीं आया तो अस्वीकृत वन क्षेत्रों में फंस सकने वाले प्रोजेक्ट्स पर काम शुरू हो सकता है। स्वीकृत और अस्वीकृत क्षेत्रों को नोटिफाई नहीं करने के निर्णय पर इस तथ्य से असर पड़ा है कि ऐसे वर्गीकरण के मसौदे में सामने आया था कि भारत के वन क्षेत्र का 10-11 पर्सेंट हिस्सा परियोजनाओं के लिए अस्वीकृत क्षेत्र के दायरे में आ जाएगा और कई बड़े प्रोजेक्ट इससे प्रभावित होंगे।एनडीए शासन ने इस संबंध में जिस क्लासिफिकेशन का प्रस्ताव किया था, उसमें यूपीए शासन की मूल योजना के मुकाबले इंडस्ट्रियल गतिविधियों के लिए ज्यादा वन क्षेत्र उपलब्ध हो जाता, लेकिन फिर भी कुछ बड़े प्रोजेक्ट्स फंस जाते। रियो टिंटो का प्रोजेक्ट भी फंस जाता। पर्यावरण मंत्रालय के तहत आने वाली वन सलाहकार समिति ने रियो टिंटो के मामले पर एक मीटिंग की थी और मध्य प्रदेश सरकार को प्रॉजेक्ट प्लान रिवाइज करने की सलाह दी गई थी।
सरकार के सारे प्रयास कागजी
उधर वनों की प्रभावी सुरक्षा हेतु क्षेत्रीय कर्मचारियों की गतिशीलता बढ़ाने हेतु केंद्र और राज्य सरकार ने जितने प्रयास किए हैं सारे विफल साबित हुए हैं। इसका परिणाम यह हुआ है कि वनों में लगातार अतिक्रमण और शिकार हो रहे हैं। वन क्षेत्रों में गस्त के लिए वाहन उपलब्ध कराए गए है। अतिसंवेदनशील वनक्षेत्रों में बीट व्यवस्था के स्थान पर सामूहिक गश्त हेतु वन चौकियों की स्थापना की गई है। वर्ष 2015 की स्थिति में 329 वन चौकियां कार्यरत हैं। प्रत्येक चौकी में गश्ती हेतु वाहन उपलब्ध है। परिक्षेत्र स्तर पर वन गश्ती एवं सुरक्षा हेतु वाहन अनुबंधित कर उपलब्ध कराये गये हैं। वन अपराधों पर नियंत्रण एवं त्वरित कार्यवाही हेतु प्रत्येक वन वृत्त में उडऩदस्ता दल कार्यरत है। उडऩदस्ता दल में पर्याप्त संख्या में वनकर्मी, शस्त्र एवं वाहन उपलब्ध हैं। ऐसे क्षेत्रों में जहां संगठित वन अपराधों की संभावना है, विशेष सशस्त्र बल की 3 कंपनियां भी तैनात की गई हैं। वर्ष 2015 में 1350 वन अपराधियों के विरूद्ध न्यायालय में प्रकरण प्रस्तुत किये गए तथा समस्त वन अपराधों में 2667 वाहन जप्त किए गए हैं जिसमें अवैध परिवहन में 1758 वाहन जप्त किए गए है। कर्तव्य के दौरान वन कर्मचारियां पर हमलें के 45 प्रकरण दर्ज हुए, जिसमें 48 कर्मचारी हमले में गम्भीर रूप से घायल हुआ। वर्ष 2015 में 3.57 करोड़ रूपए की राशि अभिसंधारित प्रकरणों में वसूल की गई।
सरकार के ताजा आंकड़ों के अनुसार, 1980 से साफ हुए 14,000 वर्ग किलोमीटर वन में से 6770 वर्ग किलोमीटर में नए सिरे से लगाए गए हैं या वनरोपण किया गया है। अप्रैल 2016 में, सरकार ने संसद में स्वीकार किया है कि प्रतिपूरक वनीकरण प्राकृतिक वनों के लिए विकल्प नहीं हो सकता। सरकारी बयान में कहा गया है कि यथासमय में प्रतिपूरक वनीकरण का इस्तेमाल वन परिवर्तन के प्रभाव का नुकसान को कम करने के लिए किया जाता है। अजय कुमार सक्सेना, दिल्ली के सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वाइरन्मन्ट के कार्यक्रम प्रबंधक (वानिकी) कहते हैं कि, प्राकृतिक वन की हानि की क्षतिपूर्ति संभव नहीं है, कम से कम एक सदी तक तो नहीं। सक्सेना आगे कहते हैं कि एक वन में प्राकृतिक पोषक तत्व प्रक्रियाओं के साथ हजारों वनस्पतियों और जीव एक जटिल पारिस्थितिकी मिश्रण में रहती हैं जो कि मोनोकल्चर वृक्षारोपण द्वारा दोबारा पाया नहीं जा सकता है।
वन भूमि का कानूनी परिवर्तन, अवैध कार्यों से बढ़ रहा है, मतलब कि कई लोग जिन्हें वन काटने की अनुमति मिल रही है, वह उन पर लगाए गए शर्तों का उल्लंघन करते हैं। 2013 की नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट कहती है कि परिवर्तन से संबंधित वन मंजूरी के कानूनों की निगरानी करने में पर्यावरण और वन मंत्रालय अपनी जिम्मेदारियों का उचित रूप से निर्वहन करने में विफल रहा है।
कैग रिपोर्ट कहती है, हमारी राय में वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 में निर्धारित दण्डात्मक खंड, अवैध और अनधिकृत प्रथाओं पर अंकुश डालने में काफी हद तक अपर्याप्त और अप्रभावी रहा है। पट्टों के अनधिकृत नवीकरण, अवैध खनन, खनन पट्टों निगरानी रिपोर्ट में प्रतिकूल टिप्पणी के बावजूद के बने रहना, परियोजनाओं के पर्यावरण मंजूरी के बिना काम करना, वन भूमि की स्थिति के अनधिकृत परिवर्तन एवं वानिकी मंजूरी के फैसले में मनमानेपन के कई उदाहरण देखे गए हैं। ठेकेदारों, राजनेताओं और कुछ वन विभाग के भ्रष्ट अधिकारियों की मिलीभगत इस स्थिति के लिए जिम्मेदार हैं। कई जि़ले जहां गैर जिम्मेदार वन विचलन के साथ बड़े पैमाने पर वनों की कटाई हुई है, वहां पानी की कमी और खाद्य असुरक्षा देखी जा रही है।
केवल 6 फीसदी क्षतिपूरक का इस्तेमाल
एक सरकारी आंकड़े के अनुसार, विकास परियोजनाओं के लिए इस्तेमाल वन भूमि के पुन: निर्माण के लिए सरकारी कोष 6 वर्षों में कंपनियों और संस्थाओं द्वारा एकत्र की गई राशि का 6 फीसदी से अधिक इस्तेमाल नहीं किया गया है। यह एक स्पष्ट संकेत है कि किस प्रकार कानून का उल्लंघन किया जा रहा है एवं वनों के कटने के बाद, उनके पुन: निर्माण के लिए किए गए वादों की अनदेखी की जा रही है। यहां तक की वन भूमि के पुन: निर्माण के लिए निर्धारित राशि का दुरुपयोग भी किया गया है। राशि का एक-तिहाई हिस्सा गैर वृक्षारोपण गतिविधियों जैसे कि सांस्कृतिक गतिविधियों, कंप्यूटर, फर्नीचर, लैपटॉप, वाहन और ईंधन के लिए इस्तेमाल किया गया है। राज्यसभा में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, 10 मार्च 2015 तक, प्रतिपूरक वनीकरण कोष, 35,853 करोड़ रुपए थी। केंद्र द्वारा राज्यों को इस राशि में 20 फीसदी (7,298 करोड़ रुपए) से अधिक नहीं सौंपा गया है। और इसमें से 6 फीसदी (2,357 रुपय करोड़ रुपए) से अधिक प्रतिपूरक वनीकरण के लिए इस्तेमाल नहीं किया गया है।
वनीकरण लक्ष्य हासिल करने में मप्र अव्वल
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले 36 वर्षों में विकास के लिए परिवर्तित 14,000 वर्ग किलोमीटर वन भूमि में से करीब 6747 वर्ग किलोमीटर में वनरोपण किया गया है। मध्य प्रदेश में सबसे अधिक भूमि (1,601 वर्ग किमी) को पुनर्जीवित किया गया है। जबकि महाराष्ट्र (962 वर्ग किमी) दूसरे स्थान पर है। अन्य राज्यों में वनीकरण नगण्य है। मप्र में जनभागीदारी एवं क्षेत्रीय इकाईयों की सक्रियता से वन अपराधों पर नियंत्रण के लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। विभाग द्वारा विगत पांंच वर्षों में पंजीबद्ध वन अपराध प्रकरणों का विवरण तालिका में दर्शित है : -
मप्र में पांच साल के वन अपराधों का विवरण
वन अपराध प्रकरण 2011 2012 2013 2014 2015
अवैध कटाई के प्रकरण 55699 54634 54011 52613 48988
अवैध चराई के प्रकरण 1325 1112 1031 877 933
अवैध परिवहन के प्रकरण 2282 2082 2239 2137 1968
अतिक्रमण प्रकरण संख्या 1479 2411 1699 1573 1658
नवीन प्रभावित क्षेत्र (हे.) 2010 4997 3679 3140 2622
अवैध उत्खनन प्रकरण संख्या 1014 758 1257 1186 986
प्रभावित क्षेत्र (हे.) 4357 3107 279 659 631
कुल पंजीबद्ध वन अपराध 66514 64910 62293 60411 56174
अवैध परिवहन मे जप्त वाहनों संख्या 1001 1592 1126 1295 1651
न्यायालय में प्रस्तुत प्रकरण 2110 2113 2885 3180 3227
वन अपराध में वसूल राशि (लाख में) 296.47 318.98 429.87 451.49 387.31
पर्यावरण एवं वनों की सुरक्षा की दृष्टि से काष्ठ के चिरान एवं व्यापार को लोकहित में विनियमन करने के लिये बनाये गये म0प्र0 काष्ठ चिरान अधिनियम 1984 के प्रावधानो का उल्लंघन करने पर दर्ज किये गये वन अपराध प्रकरण का विवरण तालिका में दर्शित है : -
वन अपराधों का विवरण
वर्ष 2011 2012 2013 2014 2015
प्रकरण संख्या 385 301 308 184 172
Sunday, February 14, 2016
Sunday, February 7, 2016
Monday, November 2, 2015
मोदी सरकार की गर्मी नहीं सह पा रहे बाबू?
अहम मंत्रालयों की डोर 'सुपर पीएमओÓ के हाथ
पीएम की पाठशाला में मप्र के आईएएस फेल
भोपाल। अपने स्टेट कैडर से केंद्र में प्रतिनियुक्ति पर जाना आईएएस अधिकरियों के गर्व और सम्मान का विषय माना जाता था, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गाइड लाइन पर काम करना अफसरों को नहीं भा रहा है। यही कारण है कि राज्यों से बार-बार मांग के बावजुद आईएएस अफसर केंद्र में जाने को तैयार नहीं हैं। आलम यह है कि मोदी सरकार के अभी तक 56 आईएएस ऑफिसर्स सेंट्रल पोस्टिंग को छोड़कर अपने स्टेट कैडर में वापस चले गए हैं। वापस जाने का ऑप्शन चुनने वाले ज्यादातर ऑफिसर्स सीनियर हैं। वे जॉइंट सेक्रेटरी या इससे ऊपर के रैंक के हैं। आमतौर पर आईएएस अधिकारी इस तरह से वापस अपने राज्य का रुख नहीं करते हैं। वहीं मात्र चार अफसर ही केंद्र में गए हैं। जहां तक मप्र का सवाल है तो यहां से इस दौरान एक भी आईएएस दिल्ली नहीं गया है, बल्कि करीब आधा दर्जन वापस ही लौटे हैं। जबकि केंद्र सरकार ने मप्र सरकार को पत्र लिखकर केंद्रिय कोटे के 30 आईएएस की मांग कई बार कर चुकी है। बताया जाता है कि वर्तमान केंद्र सरकार के अब तक के कार्यकाल में मध्यप्रदेश के नौकरशाहों की भूमिका महत्वपूर्ण नहीं हो सकी। या यूं कहे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यप्रणाली में मप्र के आईएएस फिट नहीं बैठ रहे हैं। यही कारण है कि कभी केंद्र सरकार के विभागों में महत्वपूर्ण पदों को संभालने वाले मप्र के आईएएस अफसरों के पास महत्वपूर्ण जिम्मेदारी नहीं है।
56 आईएएस ऑफिसर्स स्टेट कैडर में लौटे
क्या स्टेट कैडर के आईएएस अधिकारियों को दिल्ली रास नहीं आ रही? केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद के आंकड़े कुछ ऐसा ही इशारा कर रहे हैं। मई 2014 में मोदी सरकार के आने के बाद से अबतक कम से कम 56 आईएएस अधिकारी केंद्र की पदस्थापना समय से पूर्व छोड़कर अपने प्रादेशिक कैडर में वापस लौट चुके हैं। इसके उलट केंद्र में प्रतिनियुक्ति पर आने वाले अधिकारियों की संख्या इस दौरान महज 4 रही। अपने स्टेट कैडर में जल्द वापस जाने वाले अधिकारियों में ज्यादातर सीनियर रैंक के हैं यानी संयुक्त सचिव या उससे ऊपर के पद के। इससे पहले इस तरह के मामले कम देखने को मिलते थे। डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनेल ऐंड ट्रेनिंग (डीओपीटी) की वेबसाइट के मुताबिक 2013 में सिर्फ 3 आईएएस ऑफिसर्स केंद्र से राज्य में गए थे। अगस्त से सितंबर 2012 के बीच सिर्फ एक ऑफिसर ने ऐसा किया था, मगर जनवरी से लेकर मई 2014 तक यह संख्या बढ़कर 13 हो गई। यह वह दौर था, जिसमें लोकसभा चुनाव हुए और सत्ता बदली। डीओपीटी के अधिकारी ने बताया कि इस आंकड़े से यह नहीं कहा जा सकता कि अधिकारी मोदी सरकार के दौरान केंद्र में काम नहीं करना चाहते। उन्होंने कहा, हो सकता है कि वे राज्य में चीफ सेक्रेटरी या सीनियर लेवल की अन्य जिम्मेदारी संभालना चाहते हों। डीओपीटी के ऑर्डर्स के मुताबिक 7 ऑफिसर्स अपने राज्यों में चीफ सेक्रेटरी के पद पर गए हैं। रक्षा मंत्रालय के सूत्र ने बताया कि चार जॉइंट सेक्रेटरी रैंक के ऑफिसर्स अपने कैडर में लौट गए हैं, क्योंकि मौजूदा स्थिति में मेहनत करना उनके लिए मुश्किल हो रहा था।
सरकार की चिंता सिर्फ खाली पड़े पद ही नहीं है। राज्यों से बहुत कम अधिकारी सीनियर पदों पर आने के इच्छुक हैं। इस साल जॉइंट सेक्रेटरी रैंक के 30 पद खाली हुए, मगर चार ही आईएएस ऑफिसर्स इसके लिए राज्यों से आए। इनमें से एक ने अपनी पसंद की पोस्टिंग के लिए बेंगलुरु का नाम भरा है। आमतौर पर वरिष्ठता के एक निश्चित स्तर पर पहुंच जाने के बाद ऑफिसर्स दिल्ली में ही रहना पसंद करते हैं, जहां पर आगे बढऩे की संभावनाएं ज्यादा होती हैं।
दिल्ली में घटता जा रहा मप्र के आईएएस का रुतबा!
मप्र कैडर के आईएएस अफसर हमेशा अपनी मेहनत और बेहतर कार्यप्रणाली के लिए सराहे जाते रहे हैं। केंद्र में किसी भी पार्टी की सरकार हो या कोई भी प्रधानमंत्री हो मप्र के नौकरशाहों ने हमेशा अपना उत्कृष्ट योगदान दिया है। लेकिन वर्तमान केंद्र सरकार के अब तक के कार्यकाल में मध्यप्रदेश के नौकरशाहों की भूमिका महत्वपूर्ण नहीं हो सकी। या यूं कहे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यप्रणाली में मप्र के आईएएस फिट नहीं बैठ रहे हैं। यही कारण है कि मोदी सरकार ने अहम मंत्रालयों में सचिव व संयुक्त सचिव स्तर पर अफसरों की भूमिकाओं में जो परिवर्तन किया है, उसमें मप्र कॉडर के बिमल जुल्का, स्नेहलता कुमार, राजन कटोच व जेएस माथुर(अतिरिक्त सचिव)अपनी भूमिका बरकरार तो रख पाए हैं, लेकिन अहम महकमों में मप्र के अफसरों को जिम्मेदारी नहीं मिली। इसके पीछे मुख्य वजह यह बताई जा रही है कि पीएमओ की दक्षता गाइड लाइन पर मप्र के अफसर खरे नहीं उतर सके हैं। पीएमओ के सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार केंद्र में पदस्थ मप्र कैडर के 33 आईएएस में से मात्र पांच के कार्य को सराहा गया है, जबकि 28 आईएएस के कार्य को मात्र संतोषप्रद माना गया है।
उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पदभार संभालते ही सबसे पहले नौकरशाही पर नकेल कसने की कोशिश की। इसके लिए कई तरह की गाइड लाइन बनाई। मोदी की आक्रामकता देख नौकरशाह भी सहम गए। मोदी ने केंद्र में अफसरों की कमी की पूर्ति के लिए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से अपने कोटे के 952 अधिकारियों को प्रतिनियुक्ति पर भेजने के लिए यह गाइड लाइन जारी की। केंद्र ने कहा है कि उसके पास उपसचिव, निदेशक स्तर के आईएएस अधिकारियों की बहुत कमी है। जो आईएएस 14 साल की सेवा पूरी कर चुके हैं वे निदेशक तथा जो 9 साल की सेवा पूरी कर चुके हैं वे उपसचिव पर प्रतिनियुक्ति पर भेजे जा सकते हैं। इसके अलावा संयुक्त सचिव स्तर के आईएएस अधिकारियों की भी मांग की गई है। बताया जाता है कि मोदी सरकार की कार्यप्रणाली और जरा-सी चुक पर मिडनाइट ट्रांसफर से घबराकर किसी भी प्रदेश का कोई भी आईएएस दिल्ली जाना नहीं चाहता है। आईएएस की कमी के कारण जहां एक-एक अफसर पर कई विभागों की जिम्मेदारी है वहीं कई महत्वपूर्ण विभाग और कार्य बाबूओं के कंधों पर है। दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पदभार संभालते ही जिस तरह की आक्रामकता दिखाई, उससे नौकरशाहों में अनजाना-सा भय समा गया है। इसका परिणाम यह हुआ की केंद्र में पदस्थ नौकरशाह अपने राज्य की ओर रूख कर गए, वहीं केंद्र की बार-बार की मांग के बावजुद भी राज्य से आईएएस दिल्ली जाने को तैयार नहीं हो रहे हैं। ऐसे में मोदी ने सभी प्रमुख विभागों की निगरानी के लिए 'सुपर पीएमओÓ (पीएमओ में पदस्थ प्रधानमंत्री के पसंदीदा अफसरों की टीम यानी प्रमुख सचिव नृपेंद्र मिश्रा, अजीत कुमार डोभाल, राजीव टोपनो, संजीव सिंगला, गुलजार नटराजन, बृजेश पांडेय, मयूर माहेश्वरी और श्रीकार केशव परदेसी )का गठन कर डाला। अब लगभग हर विभाग में 'सुपर पीएमओÓ का हस्तक्षेप बढ़ गया है। इसका परिणाम यह हो रहा है कि जहां एक साल पहले तक दिल्ली में जो नौकरशाह अपने विभागों में बिना दबाव और बिना तनाव के कार्य कर रहे थे, अब उन्हें 'सुपर पीएमओÓ की निगरानी में काम करना पड़ रहा है। आलम यह है कि केंद्र में जितने अहम मंत्रालय हैं उनकी डोर 'सुपर पीएमओÓ ने अपने हाथ में ले रखी है। 'सुपर पीएमओÓ ने केंद्र सरकार में पदस्थ अफसरों की जो रिपोर्ट तैयार की है, उसमें मप्र के अफसरों को फिसड्डी बताया गया है।
मोदी की वर्किंग स्टाइल से डरे अफसर
केंद्र की अफसरशाही में अब प्रदेश के नौकरशाहों की 'रुचिÓ कम होने लगी है। इसे केंद्र सरकार का असर माना जाए या अफसरों की हिचकिचाहट लेकिन केंद्र में मप्र कॉडर के आईएएस अफसरों की आमद में कमी आने लगी है। गौरतलब है कि यूपीए सरकार के समय मप्र के अफसरों का केंद्र सरकार व महत्वपूर्ण मंत्रालयों में काफी दबदबा रहा है। एक समय यह संख्या 60 से ज्यादा थी इनमें सचिव स्तर के 11 अफसर थे। मप्र कॉडर की संख्या के मान से नियमानुनसार 84 आईएएस केंद्र में पदस्थ किए जा सकते हैं, लेकिन अमूमन राज्य सरकार इतने अफसर नहीं देती हैं। अभी केंद्र में मप्र के अफसरों की संख्या 33 है, क्योंकि दो अफसर मनोज गोविल आईएमएफ यूएसए में पदस्थ हैं व पल्लवी जैन गोविल लंबे अवकाश पर हैं। केंद्र सरकार में संयुक्त सचिव स्तर के अफसरों में मप्र की भूमिका महत्वपूर्ण है। इनमें आलोक श्रीवास्तव के पास पोत परिवहन, रश्मि शुक्ला शर्मा के पास पंचायती राज, अनिल श्रीवास्तव नागर विमानन, एम गोपाल रेेड्डी गृह, एसपीएस परिहार कैबिनेट सेक्रेटेरिएट, मनोज झालानी स्वास्थ्य, संजय बंदोपाध्याय सड़क परिवहन, शैलेंद्र सिंह उद्योग, प्रवीण गर्ग सामाजिक न्याय, अनुराग जैन पीएमओ, नीरज मंडलोई शहरी विकास मंत्रालय में हैं। जबकि निकुंज श्रीवास्तव व ई.रमेश कुमार केंद्रीय मंत्रियों के निज सचिव हैं। इनके अलावा केंद्र में प्रवेश शर्मा, राघवचंद्रा, विजया श्रीवास्तव, जयदीप गोविंद, पीके दास, पंकज राग, आशीष श्रीवास्तव, दीप्ति गौड़ मुखर्जी, अनिल जैन, अनिरूद्ध मुखर्जी, केरोलिन खोंगवार, मनीष सिंह, पवन शर्मा पदस्थ हैं। लेकिन 'सुपर पीएमओÓ के हस्तक्षेप के कारण ये अपनी छाप अपने विभाग में छोड़ पा रहे हैं।
हालांकि, डीओपीटी के सूत्र इस बात से इंकार करते हैं कि इसका कारण अधिकारियों के बीच मोदी सरकार के साथ काम करने को लेकर किसी प्रकार की अरूचि है। क्योंकि मोदी सरकार का ज़ोर प्रशासनिक कामकाज में व्यापक बदलाव पर है। इसका कारण ये हो सकता है कि राज्यों में उनके कैडर में अधिकारियों को बड़ी जिम्मेदारी मिली हो। डीओपीटी के आंकड़े बताते हैं कि वापस जाने वाले 7 आईएएस अधिकारियों ने अपने राज्य में जाकर मुख्य सचिव का पद संभाला। हालांकि, राज्यों के कैडर से बड़ी संख्या में अधिकारी इन जिम्मेदारियों को संभालने को इक्छुक दिख रहे हैं। लेकिन अधिकारियों का पैनल बनाने, उनमें आईएएस अधिकारियों और नॉन-आईएएस अधिकारियों की पदास्थापना जैसे मुद्दों के कारण इन पदों को भरने में देरी हो रही है।
मध्यप्रदेश आईएएस संवर्ग में 417 पद स्वीकृत हैं और इनमें से 325 अधिकारी ही पदस्थ हैं। यानी 92 पद अभी भी खाली है। दो सीनियर अधिकारी एसीएस देवराज बिरदी तथा पीएस स्तर के विश्वमोहन उपाध्याय 31 जनवरी को ही रिटायर हुए हैं। इस कारण भी संख्या घटी है। वैसे इस साल 21 आईएएस रिटायर होने जा रहे हैं, जिसमें बिरदी तथा उपाध्याय भी शामिल थे। एक समय पीएमओ कार्यालय में आर. रामानुजम , वित्त मंत्रालय में सुमित बोस सहित अन्य मंत्रालयों में सचिव के रूप में ओपी रावत, डीआरएस चौधरी, सुधीरनाथ, सुषमानाथ, अलका सिरोही, राघवेन्द्र सिरोही, अमिता शर्मा, जेमिनी शर्मा, विश्वपति त्रिवेदी आदि शामिल थे। केंद्र में मप्र के सचिव स्तर के अफसरों की कमी आने से भी मप्र के आईएएस का रुतबा लगातार भारत सरकार में घटता जा रहा है।
उधर, जब से केंद्र में मोदी की सरकार बनी है कोई भी अफसर केंद्र में जाने को तैयार नहीं हो रहा है। दरअसल, मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद ब्यूरोक्रेसी में बदलाव को सबसे बड़ा एजेंडा बनाया और इसपर काम भी हुए। इस प्रक्रिया में सख्त फैसले भी हुए। बीच रात में सीनियर अधिकारियों को हटाया गया। कुछ अफसरों को विदेश दौरे के समय उनके पद से हटा दिया गया। मोदी सरकार के टॉप लेवल के अफसरों को हटाने के फैसले की जगह उन्हें हटाए जाने के तरीके पर सवाल उठे। एक सीनियर अधिकारी ने बताया कि महज अतिरिक्त उत्साह के कारण विदेश सचिव बदलने जैसा फैसला भी विवादों में आया। पूर्व विदेश सचिव सुजाता सिंह को भी हटाने के तरीके पर सवाल उठाए गए। हालांकि भले ही अधिकारियों को हटाने के तरीके पर विवाद हुए लेकिन इनकी जगह पर जिन अधिकारियों की नियुक्ति हुई, वे बेहतर पंसद साबित हुए। इससे विवाद कम हुआ। एक अधिकारी ने बताया कि अगर सरकार किसी को हटाकर उसकी जगह योग्य लोगों को बैठाती रहेगी, तब तब यह मामला तूल नहीं पकड़ेगा लेकिन जिस दिन इसके उलट हुआ, विवाद बढ़ जाएगा। पूर्व कैबिनेट सेक्रेटरी टीआरएस सुब्रहमण्यम का कहना है, 13 महीने के शासन में मोदी सरकार की खासियत रही है कि उन्होंने बड़े पदों पर जो नियुक्ति की है, उसमें योग्यता को विशेष तरजीह दी गई। साथ ही अफसरों के साथ अधिक पूर्वाग्रह कम दिखा। ऐसे में संभव है कि कुछ मिसाल संयोग रहे हो।
ये तो चंद उदाहरण हैं जो केंद्र सरकार की कार्यप्रणाली को दर्शातें हैं। दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के केंद्र सरकार की कमान संभालते ही नौकरशाही उनकी रफ्तार के साथ कदम मिलाने की कोशिश में जुट गई। लेकिन उनसे कदम ताल मिलाने में कुछ नौकरशाह हांफने लगे तो कुछ कांपने। आलम यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के काम-काज को देख कर नौकरशाहों में खलबली मची हुई है। नौकरशाह मोदी के काम के प्रति जुनून से हतप्रभ है। मोदी प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद जिस तरह से अधिकारियों के साथ विचार-विमर्श कर एजेंडा तैयार करने में जुटे रहे, उससे अधिकारी हैरत में है। मोदी के काम-काज के इस तरीके को देख काम करने वाले नौकरशाह उत्साहित हैं। हालांकि मोदी के काम-काज के तरीके से एक सकारात्मक बदलाव भी दिख रहा रहा है। मोदी ने अपने मंत्रियों से भी 16 से 17 घंटा काम करने की बात कही है और मंत्री ऐसा कर भी रहे हैं। मंत्रियों की देखा देखी अफसर भी काम में लगे रहते हैं।
'सुपर पीएमओÓ का बढ़ता दबदबा
लोकप्रियता के शिखर पर सवार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का शासन चलाने का तरीका संभवत: अलग है। पीएमओ के बाद केंद्रीय कैबिनेट में गृह, वित्त, रक्षा और विदेश मंत्रालयों को सबसे ताकतवर माना जाता है, लेकिन मोदी के 'सुपर पीएमओÓ के जरिए इन मंत्रालयों के कामकाज में पर्दे के पीछे से हस्तक्षेप ने फैसले लेने की गति धीमी कर दी है। पीएम मोदी के करीबी माने जाने वाले अरुण जेटली का वित्त मंत्रालय गुजरात कैडर के अधिकारियों से भरा हुआ है, जिससे लगता है कि मोदी ने जेटली की घेरेबंदी कर दी है। ऐसे में अन्य राज्यों से आए अफसर काम करने में असहज महसूस कर रहे हैं। ऐसी ही स्थिति अन्य विभागों की भी है। मप्र कैडर के अफसर पीडी मीणा को मोदी सरकार ने रक्षा मंत्रालय में भेजा, लेकिन उन्हें भूतपूर्व कर्मचारी कल्याण का काम मिला। जहां ऐसा करने को कुछ नहीं है जो मीणा की कार्य क्षमता को प्रदर्शित कर सके। मप्र में मुख्यसचिव स्तर के एक अफसर ने बताया कि दिल्ली के बजाए फिलहाल मप्र में काम करना बेहतर है। माना जा रहा है कि मोदी सरकार के कामकाज और इसे लेकर अक्सर होने वाली चर्चाओं के चलते अफसरों में दिल्ली आने को लेकर हिचक है। वहीं मप्र सरकार भी अफसरों की कमी के चलते अफसरों को अनुमति देने से बच रही है। स्थितियां यही रही तो जल्द ही केंद्र में सचिव स्तर के मप्र के अफसरों की संख्या दो रह जाएगी,क्योंकि सचिव सीमा प्रबंधन(गृह)स्नेहलता कुमार रिटायर हो गई हैं और सचिव सूचना प्रसारण बिमल जुल्का अगस्त में सेवानिवृत्त हो रहे हैं।
कुछ ऐसी ही स्थिति अन्य अहम मंत्रालयों की हैं। 'सुपर पीएमओÓ के मंत्रालयों पर नियंत्रण करने की कवायद पिछले साल नवंबर में मोदी के भरोसेमंद गुजरात कैडर के अधिकारी हसमुख अधिया की वित्त मंत्रालय में वित्तीय सेवा विभाग के सचिव के रूप में नियुक्ति से शुरू हुई। अधिया भारतीय प्रबंधन संस्थान के गोल्ड मेडलिस्ट हैं और उन्होंने योग में भी पीएचडी की है। मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के पसंदीदा 1985 बैच के आईएएस गिरीश चंद्र मूर्मू को वित्त मंत्रालय में व्यय विभाग का संयुक्त सचिव नियुक्त किया गया है। हालांकि, राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि उन्हें प्रवर्तन निदेशालय का निदेशक बनाने की तैयारी चल रही है। यह पद लंबे समय से खाली है। कुछ ही दिन पहले 1987 बैच के वरिष्ठ आईएएस राज कुमार को भी वित्त मंत्रालय में आर्थिक मामलों का संयुक्त सचिव नियुक्त किया गया। यह सब नियुक्तियां बड़े मंत्रालयों पर 'सुपर पीएमओÓ का दबदबा कायम करने के लिए किया गया है।
कई फैसलों में 'सुपर पीएमओÓ के हस्तक्षेप
जैसा कि सभी जानते हैं नरेंद्र मोदी का काम करने का तरीका संभवत: अलग है। मोदी ने 'सुपर पीएमओÓ के जरिए इन मंत्रालयों के कामकाज में पर्दे के पीछे से हस्तक्षेप ने फैसले लेने की गति धीमी कर दी है। मंत्रालय के अधिकारियों की जानकारी के बगैर इसमें कई अहम बदलाव कर दिए गए। कई अधिकारियों का कहना है कि अन्य मंत्रालयों में पीएमओ का इसी तरह का हस्तक्षेप सामान्य बात है। यही कारण है कि मोदी सरकार के सत्ता संभालने के 13 माह से अधिक होने के बावजूद अभी तक दिल्ली की नौकरशाही उनके कामकाज के तरीकों से सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाई है और मेक इन इंडिया अभियान सहित कई अहम परियोजनाएं अनिश्चय की स्थिति में हैं या फिर उनमें संतोषजनक प्रगति नहीं हुई है। पीएमओ की कार्यप्रणाली को अच्छी तरह जानने वाले एक आईएएस कहते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उन्हीं मंत्रियों और अफसरों की पट रही है जिनकी बुलेट ट्रेन रफ्तार वाली कार्यशैली है। लेकिन आलम यह है कि अधिकांश मंत्री बैलगाड़ी मिजाज वाले साबित हो रहे हैं। मंत्रियों की रफ्तार धीमी होने का खामियाजा अफसरों को भूगतना पड़ रहा है। उन विभागों के अफसर मोदी की पाठशाला में पास हो गए हैं जिने विभाग के मंत्री अपनी तरफ से पीएमओ में प्रस्ताव, नोट ले कर पहुंचते हैं। ये नरेंद्र मोदी के कहे आईडिया को लपकते हैं और तुरत फुररत प्रस्ताव बना कर पीएमओ को भेज देते हैं। इससे फैसले भी होते हैं और काम भी। एक और पेंच है। जो मंत्री ई मेल, ई-गर्वनेश को अपना रहे हैं वे पीएमओ से फटाफट काम करवा ले रहे हैं। जानकर आश्चर्य होगा कि मोदी के पीएमओ की कार्यसंस्कृति से बुनियादी परिवर्तन हुए हैं। ई-मेल, ई-गवर्नेश में प्रधानमंत्री निवास और पीएमओ दोनों धड़ल्ले से काम कर रहे हैं। नरेंद्र मोदी ई-मेल पर प्रस्ताव, नोट, ड्राफ्ट लेने-देने और उसी पर तुरंत मंजूरी का रिकार्ड बना रहे हैं। यदि मंत्री और उनके अफसरों ने ई-मेल से नोट, प्रस्ताव, मसला भेजा तो पीएमओ से तुरंत रिस्पोंस होगा। तुरंत काम होगा। और फाइलों के अंदाज में यदि मंत्रालयों से प्रस्ताव, नोट और मसले आए तो उनमें देरी मुमकिन है। इस हकीकत में अपने लिए हैरानी वाली बात यह है कि पुराने आला अफसर यानि पीएमओ के प्रमुख सचिव नृपेंद्र मिश्र, एके मिश्रा आदि कैसे ई-मेल, ई-गवर्नेंश में रम पा रहे होंगे
पीएमओ पर मंत्रालयों की निर्भरता!
केंद्र में पदस्थ बिहार कैडर के एक आईएएस कहते हैं कि नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री कार्यालय की गरिमा और उसकी खोई हुई ताकत लौटाई है। पिछली सरकार में कई सत्ता केंद्रों में से एक सत्ता केंद्र पीएमओ भी था, लेकिन आज यह इकलौता सत्ता केंद्र है। केंद्र सरकार के कामकाज की केंद्रीय कमान प्रधानमंत्री कार्यालय में होनी चाहिए, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। यह कमान सिर्फ निर्देश देने और निगरानी करने तक हो तो बेहतर है। लेकिन नरेंद्र मोदी की सरकार के मंत्री अपने हर काम के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय के भरोसे बैठे हैं। वे पीएमओ का मुंह ताकते हैं। फैसले करने से हिचक रहे हैं। और तभी मंत्रालयों के मामूली फैसलों की फाइलें प्रधानमंत्री के पास जा रही हैं। मंत्री पीएमओ का मुंह देख रहे हैं कि वहां से कोई निर्देश आए तो वे आगे बढ़ें। कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके दफ्तर ने अपने कंधों पर इतना बोझ ले लिया हैं जिससे अनिर्णय की स्थिति बनी हुई है मप्र कैडर के एक आईएएस कहते हैं कि संदेह नहीं है कि नरेंद्र मोदी और उनके दफ्तर ने देश-दुनिया की तमाम चिंताओं का बोझ लिया हैं। सबका साथ, सबका विकास के साथ सबका काम खुद करने का भी पीएमओ का अंदाज हैं। जाहिर है कई मंत्री बात-बात के लिए पीएमओ की तरफ देखते हैं। पीएमओ पहल करे और कहे तो बात आगे बढ़ेगी। ऐसे में विभिन्न विभागों की कमान संभाल रहे नौकरशाह भी पंगू बने हुए हैं। इसका परिणाम यह हो रहा है कि कई विभागों में तो काम ही नहीं हो रहा है। मंत्रियों के पीएमओ पर निर्भर होने का एक नतीजा यह हुआ है कि प्रधानमंत्री कार्यालय पर बहुत ज्यादा बोझ बढ़ गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी रूचि से बुनियादी ढांचे के विकास, आर्थिक महत्व के मसलों और विदेशी मामलों में लगे रहते हैं। उन्होंने अपने आप को कूटनीति और उसके जरिए देश की अर्थव्यवस्था में जान फंूकने के काम में लगाया है। लेकिन इनके अलावा छोटे-छोटे मसलों की भी उनके पास भरमार हो गई है। वेहर महीने बुनियादी ढांचे से जुड़े मंत्रालयों की बैठक कर रहे हैं और समीक्षा कर रहे हैं। गंगा की सफाई पर वे बैठक कर रहे हैं। यहां तक की खेल से जुड़े मामूली फैसलों की फाइल भी उनके पास जा रही है। ऐसे में इन विभागों के मंत्रियों औश्र अफसरों के पास अपने स्तर पर काम करने के लिए कुछ भी नहीं है।
खेमों में बंटने लगे हैं ब्यूरोक्रेट्स !
जैसे-जैसे केंद्र में गुजरात कैडर के आईएएस का रूतबा बढ़ता जा रहा है वैसे-वैसे ब्यूरोक्रेसी क्षेत्रीय और जातीय खेमों में बंटती जा रही है। सरकार के हिसाब से ही अफसर भी आते-जाते रहते हैं। यूपीए सरकार में यूपी, बिहार, महाराष्ट्र, राजस्थान और मप्र के अफसरों का बोलबाला था वहीं मोदी सरकार में हर जगह गुजरात कैडर के अफसरों का रूतबा बढ़ता जा रहा है। केंद्र में पदस्थ मप्र कैडर के एक आईपीएस का दावा है कि केंद्र में हमेशा से कायस्थ लॉबी, बनिया लॉबी और ब्राह्मण लॉबी प्रभावशाली बनी रहती है। जिन अफसरों के कामकाज की तारीफ होती भी है तो वह उनके काम की मेरिट से ज्यादा किसी और वजह से होती है। वह कहते हैं कि जो आईएएस अफसर मंत्रियों के करीबी रहते हैं, उन्हें मनचाही पोस्टिंग मिलती रहती है। यहां तक कि रिटायरमेंट के बाद भी इन अफसरों की सेवा बढ़ती रहती है। इसके अलावा उन अफसरों को भी मलाईदार पोस्टिंग मिलती है जो पैसा खर्च कर सकते हैं। रिटायर्ड आईएएस प्रोमिला शंकर ने अपनी किताब 'गॉड ऑफ करप्शनÓ में ब्यूरोक्रेसी में तो जातीयता पर भी सवाल भी खड़े किए हैं।
सिविल सर्विसेज बोर्ड बनाने की मांग
राजनीतिक हस्तक्षेप से बार-बार तबादलों से अजीज आ चुके अफसरों ने प्रदेश में सिविल सर्विसेज बोर्ड बनाने की मांग तेज कर दी है। इसकी सबसे पहले अवाज राजस्थान कैडर के अफसरों ने उठाई है। राजस्थान कैडर के आईएएस समित शर्मा ने सिविल सेवा के अफसरों के ट्रांसफर पोस्टिंग के लिए सिविल सर्वे बोर्ड बनाने की मांग की। शर्मा ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट फैसला दे चुका है कि सिविल सेवा अफसरों के ट्रांसफर पोस्टिंग के लिए सिविल सर्विसेज बोर्ड होगा। उन्होंनेे राजनीतिक आधार पर तबादलों पर सवाल उठाते हुए सिविल सेवा अफसरों का कार्यकाल तय करने की मांग उठाई।
विदेशों में जम गए आईएएस की होगी छुट्टी
अब उन आईएएस अफसरों की खैर नहीं है जो विदेश दौरे पर गए लेकिन लौट कर नहीं आए। मोदी सरकार अब ऐसे अफसरों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर रही है। कुछ आईएएस सरकारी नौकरियों में डेप्युटेशन पर विदेश गए और वहां करोड़ों के पैकेज पाकर दूसरी नौकरियों में जम गए। उन्हें इतनी भी फुरसत नहीं मिल सकी कि वह नौकरी छोडऩे की औपचारिकता निभा सके। डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनल ऐंड ट्रेनिंग के अनुसार इस तरह के मिसिंग आईएएस की संख्या लगभग 20 है। ये ऐसे आईएएस है, जो सरकारी नौकरियों में डेप्युटेशन पर विदेश गए, लेकिन न तो निश्चित समय में लौटे और न ही कोई सूचना दी। सरकार अब उन्हें नौकरी से बर्खास्त करने की तैयारी कर रही है। एक ऐसे ही आईएएस प्रशांत को सरकार ने हटा दिया। सरकार ने उन्हें हटाने का औपचारिकता आदेश जारी कर दिया। 1988 बैच के बिहार के प्रशांत पश्चिम बंगाल कॉडर के आईएएस थे। इन्हें 2009 में मिनिस्ट्री ऑफ पेट्रोलियम की ओर से वॉशिंगटन में डेप्युटेशन पर भेजा गया था। वहां से उन्हें एक साल बाद लौटना था, लेकिन सूत्रों के अनुसार उन्होंने वहां एक बड़ी मल्टिनेशनल कंपनी में बड़े पैकेज पर नौकरी पकड़ ली। सरकार ने उन्हें कई बार तलाशने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं मिले। इसके बाद सरकार ने उन्हें मिसिंग आईएएस के लिस्ट में शामिल कर दिया और अंतत: हटा दिया।
आईएएस नियुक्ति के बाद कितना कमाया बताना होगा
अखिल भारतीय सेवा के प्रत्येक अफसर को अब अचल संपत्ति ही नहीं, बल्कि अब चल संपत्ति का भी लेखा-जोखा हर वर्ष सरकार को प्रस्तुत करना होगा। खासकर आईएएस, आईपीएस तथा आईएफएस की नियुक्ति के समय उसके नाम पर कितनी संपत्ति थी और आज वह बढ़कर कितनी हो गई है। पत्नी, पुत्र-पुत्री और आश्रितों के नाम पर कितनी संपत्ति है, उनके नाम पर बैंक में कितना पैसा जमा है, जमीन, बीमा पालिसी, बैंक में जमा बॉंड, वाहन मकान आदि का ब्यौरा भी अब बताना होगा। 31 मार्च तक लेखा-जोखा केंद्र सरकार ने लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम के तहत अफसरों को हर वर्ष पहली जनवरी की स्थिति में इसका लेखा-जोखा देना होगा। जीएडी ने इस मामले में अफसरों से 31 जुलाई तक उक्त प्रावधानों के तहत जानकारी मांगी है। केंद्रीय कार्मिक, लोक शिकायत तथा पेंशन मंत्रालय ने प्रत्येक लोक सेवक, यथास्थिति, लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम 2013 की धारा 44 की उपधारा (2)या उपधारा (3)के अधीन अपनी आस्तियों और दायित्वों की घोषणा करेगा। प्रत्येक लोक सेवक उस वर्ष की 31 जुलाई को या उसके पूर्व लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियमों के अंतर्गत सक्षम प्राधिकारी को प्रत्येक वर्ष के 31 मार्च को अपनी संपत्ति के विषय में घोषणा, सूचना या विवरणी फाइल करेगा। इन अधिनियमों में 26 दिसंबर 2014 को प्ररूप 2 एवं 4 में आंशिक संशोधन भी किए गए है। तीनों अखिल भारतीय सेवा के अफसरों को अपनी संपत्ति के बारे में जानकारी हिंदी और अंग्रेजी दोनों में से किसी एक भाषा में देना होगा। इस मामले में सामान्य प्रशासन विभाग ने प्रदेश के सभी आईएएस अफसरों से 31 जुलाई तक जानकारी मांगी है।
संपत्ति का ब्योरा नहीं दे रहे मप्र के आईएएस
मध्यप्रदेश संवर्ग के भारतीय प्रशासनिक सेवा के करीब 5 दर्जन अधिकारियों ने अभी तक अपनी चल-अचल संपत्ति का ब्योरा नहीं दिया है। सामान्य प्रशासन विभाग की वेबसाइट में आईएएस अधिकारियों की संपत्ति का ब्योरा अपलोड करने का प्रावधान है। लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम के तहत अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों को हर साल अपनी चल-अचल संपत्ति का ब्योरा देना अनिवार्य है। सामान्य प्रशासन विभाग की वेबसाइट के मुताबिक वित्तीय वर्ष 2014 में जिन आईएएस अफसरों ने अपनी चल-अचल संपत्ति का ब्योरा नहीं दिया है, उनमें प्रमोद अग्रवाल, संजय दुबे, शिवशेखर शुक्ला, चंद्रहास दुबे, एसके पाल, फैज अहमद किदवई, मुकेश चंद गुप्ता, कमता प्रसाद राही, पवन कुमार शर्मा, शशि कर्णावत, सुरेंद्र कुमार उपाध्याय, विवेक कुमार पोरवाल, नीरज दुबे, कैलाशचंद जैन, श्याम सिंह कुमरे, पी नरहरि, सीबी सिंह, राजेंद्र सिंह, राजेश बहुगणा, अजीत कुमार, पीके गुप्ता, डी बी पाटिल, नरेंद्र सिंह परमार, एम के शुक्ला, जॉन किग्सले, लोकेश कुमार जाटव, शेखर वर्मा, अशोक कुमार वर्मा, आरके जैन, एनएम विभीष्ण, छवि भारद्वाज, नंद कुमरे, अविनाश लवानी, गणेश शंकर मिश्रा, कर्मवीर शर्मा, एसपी मिश्रा, विजय कुमार जे, बी विजय दत्ता, हर्षिका सिंह, नीरज कुमार सिंह, पंकज जैन, अजय कटेसरिया, निधि निवेदिता, रोहित सिंह, एस सोमवंशी, प्रवीण सिंह अधयच, अनुराग वर्मा, एफ राहुल हरिदास, राजीव रंजन मीना, बी कार्तिकेय, गिरिश कुमार मिश्रा, सोनिया मीना,हर्ष दीक्षित, सोमेश मिश्रा, प्रियंका मिश्रा, मयंक अग्रवाल, फ्रेंक नोबेल, संदीप जीआर आदि शामिल है।
सामान्य प्रशासन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक निर्धारित समय-सीमा में चल-अचल संपत्ति का ब्योरा नहीं देने पर संबंधित अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है। उनकी गोपनीय चरित्रावली में भी इसका उल्लेख किया जा सकता है। चल-अचल संपत्ति का ब्योरा नहीं देने वाले अधिकारियों की पदोन्नित रोके जाने का प्रावधान है।
भोपाल। अपने स्टेट कैडर से केंद्र में प्रतिनियुक्ति पर जाना आईएएस अधिकरियों के गर्व और सम्मान का विषय माना जाता था, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गाइड लाइन पर काम करना अफसरों को नहीं भा रहा है। यही कारण है कि राज्यों से बार-बार मांग के बावजुद आईएएस अफसर केंद्र में जाने को तैयार नहीं हैं। आलम यह है कि मोदी सरकार के अभी तक 56 आईएएस ऑफिसर्स सेंट्रल पोस्टिंग को छोड़कर अपने स्टेट कैडर में वापस चले गए हैं। वापस जाने का ऑप्शन चुनने वाले ज्यादातर ऑफिसर्स सीनियर हैं। वे जॉइंट सेक्रेटरी या इससे ऊपर के रैंक के हैं। आमतौर पर आईएएस अधिकारी इस तरह से वापस अपने राज्य का रुख नहीं करते हैं। वहीं मात्र चार अफसर ही केंद्र में गए हैं। जहां तक मप्र का सवाल है तो यहां से इस दौरान एक भी आईएएस दिल्ली नहीं गया है, बल्कि करीब आधा दर्जन वापस ही लौटे हैं। जबकि केंद्र सरकार ने मप्र सरकार को पत्र लिखकर केंद्रिय कोटे के 30 आईएएस की मांग कई बार कर चुकी है। बताया जाता है कि वर्तमान केंद्र सरकार के अब तक के कार्यकाल में मध्यप्रदेश के नौकरशाहों की भूमिका महत्वपूर्ण नहीं हो सकी। या यूं कहे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यप्रणाली में मप्र के आईएएस फिट नहीं बैठ रहे हैं। यही कारण है कि कभी केंद्र सरकार के विभागों में महत्वपूर्ण पदों को संभालने वाले मप्र के आईएएस अफसरों के पास महत्वपूर्ण जिम्मेदारी नहीं है।
56 आईएएस ऑफिसर्स स्टेट कैडर में लौटे
क्या स्टेट कैडर के आईएएस अधिकारियों को दिल्ली रास नहीं आ रही? केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद के आंकड़े कुछ ऐसा ही इशारा कर रहे हैं। मई 2014 में मोदी सरकार के आने के बाद से अबतक कम से कम 56 आईएएस अधिकारी केंद्र की पदस्थापना समय से पूर्व छोड़कर अपने प्रादेशिक कैडर में वापस लौट चुके हैं। इसके उलट केंद्र में प्रतिनियुक्ति पर आने वाले अधिकारियों की संख्या इस दौरान महज 4 रही। अपने स्टेट कैडर में जल्द वापस जाने वाले अधिकारियों में ज्यादातर सीनियर रैंक के हैं यानी संयुक्त सचिव या उससे ऊपर के पद के। इससे पहले इस तरह के मामले कम देखने को मिलते थे। डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनेल ऐंड ट्रेनिंग (डीओपीटी) की वेबसाइट के मुताबिक 2013 में सिर्फ 3 आईएएस ऑफिसर्स केंद्र से राज्य में गए थे। अगस्त से सितंबर 2012 के बीच सिर्फ एक ऑफिसर ने ऐसा किया था, मगर जनवरी से लेकर मई 2014 तक यह संख्या बढ़कर 13 हो गई। यह वह दौर था, जिसमें लोकसभा चुनाव हुए और सत्ता बदली। डीओपीटी के अधिकारी ने बताया कि इस आंकड़े से यह नहीं कहा जा सकता कि अधिकारी मोदी सरकार के दौरान केंद्र में काम नहीं करना चाहते। उन्होंने कहा, हो सकता है कि वे राज्य में चीफ सेक्रेटरी या सीनियर लेवल की अन्य जिम्मेदारी संभालना चाहते हों। डीओपीटी के ऑर्डर्स के मुताबिक 7 ऑफिसर्स अपने राज्यों में चीफ सेक्रेटरी के पद पर गए हैं। रक्षा मंत्रालय के सूत्र ने बताया कि चार जॉइंट सेक्रेटरी रैंक के ऑफिसर्स अपने कैडर में लौट गए हैं, क्योंकि मौजूदा स्थिति में मेहनत करना उनके लिए मुश्किल हो रहा था।
सरकार की चिंता सिर्फ खाली पड़े पद ही नहीं है। राज्यों से बहुत कम अधिकारी सीनियर पदों पर आने के इच्छुक हैं। इस साल जॉइंट सेक्रेटरी रैंक के 30 पद खाली हुए, मगर चार ही आईएएस ऑफिसर्स इसके लिए राज्यों से आए। इनमें से एक ने अपनी पसंद की पोस्टिंग के लिए बेंगलुरु का नाम भरा है। आमतौर पर वरिष्ठता के एक निश्चित स्तर पर पहुंच जाने के बाद ऑफिसर्स दिल्ली में ही रहना पसंद करते हैं, जहां पर आगे बढऩे की संभावनाएं ज्यादा होती हैं।
दिल्ली में घटता जा रहा मप्र के आईएएस का रुतबा!
मप्र कैडर के आईएएस अफसर हमेशा अपनी मेहनत और बेहतर कार्यप्रणाली के लिए सराहे जाते रहे हैं। केंद्र में किसी भी पार्टी की सरकार हो या कोई भी प्रधानमंत्री हो मप्र के नौकरशाहों ने हमेशा अपना उत्कृष्ट योगदान दिया है। लेकिन वर्तमान केंद्र सरकार के अब तक के कार्यकाल में मध्यप्रदेश के नौकरशाहों की भूमिका महत्वपूर्ण नहीं हो सकी। या यूं कहे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यप्रणाली में मप्र के आईएएस फिट नहीं बैठ रहे हैं। यही कारण है कि मोदी सरकार ने अहम मंत्रालयों में सचिव व संयुक्त सचिव स्तर पर अफसरों की भूमिकाओं में जो परिवर्तन किया है, उसमें मप्र कॉडर के बिमल जुल्का, स्नेहलता कुमार, राजन कटोच व जेएस माथुर(अतिरिक्त सचिव)अपनी भूमिका बरकरार तो रख पाए हैं, लेकिन अहम महकमों में मप्र के अफसरों को जिम्मेदारी नहीं मिली। इसके पीछे मुख्य वजह यह बताई जा रही है कि पीएमओ की दक्षता गाइड लाइन पर मप्र के अफसर खरे नहीं उतर सके हैं। पीएमओ के सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार केंद्र में पदस्थ मप्र कैडर के 33 आईएएस में से मात्र पांच के कार्य को सराहा गया है, जबकि 28 आईएएस के कार्य को मात्र संतोषप्रद माना गया है।
उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पदभार संभालते ही सबसे पहले नौकरशाही पर नकेल कसने की कोशिश की। इसके लिए कई तरह की गाइड लाइन बनाई। मोदी की आक्रामकता देख नौकरशाह भी सहम गए। मोदी ने केंद्र में अफसरों की कमी की पूर्ति के लिए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से अपने कोटे के 952 अधिकारियों को प्रतिनियुक्ति पर भेजने के लिए यह गाइड लाइन जारी की। केंद्र ने कहा है कि उसके पास उपसचिव, निदेशक स्तर के आईएएस अधिकारियों की बहुत कमी है। जो आईएएस 14 साल की सेवा पूरी कर चुके हैं वे निदेशक तथा जो 9 साल की सेवा पूरी कर चुके हैं वे उपसचिव पर प्रतिनियुक्ति पर भेजे जा सकते हैं। इसके अलावा संयुक्त सचिव स्तर के आईएएस अधिकारियों की भी मांग की गई है। बताया जाता है कि मोदी सरकार की कार्यप्रणाली और जरा-सी चुक पर मिडनाइट ट्रांसफर से घबराकर किसी भी प्रदेश का कोई भी आईएएस दिल्ली जाना नहीं चाहता है। आईएएस की कमी के कारण जहां एक-एक अफसर पर कई विभागों की जिम्मेदारी है वहीं कई महत्वपूर्ण विभाग और कार्य बाबूओं के कंधों पर है। दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पदभार संभालते ही जिस तरह की आक्रामकता दिखाई, उससे नौकरशाहों में अनजाना-सा भय समा गया है। इसका परिणाम यह हुआ की केंद्र में पदस्थ नौकरशाह अपने राज्य की ओर रूख कर गए, वहीं केंद्र की बार-बार की मांग के बावजुद भी राज्य से आईएएस दिल्ली जाने को तैयार नहीं हो रहे हैं। ऐसे में मोदी ने सभी प्रमुख विभागों की निगरानी के लिए 'सुपर पीएमओÓ (पीएमओ में पदस्थ प्रधानमंत्री के पसंदीदा अफसरों की टीम यानी प्रमुख सचिव नृपेंद्र मिश्रा, अजीत कुमार डोभाल, राजीव टोपनो, संजीव सिंगला, गुलजार नटराजन, बृजेश पांडेय, मयूर माहेश्वरी और श्रीकार केशव परदेसी )का गठन कर डाला। अब लगभग हर विभाग में 'सुपर पीएमओÓ का हस्तक्षेप बढ़ गया है। इसका परिणाम यह हो रहा है कि जहां एक साल पहले तक दिल्ली में जो नौकरशाह अपने विभागों में बिना दबाव और बिना तनाव के कार्य कर रहे थे, अब उन्हें 'सुपर पीएमओÓ की निगरानी में काम करना पड़ रहा है। आलम यह है कि केंद्र में जितने अहम मंत्रालय हैं उनकी डोर 'सुपर पीएमओÓ ने अपने हाथ में ले रखी है। 'सुपर पीएमओÓ ने केंद्र सरकार में पदस्थ अफसरों की जो रिपोर्ट तैयार की है, उसमें मप्र के अफसरों को फिसड्डी बताया गया है।
मोदी की वर्किंग स्टाइल से डरे अफसर
केंद्र की अफसरशाही में अब प्रदेश के नौकरशाहों की 'रुचिÓ कम होने लगी है। इसे केंद्र सरकार का असर माना जाए या अफसरों की हिचकिचाहट लेकिन केंद्र में मप्र कॉडर के आईएएस अफसरों की आमद में कमी आने लगी है। गौरतलब है कि यूपीए सरकार के समय मप्र के अफसरों का केंद्र सरकार व महत्वपूर्ण मंत्रालयों में काफी दबदबा रहा है। एक समय यह संख्या 60 से ज्यादा थी इनमें सचिव स्तर के 11 अफसर थे। मप्र कॉडर की संख्या के मान से नियमानुनसार 84 आईएएस केंद्र में पदस्थ किए जा सकते हैं, लेकिन अमूमन राज्य सरकार इतने अफसर नहीं देती हैं। अभी केंद्र में मप्र के अफसरों की संख्या 33 है, क्योंकि दो अफसर मनोज गोविल आईएमएफ यूएसए में पदस्थ हैं व पल्लवी जैन गोविल लंबे अवकाश पर हैं। केंद्र सरकार में संयुक्त सचिव स्तर के अफसरों में मप्र की भूमिका महत्वपूर्ण है। इनमें आलोक श्रीवास्तव के पास पोत परिवहन, रश्मि शुक्ला शर्मा के पास पंचायती राज, अनिल श्रीवास्तव नागर विमानन, एम गोपाल रेेड्डी गृह, एसपीएस परिहार कैबिनेट सेक्रेटेरिएट, मनोज झालानी स्वास्थ्य, संजय बंदोपाध्याय सड़क परिवहन, शैलेंद्र सिंह उद्योग, प्रवीण गर्ग सामाजिक न्याय, अनुराग जैन पीएमओ, नीरज मंडलोई शहरी विकास मंत्रालय में हैं। जबकि निकुंज श्रीवास्तव व ई.रमेश कुमार केंद्रीय मंत्रियों के निज सचिव हैं। इनके अलावा केंद्र में प्रवेश शर्मा, राघवचंद्रा, विजया श्रीवास्तव, जयदीप गोविंद, पीके दास, पंकज राग, आशीष श्रीवास्तव, दीप्ति गौड़ मुखर्जी, अनिल जैन, अनिरूद्ध मुखर्जी, केरोलिन खोंगवार, मनीष सिंह, पवन शर्मा पदस्थ हैं। लेकिन 'सुपर पीएमओÓ के हस्तक्षेप के कारण ये अपनी छाप अपने विभाग में छोड़ पा रहे हैं।
हालांकि, डीओपीटी के सूत्र इस बात से इंकार करते हैं कि इसका कारण अधिकारियों के बीच मोदी सरकार के साथ काम करने को लेकर किसी प्रकार की अरूचि है। क्योंकि मोदी सरकार का ज़ोर प्रशासनिक कामकाज में व्यापक बदलाव पर है। इसका कारण ये हो सकता है कि राज्यों में उनके कैडर में अधिकारियों को बड़ी जिम्मेदारी मिली हो। डीओपीटी के आंकड़े बताते हैं कि वापस जाने वाले 7 आईएएस अधिकारियों ने अपने राज्य में जाकर मुख्य सचिव का पद संभाला। हालांकि, राज्यों के कैडर से बड़ी संख्या में अधिकारी इन जिम्मेदारियों को संभालने को इक्छुक दिख रहे हैं। लेकिन अधिकारियों का पैनल बनाने, उनमें आईएएस अधिकारियों और नॉन-आईएएस अधिकारियों की पदास्थापना जैसे मुद्दों के कारण इन पदों को भरने में देरी हो रही है।
मध्यप्रदेश आईएएस संवर्ग में 417 पद स्वीकृत हैं और इनमें से 325 अधिकारी ही पदस्थ हैं। यानी 92 पद अभी भी खाली है। दो सीनियर अधिकारी एसीएस देवराज बिरदी तथा पीएस स्तर के विश्वमोहन उपाध्याय 31 जनवरी को ही रिटायर हुए हैं। इस कारण भी संख्या घटी है। वैसे इस साल 21 आईएएस रिटायर होने जा रहे हैं, जिसमें बिरदी तथा उपाध्याय भी शामिल थे। एक समय पीएमओ कार्यालय में आर. रामानुजम , वित्त मंत्रालय में सुमित बोस सहित अन्य मंत्रालयों में सचिव के रूप में ओपी रावत, डीआरएस चौधरी, सुधीरनाथ, सुषमानाथ, अलका सिरोही, राघवेन्द्र सिरोही, अमिता शर्मा, जेमिनी शर्मा, विश्वपति त्रिवेदी आदि शामिल थे। केंद्र में मप्र के सचिव स्तर के अफसरों की कमी आने से भी मप्र के आईएएस का रुतबा लगातार भारत सरकार में घटता जा रहा है।
उधर, जब से केंद्र में मोदी की सरकार बनी है कोई भी अफसर केंद्र में जाने को तैयार नहीं हो रहा है। दरअसल, मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद ब्यूरोक्रेसी में बदलाव को सबसे बड़ा एजेंडा बनाया और इसपर काम भी हुए। इस प्रक्रिया में सख्त फैसले भी हुए। बीच रात में सीनियर अधिकारियों को हटाया गया। कुछ अफसरों को विदेश दौरे के समय उनके पद से हटा दिया गया। मोदी सरकार के टॉप लेवल के अफसरों को हटाने के फैसले की जगह उन्हें हटाए जाने के तरीके पर सवाल उठे। एक सीनियर अधिकारी ने बताया कि महज अतिरिक्त उत्साह के कारण विदेश सचिव बदलने जैसा फैसला भी विवादों में आया। पूर्व विदेश सचिव सुजाता सिंह को भी हटाने के तरीके पर सवाल उठाए गए। हालांकि भले ही अधिकारियों को हटाने के तरीके पर विवाद हुए लेकिन इनकी जगह पर जिन अधिकारियों की नियुक्ति हुई, वे बेहतर पंसद साबित हुए। इससे विवाद कम हुआ। एक अधिकारी ने बताया कि अगर सरकार किसी को हटाकर उसकी जगह योग्य लोगों को बैठाती रहेगी, तब तब यह मामला तूल नहीं पकड़ेगा लेकिन जिस दिन इसके उलट हुआ, विवाद बढ़ जाएगा। पूर्व कैबिनेट सेक्रेटरी टीआरएस सुब्रहमण्यम का कहना है, 13 महीने के शासन में मोदी सरकार की खासियत रही है कि उन्होंने बड़े पदों पर जो नियुक्ति की है, उसमें योग्यता को विशेष तरजीह दी गई। साथ ही अफसरों के साथ अधिक पूर्वाग्रह कम दिखा। ऐसे में संभव है कि कुछ मिसाल संयोग रहे हो।
ये तो चंद उदाहरण हैं जो केंद्र सरकार की कार्यप्रणाली को दर्शातें हैं। दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के केंद्र सरकार की कमान संभालते ही नौकरशाही उनकी रफ्तार के साथ कदम मिलाने की कोशिश में जुट गई। लेकिन उनसे कदम ताल मिलाने में कुछ नौकरशाह हांफने लगे तो कुछ कांपने। आलम यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के काम-काज को देख कर नौकरशाहों में खलबली मची हुई है। नौकरशाह मोदी के काम के प्रति जुनून से हतप्रभ है। मोदी प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद जिस तरह से अधिकारियों के साथ विचार-विमर्श कर एजेंडा तैयार करने में जुटे रहे, उससे अधिकारी हैरत में है। मोदी के काम-काज के इस तरीके को देख काम करने वाले नौकरशाह उत्साहित हैं। हालांकि मोदी के काम-काज के तरीके से एक सकारात्मक बदलाव भी दिख रहा रहा है। मोदी ने अपने मंत्रियों से भी 16 से 17 घंटा काम करने की बात कही है और मंत्री ऐसा कर भी रहे हैं। मंत्रियों की देखा देखी अफसर भी काम में लगे रहते हैं।
'सुपर पीएमओÓ का बढ़ता दबदबा
लोकप्रियता के शिखर पर सवार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का शासन चलाने का तरीका संभवत: अलग है। पीएमओ के बाद केंद्रीय कैबिनेट में गृह, वित्त, रक्षा और विदेश मंत्रालयों को सबसे ताकतवर माना जाता है, लेकिन मोदी के 'सुपर पीएमओÓ के जरिए इन मंत्रालयों के कामकाज में पर्दे के पीछे से हस्तक्षेप ने फैसले लेने की गति धीमी कर दी है। पीएम मोदी के करीबी माने जाने वाले अरुण जेटली का वित्त मंत्रालय गुजरात कैडर के अधिकारियों से भरा हुआ है, जिससे लगता है कि मोदी ने जेटली की घेरेबंदी कर दी है। ऐसे में अन्य राज्यों से आए अफसर काम करने में असहज महसूस कर रहे हैं। ऐसी ही स्थिति अन्य विभागों की भी है। मप्र कैडर के अफसर पीडी मीणा को मोदी सरकार ने रक्षा मंत्रालय में भेजा, लेकिन उन्हें भूतपूर्व कर्मचारी कल्याण का काम मिला। जहां ऐसा करने को कुछ नहीं है जो मीणा की कार्य क्षमता को प्रदर्शित कर सके। मप्र में मुख्यसचिव स्तर के एक अफसर ने बताया कि दिल्ली के बजाए फिलहाल मप्र में काम करना बेहतर है। माना जा रहा है कि मोदी सरकार के कामकाज और इसे लेकर अक्सर होने वाली चर्चाओं के चलते अफसरों में दिल्ली आने को लेकर हिचक है। वहीं मप्र सरकार भी अफसरों की कमी के चलते अफसरों को अनुमति देने से बच रही है। स्थितियां यही रही तो जल्द ही केंद्र में सचिव स्तर के मप्र के अफसरों की संख्या दो रह जाएगी,क्योंकि सचिव सीमा प्रबंधन(गृह)स्नेहलता कुमार रिटायर हो गई हैं और सचिव सूचना प्रसारण बिमल जुल्का अगस्त में सेवानिवृत्त हो रहे हैं।
कुछ ऐसी ही स्थिति अन्य अहम मंत्रालयों की हैं। 'सुपर पीएमओÓ के मंत्रालयों पर नियंत्रण करने की कवायद पिछले साल नवंबर में मोदी के भरोसेमंद गुजरात कैडर के अधिकारी हसमुख अधिया की वित्त मंत्रालय में वित्तीय सेवा विभाग के सचिव के रूप में नियुक्ति से शुरू हुई। अधिया भारतीय प्रबंधन संस्थान के गोल्ड मेडलिस्ट हैं और उन्होंने योग में भी पीएचडी की है। मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के पसंदीदा 1985 बैच के आईएएस गिरीश चंद्र मूर्मू को वित्त मंत्रालय में व्यय विभाग का संयुक्त सचिव नियुक्त किया गया है। हालांकि, राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि उन्हें प्रवर्तन निदेशालय का निदेशक बनाने की तैयारी चल रही है। यह पद लंबे समय से खाली है। कुछ ही दिन पहले 1987 बैच के वरिष्ठ आईएएस राज कुमार को भी वित्त मंत्रालय में आर्थिक मामलों का संयुक्त सचिव नियुक्त किया गया। यह सब नियुक्तियां बड़े मंत्रालयों पर 'सुपर पीएमओÓ का दबदबा कायम करने के लिए किया गया है।
कई फैसलों में 'सुपर पीएमओÓ के हस्तक्षेप
जैसा कि सभी जानते हैं नरेंद्र मोदी का काम करने का तरीका संभवत: अलग है। मोदी ने 'सुपर पीएमओÓ के जरिए इन मंत्रालयों के कामकाज में पर्दे के पीछे से हस्तक्षेप ने फैसले लेने की गति धीमी कर दी है। मंत्रालय के अधिकारियों की जानकारी के बगैर इसमें कई अहम बदलाव कर दिए गए। कई अधिकारियों का कहना है कि अन्य मंत्रालयों में पीएमओ का इसी तरह का हस्तक्षेप सामान्य बात है। यही कारण है कि मोदी सरकार के सत्ता संभालने के 13 माह से अधिक होने के बावजूद अभी तक दिल्ली की नौकरशाही उनके कामकाज के तरीकों से सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाई है और मेक इन इंडिया अभियान सहित कई अहम परियोजनाएं अनिश्चय की स्थिति में हैं या फिर उनमें संतोषजनक प्रगति नहीं हुई है। पीएमओ की कार्यप्रणाली को अच्छी तरह जानने वाले एक आईएएस कहते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उन्हीं मंत्रियों और अफसरों की पट रही है जिनकी बुलेट ट्रेन रफ्तार वाली कार्यशैली है। लेकिन आलम यह है कि अधिकांश मंत्री बैलगाड़ी मिजाज वाले साबित हो रहे हैं। मंत्रियों की रफ्तार धीमी होने का खामियाजा अफसरों को भूगतना पड़ रहा है। उन विभागों के अफसर मोदी की पाठशाला में पास हो गए हैं जिने विभाग के मंत्री अपनी तरफ से पीएमओ में प्रस्ताव, नोट ले कर पहुंचते हैं। ये नरेंद्र मोदी के कहे आईडिया को लपकते हैं और तुरत फुररत प्रस्ताव बना कर पीएमओ को भेज देते हैं। इससे फैसले भी होते हैं और काम भी। एक और पेंच है। जो मंत्री ई मेल, ई-गर्वनेश को अपना रहे हैं वे पीएमओ से फटाफट काम करवा ले रहे हैं। जानकर आश्चर्य होगा कि मोदी के पीएमओ की कार्यसंस्कृति से बुनियादी परिवर्तन हुए हैं। ई-मेल, ई-गवर्नेश में प्रधानमंत्री निवास और पीएमओ दोनों धड़ल्ले से काम कर रहे हैं। नरेंद्र मोदी ई-मेल पर प्रस्ताव, नोट, ड्राफ्ट लेने-देने और उसी पर तुरंत मंजूरी का रिकार्ड बना रहे हैं। यदि मंत्री और उनके अफसरों ने ई-मेल से नोट, प्रस्ताव, मसला भेजा तो पीएमओ से तुरंत रिस्पोंस होगा। तुरंत काम होगा। और फाइलों के अंदाज में यदि मंत्रालयों से प्रस्ताव, नोट और मसले आए तो उनमें देरी मुमकिन है। इस हकीकत में अपने लिए हैरानी वाली बात यह है कि पुराने आला अफसर यानि पीएमओ के प्रमुख सचिव नृपेंद्र मिश्र, एके मिश्रा आदि कैसे ई-मेल, ई-गवर्नेंश में रम पा रहे होंगे
पीएमओ पर मंत्रालयों की निर्भरता!
केंद्र में पदस्थ बिहार कैडर के एक आईएएस कहते हैं कि नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री कार्यालय की गरिमा और उसकी खोई हुई ताकत लौटाई है। पिछली सरकार में कई सत्ता केंद्रों में से एक सत्ता केंद्र पीएमओ भी था, लेकिन आज यह इकलौता सत्ता केंद्र है। केंद्र सरकार के कामकाज की केंद्रीय कमान प्रधानमंत्री कार्यालय में होनी चाहिए, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। यह कमान सिर्फ निर्देश देने और निगरानी करने तक हो तो बेहतर है। लेकिन नरेंद्र मोदी की सरकार के मंत्री अपने हर काम के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय के भरोसे बैठे हैं। वे पीएमओ का मुंह ताकते हैं। फैसले करने से हिचक रहे हैं। और तभी मंत्रालयों के मामूली फैसलों की फाइलें प्रधानमंत्री के पास जा रही हैं। मंत्री पीएमओ का मुंह देख रहे हैं कि वहां से कोई निर्देश आए तो वे आगे बढ़ें। कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके दफ्तर ने अपने कंधों पर इतना बोझ ले लिया हैं जिससे अनिर्णय की स्थिति बनी हुई है मप्र कैडर के एक आईएएस कहते हैं कि संदेह नहीं है कि नरेंद्र मोदी और उनके दफ्तर ने देश-दुनिया की तमाम चिंताओं का बोझ लिया हैं। सबका साथ, सबका विकास के साथ सबका काम खुद करने का भी पीएमओ का अंदाज हैं। जाहिर है कई मंत्री बात-बात के लिए पीएमओ की तरफ देखते हैं। पीएमओ पहल करे और कहे तो बात आगे बढ़ेगी। ऐसे में विभिन्न विभागों की कमान संभाल रहे नौकरशाह भी पंगू बने हुए हैं। इसका परिणाम यह हो रहा है कि कई विभागों में तो काम ही नहीं हो रहा है। मंत्रियों के पीएमओ पर निर्भर होने का एक नतीजा यह हुआ है कि प्रधानमंत्री कार्यालय पर बहुत ज्यादा बोझ बढ़ गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी रूचि से बुनियादी ढांचे के विकास, आर्थिक महत्व के मसलों और विदेशी मामलों में लगे रहते हैं। उन्होंने अपने आप को कूटनीति और उसके जरिए देश की अर्थव्यवस्था में जान फंूकने के काम में लगाया है। लेकिन इनके अलावा छोटे-छोटे मसलों की भी उनके पास भरमार हो गई है। वेहर महीने बुनियादी ढांचे से जुड़े मंत्रालयों की बैठक कर रहे हैं और समीक्षा कर रहे हैं। गंगा की सफाई पर वे बैठक कर रहे हैं। यहां तक की खेल से जुड़े मामूली फैसलों की फाइल भी उनके पास जा रही है। ऐसे में इन विभागों के मंत्रियों औश्र अफसरों के पास अपने स्तर पर काम करने के लिए कुछ भी नहीं है।
खेमों में बंटने लगे हैं ब्यूरोक्रेट्स !
जैसे-जैसे केंद्र में गुजरात कैडर के आईएएस का रूतबा बढ़ता जा रहा है वैसे-वैसे ब्यूरोक्रेसी क्षेत्रीय और जातीय खेमों में बंटती जा रही है। सरकार के हिसाब से ही अफसर भी आते-जाते रहते हैं। यूपीए सरकार में यूपी, बिहार, महाराष्ट्र, राजस्थान और मप्र के अफसरों का बोलबाला था वहीं मोदी सरकार में हर जगह गुजरात कैडर के अफसरों का रूतबा बढ़ता जा रहा है। केंद्र में पदस्थ मप्र कैडर के एक आईपीएस का दावा है कि केंद्र में हमेशा से कायस्थ लॉबी, बनिया लॉबी और ब्राह्मण लॉबी प्रभावशाली बनी रहती है। जिन अफसरों के कामकाज की तारीफ होती भी है तो वह उनके काम की मेरिट से ज्यादा किसी और वजह से होती है। वह कहते हैं कि जो आईएएस अफसर मंत्रियों के करीबी रहते हैं, उन्हें मनचाही पोस्टिंग मिलती रहती है। यहां तक कि रिटायरमेंट के बाद भी इन अफसरों की सेवा बढ़ती रहती है। इसके अलावा उन अफसरों को भी मलाईदार पोस्टिंग मिलती है जो पैसा खर्च कर सकते हैं। रिटायर्ड आईएएस प्रोमिला शंकर ने अपनी किताब 'गॉड ऑफ करप्शनÓ में ब्यूरोक्रेसी में तो जातीयता पर भी सवाल भी खड़े किए हैं।
सिविल सर्विसेज बोर्ड बनाने की मांग
राजनीतिक हस्तक्षेप से बार-बार तबादलों से अजीज आ चुके अफसरों ने प्रदेश में सिविल सर्विसेज बोर्ड बनाने की मांग तेज कर दी है। इसकी सबसे पहले अवाज राजस्थान कैडर के अफसरों ने उठाई है। राजस्थान कैडर के आईएएस समित शर्मा ने सिविल सेवा के अफसरों के ट्रांसफर पोस्टिंग के लिए सिविल सर्वे बोर्ड बनाने की मांग की। शर्मा ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट फैसला दे चुका है कि सिविल सेवा अफसरों के ट्रांसफर पोस्टिंग के लिए सिविल सर्विसेज बोर्ड होगा। उन्होंनेे राजनीतिक आधार पर तबादलों पर सवाल उठाते हुए सिविल सेवा अफसरों का कार्यकाल तय करने की मांग उठाई।
विदेशों में जम गए आईएएस की होगी छुट्टी
अब उन आईएएस अफसरों की खैर नहीं है जो विदेश दौरे पर गए लेकिन लौट कर नहीं आए। मोदी सरकार अब ऐसे अफसरों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर रही है। कुछ आईएएस सरकारी नौकरियों में डेप्युटेशन पर विदेश गए और वहां करोड़ों के पैकेज पाकर दूसरी नौकरियों में जम गए। उन्हें इतनी भी फुरसत नहीं मिल सकी कि वह नौकरी छोडऩे की औपचारिकता निभा सके। डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनल ऐंड ट्रेनिंग के अनुसार इस तरह के मिसिंग आईएएस की संख्या लगभग 20 है। ये ऐसे आईएएस है, जो सरकारी नौकरियों में डेप्युटेशन पर विदेश गए, लेकिन न तो निश्चित समय में लौटे और न ही कोई सूचना दी। सरकार अब उन्हें नौकरी से बर्खास्त करने की तैयारी कर रही है। एक ऐसे ही आईएएस प्रशांत को सरकार ने हटा दिया। सरकार ने उन्हें हटाने का औपचारिकता आदेश जारी कर दिया। 1988 बैच के बिहार के प्रशांत पश्चिम बंगाल कॉडर के आईएएस थे। इन्हें 2009 में मिनिस्ट्री ऑफ पेट्रोलियम की ओर से वॉशिंगटन में डेप्युटेशन पर भेजा गया था। वहां से उन्हें एक साल बाद लौटना था, लेकिन सूत्रों के अनुसार उन्होंने वहां एक बड़ी मल्टिनेशनल कंपनी में बड़े पैकेज पर नौकरी पकड़ ली। सरकार ने उन्हें कई बार तलाशने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं मिले। इसके बाद सरकार ने उन्हें मिसिंग आईएएस के लिस्ट में शामिल कर दिया और अंतत: हटा दिया।
आईएएस नियुक्ति के बाद कितना कमाया बताना होगा
अखिल भारतीय सेवा के प्रत्येक अफसर को अब अचल संपत्ति ही नहीं, बल्कि अब चल संपत्ति का भी लेखा-जोखा हर वर्ष सरकार को प्रस्तुत करना होगा। खासकर आईएएस, आईपीएस तथा आईएफएस की नियुक्ति के समय उसके नाम पर कितनी संपत्ति थी और आज वह बढ़कर कितनी हो गई है। पत्नी, पुत्र-पुत्री और आश्रितों के नाम पर कितनी संपत्ति है, उनके नाम पर बैंक में कितना पैसा जमा है, जमीन, बीमा पालिसी, बैंक में जमा बॉंड, वाहन मकान आदि का ब्यौरा भी अब बताना होगा। 31 मार्च तक लेखा-जोखा केंद्र सरकार ने लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम के तहत अफसरों को हर वर्ष पहली जनवरी की स्थिति में इसका लेखा-जोखा देना होगा। जीएडी ने इस मामले में अफसरों से 31 जुलाई तक उक्त प्रावधानों के तहत जानकारी मांगी है। केंद्रीय कार्मिक, लोक शिकायत तथा पेंशन मंत्रालय ने प्रत्येक लोक सेवक, यथास्थिति, लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम 2013 की धारा 44 की उपधारा (2)या उपधारा (3)के अधीन अपनी आस्तियों और दायित्वों की घोषणा करेगा। प्रत्येक लोक सेवक उस वर्ष की 31 जुलाई को या उसके पूर्व लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियमों के अंतर्गत सक्षम प्राधिकारी को प्रत्येक वर्ष के 31 मार्च को अपनी संपत्ति के विषय में घोषणा, सूचना या विवरणी फाइल करेगा। इन अधिनियमों में 26 दिसंबर 2014 को प्ररूप 2 एवं 4 में आंशिक संशोधन भी किए गए है। तीनों अखिल भारतीय सेवा के अफसरों को अपनी संपत्ति के बारे में जानकारी हिंदी और अंग्रेजी दोनों में से किसी एक भाषा में देना होगा। इस मामले में सामान्य प्रशासन विभाग ने प्रदेश के सभी आईएएस अफसरों से 31 जुलाई तक जानकारी मांगी है।
संपत्ति का ब्योरा नहीं दे रहे मप्र के आईएएस
मध्यप्रदेश संवर्ग के भारतीय प्रशासनिक सेवा के करीब 5 दर्जन अधिकारियों ने अभी तक अपनी चल-अचल संपत्ति का ब्योरा नहीं दिया है। सामान्य प्रशासन विभाग की वेबसाइट में आईएएस अधिकारियों की संपत्ति का ब्योरा अपलोड करने का प्रावधान है। लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम के तहत अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों को हर साल अपनी चल-अचल संपत्ति का ब्योरा देना अनिवार्य है। सामान्य प्रशासन विभाग की वेबसाइट के मुताबिक वित्तीय वर्ष 2014 में जिन आईएएस अफसरों ने अपनी चल-अचल संपत्ति का ब्योरा नहीं दिया है, उनमें प्रमोद अग्रवाल, संजय दुबे, शिवशेखर शुक्ला, चंद्रहास दुबे, एसके पाल, फैज अहमद किदवई, मुकेश चंद गुप्ता, कमता प्रसाद राही, पवन कुमार शर्मा, शशि कर्णावत, सुरेंद्र कुमार उपाध्याय, विवेक कुमार पोरवाल, नीरज दुबे, कैलाशचंद जैन, श्याम सिंह कुमरे, पी नरहरि, सीबी सिंह, राजेंद्र सिंह, राजेश बहुगणा, अजीत कुमार, पीके गुप्ता, डी बी पाटिल, नरेंद्र सिंह परमार, एम के शुक्ला, जॉन किग्सले, लोकेश कुमार जाटव, शेखर वर्मा, अशोक कुमार वर्मा, आरके जैन, एनएम विभीष्ण, छवि भारद्वाज, नंद कुमरे, अविनाश लवानी, गणेश शंकर मिश्रा, कर्मवीर शर्मा, एसपी मिश्रा, विजय कुमार जे, बी विजय दत्ता, हर्षिका सिंह, नीरज कुमार सिंह, पंकज जैन, अजय कटेसरिया, निधि निवेदिता, रोहित सिंह, एस सोमवंशी, प्रवीण सिंह अधयच, अनुराग वर्मा, एफ राहुल हरिदास, राजीव रंजन मीना, बी कार्तिकेय, गिरिश कुमार मिश्रा, सोनिया मीना,हर्ष दीक्षित, सोमेश मिश्रा, प्रियंका मिश्रा, मयंक अग्रवाल, फ्रेंक नोबेल, संदीप जीआर आदि शामिल है।
सामान्य प्रशासन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक निर्धारित समय-सीमा में चल-अचल संपत्ति का ब्योरा नहीं देने पर संबंधित अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है। उनकी गोपनीय चरित्रावली में भी इसका उल्लेख किया जा सकता है। चल-अचल संपत्ति का ब्योरा नहीं देने वाले अधिकारियों की पदोन्नित रोके जाने का प्रावधान है।
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