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भेड़ाघाट

Saturday, March 6, 2010

'म से परेशान महेश दादा

-विनोद उपाध्याय

सूर्यग्रहण का हमारे जीवन में क्या महत्व है? आज राजनीति की जबान पर गाली और हाथ में लाठी क्यों है? स्कूलों में सेक्स की शिक्षा जरूरी क्यों नहीं? यह सब सवाल अब उस आदमी के जीवन में कोई मायने नहीं रखते जो इनका रचयिता है। उस सख्स का नाम है महेश सिंह जिसे मजबूरी में 'दादाÓ कहना पड़ता है। सूत्रों (पत्रकार हूं इसलिए लिखना जरूरी है) की माने तो वह धरती के सबसे परेशान जीव है ,जिसकी खोज में मुझे वर्षों लग गए।
मुझे याद है कि मैं जब भी अपने भतीजे राज को पढऩे के लिए डांटता था तो वह जेनरल नॉलेज के सवालों की झड़ी लगाकर मेरी बोलती बंद कर देता था। उसके सवाल पर सवाल फिर जवाब सुन-सुनकर मैं यह तो जान गया हूं कि धरती पर सबसे बड़ा और छोटा जीव कौन है। लेकिन उस दिन तब हद हो गयी जब उसने मुझसे पुछ लिया धरती पर सबसे परेशान जीव कौन है? इस सवाल का जवाब न उसने दिया और न मैंने ही पुछने की हिम्मत की। हालांकि गाहे-बगाहे अजीजों के बीच इस प्रसंग को उठाकर जवाब जानने की कोशिश तो खुब की लेकिन कोई जवाब नहीं मिल सका। लेकिन जब से महेश दादा का साक्षात्कार हुआ है ऐसा लगता है जैसे भतीजे के सवाल का जवाब मिल गया।
दादा के पास तो परेशानियों का अंबार है लेकिन जानकारों की मानें तो आज-कल वे तीन 'मÓ से परेशान है। इनमें से पहला 'मÓ है मेहरारू (स्त्री),जिसका उनके लाईफ में कोई महत्व नहीं है, फिर भी वह है। ऐसा भी नहीं की उनकी गृहस्थी में कोई खोट हो। सब कुछ मजे में चल रहा है। फिर भी जाने क्या बात है, दादा ने जब से उम्र का आधा सैकड़ा पूरा किया है सुबह-सुबह बहुत बन-ठनकर घूमने निकल जाते हैं। पिंक शर्ट और बालों में गुलाबी रंग, क्या हो गया दादा को? यह बात सबको मालूम है कि उन्हें महिलाओं जैसे रंग बहुत पसंद हैं। लेकिन उस दिन समझ में आया कि वह रोज बालकनी में खड़े होकर क्यों गाते थे कि आदमी हूं, आदमी से प्यार करता हूं।
मैंने हिम्मत करके एक दिन दादा से पूछ लिया आदमी हूं, आदमी से प्यार करता हूं का क्या मतलब है? वे उबल पड़े और बोले भाई साहब मैं तो खुद भगवान से पूंछता हूं कि हे सृष्टि के पालनहार ब्रह्मा, इतना तो बता दीजिए कि अब सृष्टि का निर्माण होगा कैसे? आज का इनसान तो आपके बनाए नियमों को ही तोडऩे लगा। आदमी अगर आदमी से ही शादी कर लेगा, तो कौन बनेगा मम्मी? कौन बनेगा डैडी? कोई कैसे किसी को ललकार कर कह सकेगा कि मां का दूध पिया है, तो आ-जा अखाड़े में। मुझे तो लगता है, लड़कियों ने आजकल लड़कों को नखरे दिखाने शुरू कर दिए हैं और वे आपस में विवाह करने लग गई हैं, या फिर लड़कियों को गिफ्ट दे-देकर लड़के थक गए हैं।
मैंने पूंछ लिया इससे आपके इस रूप का क्या लेना-देना?
वे बोले,दर्द को समझने के लिए चोट का एहसास जरूरी है। मेरे इस व्यवहार से सभी (स्त्री-पुरूष)का सानिध्य आसानी से मिल रहा है। मैंने तो यहां तक पत्ता लगा लिया है कि अब कोई भी अभिभावक अपनी लड़की को दूसरी अन्य लड़की के साथ घुमने जाने देना पसंद नहीं कर रहे हैं। पहले बचपन में मां पूछती थी कि बेटी, तू किसके साथ सिनेमा जा रही है? प्रेमा और उमा के साथ जाने की तुरंत परमिशन मिल जाती थी। मगर माता-पिता आज क्या करेंगे, जब बेटी अपनी ही सहेली को सूट-बूट पहना दूल्हा बना घर ले आए ?
मुझे दादा की बात में दम दिखा लेकिन केवल स्त्री लिंग के खिलाफ उनकी ऐसी संभावना को गलत ठहराने के उदेश्य से मैंने कहा,ऐसा भी तो हो सकता है कि बेटा अपने ही दोस्त को साड़ी पहनाकर दुल्हन बनाए।
दादा भड़क उठे। बोले, अभी तक एक भी ऐसा मामला सामने नहीं आया है जबकि लड़कियों के आधा दर्जन मामले तो आपके मध्यप्रदेश में ही गिना सकता हूं। इस मामले में दादा से आगे बात करना मधुमक्खी के छाते में हाथ डालना होगा,इस लिए टॉपिक बदलना ही ठीक होगा।
दादा की परेशानी का सबब दूसरा 'मÓ मंहगाई है। वे कहते है महंगाई के सितम की ढोलक हमारे बाबा के जमाने में भी बजती थी। पिताजी के समय यह ढोल सरीखा पीटा जाता। अब यह नगाड़े की ध्वनि को प्राप्त है। सरकार के मनमोहनी वादों और सौ दिन की कवायद में इसके ताप से कितनी राहत मिलेगी, यह तो मनमोहन (कृष्ण) भी न जानें।
दादा बोले एक घटना याद आ रही है-हमारे गांव में एक सज्जन अपनी बेटी की ग्रोथ को लेकर पर्याप्त चिंतित थे। मित्रों से परामर्श किया, तो सुझाव परोसा गया कि बेटी का नाम बदल कर 'महंगाईÓ रख दो। बताते हैं कि वह सूखी-सी लड़की इस नामकरण के उपरांत यकायक तरूणी की गति को प्राप्त हो गई।
महंगाई सस्ती का उत्कर्ष है। इसकी छौंक लगते ही 'सस्तापनÓ दूर हो जाता है। वह बढ़ती नहीं, सप्रयास बढ़ाई जाती है। वह तोड़ती आमदनी है, आरोप लगता है 'कमर तोडऩेÓ का । महंगाई का मजा तो तब आवे, जब आलू चालीस रूपये और प्याज सत्तर रूपये 'दर्जनÓ बिके । महंगाई एक परंपरा है। इसका गौरवपूर्ण अतीत था, हाहाकारी वर्तमान है।
तीसरा 'मÓ है मानसून, जो घर से चला तो था ठीक-ठाक, लेकिन अपनी मस्ती में भटक रहा है। इधर आने का नाम ही नहीं लेता। कभी-कभी आता भी है, तो ठहरता नहीं। दादा की माने तो मेहरारू, महंगाई और मानसून में एक भावात्मक रिश्ता है।
मानसून लेट हुआ नहीं कि उसकी आड़ में महंगाई उछलना शुरू कर देती है और मेहरारू के तानों की बरसात होने लगती है। तीनों के सितम मामूली आदमी ही उठाता है। माननीयों पर इसका कोई असर नहीं पड़ता।

फर्जी अफसरों से हारी सरकार

मध्यप्रदेश में अब तक 250 अधिकारयों कर्मचारियों के फर्जी जाति प्रमाण पत्र से सरकारी नौकरी हासिल करने का पता चला है। इनमें डॉक्टर, इंजीनियर, इनकम टैक्स आफसर, एसडीओ और थानेदार से लेकर रेल, वन और भेल में ऊंचे पदों पर बैठे अफसर तक शामिल हैं। प्रदेश के ये 250 फर्जी अफसर सरकार पर भारी पड़ रहे हंै। पहले इन्होंने फर्जी प्रमाण पत्र से सरकारी नौकरियां हासिल की और अब ऊंचे ओहदों पर पहुंचकर सरकार को अंगुलियों पर नचा रह हैं। उनके फर्जी होने के प्रमाण मिलने के बाद भी न तो शासन उन्हें बर्खास्त कर पा रहा है और न ही उनसे वसूली।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गठित उच्च स्तरीय छानबीन समति इनमं से 21 को नौकरी से निकालने और उस पर अपराध दर्ज करने के निर्देश दे चुकी है। हालही में हाईकोर्ट ने भी शासन को फटकार लगाई और कार्रवाई के लिए 21 दिन का अल्टीमेटम दिया है। बावजूद अफसरों के कानों पर जूं नहीं रेंग रही।
सूत्र बताते हैं कि इनमें से 21 उच्च और निम्न अधिकारियों के खिलाफ 20 सितंबर 06 को ही उच्च स्तरीय छानबीन समिति ने बर्खास्त कर अपराध दर्ज कराने, फर्जी जाति प्रमाण पत्र और उनके माध्यम से बनवाए गए दस्तावेज जब्त करने और सरकारी सुविधाओं का लाभ उठाने के बदले वसूली करने के आदेश जारी कर दिए थे। प्रमुख सचिव पिछड़ा वर्ग एवं विकास विभाग की अध्यक्षता वाली इस समिति के निर्देशों को जिला कलेक्टर, एसपी और संबंधित विभाग प्रमुखों ने रद्दी की टोकरी में डाल दिया है। इन पर कार्रवाई हो भी नहीं पाई और समिति के पास अन्य 65 लोगों के फर्जी प्रमाण पत्र के सहारे नौकरी में आने की शिकायत मिल गई। छानबीन समिति को जांच में इनके खिलाफ भी प्रमाण मिल गए हैं। समिति के निर्देश के बावजूद कार्रवाई नहीं होने पर पिछले महीने उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका लगाई। इस पर मुख्य न्यायाधीश आनंद कुमार पटनायक ने शासन को जमकर फटकार लगाते हुए 21 दिन में कार्रवाई कर रिपोर्ट मांगी है हाईकोर्ट द्वारा दी गई समय-सीमा भी गत दिवस समाप्त हो गई लेकिन अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है।
उच्च स्तरीय छानबीन समिति ने कोलार नगर पालिका के वार्ड क्रमांक आठ के कांग्रेस पार्षद भैरो सिंह यादव और नगर पालिका अध्यक्ष मुन्नी यादव के पति मंगल सिंह के खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज करने के निर्देश के बाद फर्जी प्रमाण पत्र से आरक्षित सीट पर चुनाव लडऩे का धोखाधड़ी करने का प्रकरण कोलार थाने में दर्ज किया गया है।

मंत्रालय के 39 अधिकारी-कर्मचारी जांच के घेरे में

फर्जी जाति प्रमाण-पत्र को लेकर जारी जांच को पलीता लगाने राज्य मंत्रालय के आला अफसर सक्रिय हैं। फलत: शिकायत के पौने तीन वर्ष बाद भी जांच की गति बेहद मंथर है, जबकि शीर्ष अदालत के निर्देश पर ऐसे मामलों के त्वरित निराकरण के लिए एक उच्चस्तरीय समिति गठित है, लेकिन प्रकरण का निपटारा वह भी आदर्श समय में कर पाने में असहाय साबित हुई है। यह मामला 14 दिसम्बर, 2006 को तब आरंभ हुआ, जब सत्तारूढ़ दल भाजपा के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता ने शिकायत की कि वल्लभ भवन में 39 शासकीय सेवक अनुसूचित जनजाति फर्जी प्रमाण-पत्र के आधार पर सेवारत हैं। इससे सचिवालय हरकत में तो आया, लेकिन उसके बाद प्रकरण शनै: शनै: दबता रहा। इसका कारण यह भी है कि शिकायत में दस आला अफसर भी आरोपित हैं। लिहाजा शिकायत को मरणासन्न बनाए रखने हेतु उच्च स्तर पर कवायद जारी है, बावजूद इसके गत मई माह में सामान्य प्रशासन विभाग ने गोपनीय रूप से एक आवश्यक जांच बिठा दी। संगणकीय कूट संकेत पीजी 9337146/06/15 पर दर्ज जनशिकायत के आधार पर जारी इस जांच के दौरान मंत्रालय में कम से कम एक दर्जन अन्य अधिकारी-कर्मचारियों के जाति प्रमाण-पत्र विवादों और आरोपों के घेरे में आ चुके हैं, लेकिन सचिवालय अभी तक कोई भी ऐसी पारदर्शितापूर्ण प्रक्रिया या कार्रवाई अंगीकार नहीं कर सका है, जिससे संदेह के बादल छंट सकें और मंत्रालय के इतिहास में यह पहली बार है, जब सैकड़ों की संख्या में जाति प्रमाण-पत्र शंकाओं के घेरे में आ चुके हैं।

वन अधिकार कानून का जंगल राज

अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वन निवासी अधिनियम के तहत आदिवासियों, वनवासियों को मैदान में अधिकार पत्र देने के काम में भले तेजी न आई हो लेकिन राज्य सरकार कागजी कार्रवाई में लगातार प्रगति कर रही है। यही वजह है कि कानून के तहत 3 लाख 71 हजार 93 वनवासियों एवं आदिवासियों ने वन अधिकार पत्र के लिए अपने दावे प्रस्तुत कर दिए हैं। सर्वाधिक 80 हजार 696 दावे इंदौर संभाग में प्राप्त हुए हैं। इतना ही नहीं वन अधिकार समितियों द्वारा तीन लाख 55 हजार 851 दावे सत्यापित किए जा चुके हैं। साथ ही ग्रामसभा द्वारा तीन लाख 49 हजार 482 तथा उपखण्ड स्तर समिति द्वारा तीन लाख पांच हजार 543 संकल्प पारित किए गए हैं। इसके अलावा जिला स्तरीय समिति द्वारा दो लाख 69 हजार 14 प्रकरणों का निराकरण किया गया है।
बरातीलाल इस वन अधिकार कानून के अकेले शिकार नहीं हैं। गांव के दूसरे लोगों के साथ भी यही हुआ। सिवनी जिले की आमागढ़ पंचायत के नन्हीं कन्हार गांव में सभी परिवारों को ढ़ाई हेक्टेयर भूमि पर अधिकार का दावा करने के लिये बाध्य किया गया, जबकि उन्हें कानूनन 4 हेक्टेयर जमीन पर दावे का अधिकार था। यहां 29 परिवार हैं किन्तु 18 परिवारों को ही दावे करने दिये गये और यह बताया गया कि इस गांव में 1980 से मौजूद परिवारों को ही अधिकार पत्र मिलेंगे। इसका परिणाम यह हुआ कि बरातीलाल आदिवासी के परिवार से अलग होकर बने पांच नये परिवारों के पास दावा करने की स्वतंत्रता नहीं रह गई। ये सभी मिलकर 30 एकड़ जमीन वर्षों र्से जोत रहे हैं किन्तु अब इन 6 परिवारों को 6.25 एकड़ तक ही सीमित कर दिया गया। सवाल यही है कि क्या 24 सदस्यों के ये परिवार जीवित रह पायेंगें सवा छह एकड़ की खेती से अपना गुजारा कर पाएंगे ?
वन अधिकार कानून के क्रियान्वयन के लगभग डेढ़ साल के अनुभव यह बताते हैं कि अब भी आदिवासियों और वनों में रहने वाले अन्य परम्परागत वन निवासियों को ऐतिहासिक अन्याय से सीमित मुक्ति देने की कोशिशें हो रही हैं। विगत डेढ़ सौ सालों में सरकार ने सुनियोजित ढंग से वन विभाग को जंगलों का मालिक बनाने की पुरजोर कोशिशें की परन्तु उसका विरोध होता रहा। चूंकि आदिवासियों सहित कई अन्य गैर आदिवासी समुदाय वनों में और वन्यजीवन के साथ सह-जीवन की पद्घति से जीवन जीते रहे हैं। वन विभाग ने वनों पर अपना कब्जा स्थापित करने के उद्देश्य से सह-जीवन के इस समीकरण को बल और भेद के माध्यम से तोडऩे की लगातार कोशिश की। जाहिर है, आदिवासी समाज आज भी वन विभाग को एक जिम्मेदार और सहृदय विभाग नहीं मानता है।
यही कारण है कि भारत सरकार ने यह मानते हुये कि आदिवासियों के साथ हुये ऐतिहासिक अन्याय की क्षतिपूर्ति वन विभाग की कार्यशैली के जरिये नहीं की जा सकती है। वर्ष 2005 में बने इस कानून के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी आदिवासी कल्याण मंत्रालय को सौंपी। इतना ही नहीं इस कानून के नियम और प्रक्रियाओं में भी वन विभाग की भूमिका को बेहद सीमित रखा गया परन्तु मध्यप्रदेश में संकट यह है कि वन विभाग के प्रभुत्व और बल के सामने आदिवासी विकास विभाग व्यावहारिक रूप से पनप ही नहीं पाया।
वन विभाग के अफसर ग्राम सभाओं और वन अधिकार समितियों की बैठकों में जाकर कानून के बारे में भ्रम की स्थिति पैदा कर रहे हैं। कन्हार गांव के ही सुखराम भलावी बताते हैं - हमें तो यह नहीं बताया कि गांव का हर वह स्वतंत्र परिवार दावा लगा सकता है, जो वन भूमि जोत रहा है। हमें तो उन्होंने रिकार्ड से बताया कि बस 18 परिवार के दावे लगेंगे। अब रोना आता है यह सोचकर कि बेटे-भाइयों के लिये जमीन नहीं बचेगी। जब सरकार ही ऐसा कर रही है तो फिर किस पर विश्वास करेंगे?
ऐसा नहीं है कि नन्हीं-कन्हार गांव में भूलवश ऐसा हुआ है। यहां तो बड़े पैमाने पर सरकार ने विसंगतियां पैदा की हैं। वन विभाग यह मानकर चल रहा है कि वन अधिकार कानून के तहत केवल उन्हीं 1.50 लाख परिवारों को जंगल की 2.5 लाख हेक्टेयर जमीन पर अधिकार दिया जाना चाहिये, जिनकी जानकारी उसके यानी वन विभाग के रिकार्ड में अतिक्रमणकारी के रूप मे दर्ज है।
वास्तविकता यह है कि वन विभाग के जमीनी अमले ने बहुत से अतिक्रमणकारी परिवारों की जानकारी को रिकार्ड में आने ही नहीं दिया है क्योंकि यदि वे सभी वास्तविक अतिक्रमणकारियों की रिपोर्ट अपने आला अफसरों के दिखाते तो उन पर सवाल उठते कि इतने अतिक्रमणकारी जंगल में क्यों हैं?
ऐसे में जमीनी अमला उन्हें बिना रिकार्ड में दर्ज किये बार-बार बेदखल करता रहा, झोंपड़े तोड़ते रहा और यह कभी कानून का सवाल नहीं बना क्योंकि जिन परिवारों की मौजूदगी के प्रमाण नहीं हैं, उनकी बेदखली तो हो ही नहीं सकती। कानून तो सबूत मांगता है। एक मुसीबत यह भी है कि इस कानून के तहत समुदाय को जंगल पर अपने सामाजिक अधिकार को सिद्घ करने के लिये स्वयं प्रमाण प्रस्तुत करने को कहा गया है। अन्याय के शिकार आदिवासियों को सिद्घ करना है कि उनके साथ अन्याय हुआ है, यह कानून की दूसरी विसंगति है।
सरकार में पिछले 60 से ज्यादा वर्षों से बाजिब-उल-अर्ज और निस्तार पत्रकों में समुदाय के संसाधनों के अधिकार, विस्तार और दायरे स्पष्ट रूप से दर्ज किये जाते रहे हैं। हर गांव की जानकारी सरकार के रिकार्ड रूम में मौजूद है, जिनसे पता चलता है कि गांव का समाज कौन से जंगल का निस्तार के लिये, जड़ी-बूटी के लिये, आवागमन के लिये, देवता की पूजा के लिये, लकड़ी के लिये या लघुवनोपज के लिये उपयोग करता रहा है।
कानून भी कहता है कि ये तमाम दस्तावेज ग्रामसभा और वन अधिकार समिति को सौंप दिये जाने चाहिये परन्तु नियम यह बना दिया गया है कि यदि कोई ग्राम सभा या समिति मांगेगी तब ही कुछ दस्तावेज उन्हें दिये जायेंगे। इस कानून के तहत अधिकारों के लिये दावा करने की प्रक्रिया भी आदिवासियों के अनुरूप नहीं है। 13 पृष्ठों के फार्म को भरने के साथ-साथ प्रमाण प्रस्तुत करने की तकनीक से गांव के लोग अनजान है।
नन्हीं कन्हार गांव के बराती लाल बाताते हैं -वन विभाग के बीटगार्ड, रेंजर और पटवारी गांव में आये तो उन्होंने ही बताया कि सभी पुराने परिवारों को ढ़ाई-ढ़ाई हेक्टेयर जमीन मिलेगी और इसके लिये फार्म पर अंगूठे लगवाये, हस्ताक्षर करवाये। हमें तो पता ही नहीं कि उस पर क्या लिखा था? फिर पता चला कि हमारी आधी से ज्यादा जमीन कब्जे से चली गई। यह तो हक छीनने वाला कानून है।
वन अधिकार मान्यता कानून में प्रावधान है कि पूर्व में किसी भी कारण से बेदखल या विस्थापित किये गये परिवारों के वन अधिकारों को भी मान्यता दी जायेगी, जिनका जबरिया विस्थापन किया गया है या सही पुनर्वास नहीं किया गया है किन्तु मध्यप्रदेश के पालपुर-कूनों अभ्यारण्य और पन्ना राष्टï्रीय अभ्यारण्य के 635 परिवारों की स्थिति अभी बेहद असहज बनी हुई है।
पालपुर-कूनों अभ्यारण्य के 187 परिवार तो 6 सालों में 7 बार विस्थापित किये गये हैं। वे यह नहीं जान पा रहे हैं कि आखिर वे अपने दावे कहां, किस जमीन पर और कैसे करेंगे। यह एक बड़ा मसला है क्योंकि मध्यप्रदेश में विगत 50 वर्षों र्में 10 लाख परिवार विस्थापित किये गये हैं, जिनमें से 38 प्रतिशत ग्रामीण आदिवासी परिवार हैं। इन्हें नजरंदाज किये जाने का मतलब है कि परिवार ऐतिहासिक अन्याय के शिकार बने रहेंगे और आजीविका के अधिकार से वंचित हो जायेंगे।
नियम यह कहता है कि यदि किसी भी दावेदार के दावे को निरस्त किया जाता है तो उसे कारण सहित सूचित किया जायेगा। छिंदवाड़ा जिले के हर्रई विकासखण्ड में आने वाले भुमका पंचायत में 136 परिवारों ने वन भूमि पर अधिकार के लिये दावे किये थे परन्तु 132 के दावे निरस्त हो गये। वन विभाग के कर्मचारियों ने बताया था कि उन्हें जमीनों से बेदखल कर दिया जायेगा। इससे पहले न तो उन्हें सूचित किया गया और न ही यह बताया गया कि वे फिर से सही तरीके से दावे दर्ज करायें।
सिवनी जिले की शाखादेही पंचायत की सरपंच बेलाकली उइके को केवल इतना बताया गया है कि ढ़ाई हेक्टेयर तक के अधिकार के लिये व्यक्तिगत दावे लगवायें, इसके अलावा उन्हें कोई अन्य जानकारी नहीं दी गई। ऐसे में पंचायतों और सरपंच से सार्थक भूमिका निर्वाह करने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। यही कारण है कि अब तक 40 हजार से ज्यादा दावे निरस्त हो चुके है। सामाजिक संगठन् मध्यप्रदेश लोक संघर्ष साझा मंच द्वारा तीन जिलों छिंदवाड़ा, सिवनी और झाबुआ में कराये गये एक अध्ययन से पता चला है कि 81 प्रतिशत सरपंच और 97 प्रतिशत दावेदार ग्रामीणों को यही जानकारी है कि वन विभाग इस कानून का सर्वेसर्वा है। दिक्कत यह है कि यह विभाग सुनियोजित ढंग से वन अधिकार कानून की प्रक्रिया को अपने कब्जे में ले चुका है। नाकेदार, बीटगार्ड और डिप्टी रेंजर की मौजूदगी में ग्रामसभा की बैठक से लेकर तमाम दूसरी कार्यवाहियों हो रही हैं और आदिवासी विकास विभाग की भूमिका केवल ऐसे आदेश-दिशा निर्देश जारी करने तक सीमित रह गई है, जो ग्राम पंचायतों और दावेदारों तक पहुंच ही नहीं रहे हैं। यह तय था कि व्यक्तिगत और सामुदायिक दावे करने की प्रक्रिया को जमीनी स्तर पर लागू करने के लिये हर गांव के स्तर पर वन अधिकार समिति का गठन ग्रामसभा में किया जायेगा। जिसमें वन विभाग की कोई भूमिका नहीं होगी। गांव के दावेदारों से पता चलता है कि वन विभाग द्वारा पहले से बनवाई गई वन सुरक्षा समिति से ही सारे काम करवाये गये और उस समिति के अध्यक्ष सुखराम भलावी को यह पता ही नहीं चलने दिया गया।
वन विभाग ही वन सुरक्षा समिति को पूरी तरह से नियंत्रित करती है। चूंकि इनके बीच आर्थिक लेन-देन भी होता है, इसलिये समिति पूरी तरह से विभाग के प्रभुत्व में ही काम करती है। लोक संघर्ष साझा मंच के अध्ययन से यह भी पता चला कि 37 प्रतिशत वन सुरक्षा समितियों को ही वन अधिकार समिति में बदल दिया गया।
डेढ़ साल पहले तक माना जा रहा था कि आदिवासियों और अन्य वन निवासियों की वर्तमान स्थिति को बदलने में वन अधिकार मान्यता कानून अहम् भूमिका निभा सकता है लेकिन इसके क्रियान्वयन के तौर-तरीकों ने इस कानून को विफलता के घेरे में खड़ा कर दिया है, जिस पर अभी सोचने का समय कम से कम सरकार के पास तो नहीं ही है।

Saturday, February 27, 2010

बाघों के बाद निशाने पर वन

वनों के संवर्धान और संरक्षण का उत्तरदायित्व राज्यों में वन विभाग के अमलों का होना है। वनों के रखरखाव के लिए तैनात भारी भरकम शासकीय कर्मियों की फौज होते हुए भी जिस पैमाने पर वनों का विकास होना चाहिए, वह नहीं हो पा रहा है। उल्टे, यह हो रहा है कि जंगलों की कटाई और वनोपजों की निरंतर हो रही चोरियों के कारण वनों के क्षेत्रफल घटते चले जा रहे हैं। रसूखदारों द्वारा वनसंपदाओं के अवैधा व्यापार पर न तो कठोरता से नियंत्रण हो पा रहा है और न ही शासकीय स्तर पर क्षतिपूर्ति वनरोपण की दिशा में गंभीरता परिलक्षित हो रही है। परिणाम स्वरूप वनों का सत्यानाश होता जा रहा है।
वन्य प्राणियों को निशाना बनाने के बाद वन माफिया अब जंगल की अवैध कटाई में लग गया है। वनों की सुरक्षा में तैनात वनकर्मी भी उसके टारगेट पर हैं। वनकर्मियों पर हमले की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। बीते अगस्त माह में आठ अलग-अलग स्थानों पर वनकर्मियों पर जानलेवा हमले किए गए हैं। इन घटनाओं ने पूरे वन अमले को हिलाकर रख दिया है। अपने फायदे के लिए माफिया अब भोले-भाले आदिवासियों का इस्तेमाल भी कर रहा है। वन कर्मियों के हत्थे चढने पर वे आदिवासियों की ओर से उनके खिलाफ ही अनुसूचित जाति और जनजाति अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज करा देते हैं। छोटे वन कर्मियों को अपने ही अफसरों से अपेक्षित मदद न मिलने के कारण उनका मनोबल भी गिर रहा है। वन विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि पुलिस और जिला प्रशासन के समन्वित प्रयास और वन विभाग के अमले को आधुनिक हथियारों से लेस किए बिना माफिया पर काबू पाना कठिन है। वैसे तो जिला स्तर पर टास्क फोर्स बने हुए हैं, लेकिन महीनों उनकी बैठकें ही नहीं हो पाती हैं। इसके विपरीत वन माफिया के खिलाफ कड़ी कार्रवाई न होने से उनके हौसले बुलंद हैं।
हरेक रेंज में एक वाहन हो। रेंजर्स को रिवॉल्वर दी जाए। 1620 डिप्टी रेंजर्स को मोटर साइकल दी जाए। वन अपराध की सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए हरेक वन मंडल का कम्यूनिकेशन प्लान तैयार हो। वनोपज का अवैध परिवहन रोकने और निरीक्षण व्यवस्था दुरुस्त करने 100 अंतरराज्यीय बेरियर को मजबूत बनाया जाए। जिला प्रशासन में बेहतर समन्वय हो। मुखबिर व्यवस्था को मजबूत बनाने अलग से बजट का प्रावधान किया जाए। वाहनों के रखरखाव के लिए पर्याप्त बजट देय हो। 400 चिह्न्ति वन क्षेत्रों की 71 वन चौकियों का शीघ्र निर्माण किया जाए।100 अतिरिक्त वाहन उपलब्ध कराए जाएं। वनों के विनाश के कारण जहां एक तरफ पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ वनों से प्राप्त होने वाले राजस्व का भी घाटा होता जा रहा है। बाजारवाद और भौतिकवाद के इस दौर में वनसंपदाओं के अवैधा दोहन को वनकर्मियों के लाख प्रयत्नों के बावजूद भी रोकयात्रा आसान नहीं है। इसके पीछे वनों के रखरखाव के लिए तैनात वनकर्मियों के पास समुचित सुविधाएं और साधानों की कमी तो है ही, साथ ही उनमें समुचित प्रशिक्षण और तकनीकी ज्ञान का अभाव भी है। केन्द्र शासन ने वनों के बुरी तरह से हो रहे विनाश की ओर गंभीरतापूर्वक तवज्जों दी है और इस स्थिति से निपटने के लिए राज्यों के वनविद्यालयों के उन्नयन का निर्णय लिया है। इस कार्य के लिए राज्यों को अनुदान देने के लिए 206 करोड़ रु. का प्रावधान किया है। केंद्रीय वन मंत्रालय ने दस राज्यों के वन विद्यालयों के उन्नयन करने के लिए राज्यों को प्रोजेक्ट तैयार करने के निर्देश दिए हैं। योजना के तहत इन विद्यालयों में वनकर्मियों को नई तकनीक से प्रशिक्षण देने के साथ ही उन्हें आधुनिक उपकरण मुहैया कराये जायेंगे। जिन दस राज्यों से वन विद्यालयों को कहा गया है, वे हैं-मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार, असम, उत्तराखंड, महाराष्ट्र, सिक्किम, पश्चिम बंगाल और केरल। इन राज्यों के वन प्रशिक्षण केंन्द्रों को भारत शासन से अनुदान स्वीकृत किया जायेगा।
केंद्रीय वन मंत्रालय से प्राप्त निर्देशों के आधार पर राज्यों ने तत्काल कार्यवाही शुरू कर दी है क्योंकि निर्देशों में यह स्पष्ट रूप से बता दिया गया है कि जिन राज्यों से जल्द प्रोजेक्ट प्राप्त नहीं होंगे उन्हें इस योजना के तहत अनुदान नहीं मिल सकेगा, उनका नाम इस सूची से हटा दिया जायगा। अनेक राज्यों से जानकारियां मिल रही हैं कि वहां वन विद्यालयों के प्रभारियों की इस मुद्देश् पर बैठकें हो चुकी हैं और बैठकों में विभिन्न मुद्दों पर हुए विचार के आधार पर राज्य स्तर पर परियोजना को अंतिम स्वरूप दिया जाने लगा है।
वन विद्यालयों के उन्नयन के लिए केंन्द्र ने 206 करोड़ रुपये लागत की जो योजना तैयार की है, उसके लिए विदेशी सहायता प्राप्त की जा रही है। वन मंत्रालय के अनुसार इस काम के लिए जापान इंटरनेशनल कारपोरेशन एजेंसी से सहयोग लिया जा रहा है। जापान और भारत के बीच इसके लिए करारनामा हो चुका है। करार के मुताबिक जापान से मिलने वाली इस राशि की अदायगी भारत द्वारा चालीस वर्षों में की जायगी।
उम्मीद की जा रहा है कि वनों में तैनात वनकर्मियों के बेहतर प्रशिक्षण और उनके तकनीकी ज्ञान को बढ़ाने के उद्देश्य से लागू की जा इस योजना से वनकर्मियों की कार्यक्षमता बढ़ेगी और वे आधुनिक उपकरणों से साधान-संपन्न होकर वनों के संरक्षण के दायित्व निर्वहन में कामयाब होंगे।

सरकार की सामाजिक वानिकी योजना और वृक्षारोपण के लिए चल रही विभिन्न योजनाओं में सामाजिक सहयोग की अपेक्षा तो रहती है किंतु समाज के कतिपय लोगों में लोभ, लालच और धान कमाने की बढ़ती प्रवृत्ति के कारण योजनाएं भी बेहतर परिणाम दे नहीं पा रही है। वन विद्यालयों में समुचित प्रशिक्षण मिलने से वन अमले में दक्षता, योग्यता, कर्मठता के साथ ही उनमें कर्तव्य परायणता की भावना का भी विकास हो सकेगा। प्रशिक्षित अमलों में वनों के विकास में जनभागीदारी के लिए समाज को प्रेरित और प्रोत्साहित करने की सामर्थ्य भी बढ़ सकेगी।

अक्सर यह होता है कि राज्यों और केंद्र में भिन्न-भिन्न राजनैतिक दलों की सत्ता होने के कारण केंद्र और राज्यों के बीच श्रेय लूटने की प्रतिस्पधराएं शुरू हो जाती हैं। इसका दुष्परिणाम यह होता है कि जनहित की अनेक योजनाएं विवादों में उलझकर ही रह जाती हैं। वन विद्यालयों के उन्नयन के लिए जिन दस राज्यों का चयन केन्द्र शासन ने किया है उनमें अधिकांश राज्यों में अलग-अलग राजनैतिक दलों की सरकारें हैं। ये सरकारें वन विकास के नाम पर अपना अपना श्रेय लूटने का दाव खेलेंगी और केन्द्र से मिलने वाली अनुदान राशियों के आवंटन पर भेदभाव और पक्षपात का आरोप लगाकर अपने प्रदेश की जनता के बीच केंद्र की इस अभिनव योजना के बारे में भ्रम फैलाने में कसर नहीं छोड़ेगी। केंद्र और राज्यों के बीच ऐसे अनेकों उदाहरण देखे जा सकते हैं जिनमें राज्यों ने केंद्रीय योजनाओं का धान तो खूब बटोरा है किंतु उसका दुरूपयोग भी किया और केंद्र पर भेदभाव बरतने का आरोप लगाकर आम जनता के बीच केंद्रीय राशि को राज्य की राशि बताकर श्रेय भी लूटा है। आशा है वनों के संरक्षण और संवर्धान की यह योजना राजनीति का शिकार होने से बची होगी।

नहीं रूकेगा बाघों का शिकार

आज कौन मानेगा कि सौ साल पहले अपने देश में लाख की तादात में बाघ जीते थे और अपने होने का दम भरते दहाड रहे होते थे। 6 साल पहले बाघों की ये तादात घटकर 3600 हो गई और 2008 में ये संख्या चैंकाने की हद पर पहुंचते हुए 1411 जा पहुंची। 2005 के सरकारी आंकणों के मुताबिक राजस्थान के सरिस्का टाईगर रिजर्व में मौजूद सभी 26 बाघ विलुप्त हो गये। 6 साल पहले टाईगर स्टेट के नाम से जाने जाने वाले मध्य प्रदेश के पन्ना टाईगर रिजर्व में मौजूद 44 बाघ आज की तारीख में इतिहास हो गये हैं। बाघों को बचाने के लिये बनी नेश्नल टाईगर कन्वेंशन अथोरिटी की एक रिपोर्ट बताती है कि 2007 में 41 और 2008 में 53 बाघ देश भर में मौत की नीद सो गये और 2009 के पहली छमाही में ही 45 बाघ मर गये और साल के जाते जाते ये संख्या 86 पहुंच गई। पयावरणविद दावा कर रहे हैं कि आज देशभर में मुश्किल से 1000 बाघ रह गये हैं। इन 1000 बाघों को बचाया ना गया तो 2015 ज्यादा दूर नहीं लगता। आज सेव टाईगर्स के नारे देशभर में पोस्टरों, बैनरों, अखबारों, रेडियो और टीवी विज्ञापनों में तैर रहे हैं। लोग बाघों के जीवन के लिये चिन्तित नजर आ रहे हैं। 1972 में कार्बेट नेश्नल पार्क से प्रोजेक्ट टाईगर नाम से शुरू की गयी सरकारी योजना आज जबरदस्त रूप से प्रासांगिक हो गई है।
दरअसल बाघों की ये दातात कैसे आश्चर्यजनक तरीके से कमती चली गई। कैसे इन कुछ सौ सालों में देशभर के हजारों बाघ गायब होने की जद पर आ पहुंचे। कैसे हम इतने बेपरवाह शिकारी हो गये कि हमने अपने राश्ट्रीय पशु को मरने के लिये छोड दिया। इन सवालों की परतें अपनी जडों तक बड़ी गहरी हैं। बाघों की तस्करी के अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में भारत से तिब्बत के जरिये चीन तक उनकी खालों के व्यापार की खबरें पिछले कई सालों से छनती हुई मीडिया में पहुंचती रही हैं। और अब जबकि बाघों की विलुप्ति की खबरों के सच होने के दिन नजदीक आते लग रहे हैं हमें उनकी चिन्ता सता रही है। देशभर में 38 से ज्यादा टागर रिजर्व उनके संरक्षण के नाम पर बने तो सही पर मौजूदा हाल साफ कर देता है कि वो कितने सफल रहे। या कहना बेहतर होगा कि कितने नाकामयाब रहे। खैर हालात जब इतने बिगडे हैं तो कम से कम हमें जागने की सूझी है। हम जो कर सकते हैं वो यही है कि उनके बचाव के लिये काम कर रहे जागरूकता अभ्यिानों से किसी न किसी तरह जुडें। अपनी ओर से जागरूकता लाने का प्रयास करें। हो सके तो कोई पहल करें। अगले कुछ सौ सालों तक बाघ जीते हुए दहाड सके तो पर्यावरण संरक्षण के लिए ये हमारी बडी मदद होगी।

बाघों की लगातार घटती संख्या ने हर आमोखास को चिन्ता में डाल दिया है। कितने आश्चर्य की बात है कि हर साल हजारों करोड रूपए खर्च करने के बाद भी बाघों के अस्तित्व पर दिनों दिन संकट बढ़ता जा रहा। हालांकि 1973 में बाघों को बचाने के लिए कांग्रेस की तात्कालिन केन्द्र सरकार ने टाईगर प्रोजेक्ट शुरू किया था। उस वक्त माना जा रहा था कि बाघों की संख्या तेजी से कम हो सकती है, अत: बाघों के संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया गया। विडम्बना देखिए कि उसी कांग्रेस को 37 साल बाद एक बार फिर बाघों के संरक्षण की सुध आई है।
बाघ संरक्षण की दिशा में केन्द्र और राज्य सरकार कितनी संजीदा है उसकी एक बानगी है मध्य प्रदेश के पन्ना जंगल। पन्ना में 2002 में 22 बाघ हुआ करते थे, इसी लिहाज से इस अभ्यरण को सबसे अच्छा माना गया था। 2006 मे वाईल्ड लाईफ इंस्टीट्यूट ऑफ इण्डिया (डब्लूआईआई) ने कहा था कि पन्ना में महज आठ ही बाघ बचे हैं। इसके उपरान्त यहां पदस्थ वन संरक्षक एच.एस.पावला का बयान आया कि पन्ना में बाघों की संख्या उस समय 16 से 32 के बीच है। जनवरी 2009 में डब्लूआईआई ने एक बार फिर कहा कि पन्ना में महज एक ही बाघ बचा है। इस तरह अब किस बयान को सच माना जाए यह यक्ष प्रश्न आज भी अनुत्तरित ही है। अपनी खाल बचाने के लिए वनाधिकारी मनमाने वक्तव्य देकर सरकार को गुमराह करने से नहीं चूकते और सरकार है कि अपने इन बिगडैल, आरामपसन्द, भ्रष्ट नौकरशाहों पर एतबार जताती रहतीं हैं।
2007 में हुई गणना के आंकडों के अनुसार बाघ संरक्षित क्षेत्रों में सबसे अधिक 245 बाघ सुन्दरवन में थे, इसके अलावा बान्दीपुर में 82, कॉर्बेंट मेे 137, कान्हा में 127, मानस 65, मेलघाट 73, पलामू 32, रणथंबौर 35, सिमलीपाल में 99 तो पेरियार में 36 बाघ मौजूद थे। सरिक्सा 22, बक्सा 31, इन्द्रावती 29, नागार्जुन सागर में 67 नामधापा 61, दुधवा 76, कलाकड 27, वाल्मीकि 53, पेंच (महाराष्ट्र) 40, पेंच (मध्य प्रदेश) 14, ताडोबा 8, बांधवगढ 56, डम्पा 4, बदरा 35, पाकुल 26, एवं सतपुडा में महज 35 बाघ ही मौजूद थे, इसके अलावा 2007 में सर्वेक्षण वाले अतिरिक्त क्षेत्रों में कुनो श्योपुर में 4, अदबिलाबाद में 19, राजाजी नेशनल पार्क 14, सुहेलवा 6, करीमनगर खम्मन 12, अचानकमार 19, सोनाबेडा उदान्ती 26, ईस्टर्न गोदावरी 11, जबलपुर दमोह 17, डाण्डोली खानपुर में 33 बाघ ििचन्हत किए गए थे।
दूसरे आंकडों पर गौर फरमाया जाए तो 1972 में भारत में 1827 तो मध्य प्रदेश में 457, 1979 में देश में 3017, व एमपी में 529, 1984 में ये आंकडे 3959 / 786 तो 1989 में 3854 / 985 हो गए थे। फिर हुआ बाघों का कम होने का सिलसिला जो अब तक जारी है। 1993 में 3750 / 912, 1997 में 3455 / 927, 2002 में 3642 / 710 तो 2007 में देश में 1411 तो मध्य प्रदेश में महज 300 बाघ ही बचे थे।
दुख का विषय यह है कि देश में 28 राष्ट्रीय उद्यान और 386 से अधिक अभ्यरण होने के बाद भी छत्तीसगढ के इन्द्रावती टाईगर रिजर्व नक्सलियों के कब्जे में बताया जाता है। इसके साथ ही साथ टाईगर स्टेट के नाम से मशहूर देश का हृदय प्रदेश माना जाने वाला मध्य प्रदेश अब धीरे धीरे बाघों को अपने दामन में कम ही स्थान दे पा रहा है, यहां बाघों की तादाद में अप्रत्याशित रूप से कमी दर्ज की गई है।
सरकारी उपेक्षा, वन और पुलिस विभाग की मिलीभगत का ही परिणाम है कि आज भारत में बाघ की चन्द प्रजातियां ही अस्तित्व में हैं। ज्यादा धन कमाने की चाहत के चलते देश में वन्य प्राणियों के अस्तित्व पर संकट के बादल छाए हैं। विश्व में चीन बाघ के अंगों की सबसे बडी मण्डी बनकर उभरा है। अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में बाघ के अंगों की भारी मांग को देखते हुए भारत में शिकारी और तस्कर बहुत ज्यादा सक्रिय हो गए हैं। मरा बाघ 15 से 20 लाख रूपए कीमत दे जाता है। बाघ की खाल चार से आठ लाख रूपए, हड्डियां एक लाख से डेढ लाख रूपए, दान्त 15 से 20 हजार रूपए, नखून दो से पांच हजार रूपए के अलावा रिप्रोडेक्टिव प्रोडक्ट्स की कीमत लगभग एक लाख तक होती है। बाघ के अन्य अंगो को चीन के दवा निर्माता बाजार में बेचा जा रहा है।

ऐसा नहीं है कि वन्य जीवों के संरक्षण के प्रयास पहले नहीं हुए हैं। गुजरात के गीर के जंगलों में सिंह को बचाने के प्रयास जूनागढ के नवाब ने बीसवीं सदी में आरम्भ किए थे। एक प्रसिद्ध फिरंगी शिकारी जिम कार्बेंट को बाघों से बहुत लगाव था। आजादी के बाद जब बाघों का शिकार नहीं रूका तो उन्होंने भारत ही छोड दिया। भारत से जाते जाते उन्होंने एक ही बात कही थी कि बाघ के पास वोट नहीं है अत: बाघ आजाद भारत में उपेक्षित हैं।
हर साल टाईगर प्रोजेक्ट के लिए भारत सरकार द्वारा आवंटन बढ़ा दिया जाता है। इस आवंटन का उपयोग कहां किया जा रहा है, इस बारे में भारत सरकार को कोई लेना देना प्रतीत नहीं होता है। भारत सरकार ने कभी इस बारे में अपनी चिन्ता जाहिर नहीं की है कि इतनी भारी भरकम सरकारी मदद के बावजूद भी आखिर वे कौन सी वजहें हैं जिनके कारण बाघों को जिन्दा नहीं बचाया जा पा रहा है।

बाघों या वन्य जीवों पर संकट इसलिए छा रहा है क्योंकि हमारे देश का कानून बहुत ही लचर और लंबी प्रक्रिया वाला है। वनापराध हों या दूसरे इसमें संलिप्त लोगों को सजा बहुत ही विलम्ब से मिल पाती है। देश में जनजागरूकता की कमी भी इस सबसे लिए बहुत बडा उपजाउ माहौल तैयार करती है। सरकारों के उदासीन रवैए के चलते जंगलों में बाघ दहाडने के बजाए कराह ही रहे हैं।

शिवराज की दूत क्यों बनीं सुषमा स्वराज?

इंदौर यानी अहिल्या नगरी में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में तीन दिनों तक दिग्गज नेताओं में कुनबे की दिशा, दशा और चरित्र पर जमकर मंथन किया। प्राकृतिक महौल के बीच हुए इस मंथन में अमृत निकला या नहीं अभी तक पता नहीं चल पाया है लेकिन हलाहल जरूर बाहर आ गया है।

इस हलाहल को निकालने का श्रेय (कुचेष्टा) पार्टी की वरिष्ठ नेत्री और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज को जाता है। उनके एक वक्तव्य से दो नेता ही नहीं दो राज्यों की प्रतिष्ठा दांव पर लग गई है। ये राज्य हैं गुजरात और मध्यप्रदेश। तथा दोनों नेता हैं इन राज्यों के मुख्यमंत्री यानी नरेन्द्र मोदी और शिवराज सिंह चौहान। दोनों सुषमा स्वराज को बड़ी दीदी मानते हैं लेकिन दीदी के एक वक्तव्य ने भाइयों के बीच लकीर खींच दी है।

सुषमा स्वराज ने अपने आपको मध्य प्रदेश का ब्रांड एंबेसडर खुद ही बना दिया है। कायदे से तो उन्हें कर्नाटक का ब्रांड एबेसडर होना चाहिए जहां से वे सोनिया गांधी के खिलाफ चुनाव भी लड चुकी है और जहां की भाजपा सरकार सुषमा के मुंह बोले रेड्डी बंधुओं की दम पर चल रही है। सुषमा स्वराज और नरेंद्ग मोदी में कभी नहीं बनी यह तो सभी जानते हैं। इसकी एक बडी वजह यह है कि जब सुषमा बहुत पहले अपने लिए राज्य सभा की सीट तलाश रही थी तो उनके लिए लाल कृष्ण आडवाणी ने नरेंद्ग मोदी से कहा था। मोदी ने गुजराती गौरव का गुब्बारा उछाल दिया था और आखिरकार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने विदिशा की अपनी सीट लोकसभा चुनाव में सुषमा को सौपी और खुद सुषमा के लिए प्रचार भी किया।
उल्लेखनीय है कि ऐशियाई शेरों को लेकर पहले से ही इन दोनों मुख्यमंत्रियों के बीच शीत युद्ध चल रहा था। मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जब कभी गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी से कुनों अभ्यारण्य के लिए ऐशियाई शेरों की मांग करते तो श्री मोदी उन्हें पहले अपने बाघो का ध्यान रखने की सलाह दे डालते। शेरों के हस्तांतरण को लेकर वर्षो से चल रहे इस शीत युद्ध में सुषमा स्वराज की टिप्पणी ने आग में घी डालने जैसा काम किया है।

पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में सब कुछ ठीक चल रहा था। पार्टी अध्यक्ष नीतिन गडकरी जहां युवाओं को ज्यादा तरजीह देने की बात कर रहे थे, वहीं आडवाणी भी चौथी पीढ़ी को जिम्मेदारी संभालने को तैयार रहने पर जोर दे रहे थे। इन सबके बीच गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी हीरो थे। पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में जब तमाम नेता नरेन्द्र मोदी के सुशासन की कसीदे पढ़ रहे थे, तब सुषमा ने ये कहकर सबको चौंका दिया कि मध्यप्रदेश का प्रशासन गुजरात के मुकाबले ज्यादा संवेदनशील है।

पार्टी के ज्यादातर नेता सिर्फ मोदी मॉडयूल की तारीफ करते नहीं थक रहे थे। तब लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने मोर्चा संभाला और साफ किया कि गुजरात के मुकाबले मध्य प्रदेश किसी मायने में पीछे नहीं है। नरेन्द्र मोदी के बराबर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को खड़ा करना था कि पार्टी के भीतर एक नई बहस शुरू हो गई। यानी क्या बीजेपी के मोदीकरण से वाकई पार्टी को नुकसान हो रहा है।

हालांकि पार्टी प्रवक्ता इस मामले में स्पष्ट नजरिया तो नहीं रख सके, लेकिन चौहान की तारीफ करने से भी पीछे नहीं रहे। सियासी हलकों में सुषमा के बयान के मायने निकाले जा रहे हैं। दो दिन पहले ही गडकरी ने मंदिर निर्माण के लिए मुसलमानों से सहयोग की अपील की। यानी पार्टी अल्पसंख्यकों के करीब पहुंचना चाहती है। ऐसे में पार्टी को मोदीकरण चेहरे से बाहर निकालना ही होगा।

उम्मीद तो थी कि इंदौर में एसी टेंट में ही सही लेकिन प्रकृति के थोड़े करीब आकर, नए युवा अध्यक्ष की अगुआई में बीजेपी नेता कुछ नया सोचकर एक नई शुरुआत करेंगे पर लोगों को यह जानकर बड़ा अफसोस हुआ कि पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में सुबह शाम चले मंथन के बाद भी ये नेता अपनी पार्टी के लिए अमृत नहीं निकाल पाए।

अलबत्ता बीजेपी में एक नई बहस की शुरुआत हो गई है और जिसका मुख्य सूत्रधार सुषमा स्वराज को माना जाता हैं। पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में जब तमाम नेताओं की उपस्थित में श्रीमती स्वराज के इस कथन ने सबको चौंका दिया कि मध्य प्रदेश का प्रशासन गुजरात के मुकाबले ज्यादा संवेदनशील है।

एक ही परिवार के दो सदस्यों के बीच फूट डालने की कोशिश तथा एक-दूसरे के खिलाफ भड़काने की सुषमा की कोशिश करार देने वाले राजनीतिक विश£ेषक अचरज से भरकर यह कहने में नहीं चूकते कि आखिर ये क्या हो गया है बीजेपी को, लगातार दो लोकसभा चुनावों में मात खाने के बाद बदले बदले से क्यों नजर आ रहे हैं पार्टी के तेवर।

सुषमा लोकसभा की सदस्य भी बनीं और जब आडवाणी के उत्तराधिकारी की बात चल रही थी तो आडवाणी ने बहुत से लोगों की दावेदारी को किनारे करते हुए सुषमा को लोकसभा में प्रतिपक्ष का नेता भी बनाया। सुषमा स्वराज अब लोकसभा में राजनाथ सिंह को भी आदेश देंगी जो हाल तक पार्टी के अध्यक्ष थे और उस नाते सुषमा स्वराज ही नहीं, पार्टी के सभी नेता उनका आदेश माना करते थे।

सुषमा स्वराज ने शिवराज सिंह की सरकार का गुणगान करने के लिए नरेंद्ग मोदी को निशाना क्यों बनाया यह तो अलग सवाल है लेकिन सुषमा ने कहा कि गुजरात सरकार को भाजपा के मुख्यमंत्रियों को मॉडल सरकार करार देने से पहले मध्य प्रदेश की सरकार की संवेदनशीलता देख लेनी चाहिए। मध्य प्रदेश मंे विकास भी हो रहा है और सुषमा की राय में संवेदनशील तरीके से हो रहा है। जाहिर है कि सुषमा ने एक तीर से दो शिकार किए है। शिवराज सिंह की संवेदनशीलता पर मोहर लगाई है और नरेंद्ग मोदी को एक बार फिर से हडका दिया है।

प्रतिपक्ष के नेता का पद लोकतंत्र में प्रधानमंत्री के बाद सबसे महत्वपूर्ण पद होता है। ब्रिटिश और अमेरिकी लोकतंत्र में तो प्रतिपक्ष के नेता को छाया प्रधानमंत्री कहा जाता है। अगर भाजपा सरकार में आई तो प्रधानमंत्री पद की स्वाभाविक दावेदार सुषमा स्वराज ही होंगी। ऐसे में नरेंद्ग मोदी जैसे कद के नेता से झंझट मोल लेने का काम कर के सुषमा स्वराज ने बचपने का परिचय दिया।

नरेंद्ग मोदी ने सुषमा स्वराज के इस बयान पर कुछ भी नहीं बोल कर राजनैतिक बडप्पन भी दिखाया और यह संदेश भी दिया कि वे सुषमा स्वराज को कुछ नहीं समझते। वैसे भ जिससे भाजपा दूसरी पीढी कहा जाता था वह अब पहली पीढी बन गई है और नितिन गडकरी के तौर पर पार्टी के पास सबसे युवा अध्यक्ष मौजूद है। रही शिवराज सिंह की बात तो उन्हें सुषमा स्वराज के प्रमाण पत्र की जरूरत नहीं थी। प्रमाण पत्र तो मध्य प्रदेश के मतदाता ने उन्हें दूसरी बार शान से मुख्यमंत्री बना कर दे दिया है।

Friday, February 26, 2010

पुलिस में बगावत कराने की फिराक में माओवादी

माओवादी प्रभावित राज्यों में सुरक्षा बलों के जवान और माओवाद कैडेट्स के बीच संघर्ष जारी है। इसमें दोनों ही तरफ के लोग मारे जा रहे हैं। इससे देश की शांति और विकास की प्रक्रिया बाधित हो रही है। सरकार माओवाद को एक समस्या मान कर इससे से जुड़े लोगों की सफाया करना चाहती है। वहीं माओवाद से जुड़े लोगों का कहना है कि गरीबों के प्रति सरकार और जमीदारों की नकारात्मक रवैये के कारण हीं हथियार उठाना पड़ा। समर्थन बटोरने माओवादी संगठन समय-समय पर पर्चे जारी कर आदिवासी समुदाय को यह बतना नहीं भूलते कि तुम हमारे हो, हमारे बीच के हो। रिश्ता तुम्हारी रोजी-रोटी से है मगर भाई मेरे, ऐसे जीने का भला क्या मतलब? छत्तीसगढ के अविभाजित बस्तर, राजनांदगांव और महाराष्ट्र के गढ़चिरोली क्षेत्र जिसे दण्डकारण्य के नाम से पुकारा जाता है, में लोगों को अब एक युद्ध लडऩे के लिये प्रेरित किया जा रहा है। अत्याधुनिक हथियारों और ढेर सारा गोलाबारूद। क्षेत्र में तैनात अधिकारी और जंगल महकमे के लोग यहां युद्ध लड़कर देश की सेवा करेंगे या अपनी रक्षा करेंगे। यहां आने पर आप एक सच्चाई को जरूर जाना समझा होगा। वो यह है कि आपके थानों-कैंपों के इर्द-गिर्द मौजूद बस्तियों में जीने वाले आदिवासी जो बेहद गरीबी में, बुनियादी सुविधाओं के अभाव में दशकों से सरकारी जारी लापरवाही का शिकार बनकर जिंदगी के साथ जद्दोजहद खिलाफ आप लोगों को लड़ाई लडऩा है। उन्हीं लोगों के सीने पर ताननी है अपनी रायफलें। क्योंकि सोनिया, मनमोहन सिंह, चिदंबरम, रमण सिंह, ननकीराम, अशोक चव्हान, महेंद्र कर्मा आदि नेताओं ने निर्णायक युद्व या आरपार की लड़ाई का जो हुंकार मार रहे हैं वो यहां के भोले भाले गरीब और मेहनतकश आदिवासी जन समुदाय के खिलाफ हीं है। आखिर यहां के जनता पर इतना गुस्सा क्यों?भोली-भाली व शांति चाहने वाली यहां की आदिवासी जनता का इतिहास देश के अन्य इलाकों के आदिवासी की तरह ही रहा है। इन्होंने 19 वीं सदी की शुरूआत से लेकर आज तक शोषण, लूट, उत्पीडऩ, अन्याय और परायों के शासन के खिलाफ बगावत का परचम हमेशा ऊंचा उठाए रखा है। 1911 में अंग्रेजों के खिलाफ इनलोगों ने जबरदस्त विरोध किया था जो इतिहास के पन्नों में महान भूमकाल के नाम से अंकित है। आने वाले 2011 में इस विद्रोह की 110 वीं सालगिरह मनानी है। और अब एक ऐसा संयोग बना है कि यह सौवां साल यहां के समूचे आदिवासियों को एक बार फिर प्रतिरोध का झंडा बुंलद करने पर मजबूर कर रहा है।बहरहाल यहां के आदिवासियों ने कई बिद्रोह किये। काफी खून बहाया, शहादतें दी। पर आजादी और मुक्ति की उनकी चाहतें पूरी नहीं हुई। पहले गोरें लुटेरों और 1947 के बाद से उनका स्थान लेने वाले काले लुटेरों ने इनके हिस्से में अभाव, अन्याय, अपमान और अत्याचार हीं दिये हैं। अपने हीं मां समान जंगल में वन विभाग के अधिकारियों ने उन्हें चोर बना दिया। जंगल माफिया, मुनाफाखोर व्यापारी, ठेकेदार, पुलिस, फॉरेस्ट अफसर। सभी ने उनका शोषण किया। उनकी मां-बहनों की इज्जत के साथ खिलवाड़ किया। हालांकि इनके खिलाफ उनके दिलो दिमाग में गु्स्सा उबल रहा था, लेकिन उसे सही दिशा देने की राजनैतिक ताकत उनके पास नहीं थी। ऐसी स्थिति में 1980 के दशक में उन्हें एक नई राह मिल गई। मुक्ति की एक वैज्ञानिक सोच और जनयुद्व का संदेश लेकर यहां पर माओवादी पार्टी ने कदम रखा। यहां की दमित-शोषित-उत्पीडि़त आदिवासी जनता में काम करना शुरू किया।सिर्फ यहां की आदिवासियों की नहीं बल्कि देश के तमाम इलाकों के लोगों की या यूं कहें कि देश की 90 प्रतिशत मेहनतकश लोगों की कमोबेश यही बदहाली है। देश के मजदुरों, किसानों, छोटे छोटे मंझोले व्यापारियों तथा आदिवासी, दलित, महिलाएं और अन्य पिछड़े समुदायों पर शोषण उत्पीडऩ का एक व्यापक दुष्चक्र जारी है। इस स्थिति के लिये जिम्मेदार वे लोग हैं जो आबादी के महज 11 फिसदी का प्रतिनिधि होने के बावजूद देश की समूची सम्पदाओं में 90 प्रतिशत पर हिस्सेदारी रखते हैं। गिद्ध माने जाने वाले इस समुदाय को माओवादी सामंती वर्ग, दलाल पूंजीपति वर्ग और साम्राज्यवादियों के वर्ग में बांटते है और इनकी सांठगांठ से निर्मित व्यवस्था को देश की सारी समस्याओं की जड़ बताते है।लोकतांत्रिक व्यवस्था को दुष्ट तिकड़ी की मुठ्ठी में बताते हुए यह प्रचारित किया जाता है कि यही लोग चुनाव लड़ते हैं, यही लोग जीतते हैं, पार्टी का नाम और झंडा का रंग जो भी हो। संसद भी इन्हीं लोगों का है। थाना, कचहरी, जेल सभी पर नियंत्रण इन्ही का है। देश की श्रमशक्ति, संपदाओं और संसाधनों को यही लोग लुटते हैं। इसके खिलाफ लडऩे पर पुलिस और फौजी बलों को उतारकर जनता पर अकथनीय जु्ल्म ढाते हैं। और उल्टा उन्हीं लोगो पर आंतकवादी या उग्रवादी का ठप्पा लगा देते हैं। गरीबी, बेरोजगारी, भुखमरी, अकाल, अशिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, किसानों की आत्महत्या, पलायन आदि सभी सम्मस्यायें इन्ही तीन वर्गों र्की निर्मम लूट खसोट के कारण उपजी है। मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण के आधार पर खड़ी इनकी व्यवस्था को ध्वस्त करना निहायत जरूरी बताते हुए माओवादी कार्यकर्ता कहते हैं कि शोषणविहीन, भेदभावरहित तथा हर प्रकार के उत्पीडऩ से मुक्त खुशहाल समाज का निर्माण किया जा सके इसके लिए जनता के पास कोई दूसरा और नजदीकी रास्ता नहीं बचा है। हमारी पार्टी की इसी राजनीतिक सोच के साथ दण्डकारण्य के आदिवासी सचेत हुए हैं और फिर संघर्ष का शंखानाद बज गया। सरकारी गुस्से का कारण यही है।देश के अन्य नागरिक इन बदहाल आदिवासियों से अलग हैं? यह माओंवादी नेता ऐसा भी नहीं मानते हैं। वह पुलिस के जवान और छोटे स्तर के अधिकारी को ( आपके बलों का नाम जिला पुलिस, सीएएएफ, सीपीओ, एसपीओ, एसटीएफ, सीआरपीएफ, बीएसएफ, ग्रे-हाउण्डस, कोबरा, आईटीबीपी, एसएसबी जो भी हों) ऐसे ही शोषित व मेहनतकश माता-पिता की संताने मानते हैं। आदिवासी जनता और उसका नेतृत्व कर रहे नक्सली यह कहने में गुरेज नहीं करते हैं कि अमेरिकी साम्राज्यवादियों की वफादार सरकार के सेवक मनमोहन सिंह और उनके अन्य मंत्री हमारे दल को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिये सबसे बड़ा खतरा बताते नहीं थकते लेकिन इस बात को सफाई से छुपा जाते हंै कि हमारी पार्टी से देश के मुठ्ठी भर लुटेरों को खतरा है। चूंकि रेडियो, अखबार, और टीवी पर उन्हीं लुटेरों का कब्जा है। इसलिये एक झूठ को सौ बार दोहराकर सच बनाने की उनकी चालें कुछ हद तक चल भी पा रही है।सरकार के सभी प्रयासों के बाद भी आदिवासी अवाम के लिए जायज संघर्ष की अगुवाई करने का दम भरने वाले माओवादी नेता अपने अधिकारियों और कार्यकर्ताओं को उकसा आदिवासियों का समर्थन पाने के लिए गांवों को जला रहे हैं। लूट रहे हैं। या फिर सलवा जुडूम जैसी व्यवस्था को नाकाम करने के लिए उनके साथ मारपीट कर रहे हैं। या फिर आदिवासी महिलाओं के साथ बलात्कार कर रहे हैं। निहत्थे लोंगों पर गोलियां बरसा रहे हैं। और नरसंहारों को अंजाम दे रहे हैं। यह सब उस संविधान के खिलाफ जाकर कर रहे हैं जिसका पालन करने की शपथ लेकर देश के नेता और अफसर शाही देश सेवा में जुटे हंै। विडम्बना यह है कि जिन लोगों के खिलाफ यह सब कुछ हो रहा हैं वो आज भी गरीबी और भुखमरी से लड़ रही है। मेहनतकश जान बचाने की खातिर जन सेना और पीएलजी जैसे संगठनों के साथ मिलकर अपनी ही सेना और बल के खिलाफ जवाबी हमले कर रहे है जिसमें दर्जनों की संख्या में लोग हताहत हो रहे हैं। इन आदिवासियों से मिले नक्सलियों और माओवादियों को मिले समर्थन को देखते हुए नक्सल प्रभावित इलाकों में तैनात जवान खून-खराबा रोकने के लिए या तो आदिवासियों पर गोली चलाने से इनकार कर रहे हैं या संघर्ष के इलाके में डयूटी करने से मना कर कर रहे हैं। इसके चलते इलाके में नहीं जाने के कारण कई कर्मचारियों का निलंबन किया गया फिर भी वे अपने फैसले पर कायम पर रहे। इलाके में इन अताताइयों के बढ़ते हुए प्रभाव को देखते हुए माना यह जाता है कि फोर्स के जवान ही अब माओवादियों तक हथियार पहुंचा रहे हैं। नक्सली अब आदिवासी समुदाय के बीच ऐसे लोगों की सरहाना करते हैं जिन्होंने किसी न किसी वजह से आदिवासियों के पीछे छिपे नक्सलियों के खिलाफ बंदूक उठाने से मना कर दिया। इलाके में पदस्थ जवान कई परेशानियों और प्रताडनाओं के दौर से गुजर रहे हैं। खास कर उच्च अधिकारियों के बुरे बर्ताव से आहत पुलिस और अर्द्वसैनिक बलों के जवानों खुदकुशी भी कर रहे हैं। यहा अपने अफसरों को गोली मारकर खुद को भी गोली मारी।अपनी योजना को कारगर बनाने के लिए यह माओंवादी नेता आज जवानों के बीच ही फूट डालने की योजना के तहत काम करते हुए जवानों से अपील कर रहे हैं कि आप इस इस तरह निरर्थक मौत को गले न लगायें। आपमें ताकत है और सोच विचार कर फैसला लेने का विवेक भी। अपनी वर्गिय जड़ों को पहाचानिये। उकसाने और जनता पर कहर ढाने का आदेश देने वाले अपने अफसरों की वर्गीय जड़ो को पहचानिये। चिदम्बरम, रमनसिंह, महेंद्र कर्मा जैसों के असली चेहरे को पहचानिये। दोनो बिल्कुल अलग अलग हैं और एक दूसरे के विपरित भी हैं। दोनों हाथ फैला कर स्वागत करने की बात कहते हुए जवानों को अपनी बंदूकें लुटेरों, घोटालेबाजों, रिश्वतखोरों, जमाखोरों, देश की संपदाओं को बेचने वाले दलालों, देश की अस्मिता के साथ सौदा करने वाले देशद्रोहियों के सीने पर तानने की सलाह दे रहे हैं। इनका मानना है कि जिस मेहनत वर्ग में जन्म लिया है उस वर्ग की मुक्ति के लिये जारी महासंग्राम के सैनिक बनना चाहिए। न कि घूसखोरी, गालीगलौज, दलाली, जातिगत भेदभाव, धार्मिक साम्प्रदायिकता आदि सामंती मान्यताओं के ढांचे पर निर्मित पुलिस और अद्र्धसैनिक बलों मेें शामिल होकर देश के सच्चे सेवकों की राह में रोड़ा बनकर उभरना चाहिए।इलाके में तैनात पुलिस के जवानों की माने तो इन दिनों नक्सली अपनी वारदातों को अंजाम देने के बजाय रणनीतिक चाल चलते हुए पुलिस और अद्र्धसैनिक बलों तक यह संदेश पहुंचा रहे है कि वह हमलों में शामिल होने से इंकार कर दें। अपने अफसरों के हुक्म का पालन न करने की समझााइश देते हुए जनता के खिलाफ लाठी-गोलियों का प्रयोग नहीं करने की बात कह रहे हैं। सशस्त्र झड़पों के सूरत में हथियार डाल अपनी जान बचा लेने का संदेश देते हुए यह समझाने की कोशिश की जा रही है कि संघर्ष कि इतनी व्यापक सरकारी बर्बरता, आतंक और नरसंहारों के बावजूद भी यहां की जनता हमारी पार्टी के साथ क्यों खड़ी है। अपने अधिकारियों और सरकार के खिलाफ झूठे प्रचार का सहारा ले यह बताने की कोशिश की जा रही है कि जिस सरकार ने तुम्हारे हाथों में बंदूके थमाई हैं वो गद्दार हैं मुल्क के दुश्मन हैं। जबकि मत भूलो, कि तुम हमारे हो, हमारे बीचे के हो।