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भेड़ाघाट

Sunday, March 18, 2012

काले हीरे का काला बाजार




काला हीरा यानी कोयले का कारोबार भी उसी की तरह काला है. कोयले के काला बाजार में सफेदपोशों की चलती है जिसके कारण यह माफियाओं की पहली पसंद बन गया है.एक अनुमान के अनुसार देश में करीब 20 फीसदी कोयला काला बाजारी की भेंट चढ़ जाती है.
भारतीय कोयला बाज़ार एक अजीबो-गऱीब दानव है. कोल इंडिया लिमिटेड (सीआईएल), सिंगरेनी कोल कोलियरी लिमिटेड (एससीसीएल) और नेवेली लिग्नाइट कॉर्पोरेशन (एनएलसी) के बीच राज्यों की स्वाधिकृत कंपनियों के उत्पादन के अल्पाधिकार की भरपाई ऐतिहासिक रूप में क्रय के एकाधिकार द्वारा की जाती रही है. उदारीकरण से पहले तक कोयले के सबसे बड़े औद्योगिक उपभोक्ता अर्थात बिजली, लोहा व इस्पात और सीमेंट के कारख़ाने भी ज़्यादातर राज्यों के स्वाधिकृत कारख़ाने ही रहे हैं, लेकिन वास्तव में रेलवे ही एक ऐसी संस्था है जिसके पास कोयले को बड़े पैमाने पर उठाने और उसे वितरित करने की अच्छी-खासी मूल्य-शक्ति है. उदारीकरण के बाद जब ये जि़म्मेदारियां सीआईएल को औपचारिक रूप में सौंप दी गईं, तब कोयला मंत्रालय ने 2000 के दशक की शुरुआत तक मूल्यों पर नियंत्रण बनाए रखा. फिर भी आयात-समानता के मूल्यों पर केवल कोयले के उच्चतम ग्रेड ही बेचे गए और भारत का अधिकांश उत्पादन निचले ग्रेड का होने के कारण कम मूल्य पर बेचा गया और हो सकता है कि इन मूल्यों का निर्देश अनिवार्य वस्तुओं, खास तौर पर बिजली की लागत को कम रखने के लिए कदाचित कोयला मंत्रालय द्वारा दिया गया था. सन 2011 के आरंभ में सीआईएल ने विभेदक मूल्य प्रणाली शुरू की, जिसके आधार पर बाज़ार-संचालित क्षेत्रों के लिए उच्चतर मूल्य तय किए गए.
इन बदलती हुई मूल्य-व्यवस्थाओं के बावजूद काले बाज़ार को छोड़कर खुले बाज़ार में थोक में कोयला खरीदना सचमुच बहुत कठिन है. भारत के छह सौ मिलियन टन के घरेलू कोयला उत्पादन में से लगभग 80 प्रतिशत का आवंटन कोयला मंत्रालय की प्रशासनिक समितियों के माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों के सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों के आवेदकों को किया गया. अतिरिक्त 10 प्रतिशत की बिक्री ऑनलाइन ई-नीलामी के माध्यम से की गई, जिसके परिणामस्वरूप अच्छा-खासा राजस्व भी मिला है. 2009-10 में ई-नीलामी मूल्य औसतन अधिसूचित मूल्यों से लगभग 60 प्रतिशत ऊपर रहा. अवरुद्ध कोयला ब्लॉक, जिन्हें जल्द ही प्रतियोगी बोलियों के माध्यम से सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की कंपनियों को आवंटित कर दिया जाएगा, 19 प्रतिशत अतिरिक्त था. अंतत: घरेलू कोयला उत्पादन का आ़खिरी 1 प्रतिशत राज्य सरकार की एजेंसियों को, जो इसे स्थानीय बाज़ारों को उपलब्ध करा देते हैं, आवंटित कर दिया जाता है.
कोयले के कम मूल्य के पीछे का तर्क था कि बिजली, इस्पात और सीमेंट का परिणामी उत्पादन अनिवार्य था और वृद्धि को बढ़ावा देने के लिए उसकी क़ीमत कम करना ज़रूरी था, लेकिन आर्थिक सलाहकार के कार्यालय से हाल के मूल्यों के आंकड़ों को देखते हुए 2004 से 2011 तक कोयले के मूल्य में 89 प्रतिशत वृद्धि हुई, जबकि बिजली, इस्पात और सीमेंट के मूल्यों में क्रमश: 13 प्रतिशत, 26 प्रतिशत और 50 प्रतिशत की वृद्धि हुई. उसी अवधि में थोक मूल्य सूचकांक में 54 प्रतिशत वृद्धि हुई. जहां एक ओर बिजली के मूल्य विनियमित कर दिए गए, वहीं दोनों के मूल्य का विनियमन नहीं हुआ है, जिसका अर्थ यह हुआ कि इन दोनों उद्योगों ने कोयले के बढ़ते मूल्यों को पर्याप्त रूप में आत्मसात करते हुए उनका प्रबंधन कर दिया. यदि स्थिति यही है तो कृत्रिम रूप से कोयले के कम मूल्य के रूप में सहायता की इनपुट राशि का तर्क काफ़ी कमज़ोर है, लेकिन मूल्य-निर्धारण मूलभूत समस्या भी नहीं है.
यह समय सबसे अच्छा था, यह समय सबसे खराब था, यह युग समझदारी का था, यह युग ही बेवक़ूफिय़ों का था. कोयले की इस वर्तमान गतिशीलता की तुलना किसी षड्यंत्र और दो शहरों की कथा (ए टेल ऑफ़ टू सिटीज़) के झंझावात से नहीं की जा सकती. यह कथा निश्चय ही आरंभिक भावनाओं को प्रतिबिंबित करती है और इससे इस क्षेत्र में चलने वाले घटनाचक्र का अंदाज़ा हो जाता है. हाल में बाज़ारी पूंजीवाद के संदर्भ में सबसे प्रतिष्ठित कंपनी के रूप में कोल इंडिया के उदय होने की चर्चा समाचार पत्रों में गूंजती रही है. वित्तीय जश्न मनाने की बजाय पिछले कुछ वर्षों से भारत में कोयले की भारी कमी रही है, जिसके कारण राज्य सरकारें, सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों की पावर और इस्पात कंपनियां समय पर कोयले की डिलीवरी न होने की लगातार शिकायतें करती रही हैं.
कोयले की आपूर्ति की निगरानी के लिए विकसित प्रशासनिक प्रणाली बहुत जल्द ही अपनी विश्वसनीयता खोने जा रही है. बिजली के क्षेत्र की क्षमता, शायद कुछ मूर्खतापूर्ण लगे, लेकिन कोयले की आपूर्ति की क्षमताओं से कहीं आगे निकल गई है. इस समय चलने वाले कई संयंत्र, खास तौर पर वे संयंत्र जो राज्य के क्षेत्र में हैं, अपनी क्षमता से बहुत कम काम कर रहे हैं. पिछले साल वर्तमान संविदागत कऱारों को पूरा करने में सक्षम न होने के कारण ही बहुत कम कोयला ईंधन आपूर्ति कऱारों पर हस्ताक्षर हो पाए हैं.
घरेलू कोयले के सुरक्षित भंडार से काफ़ी मात्रा में कोयला निकालने की भारत की क्षमता में गिरावट आने के कारण उसकी नीति पर भी मूल रूप में इसका असर पड़ा है. कोयला मंत्रालय द्वारा निष्पादित नवीनतम कोयला ईंधन आपूर्ति कऱार (एफएसए) बिजली संयंत्रों की ईंधन संबंधी 75 प्रतिशत आवश्यकताओं को पूरा करने की गारंटी देते हैं, शेष की पूर्ति निजी तौर पर की जानी चाहिए. यदि कोयला ईंधन आपूर्ति कऱार (एफएसए) निष्पादित हो भी जाए, जो अपने आपमें संपर्क अनुमोदन प्रक्रिया की जटिलताओं को देखते हुए बेहद अनिश्चित है तो भी रेल और सड़क मार्ग के मिले-जुले रूप के कारण स्त्रोत स्थल से ले जाकर गंतव्य स्थल पर उन्हें खाली करने-कराने के तौर-तरीक़ों और उसके लिए जि़म्मेदार एजेंसियों द्वारा लॉजिस्टिकल प्रबंधन के कमज़ोर समन्वयन के कारण और भी नुक़सान और देरी होती रहती है. इस बात को लेकर हैरानी भी नहीं होनी चाहिए कि बड़े-बड़े कोयला उपभोक्ता बेहतर कि़स्म के कोयले को चुनने के लिए उसे उन देशों से आयातित करने पर आमादा होने लगे हैं, जहां पर कऱार और लॉजिस्टिक्स से संबंधित दायित्वों का पूर्वानुमान किया जा सकता है. इसकी प्रतिक्रिया में कोयला निर्यातक देशों और अभी हाल में इंडोनेशिया ने भी कोयले की बढ़ती मांग को देखते हुए उसकी क़ीमत में बढ़ोतरी और विनियमों में परिवर्तन करना शुरू कर दिया है.
आशा है कि भारत अगले कुछ वर्षों में एक मिलियन टन से अधिक कोयले का आयात करेगा. क्या कारण है कि कोयले का घरेलू उत्पादन मांग को पूरा करने में विफल रहा है? हालांकि इस बारे में बहुत-से स्पष्टीकरण दिए जा चुके हैं, फिर भी यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब कदाचित सबसे कठिन है. कुछ लोग कहते हैं कि पर्यावरण संबंधी स्वीकृति और भूमि अधिग्रहण ही मुख्य बाधाएं रही हैं. कुछ लोग इसका दोष राज्यों द्वारा स्वाधिकृत कोयला कंपनियों पर मढ़ देते हैं जो अपने परिचालन में आधुनिक खनन की परिपाटियों और प्रौद्योगिकी को प्रभावशाली रूप में अपनाने में असमर्थ रहे हैं. सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की कोयला कंपनियों के इन पुराणपंथी मालिकों की काफ़ी आलोचना भी हुई है. इनके कई मालिकों ने तो उत्पादन के लिए ब्लॉक ला पाने में विफल होने के बाद अपने आवंटित ब्लॉकों को अनावंटित भी करा दिया. कि़स्सागोई की तरह आपराधिक तत्वों के साथ कोयला उद्योग की मिलीभगत और उसके फलस्वरूप होने वाली चोरी और ग्रेड की गुणवत्ता को कम करने की वारदातों को भी समझा जा सकता है. यही कारण है कि घरेलू उद्योग में वर्तमान कमी के सही कारणों को समझना इतना आसान नहीं है, परंतु एक बात तो साफ़ है कि परंपरागत बाज़ार की अपेक्षित क्षमताओं का पूरा उपयोग नहीं हो पाया है.
कोयले की आपूर्ति की निगरानी के लिए विकसित प्रशासनिक प्रणाली बहुत जल्द ही अपनी विश्वसनीयता खोने जा रही है. बिजली के क्षेत्र की क्षमता, शायद कुछ मूर्खतापूर्ण लगे, लेकिन कोयले की आपूर्ति की क्षमताओं से कहीं आगे निकल गई है. इस समय चलने वाले कई संयंत्र, खासतौर पर वे संयंत्र जो राज्य के क्षेत्र में हैं, अपनी क्षमता से बहुत कम काम कर रहे हैं. पिछले साल वर्तमान संविदागत कऱारों को पूरा करने में सक्षम न होने के कारण ही बहुत कम कोयला ईंधन आपूर्ति कऱारों पर हस्ताक्षर हो पाए हैं. पिछले कुछ महीनों में श्रमिक संकट, भारी वर्षा और तेलंगाना विरोध के कारण इस प्रणाली की ऐसी कमी भी सामने आई है, जिसके कारण बिजली के संयंत्रों में कोयले के भंडार कम होने लगे और अनेक दक्षिणी राज्यों में लंबे समय तक बिजली की कटौती होने लगी.
ऐसी अप्रत्याशित परिस्थितियों में निजी क्षेत्र में भी जोखिम बढऩे के कारण उत्साह में कमी दिखाई पडऩे लगी. सीआईएल के मूल्य-निर्धारण के उत्साह से भरे सारे प्रयासों पर बार-बार पावर क्षेत्र द्वारा पानी फेर दिया गया. यदि इन्हें उचित रूप में कार्यान्वित किया जाए तो इससे पावर क्षेत्र में सैद्धांतिक रूप में स्थितियों में सुधार आ जाएगा, लेकिन बढिय़ा कोयले की डिलीवरी में सीआईएल के खराब रिकॉर्ड के कारण कई ऑपरेटर भारी रद्दोबदल करने की बजाय स्थिति को यथावत बनाए रखना ही पसंद करते हैं. इस प्रकार का संतुलन, जहां कोई भी पक्ष पूरी तरह से निकम्मी पड़ी इस प्रणाली में कोई भारी परिवर्तन नहीं चाहता, बहुत समय तक नहीं चल सकता.
इस प्रकार की समस्याओं का कोई सरल समाधान नहीं है, इसलिए इन पर गंभीर विचार मंथन की आवश्यकता है. रणनीतिक कारणों से विदेशों से कोयले के संसाधन मंगवाने की बात ठीक तो लगती है, लेकिन इस बात को मद्देनजऱ रखते हुए कि कोयले की किसी खान को पूरी तरह से विकसित करने में पांच से सात साल तक का समय लगता है, अपने देश में ही कुछ अल्पकालिक उपायों की आवश्यकता तो होगी ही. कोयले के क्षेत्र में सुधारों पर शंकर समिति की रिपोर्ट में चार साल पहले कई ऐसी समस्याओं की भविष्यवाणी की गई थी और उस समिति की सिफ़ारिशों पर कार्रवाई करने में कुछ समय तो लगेगा ही. अनेक महत्वपूर्ण सवालों पर विचार करना होगा. उदाहरण के लिए पिछले बीस वर्षों में भारतीय कोयला खनन कंपनियों की उत्पादकता में बदलाव कैसे आया? कोयले की आपूर्ति की लाइनें कैसे चलती हैं और इस प्रक्रिया में बाधाएं और विचलन कहां हैं? क्या भारत अपनी घरेलू खानों से इष्टतम मात्रा में कोयला निकाल सकता है? क्या यह संभव है कि वर्तमान क़ानूनी ढांचे के भीतर अधिक खुले कोयला बाज़ार में संक्रमण किया जा सके ? इन सवालों पर गंभीरतापूर्वक विचार करने के बाद ही पिछले कुछ वर्षों से इस क्षेत्र में चली आ रही समस्याओं के लगातार समाधान की कोशिशें रंग ला पाएंगी.
काला हीरा यानी कोयले का कारोबार भी उसी की तरह काला है। कोयले के काला बाजार में सफेदपोशों की चलती है जिसके कारण यह माफियाओं की पहली पसंद बन गया है। एक अनुमान के अनुसार देश में करीब 20 फीसदी कोयला काला बाजारी की भेंट चढ़ जाती है। अकेले मध्य प्रदेश में हर साल करीब 350 करोड़ का कोयला तस्करी के माध्यम से बाजारों में पहुंच रहा है।
मध्य प्रदेश में कई कोयला खदानें हैं और इन खदानों का कोयला देश भर में भेजा जाता है। कोयले के इस कारोबार में खदान से लेकर कोल डिपो और परिवहन प्रक्रिया के दौरान भारी मात्रा में कोयला चोरी होता है और अच्छी गुणवत्ता के कोयले को चुराकर वजन पूरा करने के लिए कोयले के ढेर में पत्थर और कचरा मिलाया जाता है। यही पत्थर और कचरायुक्त कोयला बिजली संयंत्रों को भेजा जाता है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से बिजली उत्पादन कंपनियों के आला अफसर कई बार शिकायत कर चुके हैं कि राज्य के बिजली संयंत्रों को मिलने वाले कोयले में बड़ी मात्रा में पत्थर और कचरा होता है, जिससे बिजली उत्पादन प्रभावित होता है, लेकिन हक़ीक़त यह है कि कोयला कंपनियां तो अच्छा कोयला ही भेजती हैं। बीच में कोयला परिवहन करने वाले और भंडारण करने वाले कोयला चोरी करते हैं और उसमें पत्थर कचरा मिलाकर वजन पूरा कर देते हैं। इस गोरखधंधे में कोयला कंपनियों और बिजली संयंत्रों के ज़मीनी अधिकारियों की मिली भगत से इंकार नहीं किया जा सकता है। कोयला चोरी करोड़ों रुपयों का लाभदायक धंधा है और इस कमाई का बंटवारा ऊपर से नीचे तक होता है।
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जि़ले में तो कोयला चोरी का बड़ा मामला संसदीय जांच समिति ने पकड़ा भी है, लेकिन मध्य प्रदेश में अभी किसी का ध्यान नहीं गया है। यह चोरी का कोयला उद्योगों, कल कारखानों और कोयला आपूर्ति करने वाली व्यापारिक कंपनियों के भंडार में ही जाता है।
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और बिजली संयंत्रों के आला प्रबंधकों ने मिलावटी कोयले की बार-बार शिकायत करके बिजली संयंत्रों के लिए बेहतर गुणवत्ता वाले कोयले के आयात के समर्थन में माहौल तैयार किया और केंद्र सरकार से आयात की अनुमति भी ले ली है। लेकिन इस बारे में कांग्रेस नेताओं को पूरी आशंका है कि कोयला आयात का धंधा भ्रष्टाचार से प्रेरित है। एक यह भी आशंका जताई जा रही है कि देश में बड़ी मात्रा में हो रही कोयला चोरी को ठिकाने लगाने के लिए कुछ कंपनियां, बिजली संयंत्रों को कोयला बेचने के लिए लालायित हैं और हो सकता है कि मध्य प्रदेश सरकार का आयातित कोयला खरीदने का फैसला भी इन कंपनियों के दबाव का ही नतीजा हो।

देश का 28 प्रतिशत कोयला उत्पादन मध्यप्रदेश से
देश के कोयला उत्पादन का 28 प्रतिशत प्रदेश की धरती से हर साल राष्ट्र को उपलब्ध कराया जाता है। यह मात्रा लगभग 75 मिलियन टन है, लेकिन प्रदेश के बिजली प्लांटों के लिए 17 मिलियन टन कोयला भी प्रदेश को केंद्र सरकार नहीं दे रही है। प्रदेश में बिजली उत्पादन का मुय स्रोत कोयला ही है। बिजली प्लांटों के लिए कोयला केंद्र सरकार उपलब्ध कराती है। कोल इंडिया लिमिटेड यह मात्रा तय करती है। प्रदेश के बिजली प्लांटों के लिए केंद्र सरकार ने लगभग 17 मिलियन टन कोयला आपूर्ति का कोटा तय किया है, लेकिन पिछले तीन सालों से प्रदेश को लगभग 13-14 मिलियन टन कोयला ही मिल पा रहा है। कोयले की आवंटित मात्रा उपलब्ध कराने के लिए 2009 में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सारणी से कोयला यात्रा भी निकाली थी।
मप्र के कोयला उत्पादन में भारी कमी के आसार
पुरानी खदानों के बंद होने और नये कोल ब्लॉकों में उत्पादन शुरू न होने से राज्य में कोयले के उत्पादन में भारी कमी होने जा रही है। उत्पादन में होने वाली यह संभावित कमी राज्य सरकार के लिए चिंता का विषय बन गई है क्योंकि खनन से मिलने वाली कुल रॉयल्टी में कोयले का हिस्सा 60 फीसदी होता है।
मध्य प्रदेश के सिंगरौली जिले में कई कोयला खदानें है। इसमें से सबसे बड़े कोल रिजर्व वाली झिंगुरदाह खदान जल्द ही बंद होने वाली है। एनसीएल की गोरबी खदान में भी कोयला कम बचा हुए है। प्रदेश के सिंगरौली की सभी खुली खदानेंं है, यहां के अलावा प्रदेश की ज्यादातर खदाने भूमिगत है और काफी पुरानी है। प्रदेश में फिलहाल कोल इंडिया की तीन सहायक कंपनियां एनसीएल, एसईसीएल और डब्ल्यूसीएल की कुल छह खदानें है।
दूसरी ओर प्रदेश के नये कोल ब्लॉकों में अभी तक कोल उत्पादन शुरू नहीं हुआ है तथा अगले दो सालों तक उनके शुरू होने की कोई संभावना भी नहीं है। प्रदेश में विभिन्न पॉवर कंपनियों को 22 कोल ब्लॉक आवंटित किये गये है, जिनका अनुमानित कोल भंडार 3100 मिलियन टन का है। ये ब्लॉक सिंगरौली, शहड़ोल, उमरिया, अनूपपुर और छिंदवाड़ा में है। जिन कंपनियों को यह आवंटित किये गये है उनमें रिलायंस एनर्जी लिमिटेड, एस्सार पॉवर, मध्य प्रदेश राज्य खनिज निगम, राष्ट्रीय खनिज विकास निगम, जे.पी.एसोसिएटस, ए.सी.सी. लिमिटेड शामिल है।
आज की स्थितियों को देखते हुए तय माना जा रहा है कि जब तक नये कोल ब्लॉकों में उत्पादन शुरू नहीं होगा, प्रदेश में कुल कोयला उत्पादन नहीं बढ़ेगा। ऐसी स्थिति में राज्य को कोयले से होने वाली रॉयल्टी में भी कमी आयेगी। चालू वित्त वर्ष में नवंबर महीने तक कुल रॉयल्टी 2086 करोड़ रुपये है, इसमें करीब 1079 करोड़ रुपये इन्फ्रास्ट्रक्चर फंड के रुप में आया है। इस तरह से खनन की रॉयल्टी 1007 करोड़ रुपये है। इसी दौरान कोयले से मिलने वाली रॉयल्टी 619 करोड़ रुपये है। सरकार इसी राशि में होने वाली कमी को लेकर परेशान है।
कोयला जितना काला है उससे अधिक इस धंधे में लगे लोग काले हैं। ब्लैक डायमंड के नाम से प्रख्यात कोयले के काले कारोबार ने रातों ही रात में कईयों को फर्श से उठाकर अर्श पर ला खड़ा किया है। कोयले के कारोबार में मापदंडों का जिस प्रकार उल्लंघन हो रहा है उससे पर्यावरण भी दूषित हो रहा है। सिंगरौली में 22 सितंबर को ग्रीनपीस द्वारा सार्वजनिक सभा में एक रिपोर्टे जारी की गई। रिपोर्टर को जारी करते हुए ग्रीनपीस की प्रिया पिल्लई ने कहा सिंगरौली पर पर्यावरण एवं मानवाधिकार के हनन के निशान दिखाई देते हैं। हमारी रिपोर्ट देश की विधुत राजधानी में छाए प्रदुषण एवं विनाश को बेनकाब करती है।
चारों तरफ कोयला की धूल के बीच पुरा जन-समुदाय कोयला खदानों के भारी बोझ के साये में जी रहा है।उन्होंने अपनी जमीन विधुत उत्पादन के लिए दी जो उन तक नहीं पहुँचती है और अब उनके पास जीविकोपार्जन के लिए कोई भरोसेमंद साधन नहीं तथा स्वास्थ्य चौपट हो गया है। इसे विकास नहीं कहा जा सकता। धरती और लोगो की इतने व्यापक पैमाने पर हो रही बरबादी को हम नजऱअंदाज़ नहीं कर सकते जिसे उनके अधिकारों की रक्षा किए बिना और हमारे द्वारा किए जा रहे पर्यावरण के अतिक्रमण की सीमा तय किए बिना उन पर थोपा जा रहा है।
यह हजारों हेक्टेयर सघन वनों का सवाल है, हाशिए पर पड़े हजारों आदिवासी एवं दुसरे समुदाय तथा इस क्षेत्र का सम्पूर्ण पारिस्थिकी तन्त्र खतरे में है। फिर भी महज कुछ टन निम्नस्तरीय कोयले के लिए सरकार यहां की समृद्ध जैव विविधता का विनाश करने पर तुली हुई है। कोयला से काला' नामक एक रिपोर्ट आज बैधन की एक सार्वजनिक सभा में जारी की गई। इस सभा में कोयला खनन एवं थर्मल पावर प्लांटों से प्रभावित गांवों के लोग और वैसे लोग जिनके गांवों में खनन या औद्योगिक परियोजनाएँ प्रस्तावित हैं, उपस्थित थे।
यह रिपोर्ट ग्रीनपीस द्वारा जुलाई 2011 में गठित एक तथ्य आंकलन दल (फैक्ट फाइंडिंग मिशन)(1) का नतीजा है। इसमें पर्यावरण एवं इस क्षेत्र के लोगों पर अनियंत्रित कोयला खनन तथा ताप बिजली संयंत्र (थर्मल पावर प्लांटों) के प्रभाव को दर्ज किया गया है। इस तथ्य आंकलन दल को देश की विद्युत राजधानी के तौर पर प्रोत्साहित, सिंगरौली, में कोयला खनन के कारण हो रहे मानवीय उत्पीडऩ एवं पर्यावरण के विनाश की सच्चाई को सामने लाने के लिए गठित किया गया था।
रिपोर्ट को जारी करते हुए ग्रीनपीस की प्रिया पिल्लई ने कहा, ''सिंगरौली पर पर्यावरण एवं मानवाधिकार के हनन के निशान दिखाई देते हैं। हमारी रिपोर्ट, देश की विद्युत राजधानी माने जाने वाले सिंगरौली, में छाए प्रदूषण एवं विनाश को बेनकाब करती है। चारों तरफ कोयले की धूल के बीच पूरा जन-समुदाय कोयला खदानों के भारी बोझ के साये में जी रहा है। उन्होंने अपनी जमीनें विद्युत उत्पादन के लिए दीं जो उन तक नहीं पहुंचती है और अब उनके पास जीविकोपार्जन के लिए कोई भरोसेमंद साधन नहीं है तथा उनका स्वास्थ्य चौपट हो गया है। इसे विकास नहीं कहा जा सकता। धरती और लोगों की इतने व्यापक पैमाने पर हो रही बरबादी को हम नजरअंदाज नहीं कर सकते जिसे उनके अधिकारों की रक्षा किए बिना और हमारे द्वारा किए जा रहे पर्यावरण के अतिक्रमण की सीमा तय किए बिना उन पर थोपा जा रहा है।''
इस तथ्य आंकलन दल के निष्कर्ष महत्वपूर्ण हैं, खासकर मंत्रियों के समूह (जीओएम) द्वारा कोयला खनन के लिए वन प्रखंडों के आवंटन की स्वीकृति के संदर्भ में। केवल सिंगरौली में ही, माहन, छत्रसाल, अमेलिया एवं डोंगरी टाल-2 के वन प्रखंडों को पहले 'वर्जितÓ (नो-गो) की श्रेणी में रखा गया था। लेकिन अब इस विषय में मंत्रियों के समूह की ओर से स्वीकृति की प्रतीक्षा की जा रही है। हाल ही में कुछ खबरों के अनुसार मंत्रियों के समूह द्वारा 'वर्जितÓ व 'गैर वर्जितÓ (गो) क्षेत्र का सीमांकन रद्द किया जा सकता है। जब तक अक्षत वनों का सीमांकन नहीं किया जाता, इन वनों और लोगों की जमीन पर अधिग्रहण का खतरा बढ़ता रहेगा।
आधिकारिक तौर पर, 1980 में वन संरक्षण अधिनियम लागू होने के बाद से सिंगरौली क्षेत्र में 5,872.18 हेक्टेयर वन का गैर-वन्य उपयोग के लिए विपथन किया जा चुका है। सिंगरौली के वन प्रमंडल अधिकारी के अनुसार और भी 3,299 हेक्टेयर वन विपथन के लिए प्रस्तावित है। इसमें वर्तमान एवं प्रस्तावित औद्योगिक गतिविधियों के कारण वन-भूमि के अतिक्रमण के विभिन्न उदाहरण शामिल नहीं हैं।
फिलहाल, प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से माहन के वनों को एस्सार एवं हिंडाल्को के खनन स्वामित्व में हस्तांतरित करने के लिए बेहद दबाव दिया जा रहा है। पूर्व पर्यावरण एवं वन मंत्री, जयराम रमेश ने संकेत दिए थे कि इन वनों में खनन नही किया जाना चाहिए। माहन में उपलब्ध कुल 144 मिलियन टन का कोयला भंडार हिंडाल्को इंडस्ट्रीज लिमिटेड एवं एस्सार पावर लिमिटेड के ताप बिजली संयंत्र के लिए केवल 14 वर्षों तक कोयले की आपूर्ति के लायक हैं।
ग्रीनपीस इंडिया की नीति अधिकारी प्रिया पिल्लई ने आगे कहा, ''यह हजारों हेक्टेयर सघन वनों का सवाल है, हशिए पर पड़े हजारों आदिवासी एवं दूसरे समुदाय तथा इस क्षेत्र का संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र खतरे में हैं। फिर भी, महज कुछ टन निम्नस्तरीय कोयले के लिए सरकार यहां की समृद्ध जैव विविधता का विनाश करने पर तुली हुई है। वन भूमि के और अधिक विपथन के पहले सरकार को दूसरे क्षेत्रों में कोयले की उपलब्धता एवं वैकल्पिक ऊर्जा समाधानों का आंकलन करना चाहिए। कंपनियों को भी चाहिए कि वे प्रभावित समुदायों की आजीविका पर ध्यान दें, मानवाधिकारों पर हो रहे असर का आंकलन करें, भूमिहीनों एवं वन-आश्रित समुदायों की क्षतिपूर्ति तथा पुनर्वास की व्यवस्था करें।''
तथ्य आंकलन दल ने 9 एवं 10 जुलाई 2011 को सिंगरौली के उत्तर प्रदेश वाले इलाके में चिलिका दाड, दिबुलगंज (अनपरा थर्मल पावर प्लांट के निकट), बिलवाड़ा और सिंगरौली क्षेत्र के मोहर वन प्रखंड, अमलोरी एवं निगाही खदानों का दौरा किया। इस दल ने जनपद प्रशासन एवं कोल इंडिया लिमिटेड के प्रतिनिधियों से भी मुलाकात की।
रिपोर्ट में शामिल सूचनाओं के अनुसार देश में चुनिंदा 88 अति प्रदूषित औद्योगिक खण्ड के विस्तृत पर्यावरण प्रदूषण सूचकांक पर सिंगरौली नौवें स्थान पर है। इसके 81.73 अंक यह साफ-साफ संकेत करते है कि यह क्षेत्र खतरनाक स्तर पर प्रदूषित है। दरअसल, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान (एनआईएच) और भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (भेल) के प्रदूषण नियंत्रण अनुसंधान संस्थान (पीसीआरआई) की रिपोर्ट साफ-साफ संकेत करती है कि कोयला खनन के कारण सिंगरौली क्षेत्र में भू-जल का प्रदूषण हुआ है।
इसके अतिरिक्त, ' इलेक्ट्रिसिटे द फ्रांसÓ की एक अप्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार उत्पादन के लिए निम्नस्तरीय कोयले के उपयोग के कारण सिंगरौली के थर्मल पावर प्लांटों से हर साल लगभग 720 किलोग्राम पारा (मर्करी) निकलता है। अनेक गांवों में और यहां तक कि नॉदर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (एनसीएल) के उच्च अधिकारियों के द्वारा भी, तथ्य आंकलन दल को बताया गया कि चूंकि उनका दौरा बरसात के मौसम में हुआ है इसलिए वायु का गुणवत्ता स्तर काफी बेहतर था। सामान्यत:, और खासकर गर्मी के महीनों में वायु की गुणवत्ता का स्तर काफी खराब होता है। राख के तालाबों और खदानों के आस-पास रहने वाले ग्रामवासियों ने कहा कि उन महीनों में उनका जीवन नर्क हो जाता है। इसके फलस्वरूप, सिंगरौली गांव के लोगों को अनेक तरह की स्वास्थ्य समस्याएँ रहती हैं जिनमें सांस की तकलीफ, टीबी, चर्मरोग, पोलियो, जोड़ों में दर्द और अचनाक कमजोरी तथा रोजमर्रा की सामान्य गतिवधियों को करने में कठिनाई जैसी अनेक समस्याएं हैं।
इस रिपोर्ट में इस बात को भी उजागर किया गया है कि किस तरह विभिन्न खनन एवं औद्योगिक गतिविधियों ने ग्रामीण जीवन को नुकसान पहुंचाया है लेकिन इन गतिविधियों के संचालकों से किसी ने भी स्वास्थ्य सेवा एवं बुनियादी सुविधाओं को मुहैया कर लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ रहे कुप्रभाव को कम करने की जिम्मेदारी नहीं ली है। उदाहरण के लिए, सोनभद्र जनपद (उत्तर प्रदेश में) के शक्तिनगर में चिलिका दाड गांव को लें जो नैशनल कोलफील्ड्स लिमिटेड (एनसीएल) के मिट्टी के ढेर, कोयला ढोने वाली रेलवे लाइन और राष्ट्रीय ताप विद्युत निगम के पावर प्लांट से घिरा है और यहां जल को प्रदूषित करने, वायु को प्रदूषित करने एवं स्वीकृत मानदंड से अधिक शोर पैदा करने में इनमें से हरेक की भूमिका है।
केवल अकेले चिलिका दाड में ही 600 ऐसे परिवार हैं जिन्हें इन विभिन्न परियोजनाओं के कारण अनेक बार विस्थापित होना पड़ा है। इन निवासियों को आवासीय पट्टे दिए गए केवल उस पर रहने के अधिकार के साथ। वे न तो इस जमीन को बेच सकते हैं और न ही इसके एवज में कोई कर्ज ले सकते हैं। अब इस गांव से महज 50 मीटर की दूरी पर भारी संख्या में खदानों, बेरोजगारी, उच्चस्तरीय प्रदूषण एवं खनन विस्फोट का खतरा झेल रहे ग्रामीणों के सामने बदहाली को झेलने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचा है।
तथ्य आंकलन दल इस बात की सिफारिश करता है कि जब तक अन्य क्षेत्रों में कोयले की उपलब्धता एवं वैकल्पिक ऊर्जा समाधानों का आंकलन न हो जाए तब तक के लिए सिंगरौली के वन क्षेत्र में सभी खनन गतिविधियों पर रोक लगाई जाए। दल यह भी सिफारिश करता है कि सभी खनन एवं औद्योगिक गतिविधियों का व्यापक मानवाधिकार आंकलन किया जाए और लोगों की शिकायतें दूर करने के लिए जमीनी स्तर पर कारवाई की जाए। इस दल ने महसूस किया है कि दशकों से सिंगरौली में प्रभावित जन समुदायों की आजीविका का सवाल बुनियादी तौर पर अनुत्तरित ही रहा है। इस मोर्चे पर तथ्य आंकलन दल ने सुझाव दिया है कि लोग अपनी पूर्ववर्ती आजीविका को जारी रख सकें, इस पर प्रशासन को ध्यान देना चाहिए। इसके लिए भूमि-आधारित क्षतिपूर्ति व्यवस्था लागू की जाए जिसके माध्यम से अधिग्रहीत की गई कृषि भूमि के बदले में किसी दूसरी जगह कृषि भूमि प्रदान की जाए।
भिलाई इस्पात संयंत्र में काले हीरे की कालाबाज़ारी इस तरह चलती है कि प्रतिवर्ष अरबों रुपये का लेनदेन अधिकारियों, कर्मचारियों और पुलिस के साथ मिलकर खुलेआम कर लिया जाता है. इस धंधे में लगे हुए ठेकेदार कहने को तो कोयले की बुहारन यानी शेष बचा हुआ कोयला बटोरते हैं, पर इसी के भरोसे छत्तीसगढ़ में एक नया कोल मा़फिया लंबे समय से सक्रिय है. इस पर लगाम लगाने की न कभी कोशिश की गई और न ही इसे गंभीरता से लिया गया. पिछले बीस वर्षों में इस धंधे से 350 करोड़ रुपये से अधिक की अवैध कमाई की गई है.
भिलाई से लेकर बिहार और झारखंड तक इस्पात कारखानों में कोल माफिया रेलवे, आरपीएफ, इस्पात संयंत्रों के अधिकारियों-कर्मचारियों और सुरक्षातंत्र के साथ मिलकर यह अवैध कारोबार कर रहे हैं, जिसे हर स्तर पर राजनीतिक संरक्षण हासिल है. भिलाई इस्पात संयंत्र को बिहार, झारखंड और कोरबा की खानों से निकलने वाला कोयला आपूर्ति किया जाता है, जो मालगाड़ी के माध्यम से यहां तक पहुंचता है. जानकारी के अनुसार, एक मालगाड़ी में 6 से 10 वैगन तक होते हैं और एक वैगन में 18 से 60 टन कोयला भरा होता है. जैसे ही मालगाड़ी यार्ड में पहुंचती है, ट्रांसपोर्ट एवं डीजल विभाग, मैटेरियल विभाग, कोक ओवन विभाग मिलकर कोयला रिसीव करते हैं और डिब्बा खाली होने का क्लियरेंस देते हैं. इसके बाद डिब्बे में पड़े कोयले का चूरा, जिसे बुहारन कहा जाता है, साफ़ करने की प्रक्रिया शुरू होती है. इसी बुहारन के ज़रिए ही भिलाई इस्पात संयंत्र से प्रतिवर्ष 350 करोड़ रुपये का चूना लगाया जाता है. भिलाई स्टील प्लांट में काम करने वाला ठेकेदार अग्रवाल, जिसका पूरा नाम ज्ञात नहीं है, इस बुहारन को पिछले कई वर्षों से लगातार साफ़ कर रहा है. इस ठेकेदार ने 60-70 मज़दूर लगा रखे हैं, जो बेलचे से बुहारन एकत्र करने का काम करते हैं. प्रत्येक मज़दूर को 90 रुपये प्रतिदिन मज़दूरी दी जाती है. एक महीने में मज़दूरों का भुगतान एक लाख 79 हज़ार रुपये के आसपास होता है. इतनी बड़ी राशि के लिए इस बुहारन का बाज़ार भाव 200 से 250 रुपये प्रति टन होता है. प्रतिमाह भिलाई इस्पात संयंत्र में 30 मालगाडिय़ां डाउनलोड होती हैं. यानी 250 टन प्रतिमाह. बारह माह में 60 हज़ार टन बुहारन मालगाडिय़ों से उतारी जाती है, जिसकी कुल क़ीमत करोड़ों में होती है. इस बुहारन के साथ योजना के अनुसार अच्छा कोयला भी डिब्बे में छोड़ दिया जाता है, जो खुले बाज़ार में अतिरिक्त रूप से बेच दिया जाता है.

पिछले बीस वर्षों के दौरान लगभग 350 करोड़ रुपये का माल तस्करों द्वारा ग़ायब कर दिया गया. यह मात्र अनुमान है. सूत्रों के अनुसार, बिना टेंडर के बेचे जाने वाले इस माल के व्यापार में लगभग हर स्तर के अधिकारी और कर्मचारी को मुंह बंद करने की पूरी क़ीमत दी जाती है. बिना किसी अधिकार के ठेकेदार द्वारा बीस वर्षों की अवधि में कितना माल निकाल कर बाज़ार में बेचा गया, इसका हिसाब इस्पात संयंत्र या रेलवे के किसी भी अधिकारी के पास नहीं है. इस संदर्भ में चौथी दुनिया ने जब विभिन्न विभागीय अधिकारियों से चर्चा करनी चाही तो अफ़सर कन्नी काट गए. भिलाई इस्पात संयंत्र के जनसंपर्क अधिकारी जेकब कुरियन का कहना है कि हमें भी कोयले की कमी की शिकायतें मिल रही हैं. हालांकि इस्पात संयंत्र का ट्रांसपोर्ट और डीजल विभाग डिब्बों को खाली कराता है. उन्होंने कहा कि प्रबंधन खुद ही अपनी निगरानी में क्लीनिंग कराएगा.
भिलाई इस्पात संयंत्र में कोयले की तस्करी का सिलसिला विभिन्न स्तरों पर निरंतर जारी है. प्रबंधन यदि जाग भी जाए तो अवैध रूप से पैसा कमाने का आदी हो चुका तंत्र उसे सक्रिय नहीं होने देगा.
झारखंड की सत्ता संस्कृति कमोबेश कोयले और लोहे के अवैध धंधे से ही ऊर्जा प्राप्त करती है. यह धंधा राज्य के ताक़तवर नेताओं और आला अधिकारियों के संरक्षण में बड़े ही संगठित रूप से संचालित होता है. कोल इंडिया की दो अनुशंगी कंपनियां भारत कोकिंग कोल लिमिटेड और सेंट्रल कोलफील्ड लिमिटेड की खदानें पूर्ण रूप से और ईस्टर्न कोलफील्ड लिमिटेड की कुछेक खदानें झारखंड की सीमा के अंदर आती हैं. इन इलाक़ों में एक प्रचलित शब्द है डिस्को पेपर. इसका इस्तेमाल चोरी के कोयले को सड़क मार्ग से मंडी तक पहुंचाने के ग़ैर सरकारी परमिट के रूप में किया जाता है. रास्ते में पडऩे वाले पुलिस थानों से लेकर तमाम सरकारी महकमे को इसकी जानकारी रहती है. यह एक सांकेतिक टोकन होता है, जिसे कोयला माफिया हर दिन बदल देता है. प्राय: दस या बीस रुपये के नोटों की गड्डी से एक-एक नोट को निकालकर आधा फाड़ दिया जाता है और चोरी का कोयला ले जाने वाले ट्रक को निर्धारित फीस के एवज में दिया जाता है. किस इलाक़े से किस सीरीज़ के नोट जारी किए गए हैं, सुबह माफिया के गुर्गे रास्ते के तमाम थानों को सूचित कर देते हैं. ट्रक वालों को सफिऱ् इसे दिखाना होता है. उन्हें हर थाना क्षेत्र में वीआइपी ट्रीटमेंट मिलता है. वैध कोयले से लदी गाड़ी भले ही रोक ली जाए, लेकिन अवैध कोयले की गाडिय़ों को कोई नहीं रोकता. कारण, हर सप्ताह माफिया की तरफ़ से बंधी बंधाई रकम का पैकेट उन तक पहुंच जाता है. पुलिस की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिये कभी-कभी मैच फिक्सिंग के अंदाज़ में कोयले की बरामदगी भी करा दी जाती है.
कोल इंडिया की दो अनुशंगी कंपनियां भारत कोकिंग कोल लिमिटेड और सेंट्रल कोलफील्ड लिमिटेड की खदानें पूर्ण रूप से और ईस्टर्न कोलफील्ड लिमिटेड की कुछेक खदानें झारखंड की सीमा के अंदर आती हैं. इन इलाक़ों में एक प्रचलित शब्द है डिस्को पेपर. इसका इस्तेमाल चोरी के कोयले को सड़क मार्ग से मंडी तक पहुंचाने के ग़ैर सरकारी परमिट के रूप में किया जाता है. रास्ते में पडऩे वाले पुलिस थानों से लेकर तमाम सरकारी महकमे को इसकी जानकारी रहती है. यह एक सांकेतिक टोकन होता है, जिसे कोयला माफिया हर दिन बदल देता है.
झारखंड के कोयला खदान क्षेत्रों से लेकर हाइवे तक कार्य विभाजन के आधार पर धंधे का संचालन होता है. माफिया, पुलिस, औद्योगिक सुरक्षा बल और स्थानीय जनप्रतिनिधियों के संरक्षण में कुछ दबंग किस्म के अपराधकर्मी बंद खदानों में अवैध उत्खनन कराते हैं. इसमें प्राय: स्थानीय गऱीब बेरोजग़ारों को दैनिक मज़दूर के रूप में लगाया जाता है. असुरक्षित और अवैज्ञानिक खनन कार्य के कारण दुर्घटनाएं भी होती रहती हैं, जिसमें मौतें भी हो जाती हैं, लेकिन प्राय: स्थानीय ग्रामीण शवों को हटा लेते हैं और चुपके से अंतिम संस्कार कर देते हैं. अवैध उत्खनन में लिप्त होने की बात कोई स्वीकार नहीं करता. प्रतिदिन अवैध उत्खनन से उत्पादित कोयले को अवैध डिपो में एकत्र किया जाता है. जंगल, पहाड़ और आबादी से जऱा हटकर बने इन डिपो का संचालन भी माफिया के गुर्गों की टीम के जि़म्मे रहता है. स्थानीय ग्रामीण कोयला खदानों से कोयला चुराकर साइकिलों पर लादकर इन्हीं डिपो में लाकर बेचते हैं. इसके एवज में उन्हें भरण-पोषण भर रकम मिल जाती है. पुलिस वाले भी इन्हीं को परेशान करते हैं और अवैध वसूली करते हैं. रोजग़ार के अभाव में ग्रामीण इस अवैध धंधे में शामिल हो जाते हैं. स्थानीय थाने को प्रति ट्रक एक हज़ार से तीन हज़ार तक नजऱाना दिया जाता है. हाइवे के पहले पडऩे वाले थानों को भी प्रति ट्रक की दर से नजऱाना तय रहता है. डिस्को पेपर हाइवे में प्रभावी होता है. कोयलांचल के पुलिस थानों की प्रतिदिन की कमाई लाखों में होती है, इसीलिये इन थानों में पोस्टिंग के लिए पुलिस अधिकारी मुंहमांगी रकम देने को तैयार रहते हैं. इस धंधे में पुलिस, पत्रकार, नेता और यहां तक की नक्सलियों का भी हिस्सा रहता है, जिसे पूरी ईमानदारी के साथ निर्धारित अवधि में बांट दिया जाता है. पुलिस थानों के प्रभारी अपने आला अधिकारियों को इसका हिस्सा पहुंचाते हैं. माफिया की तरफ से पुलिस, प्रशासन और राजधानी के आकाओं को अलग से पैकेट भेजा जाता है. शायद ही कोई ऐसा राजनीतिक दल हो जिसके शीर्ष नेताओं को उनकी हैसियत के मुताबिक़ थैली न पहुंचाई जाती हो. ऐसा नहीं कि यह धंधा अनवरत रूप से चलता हो. चुनाव के पूर्व या केंद्र के ज़्यादा दबाव बढऩे पर कुछ समय के लिए इसका पैमाना घटा दिया जाता है. ऐसे मौक़ों पर सरकार की छवि सुधारने के लिए ईमानदार और कड़े प्रशासकों का पदस्थापन कोयलांचल के इलाकों में किया जाता है. फिर माहिर अधिकारियों को भेजकर धंधे का दायरा बढ़ा दिया जाता है.
चोरी के कोयले को मंडी तक पहुंचाने का काम भी कुछ खास ट्रक मालिक करते हैं. उन्हें सामान्य से अधिक भाड़ा मिलता है और रास्ते में कोई परेशानी नहीं होती. कोयला माफिया के पास ऐसे ट्रकों की लिस्ट रहती है. वे हर ट्रिप के बाद माफिया के यहां उपस्थिति दर्ज करा देते हैं. उन्हें दिन के व़क्त ही बता दिया जाता है कि किस डिपो से लोड लेना है. शाम ढलने के बाद इनपर कोयले की लदाई होती है और देर रात वे हाइवे पकड़ लेते हैं. अधिकांश कोयला डिहरी और बनारस की मंडियों में खपाया जाता है, जहां से इसे देश के दूसरे इलाक़ों के कोयला व्यापारी खरीद ले जाते हैं.

कोयला चोरी को रोकने की बात हर सरकार करती है. इसके लिये तरह-तरह के उपाय भी किए जाते हैं. कभी टास्क फोर्स बनाई जाती है तो कभी लगातार छापेमारी की जाती है. कभी चिन्हित कोयला तस्करों को गिरफ्तार कर जेल में भी डाला जाता है. लेकिन सब सफिऱ् दिखावे के लिये. सत्ता में बैठे लोगों के खाने के दांत और दिखाने के दांत अलग रहते हैं. एक अनुमान के अनुसार प्रतिवर्ष कऱीब 1000 करोड़ का कोयला चोरी से मंडियों तक पहुंचाया जाता है. कुछ बड़े तस्करों का जाल तो नेपाल और चीन तक बिछा हुआ है. चोरी का कोयला स्थानीय स्तर पर भी रोलिंग मिलों, ईंट भ_ों आदि में धड़ल्ले से खपाया जाता है. उन्हें यह कोयला सस्ता पड़ता है. चोरी का कोयला खपाने वाले कल-कारखानों का नजऱाना भी स्थानीय स्तर से राजधानी तक पहुंचता है. बहरहाल, काले हीरे के काले धंधे में कई सफ़ेदपोश लाल हो रहे हैं. इसे कोई स्वीकार करे न करे, लेकिन कोयले की दलाली में अच्छे-अच्छों के हाथ काले हो रहे हैं, जिसे वे तरह-तरह के दास्त

Sunday, January 8, 2012

नौकरशाहों के निजी क्षेत्र प्रेम पर लगेगा अंकुश





निजी क्षेत्र का मोहपाश नौकरशाहों को वर्षो से अपनी ओर आकर्षित करता रहा है। यही कारण है कि वर्ष 2001 के बाद से 100 से अधिक नौकरशाहों ने निजी क्षेत्र की नौकरी पकडऩे की खातिर सरकारी नौकरी से या तो स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली या फिर रिटायरमेंट के बाद निजी क्षेत्र का रूख किया है। कैरियर के बीच में नौकरी छोड़ देना आईएएस एवं आइपीएस अधिकारियों के लिए कोई नई बात नहीं है,लेकिन प्रशासनिक सेवा से रिटायर होकर निजी क्षेत्र में शानदार नौकरियां तलाशने वाले नौकरशाहों को तगड़ा झटका लगने वाला है। मौजूदा नियम के मुताबिक, सरकारी अफसर रिटायरमेंट के बाद, कम से कम एक साल तक निजी क्षेत्र में नौकरी नहीं कर सकते हैं। इस एक साल की अवधि को कूलिंग ऑफ पीरियड कहा जाता है। घोटालों की शृंखला से जूझती केंद्र सरकार इस अवधि को बढ़ाकर तीन साल करना चाहती है। केंद्रीय मंत्री वी नारायणस्वामी के नेतृत्व में कार्मिक एवं प्रशिक्षण मंत्रालय मौजूदा नियम में बदलाव को अंतिम रूप दे रहा है, ताकि जल्द ही उसे कैबिनेट से मंजूरी मिल सके।
ऐसे मामलों में हमेशा ही निहित स्वार्थ की संभावना बनी रहती है। हम इसे रोकना चाहते हैं। हम कूलिंग ऑफ पीरियड को फिर से तीन साल करना चाहते हैं। सात-आठ साल पहले इसे घटा कर एक साल कर दिया गया था। इस तर्क के पीछे यह सवाल छुपा हुआ है कि क्या आईएएस अफसरों को निजी क्षेत्र में काम करने की इजाजत दी जानी चाहिए? खासकर तब, जबकि लॉबिंग उसके काम का महत्वपूर्ण हिस्सा हो। हालांकि अपनी सीमाओं के बावजूद, मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने सरकारी अफसरों की निष्ठा और आचार संहिता बनाए रखने के लिए अपने तई भरसक प्रयास किए हैं।
लेकिन यह बात भी पूरी तरह सही है कि रिटायरमेंट के बाद निजी क्षेत्र में नौकरी करने की इछा रखने वाले अफसरों के आग्रह को सरकार बहुत अच्छे ढंग से मैनेज नहीं कर पाई है। देखा जाए तो मनमोहन सरकार कूलिंग ऑफ पीरियड के नियम लागू करने के मामले में काफी ढीली साबित हुई है, जबकि रिटायर होने वाले अफसरों के लिए इन नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है। मिसाल के तौर पर इन मामलों पर एक नजर डालते हैं।
दरअसल, कॉरपोरेट रणक्षेत्र में प्रतिस्पर्धा के बीच ख़ुद को बचाए रखने और आगे बढ़ाने के लिए कंपनियों के पास दो ही विकल्प हैं- या तो वे नेताओं और अफ़सरों को रिश्वत दें या फिर अवकाश प्राप्त अफ़सरों को अपने यहां नौकरी पर रखें जो उनके लिए राजनीतिक और अफ़सरशाही वर्ग से निपट सकें। पहले की तुलना में दूसरा विकल्प बहुत तेजी से लोकप्रिय होता जा रहा है। निजी क्षेत्रों में आकर्षक तनख्वाह और भारतीय प्रशासनिक सेवा एवं भारतीय पुलिस सेवा की मुश्किल भरी नौकरी सहित विभिन्न कारणों के चलते आईएएस एवं आइपीएस अफसरों के नौकरी छोडऩे का सिलसिला जारी है। बीते तीन साल में 30 अधिकारियों ने आइपीएस की नौकरी छोड़ दी। अखिल भारतीय सेवा में भारतीय पुलिस सेवा (आइपीएस) की नौकरी काफी लोकप्रिय है, बावजूद इसके आइपीएस अफसर करियर के बीच में ही नौकरी छोड़ रहे हैं। बीते तीन सालों के आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि 2008 में 12, 2009 में दस और 2010 में आठ आइपीएस अधिकारियों ने नौकरी छोड़ी।
आईएएस अफसर अशोक मोहन चक्रवर्ती पश्चिम बंगाल के प्रमुख सचिव पद से 30 अप्रैल 2010 को रिटायर हुए। उन्होंने आईएएस कैडर पर नियंत्रण रखने वाले कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) से एस्सार समूह में काम करने की इजाजत मांगी। राज्य सरकार और अन्य संबंधित एजेंसियों से मश्विरे के बाद डीओपीटी ने उन्हें हरी झंडी दिखा दी। चक्रवर्ती ने सात अक्टूबर 2010 को स्थानीय निदेशक के पद पर एस्सार समूह को अपनी सेवाएं देनी शुरू कर दीं। वित्त सचिव पद से रिटायर होने वाले अशोक झा को सरकार ने एक ऑटोमोबाइल कंपनी में सेवा देने की इजाजत दे दी। तीन वरिष्ठ अफसर तो ऐसी कंपनियों से जुड़ गए, जो या तो सीधे तौर पर या फिर परोक्ष रूप से कॉरपोरेट लॉबिंग से जुड़ी थीं। अब इसे संयोग ही कहा जाएगा कि तीनों ही कंपनियां लॉबिंग को लेकर चल रहे हालिया विवाद से किसी न किसी तरह जुड़ी हुई हैं। ये तीनों कोई मामूली अफसर भी नहीं थे। प्रदीप बैजल विनिवेश सचिव थे, जो बाद में टेलीफोन रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (ट्राई) के चेयरमैन बने। अजय दुआ डिपार्टमेंट ऑफ इंडस्ट्रियल पॉलिसी एंड प्रोमोशन में सचिव थे। इसी तरह सीएम वासुदेव आर्थिक मामलों के सचिव और विश्व बैंक के बोर्ड में भारत की ओर से नामित कार्यकारी निदेशक थे।
पीवी भिड़े 31 जनवरी 2010 को राजस्व सचिव के पद से रिटायर हुए थे। डीओपीटी ने उन्हें पांच कंपनियां ज्वाइन करने की इजाजत दी है। इनमें नॉसिल लिमिटेड, हिडेलबर्ग सीमेंट इंडिया लिमिटेड, ट्यूब इंवेस्टमेंट इंडिया लिमिटेड, एल एंड टी फाइनेंस लिमिटेड और ग्लैक्सो स्मिथक्लाइन फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड शामिल हैं। नरेश दयाल 30 सितंबर 2009 को केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय में सचिव पद से रिटायर हुए थे। जल्द ही उन्होंने ग्लैक्सो स्मिथक्लाइन कंज्यूमर हेल्थकेयर में अनाधिकारिक निदेशक के तौर पर जुडऩे की अर्जी दाखिल कर दी। 21 मई 2010 को उन्हें इजाजत भी दे दी गई।
उत्तर प्रदेश कैडर के 1973 बैच के अफसर अजय शंकर ने 31 दिसंबर 2009 को वित्त एवं उद्योग मंत्रालय से रिटायर होकर निदेशक के पद पर टाटा टी ज्वाइन कर लिया। इसी तरह यूनियन टेरिटरी कैडर के 1969 बैच के अफसर अनिल बैजल 31 अक्टूबर 2006 को शहरी विकास मंत्रालय के सचिव पद से रिटायर हुए। उन्हें 22 जून 2007 को इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फाइनेंस कंपनी के पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप इनिशिएटिव के सलाहकार व चेयरमैन पद पर ज्वाइन करने की इजाजत मिल गई।
तमिलनाडु कैडर के 1975 बैच के अफसर बृजेश्वर सिंह ने हाल में सड़क परिवहन और राष्ट्रीय राजमार्ग मंत्रालय को पत्र लिखकर एल एंड टी बिल्डिंग्स ज्वाइन करने की इजाजत मांगी है। उल्लेखनीय है कि एल एंड टी समूह ने हाल में विभिन्न व्यवसायों को अलग-अलग करने की रणनीति के तहत यह कंपनी बनाई है। मंत्रालय इस बात पर राजी है कि बृजेश्वर सिंह स्वतंत्र निदेशक के रूप में एल एंड टी बिल्डिंग्स ज्वाइन कर सकते हैं।
यूं तो इसमें कहीं कोई गड़बड़ी नजर नहीं आती, मगर शीर्ष नौकरशाहों को इतनी आसानी से इस तरह की इजाजत देने पर त्योरियां चढ़ सकती हैं। हाल में इस मुद्दे पर पुनर्विचार के अलावा सरकार ने कूलिंग ऑफ पीरियड में छूट दिए जाने को लेकर कभी कोई ठोस बचाव पेश नहीं किया। कैबिनेट का मसौदा तैयार करने वाले सरकारी अफसर इस बात की पुष्टि करते हैं कि कूलिंग ऑफ पीरियड के मामले का फिर से अध्ययन किया जा रहा है। नाम न छापने की शर्त पर एक अफसर ने कहा, एक खास तरह का काम है, जिसे करने की इजाजत रिटायर्ड सरकारी अफसरों को नहीं मिलनी चाहिए। फिलहाल तो सरकारी नीतियों में इस तरह के भेद का प्रावधान ही नहीं है। मिसाल के तौर पर, कूलिंग ऑफ पीरियड पूरा होते ही सेना से रिटायर हुए अफसर हथियार बेचने वाली कंपनियों में नौकरी कर सकते हैं। क्या सरकार को उन्हें इस तरह की इजाजत देनी चाहिए? सरकार का मसौदा इसकी भी पड़ताल करेगा कि क्या आईएएस अफसर को ऐसी लॉबिंग फर्म या किसी कंपनी से जुडऩे दिया जाना चाहिए, जिससे उनके अंतिम तीन पदों का कोई लेना-देना रहा हो। सही कहा जाए तो कूलिंग ऑफ पीरियड के फॉर्मूले को ही लॉबिंग में अनैतिकता रोकने के लिए काफी समझना ठीक नहीं होगा।
अधिकारी यह भी कहते हैं कि नीरा राडिया प्रकरण और पूर्व ट्राई अध्यक्ष के रिटायरमेंट के तुरंत बाद कॉरपोरेट लॉबिंग फर्म से जुडऩे का मामला कूलिंग ऑफ पीरियड में बदलाव के बारे में फिर से सोचने का बड़ा कारण बना। ऐसे और भी मामले हैं, जिनमें सेवानिवृत्त अधिकारी ऐसी कंपनियों से जुडऩे की चाहत रखते हैं, जिनके साथ उनका संबंध सरकारी नौकरी में रहते हुए भी था, जैसे कि भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के एक पूर्व अधिकारी एक निर्माण कंपनी से जुडऩा चाहते थे। स्पष्टीकरण मांगने पर पता चला कि एक खास क्षेत्र में उनके रहते हुए उस कंपनी को कई ठेके दिए गए थे। आखिरकार, उन्हें वह कंपनी ज्वाइन करने की इजाजत नहीं मिली।
डीओपीटी एक और नजरिए से भी इस मामले को देख रही है: एक विचार यह भी है कि कूलिंग ऑफ पीरियड इस मसले को पूरी तरह नहीं सुलझा सकता, क्योंकि कई बार रिटायर हो चुके अधिकारी इसे बाईपास करते हुए फुलटाइम कर्मचारी होने की बजाय सलाहकार बनकर कंपनियां ज्वाइन कर लेते हैं। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के बाद से तो यह खास रिश्ता ज्यादा ही चर्चा में आ गया है। सरकार इस गठबंधन को तोडऩे के रास्ते निकालने की दिशा में काम कर रही है। विशेष रूप से, चार पूर्व नौकरशाहों के पीआर कंसल्टेंट और लॉबिस्ट नीरा राडिया के संपर्क में रहने के मामले की बड़ी बारीकी से जांच की जा रही है। यह वही नीरा राडिया हैं, जिनकी फर्म में वैष्णवी कॉरपोरेट कम्युनिकेशंस, नोएसिस स्ट्रैटजिक कंसल्टिंग सर्विसेस, विटकॉम कंसल्टिंग और न्यूकॉम कंसल्टिंग शामिल हैं।
जिन नौकरशाहों पर उंगलियां उठी हैं, उनमें ट्राई के पूर्व अध्यक्ष व पूर्व विनिवेश सचिव प्रदीप बैजल, आर्थिक मामलों के पूर्व सचिव सीएम वासुदेव, इंडस्ट्रियल पॉलिसी एंड प्रमोशन के पूर्व सचिव अजय दुआ और ट्राई के पूर्व सदस्य डीपीएस सेठ शामिल हैं। जैसे ही घोटाला सामने आया, कैबिनेट सचिवालय ने तुरंत नीरा राडिया की फर्म वैष्णवी कम्युनिकेशंस से इनके रिश्तों की पड़ताल की थी। ट्राई से रिटायर होने के बाद बैजल राडिया की फर्म वैष्णवी कम्युनिकेशंस से जुड़ गए थे और फिर राडिया के साथ पार्टनरशिप में नोएसिस कम्युनिकेशन की स्थापना की थी। जब 2जी घोटाला सामने आया, तब बैजल नोएसिस के चेयरमैन थे। माना जा रहा है कि डीओपीटी अब रिटायर होते ही कूलिंग ऑफ पीरियड से छूट मांगने वाले नौकरशाहों के आग्रह पर सख्त रवैया अपनाएगा। डीओपीटी के अधिकारियों का कहना है कि उन्हें हर महीने ऐसे 10-12 प्रार्थनापत्र जरूर मिलते हैं और कोई आश्चर्य नहीं कि इनमें से ज्यादातर आर्थिक मंत्रालयों से जुड़े नौकरशाहों के होते हैं। विभाग ने अब तक काफी नर्म रवैया अपनाया है, मगर हाल के दिनों में सामने आए इन मामलों ने उसे और सावधानी बरतने पर मजबूर कर दिया है।

उदाहरण के लिए जरा इन दो मामलों पर एक नजर डालिए

हाल में, विभाग ने भारतीय राजस्व सेवा (आईआरएस) से सात महीने पहले रिटायर हुए एक अधिकारी का आग्रह ठुकरा दिया, जिन्हें दो निजी कंपनियों से 30-30 लाख रुपये प्रति माह के ऑफर मिले थे। इसी तरह के एक अन्य मामले में विभाग ने शहरी विकास मंत्रालय से रिटायर हुए एक अधिकारी को निर्माण कार्य करने वाली एक निजी कंपनी से जुडऩे की इजाजत नहीं दी। बाद में जांच से पता चला कि इस अधिकारी के कार्यकाल में उस निजी कंपनी को मंत्रालय की तरफ से कई ठेके दिए गए थे।पर एस्सार समूह से जुड़े पश्चिम बंगाल के पूर्व प्रमुख सचिव चक्रवर्ती अधिकारियों के निजी कंपनियों से जुडऩे को अनुचित नहीं मानते। वह कहते हैं, इसमें किसी तरह की गड़बड़ी कैसे हो सकती है? किसी भी अधिकारी को अनुमति देने से पहले सरकार ऐसे सभी पहलुओं की जांच करती है। एस्सार समूह से जुडऩे से पहले मुझे भी पांच महीने इंतजार करना पड़ा था। भिडे कहते हैं, इसमें गड़बड़ी क्यों हो सकती है? मैंने एक सरकारी खाद कंपनी चलाई है। निजी क्षेत्र मेरे अनुभव को इस्तेमाल कर सकता है। मैं अभी काम कर सकता हूं, मगर सरकार को अब मेरी सेवाओं की जरूरत नहीं है। इसलिए मैंने निजी क्षेत्र से जुडऩे का फैसला लिया।इसी तरह दयाल ने भी टीएसआई से कहा, सरकार ने मुझे जो भी जिम्मेदारी दी, मैंने उसे बाखूबी निभाया। निजी क्षेत्र में भी मैं अपनी जिम्मेदारियों को ऐसे ही निभाउंगा।
डीओपीटी के अधिकारियों की मानें तो रिटायरमेंट के बाद निजी क्षेत्र से जुडऩे का आग्रह करने वाले अधिकारियों की सूची काफी लंबी है। एक जनवरी 2007 तक अनिवार्य कूलिंग ऑफ पीरियड दो साल हुआ करता था, मगर आईएएस अधिकारियों की जबरदस्त लामबंदी के चलते इसे घटाकर एक साल कर दिया गया। इतना ही नहीं, अधिकारियों का एक वर्ग ऐसा भी है, जो ऐच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर निजी क्षेत्र से जुड़ जाता है।
यूपी कैडर के 1976 बैच के अधिकारी अशोक कुमार खुराना ने नवंबर 2007 में ऊर्जा मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव के पद से ऐच्छिक सेवानिवृत्ति ली थी। अप्रैल 2008 में उन्हें जेपीएसके स्पोट्र्स से जुडऩे की अनुमति दे दी गई। उत्तराखंड कैडर के 1975 बैच के अधिकारी ओपी आर्या ने मई 2008 में समय से पहले रिटायरमेंट ले लिया था। डीओपीटी से जनवरी 2009 में अनुमति मिलने के बाद वह जेपी गंगा इंफ्रास्ट्रक्चर कॉरपोरेशन लिमिटेड में मुख्यकार्यकारी अधिकारी बन गए।
कहते हैं कि इन अधिकारियों को निदेशक के तौर पर एक बार बैठने के लिए दस हजार रुपये और सालाना 170 करोड़ रुपये तक वेतन मिल जाता है। यदि उन अधिकारियों को भी जोड़ लिया जाए, जिन्होंने केवल राज्य सरकारों से अनुमति लेकर निजी क्षेत्र में नौकरी कर ली है, तो यह सूची और भी लंबी हो जाएगी। नियम कहता है कि सचिव पद से नीचे तीन साल तक राज्य सरकार की नौकरी करने वाले अधिकारियों को केंद्र से नहीं, बल्कि राज्य सरकार से अनुमति लेना ही काफी है। इससे उनका काम और भी आसान हो जाता है।
ये मामले तो हाल के दिनों में खबरों में रहे हैं। 1990 के दशक की शुरुआत में तो ऐसे ढेर सारे मामले सामने आए थे, जब रुपर्ट मरडॉक ने दूरदर्शन के प्रमुख रतिकांत बासु को भारत में स्टार के प्रमुख के तौर पर अपने साथ जोड़ लिया था। बासु के साथ सूचना विभाग की वरिष्ठ अधिकारी उर्मिला गुप्ता और इंदिरा मानसिंह भी स्टार से जुड़ गई थीं।
दिसंबर 2010 में रिटायर हुए एचएचएआई के पूर्व अध्यक्ष बृजेश सिंह ने सरकार से निर्माण क्षेत्र की बड़ी कंपनी एल एंड टी से जुडऩे की अनुमति मांगी है। ये उसी शृंखला की कड़ी है, जिसमें पूर्व सरकारी अधिकारियों और सरकारी कंपनियों के प्रमुखों की निजी क्षेत्र में जाने की इच्छा साफ तौर पर बढ़ती नजर आती है। हाल में, स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेट (सेल) के पूर्व अध्यक्ष एसके रूंगटा ने बतौर प्रबंध निदेशक, वेदांता एल्यूमिनियम ज्वाइन किया है। यह तो वे कुछ नाम हैं जो पिछले दिनों चर्चा में रहे। ऐसे सैकड़ों नौकरशाह हैं जो निजी क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहे हैं और कई जाने की तैयारी में हैं। अब देखना यह है कि सरकार नौकरशाहों के पलायन पर किस हद तक अंकुश लगा पाती है।

Tuesday, November 15, 2011

पठार को खोदकर पाताल बना डाला माफिया ने






मध्य प्रदेश सरकार ने एक तरफ स्वर्णिम मध्यप्रदेश बनाने के लिए सात संकल्प, सात कार्यदल बना रखे हैं वहीं दूसरी तरफ सात किस्म के माफिया प्रदेश के विकास की राह में रोड़ा बने हुए हैं। प्रदेश में जमीन, शराब, वन, ड्रग, खनिज, गोवंश और गरीबों को मिलने वाले केरोसिन और अन्य सामग्री को पात्र व्यक्तियों तक नहीं पहुंचने देने वाले जैसे सात तरह के माफिया सक्रिय हैं। सात किस्म के इन माफियाओं में से खनिज माफिया सबसे कुख्यात हैं।
मध्य प्रदेश में खनिज माफियों का कहर सबसे अधिक बुंदेलखंड के पठार पर पड़ रहा है। यहां हरे रंग के बड़े बोर्ड पर लिखा है, सिद्धबाबा की पावन धरती पर आपका स्वागत है. 'सिद्धबाबाÓ जैसा नाम पढऩे से भ्रम होता है कि हम किसी धार्मिक स्थल पर आ गए हैं. लेकिन हाइवे के बगल में ही भारी हथौड़ा लिए ग्रेनाइट तोड़ती 12 साल की बच्ची को देखकर यह मुगालता दूर हो गया. जल्दी ही मालूम हुआ कि यह ग्रेनाइट के अवैध खनन के लिए कुख्यात बुंदेलखंड के सबसे बड़े खनन क्षेत्र का पता है. नेशनल हाइवे नंबर 76 पर महोबा जिले का यह कबरई इलाका है जहां काले ग्रेनाइट से लदे भारी-भरकम ट्रकों के बोझ से 20-25 किलोमीटर तक की सड़कें पूरी तरह चकनाचूर हो चुकी हैं. बुंदेलखंड इलाके की सबसे बड़ी कही जाने वाली सिद्धबाबा की पहाड़ी कभी समुद्र तट से 1,772 मीटर ऊंची हुआ करती थी, लेकिन इसके भीतर छिपे फौलादी ग्रेनाइट के खजाने के कारण इसे पाताल तक खोदा जा रहा है. आधिकारिक तौर पर महोबा से सालाना 65 करोड़ रु. का ग्रेनाइट कारोबार होता है, लेकिन कबरई मंडी को करीब से जानने वाले बताते हैं कि यह मंडी साल में कम से कम 250 करोड़ रु. पत्थर सप्लाई करती है. इसे महज आंकड़ों का फर्क मान कर खारिज नहीं कर सकते. हिंदी पट्टी के पांच राज्यों में मीडिया की पड़ताल से पता चलता है कि महोबा का हाइवे नं. 76 तो अवैध खनन की महज एक मिसाल है. खनिज संपदा के मामले में इन पांच राज्यों में जो राज्य जितना संपन्न है वहां बेतहाशा अवैध खनन, राजस्व की जबरदस्त हानि, भूजल स्तर में तीव्र गिरावट के रूप में पर्यावरण को भारी नुक्सान और खनन क्षेत्रों में जानो-माल को बड़े पैमाने पर नुक्सान के कई चौंकाने वाले उदाहरण देखे जा सकते हैं.
भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की विभिन्न रिपोर्ट को ही आधार मानें तो अवैध खनन के कारण पिछले पांच साल में मध्य प्रदेश में करीब 1,500 करोड़ रु. की चपत लगी है. बुंदेलखंड क्षेत्र में दो दशक से काम कर रहे पर्यावरणविद् भारतेंदु प्रकाश का कहना है, इस अवैध कारोबार की भारी कीमत कबरई ने कुछ इस तरह चुकाई कि इलाके का भूजल स्तर आज कई जगह 300 फुट नीचे तक चला गया है. जब कभी विस्फोट के बाद पहाड़ के परखच्चे उड़ते हैं और चट्टानें उड़कर किसी घर पर गिरती हैं, तो वहां खेलते बच्चे हमेशा के लिए सो जाते हैं. स्थानीय पर्यावरण कार्यकर्ता आशीष मिश्र एक उदाहरण देते हुए कहते हैं, पिछले दिनों आठ साल का उत्तम प्रजापति एक दिन आंगन में खेलते-खेलते, ऐसे ही एक पत्थर के नीचे दबकर खत्म हो गया था. बाद में थोड़ी कानूनी लड़ाई के बाद परिजन हार गए, मामूली मुआवजे के मिलने के साथ ही नन्हे बच्चे की मौत मामूली दुर्घटना बन कर रह गई. 10वीं सदी के दुर्लभ चकरिया दाई स्मारक के ठीक बगल से पहाड़ काट दिया गया है. आल्हा-ऊदल की जमीन पर इस तरह के 50 से अधिक स्मारकों के आसपास अवैध खनन चल रहा है.
मध्य प्रदेश विधानसभा में पेश सीएजी की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक वित्त वर्ष 2005-06 से 2009-10 के दौरान प्रदेश में खनन से जुड़ी गड़बडिय़ों के कारण प्रदेश सरकार को 6,906 मामलों में 1496.29 करोड़ रु. राजस्व का नुक्सान हुआ. मध्य प्रदेश में पिछले छह साल में अवैध खनन के 24,630 मामले सामने आए और 23,393 मामले अदालतों में दर्ज हुए हैं, यह देश के अन्य सभी राज्यों की तुलना में सर्वाधिक है. मध्य प्रदेश देश का सबसे प्रमुख हीरा उत्पादक राज्य है. इसके अलावा यहां कॉपर (तांबे) के आधिक्य वाला पाइरोफाइलाइट और डाइसपोर भी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है. खनन मंत्रालय के मुताबिक मध्य प्रदेश ने वर्ष 2009-10 में 9,701.87 करोड़ रु. के खनिज और 440.19 करोड़ रु. के उप खनिजों का उत्पादन किया.मध्यप्रदेश में खनन माफिया की जड़ें कितनी गहरी हैं इसका एक अंदाजा पिछले दिनों हुई आरटीआई कार्यकर्ता शेहला मसूद की हत्या से भी मिला. इस हत्याकांड की जांच सीबीआइ कर रही है और अब तक जांच किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंची है. लेकिन इस हत्याकांड में हीरा खनन करने वाली ऑस्ट्रेलिया की कंपनी रियो टिंटो का नाम भी उछला है. कंपनी के खिलाफ जबलपुर हाइकोर्ट में भी पर्यावरण संबंधी मामले लंबित हैं. लेकिन इससे कंपनी के विस्तार पर कोई असर नहीं हुआ, बल्कि उसकी ताकत बढ़ ही गई.मध्य प्रदेश सरकार ने हाल ही में रियो टिंटो कंपनी को छतरपुर जिले के बुंदर नामक स्थान पर भी हीरा उत्खनन की इजाजत दे दी है. एक अनुमान के मुताबिक बुंदर में जमीन के नीचे करीब 27.4 मिलियन कैरेट हीरे के भंडार हैं. हीरे की खुदाई के लिए मशहूर पन्ना के मझ्गवां में राष्ट्रीय खनिज विकास निगम (एनडीएमसी) की जो खदान है, उसकी तुलना में रियो टिंटो को मिली खदान में हीरे का सात गुना ज्यादा भंडार है. इसके अलावा डेढ़ वर्ष पहले जबलपुर हाइकोर्ट ने आदेश दिया था कि ग्वालियर क्षेत्र में स्थित बटेश्वर और पडावली के पुरातत्व स्थलों के पास की खदानों को बंद कर दिया जाए. लेकिन जमीनी मुआयना करने पर पता चला कि यहां 25 खदानों से अभी भी गैरकानूनी उत्खनन किया जा रहा है. अवैध उत्खनन करने वाले पत्थर निकालने के लिए ब्लास्ट भी करते हैं जिससे ऐतिहासिक मंदिरों की दीवारों में दरारें पड़ रही हैं. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की आपत्तियों के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई. खुद प्रशासन ने 29 सितंबर को घाटीगांव स्थित सोन चिरैया अभायारण्य क्षेत्र में अवैध खनन पकड़ा. इस मामले में ग्वालियर के कलेक्टर आकाश त्रिपाठी का कहना है कि कि घाटीगांव इलाके में सख्ती से रोक लगाई जा रही है.गौरतलब है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के पास एक महीने से रिपोर्ट पड़ी है लेकिन मंत्रियों के खिलाफ कार्रवाई अब तक नहीं हो सकी है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का कहना है कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। मैं पूरी रिपोर्ट जब तक नहीं देख लूं तब तक कुछ नहीं कह सकता।
बुन्देलखण्ड का पठार प्रीकेम्बियन युग का है। पत्थर ज्वालामुखी पर्तदार और रवेदार चट्टानों से बना है। इसमें नीस और ग्रेनाइट की अधिकता पायी जाती है। इस पठार की समु्रद तल से ऊंचाई 150 मीटर उत्तर में और दक्षिण में 400 मीटर है। छोटी पहाडिय़ों में भी इसका क्षेत्र है, इसका ढाल दक्षिण से उत्तर और उत्तर पूर्व की और है। बुन्देलखण्ड का पठार मध्यप्रदेश के टीकमगढ़, छतरपुर, दतिया, ग्वालियर तथा शिवपुरी जिलो में विस्तृत है। सिद्धबाबा पहाड़ी (1722 मीटर) इस प्रदेश की सबसे ऊंची पर्वत छोटी है। बुन्देलखण्ड की भौगोलिक बनावट के अनुरूप गुलाबी, लाल और भूरे रंग के ग्रेनाइट के बड़ाबीज वाला किस्मों के लिये विन्ध्य क्षेत्र के जनपद झांसी, ललितपुर, महोबा, चित्रकूट- बांदा, दतिया, पन्ना और सागर जिले प्रमुखत: हैं। भारी ब्लाकों व काले ग्रेनाइट सागर और पन्ना के कुछ हिस्सों में पाये जाते हैं इसकी एक किस्म को झांसी रेड कहा जाता है। छतरपुर में खनन के अन्तर्गत पाये जाने वाले पत्थर को फार्च्यून लाल बुलाया जाता है। सफेद, चमड़ा, क्रीम, लाल बलुआ पत्थर अलग-अलग पहाडिय़ों की परतों में मिलते हैं। न्यूनतम परत बलुवा पत्थर एक उत्कृष्ट निर्माण सामग्री के लिये आसानी से तराषा जा सकता है। इसके अतिरिक्त बड़े भंडार, हल्के रंग का पत्थर झांसी, ललितपुर, महोबा, टीकमगढ़ तथा छतरपुर के कुछ हिस्सों में मिलता है। इस सामग्री भण्डार का उपयोग पूरे देष में 80 प्रतिशत सजावटी समान के लिये होता है। ललितपुर में पाया जाना वाला कम ग्रेड व लौह अयस्क (राक फास्फेट) के रूप से विख्यात है।
हाल ही के अध्ययन व सर्वेक्षण से जो तथ्य प्रकट हुये हैं वे चौकने वाले ही नहीं वरन् यह भी सिद्ध करते हैं कि भविष्य ये बुन्देलखण्ड की त्रासदी में वे अति सहयोगी होंगे। जहां पहाड़ों के खनन में मकानों की अनदेखी की जा रही है। वहीं खनन माफिया साढ़े 37 लाख घन मी. पत्थर रोजाना पहाड़ों से निकालते हैं। इसके लिये वह एक इंच होल में विस्फोटक के बजाय छ: इंच बड़े होल में बारूद भरकर विस्फोट करते हैं। जब यह विस्फोट होते हैं तो आस-पास 15-20 किमी की परिधि में बसने वाले वन क्षेत्रों के वन्य जीव इन धमाके की दहषत से भागने लगते हैं व कुछ की श्रवण क्षमता पूरी तरह नष्ट हो जाती है। इसके अतिरिक्त विस्फोट से स्थानीय जमीनों में जो दरारें पड़ती हैं उससे ऊपरी सतह का पानी नीचे चला जाता है और भूगर्भ जल बाधित होता है। इस सम्पूर्ण बुन्देलखण्ड ग्रेनाइट करोबार जो कि यहां कुटीर उद्योग के नाम से चल रहा है में 1500 ड्रिलिंग मशीनें, पांच सैकड़ा जेसीबी, 20 हजार डंफर, 2000 बड़े जनरेटर, 50 क्रेन मशीन और हजारों चार पहिया ट्रैक्टर प्रतिदिन 6 करोड़, 83 लाख, पांच सौ ली0 डीजल की खपत करके और ओवरलोडिंग करते हैं। इन विस्फोटों से रोजाना 30-40 टन बारूद का धुआं यहां के वायुमंडल में घुलकर बड़ी मात्रा में सड़क राहगीरों व खदानों के मजदूरों को हृदय रक्तचाप, टी0वी0, श्वास-दमा का रोगी बना देता हैं। इसके साथ-साथ 22 क्रेसर मषीनों के प्रदूषण से प्रतिदिन औसतन 2 लोग की आकस्मिक मृत्यु, 2 से तीन लोग अपाहिज व 6 व्यक्ति टीवी के शिकार होते हैं।
गौरतलब है कि इस उद्योग से प्रतिदिन 10 हेक्टेयर भूमि (उपजाऊ) बंजर होती हैं 29 क्रेसर मषीनों को उ0प्र0 प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा अनापति प्रमाण पत्र जारी किया गया है लेकिन इन खनन मालिकों की खदानों में पत्थर तोडऩे के समय चलाया जाने वाला फव्वारा कभी नहीं चलता जो कि डस्ट को चारों तरफ फैलने से रोकने के लिये होता है ताकि प्रदूषण कम हो। अवैध रूप से लाखों रूपयों की विद्युत चोरी इनके द्वारा प्रतिदिन की जाती है इसके बाद भी यह उद्योग बहुत तेजी से बुन्देलखण्ड में पैर पसार रहा है क्योंकि सर्वाधिक राजस्व इस उद्योग से मिलता है। विन्ध्याचल पवर्त माला और कबरई (महोबा), मोचीपुरा, पचपहरा का ग्रेनाइट सर्वाधिक रूप से खनिज कीमतों में सर्वोत्तम माना जाता है प्राकृतिक संसाधनों के इस व्यापार से निकट समय में ही यदि निजात नहीं मिलती है तो बुन्देलखण्ड की त्रासदी में यह उद्योग बहुत बड़ी भूमिका के साथ दर्ज होने वाला काला अध्याय साबित होगा।
मारबल माफिया की करतूतें
मध्य प्रदेश के कटनी में सालों से संगमरमर का अवैध खनन हो रहा था। जहां जिला प्रशासन की संदिग्ध भूमिका के चलते पिछले पांच सालों से सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की लगातार अवमानना होती आ रही है। हैरानी है कि इसके बावजूद कटनी के निमास गांव में न केवल मारबल माफिया सक्रिय हैं बल्कि इन्होंने आईएएस अफसरों को भी साथ ले रखा है, जो मार्बल माफियाओ को फायदा पहुंचाने का काम करते रहे हैं। कटनी के मार्बल माफियाओं पर डायलाग इंडिया के ब्यूरो चीफ कमलेश तिवारी की रिपोर्ट- देश की बुनियाद व्यवस्था का आधार कहे जाने वाले भारतीय प्रशासनिक सेवा में पदस्थ आई.ए. एस. अफसर आज अकूत धन संग्रह के फेर में कितने पक्ष-भ्रष्ट हो चुके हैं। इसका औसत अनुमान तथाकथित अति-ईमानदार कहे जाने वाले आई.ए.एस. जोशी- दम्पत्ति द्वारा किये गये धन का संग्रह के मिजाज से सहज ही लगाया जा सकता है।
आश्चर्य होता है कि ,एक हद तक इनके हाथों में सामाजिक न्याय प्रबंधन के व्यवस्था की, संवेदनशील जिम्मेदारी भी होती है। इसीलिए किसी जिले में इनकी पदस्थापना के साथ इन्हें डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के नाम से भी संबोधित किया जाता है। ऐसे गरिमापूर्ण पद पर आसीन शख्स जब अपने ही लोकतंत्र की आस्तीन का सांप बन जाए तो, देश के आम नागरिकों और उनसे बने समाज तथा देश का क्या होगा? यह एक विचारणीय प्रश्न है ?
मध्यप्रदेश के कटनी जिले में मार्बल माफियाओं से जुड़ा एक ऐसा, ही मामला प्रकाश में आया है जहां जिला प्रशासन की अफसरशाही की सरपरस्ती में विगत लगभग पांच वर्षो से सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की निरंतर अवमानना होती आ रही है।
भारतीय लोकतंत्र में यदि ऐसे निरंकुश आई.ए.एस. हाकिमों और ऐसे मर्यादाहीन सामंतों का जहां गठजोड़ हो जाता है तो फिर वहां कुछ भी होना संभव है। जाहिर हैं कि वहां जिसकी लाठी उसकी भैंस जैसी उक्ति का सूत्र कारगार हो जाता है। इस हकीकत का ब्यौरा भी कुछ इसी तरह है।
कटनी जिला के मार्बल जोन में स्थित गांव निमास के ख-न- 220 के रकवा 29-31 हेक्टेयर में 1-96 हेक्टेयर छोड़कर मार्बल उत्खनन हेतु कुछ लीजें लीज धारकों के आवेदन पर शासन द्वारा 2005 में स्वीकृत की गई थी। जिनके विरूद्ध सामाजिक संस्था एकता परिषद् के जगत बहादुर सिंह द्वारा देश के सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की गई थी जिसकी सुनवाई पश्चात् अंतिम निर्णय तक की अवधि के लिये माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विगत दिनांक 16-09-2005 को संबंधित भू-क्षेत्र के उत्खनन कार्य पर पूर्ण रोक का आदेश जारी किया गया था। माननीय सर्चोच्च न्यायालय के उक्त आदेश की प्रमाणित प्रतियों की छाया प्रतिंया भेजकर याचिकाकर्ता ने स्वत: संबंधित सभी विभागों को आगाह भी कर दिया था ताकि, किसी भी स्तर पर किसी तरह- माननीय न्यायालय की गरिमा भंग न हो सके। बावजूद इसके रसूखदार मार्बल उद्योगपतियों ने हार नही मानी और जिले के आला अफसरों से गठजोड़ का सिलसिला शुरू कर दिया।
इस गठजोड़ से जोड़-तोड़ बिठाया और रास्ता भी खोज निकाला। सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रतिबंधित भू-क्षेत्र में धड़ल्ले से उत्खन्न किया जाता रहा और इसे बाजार में बेचा जाता रहा। इसकी शिकायत भी कई बार प्रदेश शासन के मंत्रियों तथा सचिवों के साथ उच्चतम न्यायालय तक भी पहुचाई गई किन्तु, हाकिमों और सामंतों की संयुक्त पैतरेबाजी, माननीय न्यायालय को निरंतर गुमराह करती रही। सन 2010 में हुई शिकायतों के बाद से यह प्रकरण समाचारों की सुर्खियां बनने लगा। ऐसी दशा में अब यह मामला अपनी मूल विषय वस्तु से भटककर सीमांकन के सत्यापन जैसे विवाद का विषय बन गया है।
कटनी जिलें के मार्बल जोन में अनेक विसंगतियों के लिये बहुचर्चित एक गांव हैं निमास। जिसके भू-गर्भ में बेशकीमती अकूल खनिज सम्पदा का भण्डारण सफेद सोना यानि मार्बल के रूप में दबा पड़ा है। यही कारण है कि देश भर के मार्बल माफियाओं में इस क्षेत्र को हथियाने की प्रतिस्पर्धा चलती रही और इसी स्वार्थ के चलते यहां के मार्बल माफियाओं ने राज्य सरकार से लेकर केन्द्र तक के संबंधित लगभग सभी महकमों की कार्य शैली को कुछ इस तरह पंगु कर दिया कि, आज उनकी सारी कार्य प्रणाली बूझो तो जाने जैसी पहेली बन कर रह गई है।
ग्राम निमास तहसील बहोरीबंद जिला कटनी मध्यप्रदेश के खसरा नं- 220 की भूमि रकवा 29-31 हेक्टेयर यानी-73 एकड़ लगभग दस्तावेजों में दर्ज है। इसी खसरा नंबर में दर्ज भूमि के नाम जोख में हुई हेरा-फेरी के चलते, विगत वर्ष 2005 से सरकारी महकमों के आला अफसर बड़े और अपच भ्रष्ट्राचार के लिये जितने बदनाम हुए है अब उतना ही यह भू-क्षेत्र उनके गले की फांस बनता नजर आने लगा है। इसके कारणों में कई तरह की बातें कही-बताई जा रही है इस भू-भाग का विवाद आज भी अनसुलझा और संदेहों की परिधि में बना हुआ है।
प्रथम तो यह कि इस भू-क्षेत्र निमास के खसरा नं- 220 तथा इसके इर्द-गिर्द के क्षेत्र में वन्य प्राण्यिों की बहुतायत होने और खासकर बाघों तथा उनके शावकों के मौजूद होने की बात को प्रमाणित करते हुए विगत सन् 2000 में इस सम्पूर्ण राजस्व भू-क्षेत्र को वन विभाग ने अपने अधिपत्य में ले लिया था। (जिसे वन विभाग के दस्तावेजों में भूमि बैंक के रूप में दर्शाया भी गया है।
तत्ससंबंधी प्रक्रिया कमोवेश अंतिम दौर तक पहुंच ही चुकी थी मात्र, सरकारी राजपत्र में प्रकाशन होने की ओैपचारिकता शेष रह गई थी। इसी दौरान न जाने ऐसा क्या हुआ और वन- विभाग ने पांच सालों तक अपने अधिपत्य में रखी इस क्षेत्र की पूरी भूमि को 2005 में राजस्व विभाग के हवाले वापस लौटा दी? संदेहों के इसी तथ्य को आधार बनाकर याचिकाकर्ता ने जनहित याचिका के माध्यम से देश की सर्वोच्च न्यायालय ने न्याय उक्त भू-क्षेत्र में उत्खनन कार्य प्रतिबंधित करने का आदेश जारी किया गया। दूसरी बात यह रही कि, निमास ख-न- 220 के रकवा 29-31 हेक्टेयर के भू-भाग की सीमांकन भी भू बंदोबस्त के साथ बीती सदी के सन् 1988-89 में हुआ था। इस दौरान बंदोबस्त के अधिकारियों व कर्मचारियों द्वारा अन्य गांवों की तरह निमास गांव की सीमा का निर्धारण कर, उक्त भू-क्षेत्र में 12 चांदे-मुनारे स्थापित किये गए थे। कालान्तर में इस भू-क्षेत्र में मार्बल लीजे स्वीकृत हुई। तब लीजधारकों में भू-अधिकार क्षेत्र को लेकर सन् 2005 में विवाद निर्मित हुई तब लीजधारकों में भू-अधिकार क्षेत्र को लेकर सन् 2005 में विवाद की स्थिति निर्मित होने लगी। इसी दौरान सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उत्खनन कार्य पर रोक संबंधी आदेश जारी हो जाने के कारण यह विवाद कुछ ठंडा तो हुआ लेकिन शीतयुद्ध की तर्ज पर चलता रहा। इस विवाद का प्रमुख कारण यह था कि बंदोबस्त विभाग द्वारा 1988-89 में स्थापित किये गए चांदे व मुनारे पूरी तरह नदारत थे। फिर जैसे तैसे 2007 में बंदोबस्त मुख्यालय ग्वालियर से एक जांच दल कटनी आया, जिसने कटनी जिले के राजस्व अमले के साथ क्षेत्र का सर्वेक्षण किया और अंतत: चांदे व मुनारे खोजने में पूरी टीम और उनके उपकरण तक असफल रहे।
यह बात तूल न पकड़े इस गरज से कटनी जिला मुख्यालय में भू- बंदोबस्त ग्वालियर एवं जिला राजस्व विभाग की त्वारित बैठक कलेक्टर के निर्देशन में हुई और आगामी दो दिनों की समयावधि में ही विवादित भू-क्षेत्र में अनुमानित आधार पर (सन् 2007 में) पुन:12 चांदे व मुनारे स्थापित करवा दिये गए। मामला फिर शांत पड़ गया। कुछ समय बीता। मार्बल माफिया और जिला प्रशासन के गठजोड़ ने रास्ता खोज निकाला।
भू-गर्भ का दोहन फिर शुरू हो गया जबकि, सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की मर्यादा बनाए रखने हेतु मध्यप्रदेश शासन, खनिज विभाग के सचिव द्वारा कार्य पर रोक लगाए रखने के निर्देश लिखित तौर पर, पहिले से ही सभी को प्राप्त हो चुके थे बाबजूद, इसके मार्बल उत्खनन का कार्य जारी रहा। इसके विरूद्ध शिकायतों का सिलसिला भी फिर चल पड़ा। लेकिन इस बार अप्रेल मई 2010 में मामला कुछ ज्यादा ही गरमा गया। निमास ख-न- 220 में स्वीकृत लीजों की सीमा निर्धारण करने हेतु इस बार आई-बी-एम-(इंडियन माइंस ब्यूरो) तथा सी-एल-आर (भू-बंदोबस्त) ग्वालियर की संयुक्त टीम 17 मई 2010 को जिला मुख्यालय कटनी पहुंची। जिसने कटनी जिला राजस्व तथा खनिज विभाग की टीम के साथ दिनांक 17,18, और 19 मई 2010 तक सर्वेक्षण किया।
आश्चर्य की बात यह रही कि, इस बार भी विगत 2007 में स्थापित किये गए चांदे व मुनारे फिर गायब हो गए? यह जादू था या कुछ और? कोई नही जानता। मामला ढाक के तीन पात जैसा बनकर फिर जस का तस रह गया।
अब प्रश्न यह उठता है कि , वे चांदे व मुनारे कहां गुम जो गए,? जबकि सीमांकन के दौरान दोनो बार (1988-89 तथा 2007 में भी चांदा के गढ़े गए पत्थरों को अन्य सांकेतिक सामग्री के साथ जमीन की सतह से पांच फुट नीचे गढ्ढों में रखकर ढांका गया था। और उसके ऊपर चतूबतरानुमा पक्के मुनारे खड़े कर दिये गये थे। यह सब भू-बदोबस्त विभाग द्वारा इसलिये किया जाता है ताकि, कभी किसी विवाद की स्थिति में जरीब की कडिय़ा डालकर भूमि की नाप-जोख करके सीमांकन का सत्यापन किया जा सके। लेकिन खसरा नं- 220 निमास के भू-भाग में उपजे इस विवाद से सरकारी महकमों के सारे आला अधिकारी आज भी कतराते नजर आ रहे है।? इसकी मात्र एक वजह है कि चंदा-मुनारा की निशान देही तक कहीं नजर नहीं आती। इतनी बड़ी धोखाधड़ी कब कैसे, क्यों और किसने की? शायद! प्रशासन के आला अफसर सब कुछ जानते समझते तो हैं लेकिन, ना समझी का मलम्मा परत दर परत चढ़ाते चले आ रहे है?
इस विवाद की तीसरी मुख्य वजह यह भी बताई जा रही हैं कि निमास ख-न- 220 में मूल रकवा 29-31 हेक्टेयर है जिसमें 1-96 हेक्टेयर का रकवा मंदिर रोड़ एवं हाईटेंशन लाइन के लिये छोड़कर शेष 4-80 हेक्टेयर सरिता मार्बल, 10 हेक्टेयर शारदा मार्बल तथा 12-55 हेक्टेयर एस-अंकुन मिनरल्स प्रा-लि- को 16-03-2005 को मार्बल उत्खनन हेतु स्वीकृत लीज के रूप में शासन द्वारा उक्त लीजधारकों को दिया गया है। जिसमें कटनी कलेक्टर द्वारा 31-03-2008 को भू-प्रवेश की अनुमति भी दे दी गई थी। इसी के समानांतर एक बात यह भी है कि ख-न- 220 के चारों ओर पूर्व से अन्य लीज धारकों की खदानें है जो विवादित भूमि से सटी हैं। इनमें ही, एक लीज धारक जिसे 12-55 हेक्टेयर रकवा की भूमि स्वीकृत हुई है। उस लीजधारक फर्म एस अंकुन मिनरल्स प्रा-लि- के डायरेक्टर का कहना हैं कि उनके स्वीकृत क्षेत्र में तीन दिशाओं से अतिक्रमण कर अन्य लीज धारकों द्वारा अवैधानिक तरीके से अरबों रूपयें का मार्बल (लीज स्वीकृत के पूर्व से अभी तक) उत्खनन करके बाजार में बेच लिया गया। लिहाजा उक्त भू-दोहन से हुई आय तथा शासकीय राजस्व की क्षतिपूर्ति का जिम्मेदार कौन रहेगा? इस वाजिव प्रश्न का जबाव भी शायद ! कटनी जिला प्रशासन के आला अफसरों के पास नही है! और यही कारण है उक्त लीजधारक नाप जोख कर सीमांकन की जिद् पर अड़ गया है। वजह यही रही कि उसने स्वीकृत लीज पर अभी तक काम का श्री गणेश भी नही किया।
ऐसे हालातों में सीमांकन का सत्यापन कैसे होगा और कौन करेगा? यदि यह कार्य दुष्कर नहीं, तो नाप- जोख करने से शासन व प्रशासन कतरा क्यों रहा?
दूसरा यह कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की अवमानना करते हुए जिस तरह का कुचक्र चलाकर मार्बल माफिया ने प्रतिबंधित क्षेत्र का भू-दोहनकर अरबों रूपये के मार्बल का अवैधानिक कारोबार किया और जिला प्रशासन अपनी नाक के नीचे होते इस अवैधानिक कारोबार की अनदेखी करता रहा, उसके लिये माननीय सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना संबंधी भंग हुई मर्यादा की क्षतिपूर्ति कैसे हो सकेगी? और कौन कर पाएगा?

Tuesday, October 25, 2011

कब धुलेगा कुपोषण का कलंक





मध्य प्रदेश के माथे पर कुपोषण एक ऐसा कलंक बन गया है जिसे मिटाने के लिए जितना सरकारी प्रयास हो रहा है वह उतना ही बढ़ रहा है। वर्तमान वित्तीय वर्ष में प्रदेश सरकार ने महिला एवं बाल विकास विभाग को 2209 करोड़ 49 लाख रुपये का बजट मुहैया कराया है लेकिन खंडवा जिले के खालवा में जिस तेजी से कुपोषण फैला रहा है उससे सरकार के सारे प्रयास बेमानी साबित हो रहे हैं। खालवा में स्थिति नियंत्रण में है,जबकि हकीकत यह है कि कुपोषण के आंकड़ों से सरकारी मशीनरी सकते में है। जिले में कुपोषण के शिकार लगभग नब्बे बच्चे अस्पताल में जीवन और मौत के बीच झूल रहे हैं। कुछ ऐसे ही हालात प्रदेश के अन्य जिलों में भी हैं। सरकार के तमाम प्रयासों के बाद भी वर्तमान में राज्य में नवजात शिशुओं से लेकर पांच वर्ष तक की आयु के 60 प्रतिशत बच्चे कुपोषण की समस्या से ग्रस्त होने के कारण कमज़ोर और बीमार हैं। इनमें से कई बच्चों की असमय मौत हो जाती है।
सरकारी रिपोर्ट के अनुसार मधयप्रदेश के आदिवासी बहुल जिले में कुपोषण की स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक पाई गई है, जिनमें राज्य के झाबुआ, अलीराजपुर, मंडला, सीधी, धार और अनूपपुर जिलों में अतिकुपोषित बच्चों की संख्या 7 से 15 प्रतिशत तक रही। हालांकि कुपोषण की स्थिति का पता लगाने के लिए बच्चों के वजन मापने के इस अभियान में कई तरह की खामियां और गड़बडियां भी सामने आईं, जिसके कारण प्रदेश में कुपोषण के शिकार बच्चों की वास्ततिक स्थिति सामने नहीं आ सकी। ऐसे में इन नतीजों पर पूरी तरह से भरोसा तो नहीं किया जा सकता, किन्तु यह राज्य सरकार और इसके कर्ता-धार्ताओं के लिए आंख खोलने वाले हैं। गड़बडियों में वजन मापने की मशीनों की कमी के कारण 30 हजार से ज्यादा आंगनबाड़ी केंद्रों में दूसरे स्थानों से मशीने लाई गईं और कई मशीनें बिगड़ जाने से सुदूर ग्रामीण अंचलों में उन्हें सुधारा भी नहीं गया और मनमाने तौर पर बच्चों का वजन लिया गया। फिर भी इन ताजे परिणामों से भी यह सिध्द होता है कि मधयप्रदेश में बच्चों में कुपोषण की स्थिति काफी खतरनाक स्थिति में हैं।
कुपोषण को लेकर प्रदेश सरकार और प्रशासनिक अमला कितना गंभीर है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि प्रदेश में समेकित बाल विकास सेवाओं के लिए पूरे राज्य में जहां एक लाख 46 हजार आंगनबाड़ी केंद्रों की जरूरत है, वहां राज्य में केवल 70 हजार आंगनबाड़ी केंद्र ही संचालित हो रहे हैं, जो कि राज्य के मात्र 76 फीसदी बच्चों को ही अपनी सेवाएं दे पा रही हैं, जबकि एक चौथाई बच्चे अभी भी बाल कल्याण सेवाओं से पूरी तरह से वंचित हैं। मधयप्रदेश की केवल 13 हजार आदिवासी बस्तियों में समेकित बाल विकास सेवा का लाभ पहुंच रहा है, लेकिन तकरीबन 4200 आदिवासी बस्तियां इस सेवा से आज भी वंचित हैं।
मध्यप्रदेश के माथे पर लगे चुके कुपोषण के कलंक को मिटाने के लिए प्रदेश सरकार जहां पानी की तरह पैसा बहा रही है वहीं आज भी मप्र में कुपोषण के नाम पर कुपोषित का नहीं, बल्कि किसी और का पोषण हो रहा है। हाल ही में प्रदेश की भाजपा सरकार ने करोड़ों रुपए खर्च कर प्रदेश में कुपोषण के खिलाफ एक मिशन के तौर पर जिस तरह से 'अटल बाल अरोज्य एवं पोषण मिशनÓ की शुरुआत की है उससे तो यही लगता है कि यह 'पोषण मिशनÓ भी प्रदेश से कुपोषितों का पोषण करने के बजाय कहीं पोषितों के पोषण का जरिया न बन जाए। मिशन की शुरुआत जिस तरह से गरीब व भूखे को धयान में रखकर इसका नामकरण पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर किया गया और शुभारंभ कार्यक्रम के दौरान प्रदेश का कोई कुपोषित बच्चों की नहीं, बल्कि प्रदेश के माननीयों और नौकरशाहों की टोली दिखी। ऐसे में सवाल यह उठता है कि सरकार यदि मिशन के शुभारंभ के अवसर पर स्वपोषितों के बजाय कुपोषितों को बुलाकर उनसे रूबरू होती तो शायद यह मिशन अपने मकसद में कामयाब होने के ज्यादा करीब रहता।
बच्चों के अधिकारों की वकालत करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था चाइल्ड राइट्स एंड यू (क्राई) ने मध्य प्रदेश के दस जिलों में किए गए सर्वे के आधार पर दावा किया है कि यहां कुपोषित बच्चों की संख्या 60 फीसदी से ज्यादा है। वहीं महिला बाल विकास मंत्री रंजना बघेल की माने तो वर्ष 2009-10 में 69 लाख 69 हजार से अधिक बच्चों का परीक्षण किया गया, जिनमें से 46 लाख 34 हजार से ज्यादा बच्चे सामान्य पाए गए, वहीं 23 लाख 34 हजार बच्चे कुपोषित पाए गए। कुपोषित कुल 23 लाख 24 हजार बच्चों में से एक लाख 37 हजार बच्चे ऐसे हैं जो गंभीर स्थिति यानी तीसरी व चौथी श्रेणी के हैं। उन्होंने बताया कि कुपोषण को रोकने के लिए पूरक पोषण आहार पर पिछले वित्त वर्ष में 51,166 लाख रुपए खर्च किए गए। वहीं क्राईका कहना है कि पूरे राज्य में आदिवासी समुदाय के 74 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। चौंकाने वाला तथ्य तो यह है कि राजधानी भोपाल की पुनर्वास कॉलोनियों के 49 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार पाए गए हैं। संस्था के प्रदेश में इस सर्वे को पूरा करने वाले विकास संवाद के प्रशांत दुबे का कहना है कि सिर्फ रीवा जिले में अकेले 83 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार पाए गए हैं। संस्था द्वारा राजधानी भोपाल की पुनर्वास कॉलोनियों में कराए गए शोध के आंकड़े और भी ज्यादा चौंकाने वाले मिले हैं। भोपाल के लगभग 11 रिसेटमेंट कॉलोनियों से इक_ा किए गए आंकड़ों से पता चला है कि यहां के 49 फीसदी बच्चे कुपोषण से ग्रसित हैं। जबकि इन्हीं इलाकों के 20 फीसदी बच्चे गंभीर कुपोषण के शिकार पाए गए हैं।
दिल्ली में क्राई की निदेशक योगिता वर्मा का कहना है कि भले राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान राज्य के सभी बच्चों के मामा होने का दावा करें लेकिन वे अभी भी राज्य के मासूम बच्चों को कुपोषण से निजात दिलाने में नाकाम साबित हुए हैं। राज्य में बच्चों के बेहतर देखभाल के लिए जरूरी आंगनबाड़ी का भी पूरी तरह इंतजाम नहीं करा पाए हैं। अभी भी पूरे मध्य प्रदेश में लगभग 47 प्रतिशत आंगनबाडिय़ों की कमी हैं। क्राई के एक अन्य सदस्य आरबी पाल का कहना है कि राज्य में रहने वाले आदिवासी समुदाय के लगभग 74 फीसदी बच्चे भी कुपोषण के शिकार पाए गए हैं।
मध्यप्रदेश के बच्चे देशभर में वजन में सबसे कम और शारीरिक रूप से भी सबसे कमजोर हैं। केंद्र सरकार द्वारा एनीमिया और कुपोषण पर जारी आंकड़ों से यह शर्मनाक खुलासा हुआ है। प्रदेश के 60 प्रतिशत बच्चे अंडरवेट (सामान्य से कम वजन) बताए गए हैं। इसके बाद झारखंड 56.6 और बिहार 55.9 प्रतिशत के साथ क्रमश:दूसरे और तीसरे स्थान पर हैं।
प्रदेश सरकार द्वारा हाल में राष्ट्रीय पोषण संस्थान, हैदराबाद से कराए गए सर्वेक्षण के मुताबिक 51.77 फीसदी बच्चे कुपोषित हैं। अति कुपोषित बच्चों की संख्या 8.34 फीसदी है। यानी अभी भी प्रदेश में सात लाख से अधिक बच्चे अति कुपोषित हैं। एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार मधयप्रदेश में हर साल करीब 30 हजार बच्चे अपना पहला जन्मदिन तक नहीं मना पाते और काल के गाल में समा जाते हैं। ये वो अभागे अबोधा बच्चे हैं, जो धारती पर पैर रखने के साथ ही कुपोषण के शिकार होते हैं और जन्म के बाद पोषण आहार की कमी के चलते अकाल मृत्यु को प्राप्त होते हैं। इसी कलंक की बदौलत मध्यप्रदेश देश के उन पिछड़े राज्यों में शुमार है, जहां शिशु मृत्युदर सबसे ज्यादा है। मधयप्रदेश में शिशुमृत्यु दर 70 प्रति हजार है। गरीबी, पिछड़ेपन और अशिक्षा की मार झेल रहे मध्यप्रदेश में कुपोषण की स्थिति चिंताजनक है, जबकि प्रदेश की भाजपा सरकार इसे लेकर गंभीर नहीं है। हालांकि पिछले दिनों भारत सरकार द्वारा राज्य सरकार और केंद्र के अधिकृत प्रतिवेदनों के आधार पर जारी रिपोर्ट के बाद प्रदेश सरकार को शर्म से झुकना पड़ा और उसने स्वीकार किया कि मध्यप्रदेश में हर साल हजारों बच्चे कुपोषण के कारण बेमौत मारे जाते हैं।

पोषण आहार कार्यक्रम माफियाओं के कब्जे में

भारत सरकार के सहयोग से राज्य सरकार ने कुपोषण निवारण के लिए कई कार्यक्रम चला रखे हैं, लेकिन राज्य में पोषण आहार सप्लाई करने और उसका वितरण करने तक की पूरी प्रक्रिया माफियाओं के क़ब्ज़े में होने के कारण वास्तविक हितग्राहियों को पोषण आहार कार्यक्रम का पूरा लाभ नहीं मिल रहा है। सरकार ने इस योजना में अपनों को लाभ पहुंचाने के लिए बड़े-छोटे मा़फिया तंत्र को प्रोत्साहित किया है, लेकिन अब यह मा़फिया तंत्र सरकार के नियंत्रण से बाहर होकर अपना हित साधन में लगा हुआ है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को इन मा़फियाओं की उपस्थिति और करतूतों की भली प्रकार जानकारी है, इसीलिए उन्होंने इस कार्यक्रम को शहरी क्षेत्रों में सक्रिय मा़फियाओं से मुक्त रखने के निर्देश दिए थे। मुख्यमंत्री के स्पष्ट निर्देश थे कि भोपाल, इन्दौर, ग्वालियर, जबलपुर जैसे बड़े शहरों में एक समूह या प्रतिष्ठान को 15 से 20 आंगनवाडिय़ों में ही पोषण आहार आपूर्ति के लिए नियुक्त किया जाए। बाक़ायदा सरकारी फाइल चली और मुख्यमंत्री के इन निर्देशों पर महिला एवं बाल कल्याण विभाग की मंत्री और प्रमुख सचिव ने भी स्वीकृति की मोहर लगाई, लेकिन फाइलों में दबा यह आदेश शहरों तक नहीं पहुंचा हैं और इसलिए बड़े शहरों में सक्रिय पोषण आहार आपूर्ति करने वाले मा़फिया अभी भी खुलकर अपना खेल खेल रहे हैं और कुपोषित बच्चों तथा गऱीब माताओं के हिस्से को डकार रहे हैं।
पूरे प्रदेश में 69238 आंगनवाड़ी केंद्रों में पूरक पोषण आहार वितरण की व्यवस्था है, इनमें लगभग 50 लाख बच्चों और 10 लाख गर्भवती महिलाओं को पोषण आहार उपलब्ध कराया जाता है। इन्हें 300 से 600 कैलोरी तक का प्रोटीन पोषण आहार के रूप में दाल-दलिया या अन्य खाद्य पदार्थ के रूप में दिया जाता है, लेकिन इस कार्यक्रम में कई खामियां, गड़बडिय़ा और घपले-घोटले होते रहे हैं। मुख्यमंत्री के निर्देश पर पूरी व्यवस्था में सुधार लाने के लिए प्रदेश भर की आंगनवाडिय़ों में बच्चों और गर्भवती तथा धात्री माताओं को ताज़ा पका खाना देने के उद्देश्य से साझा चूल्हा योजना बनाई गई। मुख्यमंत्री ने योजना 15 जुलाई 2009 से शुरू करने के निर्देश दिए थे, पर योजना 1 नवम्बर से अस्तित्व में आ पाई इसके देर से शुरू होने का कारण भी दलिया मा़फिया और विभाग के कुछ अधिकारियों को माना जा रहा है।

विंध्य क्षेत्र में बच्चों की उपेक्षा

कुपोषण के कारण गऱीबी में जी रहे हज़ारों बच्चों की मौत की दर में सतना जि़ला अव्वल है। राज्य सरकार द्वारा बच्चों की सुरक्षा और सेहत के मामले में जारी किए गये कोई भी निर्देश सतना में प्रभावशील नहीं है। पिछले चार वर्षों के दौरान राज्य सरकार ने राज्य में बच्चों की सुरक्षा पर हर साल औसतन दो रुपये और स्वास्थ्य पर पंद्रह रुपये खर्च किए हैं। एक ग़ैर सहकारी संगठन द्वारा जारी किये गए सर्वेक्षण रिपोर्ट से उपरोक्त तथ्यों का खुलासा हुआ है। वर्ष 2005 से लेकर 2009 तक क्रमश: 1603, 2060, 1688 और 1856 बच्चों की मौत सतना जिले में हुई है। वहीं रीवा और सीधी जिलों में क्रमश: इसी अवधि में 1051 और 573, 1324 एवं 1070, 972 एवं 1450, 702 एवं 1122 बच्चों की मौत हुई है। मध्य प्रदेश सरकार द्वारा प्रत्येक बच्चे के स्वास्थ्य पर वर्ष 2004 से लेकर 2009 तक पंद्रह रुपया खर्च किया गया वहीं उड़ीसा राज्य द्वारा सत्रह रुपये और उत्तर प्रदेश द्वारा 60 रुपये व्यय किया गया। बाल सुरक्षा के मामले में प्रत्येक बालक पर सालाना खर्च मध्य प्रदेश में 01.94 रुपये और आंध्र प्रदेश द्वारा 27.54 रुपया किया गया। बलात्कार सहित बच्चों पर होने वाले अपराधों की संख्या भी प्रदेश में सबसे ज़्यादा है। राज्य सरकार द्वारा बाल शिक्षा पर 2004 से 2009 के मध्य प्रतिवर्ष प्रति बालक 1395 रुपये और इसी अवधि में हिमाचल प्रदेश द्वारा 4894 रुपये व्यय किए गए।
ग़ैर सहकारी संगठन संकेत डेवलपमेंट ग्रुप द्वारा जारी रिपोर्ट में वर्ष 2001 से वर्ष 2009 तक राज्य सरकार द्वारा बच्चों को लाभ पहुंचाने वाली योजनाओं पर बजट प्रावधानों का अध्ययन किया गया। इस अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार बच्चों की शिक्षा शिशु विकास पर तुलनात्मक रूप से अधिक राशि खर्च की गई है जबकि बाल स्वास्थ्य और सुरक्षा को नजऱअंदाज़ किया गया है।

Friday, October 21, 2011

रेत माफिया के कारण घडिय़ालों पर संकट




मध्य प्रदेश में खनिज और रेत माफियाओं के कारण वनों और नदियों के साथ ही जीवों का जीवन भी खतरे में पड़ गया है। प्रदेश में अब बाघों के बाद घडिय़ालों के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा है। हालात ऐसे बन गए हैं कि प्रदेश का एक और अभ्यारण्य समाप्त होने की कगार पर है. विंध्य क्षेत्र की सबसे बड़ी नदियों में शामिल की गई सोन नदी के तट पर बना घडिय़ाल अभ्यारण्य राज्य शासन की उपेक्षा और अनदेखी का शिकार बन चुका है. मध्य प्रदेश में विलुप्ति की कगार पर जा रहे घडिय़ाल, मगरमच्छों की दुर्लभ जलीय प्रजातियों के संरक्षण के लिए इस केंद्र की स्थापना की गई थी. इस अभ्यारण्य के लिए राज्य सरकार प्रतिवर्ष करोड़ों रूपए का बजट आवंटित करती है. प्रतिबंधित क्षेत्र में रेत माफिया द्वारा लगातार किया जा रहा अवैध उत्खनन राज्य शासन के स्थानीय अधिकारियों के लिए चिंता का विषय नहीं है. रेत माफिया स्थानीय अधिकारियों और नेताओं से ही पिछले दो वर्षों से सक्रिय है.
सोन घडिय़ाल अभ्यारण्य मध्य प्रदेश में सोन नदी की विविधता और प्राकृतिक सौन्दर्य को देखते हुए मध्य प्रदेश शासन के आदेश से 23 सितम्बर 1981 को स्थापित किया गया था. इस अभ्यारण्य का उद्घाटन प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह द्वारा 10 नवम्बर 1981 को किया गया था. अभ्यारण्य का कुल क्षेत्रफल 209.21 किमी का है. इसमें सीधी, सिंगरौली, सतना, शहडोल जिले में प्रवाहित होने वाली सोन नदी के साथ गोपद एवं बनास नदी का कुछ क्षेत्र भी शामिल है. सोन घडिय़ाल अभ्यारण्य नदियों के दोनों ओर 200 मीटर की परिधि समेत 418.42 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र संरक्षित घोषित है.उस समय के एक सर्वेक्षण के अनुसार इस क्षेत्र में मगरमच्छ और घडिय़ालों की कुल संख्या 13 बताई गई थी, जबकि वास्तविकता कुछ और थी. क्षेत्र में कार्यरत पर्यावरणविदों के अनुसार इस क्षेत्र में घडिय़ालों की संख्या लगातार कम होती जा रही है और उसका प्रमुख कारण सोन नदी के तट पर अनधिकृत रूप से कार्यरत रेत माफिया हैं.
रेत माफिया के अवैध संग्रहण के कारण मगरमच्छ और घडिय़ाल सोन नदी से करीब बसाहट वाले गांव में घुसकर जानवरों और ग्रामीणों को शिकार बना रहे हैं. जिला चिकित्सालय वैढऩ में पदस्थ चिकित्सक डॉ. आर.बी. सिंह के अनुसार प्रतिवर्ष 40 से 50 लोग घडिय़ालों के हमले का शिकार होकर यहां आते है, जिनमें से कुछ को तो बचा लिया जाता है पर कई लोग अकाल मौत का भी शिकार हो जाते हैं. रेत माफिया सोन नदी से अवैध रूप से उत्खनन करने के लिए नदी को लगातार खोदने का काम करता है, परिणामत: पानी में होने वाली लगातार हलचल के परिणाम स्वरूप घडिय़ालों के लिए निर्मित किए गये इस प्राकृतिक वातावरण में परिवर्तन आता है.
मध्य प्रदेश में विलुप्ति की कगार पर जा रहे घडिय़ाल, मगरमच्छों की दुर्लभ जलीय प्रजातियों के संरक्षण के लिए इस केंद्र की स्थापना की गई थी. इस अभ्यारण्य के लिए राज्य सरकार प्रतिवर्ष करोड़ों रूपए का बजट आवंटित करती है. प्रतिबंधित क्षेत्र में रेत माफिया द्वारा लगातार किया जा रहा अवैध उत्खनन राज्य शासन के स्थानीय अधिकारियों के लिए चिंता का विषय नहीं है. रेत माफिया स्थानीय अधिकारियों और नेताओं से ही पिछले दो वर्षों से सक्रिय है. सूत्रों की मानें तो भारत शासन द्वारा घडिय़ाल अभ्यारण्य में खर्च की जाने वाली राशि फर्जी बिल बाउचर्स के जरिए वन अधिकारियों एवं स्थानीय अधिकारियों के निजी खजाने में जा रही है. सोन नदी के जोगदाह पुल से कुछ आगे रेत का अवैध उत्खनन व्हील बना हुआ है, जहां से रेत माफिया इस क्षेत्र में पूरी तरह सक्रिय हैं.
सोन घडिय़ाल के प्रभारी संचालक ने बताया कि 200 किलोमीटर संरक्षित क्षेत्र के लिए केवल 13 सुरक्षाकर्मी उपलब्ध है. मगरमच्छ एवं घडिय़ालों की सुरक्षा के लिए प्रतिवर्ष 30 लाख रूपये का बजट आवंटित किया जाता है. अब तक तकरीबन 250 मगरमच्छ एवं घडिय़ालों के बच्चे संरक्षित क्षेत्र में छोड़े गए हैं, जिनकी संख्या अब लगभग 150 के करीब है. श्री वर्मा के अनुसार शीघ्र ही वैज्ञानिक सर्वे कराया जाना प्रस्तावित है, इसके बाद भिन्न प्रजातियां एवं उनकी वास्तविक संख्या का आंकलन किया जा सकेगा.वरना बाघों की तरह इनके दर्शन भी दुर्लभ हो जाएंगे.
उल्लेखनीय है कि चंबल सेंचुरी क्षेत्र में दिसंबर-2007 से जिस तेजी के साथ किसी अज्ञात बीमारी के कारण एक के बाद एक सैकड़ों की संख्या में डायनाशोर प्रजाति के इन घडिय़ालों की मौत हुई थी उसने समूचे विश्व समुदाय को चिंतित कर दिया था। ऐसा प्रतीत होने लगा था कि कहीं इस प्रजाति के घडिय़ाल किसी किताब का हिस्सा न बनकर रह जाएं। घडिय़ालों के बचाव के लिए तमाम अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं आगे आई और फ्रांस, अमेरिका सहित तमाम देशों के वन्य जीव विशेषज्ञों ने घडिय़ालों की मौत की वजह तलाशने के लिए तमाम शोध कर डाले। वन्य जीव प्रेमियों के लिए चंबल क्षेत्र से एक बड़ी खुशखबरी सामने आई है। किसी अज्ञात बीमारी के चलते बड़ी संख्या में हुई डायनाशोर प्रजाति के विलुप्तप्राय घडिय़ालों के कुनबे में सैकड़ों की संख्या में इजाफा हो गया है। अपने प्रजनन काल में घडिय़ालों के बच्चे जिस बड़ी संख्या में चंबल सेंचुरी क्षेत्र में नजर आ रहे हैं वहीं चंबल सेंचुरी क्षेत्र के अधिकारियों की अनदेखी से घडिय़ालों के इन नवजात बच्चों को बचा पानी काफी कठिन प्रतीत हो रहा है।
घडिय़ालों की हैरत अंगेज तरीके से हुई मौतों में जहां वैज्ञानिकों के एक समुदाय ने इसे लीवर क्लोसिस बीमारी को एक वजह माना तो वहीं दूसरी ओर अन्य वैज्ञानिकों के समूह ने चंबल के पानी में प्रदूषण की बजह से घडिय़ालों की मौत को कारण माना। वहीं दबी जुबां से घडिय़ालों की मौत के लिए अवैध शिकार एवं घडिय़ालों की भूख को भी जिम्मेदार माना गया। घडिय़ालों की मौत की बजह तलाशने के लिए ही अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने करोड़ों रुपये व्यय कर घडिय़ालों की गतिविधियों को जानने के लिए उनके शरीर में ट्रांसमीटर प्रत्यारोपित किए।
घडिय़ालों के अस्तित्व पर संकट के प्रति चंबल सेंचुरी क्षेत्र के अधिकारी लगातार अनदेखी करते रहे हैं। घडिय़ालों की मौत की खबर भी इन अधिकारियों को हरकत में नहीं ला सकी और अब जबकि घडिय़ालों के अस्तित्व को बचाए रखने के लिए इटावा जनपद से गुजरने वाली चंबल में बड़ी संख्या में घडिय़ालों के बच्चों ने जन्म लिया है तो अभी तक इनकी सुरक्षा के लिए सेंचुरी क्षेत्र के अधिकारियों ने कोई उपाय नहीं किए हैं। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश को जोडऩे वाली चंबल नदी में घडिय़ालों के बच्चों को नदी के किनारे बालू पर रेंगते हुए और नदी में अठखेलियां करते हुए आसानी से देखा जा सकता है। इतनी बड़ी संख्या में घडिय़ालों के प्रजनन के बारे में जानकर अंतर्राष्ट्रीय वन्य जीव प्रेमियों में उत्साह है तो वहीं इनकी सुरक्षा को लेकर चिंता भी जताई जा रही है। वन्य जीव प्रेमियों को आशंका है कि आने वाले दिनों में मानसून में चंबल के बढ़ते वेग में कहीं यह बच्चे बह कर मर न जाएं परंतु इसके बावजूद भी चंबल सेंचुरी क्षेत्र के अधिकारियों को इससे कोई सरोकार नहीं रह गया है।
नेचर कंजर्वेसन सोसायटी फार नेचर के सचिव एवं वन्य जीव विशेषज्ञ डा. राजीव चौहान बताते हैं कि पंद्रह जून तक घडिय़ालों के प्रजनन का समय होता है जो मानसून आने से आठ-दस दिन पूर्व तक रहता है। घडिय़ालों के प्रजनन का यह दौर ही घडिय़ालों के बच्चों के लिए काल के रुप में होता है क्योंकि बरसात में चंबल नदी का जलस्तर बढ़ जाता है। परिणामस्वरूप घडिय़ालों के बच्चे नदी के वेग में बहकर मर जाते हैं। इन बच्चों को बचाने के बारे में वह उपाय बताते हैं कि यदि इन बच्चों को कृत्रिम गर्भाधान केंद्र में संरक्षित कर तीन साल तक बचा लिया जाए तो इन बच्चों को फिर खतरे से टाला जा सकता है। वे कहते हैं कि महज दस फीसदी ही बच्चे बच पाते हैं जबकि 90 फीसदी बच्चों की पानी में बह जाने से मौत हो जाती है। वहीं डा.चौहान यह जानकर चौंकते हैं कि घडिय़ालों के बच्चों की संख्या हजारों में है। वह संभावना जताते हैं कि विगत दिनों इस प्रजाति को बचाने के लिए 840 बच्चों को नदी के ऊपरी हिस्से में छोड़ा गया था। कहीं ऐसा न हो कि यह वही बच्चे नीचे उतर आए हों परंतु नदी के तट पर जिस प्रकार से टूटे हुए अंडे नजर आते हैं उससे साफ है कि इन बच्चों ने अभी हाल ही में जन्म लिया है।

कैसे हुई संकट की शुरूआत?
देश मे दो घाटियां है,एक कश्मीर घाटी एवं एक चंबल घाटी। कश्मीर घाटी जहां आतंकवादियों के आंतक से ग्रस्त है। वहीं चंबल घाटी को खूंखार डकैतों की शरण स्थली के रूप मे दुनिया भर मे ख्याति हासिल है। इसी चंबल घाटी मे खूबसूरत नदी बहती है चंबल। जिसमें मगर, घडिय़ाल, कछुये, डाल्फिन समेत तमाम प्रजातियों के वन्यजीव स्वच्छंद विचरण करते है। इतना ही नहीं चंबल की खूबसूरती में चार-चांद लगाने के लिये हजारों की संख्या मे प्रवासी पक्षी भी आते है, लेकिन पिछले दिनो दुर्भल घडिय़ालों की मौत का जो सिलसिला शुरू हुआ वह अब डाल्फिन एवं मगर तक आ पहुंचा है। खूंखार डकैतों के खात्मे के बाद चंबल घाटी के वन्यजीवों पर जो संकट आया है। ऐसा लगता है कि खूंखार डकैतों के खात्मे के बाद सक्रिय अधिकारियों ने चंबल की खूबसूरती को दाग लगा दिया है। राजस्थान से प्रवाहित चंबल मध्य प्रदेश होते हुये उत्तर प्रदेश के इटावा के पंचनंदा तक इतनी खूबसूरत है जहां एक साथ मगर, डाल्फिन और घडिय़ाल रहते है और यहां हजारों की तादात मे घडिय़ाल मर रहे थे. उस समय यह आशंका भी व्यक्त की जा रही थी कि कहीं ऐसा तो कहीं ऐसा न हो कि चंबल की आने वाले दिनों मे खूबसूरती समाप्त हो जायें।
चंबल की खूबसूरती इसलिये भी बढ़ जाती है क्योकि यहां की रीजनल डायवर्सिटी अपने आप में खूबसूरत है। इस क्षेत्र की प्राकृतिक सुन्दरता के कारण हजारो विदेशी पक्षी आते है, जिनकी 200 से अधिक प्रजातियां देखने को मिलती है। इसीलिए इस क्षेत्र को पक्षी अभयारण्य घोषित किया गया था. लेकिन इटावा मे पिछले साल दिसम्बर के पहले सप्ताह मे चंबल नदी मे घडिय़ालों के मरने की खबरो ने सनसनी फैला दी। हालांकि पूछने पर वन अधिकारियों ने इससे साफ इंकार किया कि किसी घडिय़ाल की मौत हुई है. लेकिन वन पर्यावरणीय संस्था सोसायटी फार कन्जरवेशन आफ नेचर के सचिव डा.राजीव चौहान ने इन मृत घडिय़ालों को खोज ही नही निकाला बल्कि वन अधिकारियों की उस करतूत को भी उजागर कर दिया जो उन्होने बेजुबान घडिय़ाल की मौत के बाद किया था।
अगर दुर्लभ घडिय़ालों, डाल्फिन एवं मगरों की मौत की बात करें तो कही न कही चंबल मे अधिकारियों का साम्राज्य हावी है और उन्हीं की यह करतूत है जो चंबल मे वन्यजीवो पर संकट आ खड़ा हुआ है। यह कब दूर होगा कुछ कहा नहीं जा सकता।
कभी इटावा में चंबल नदी से इसी तरह से एक सौ से अघिक घडियाल भटक कर यमुना और दूसरी नदियों में चले गए थे, जो आज तक वापस नहीं लौट सके हैं। इसका कोई जबाव ना तो वन अधिकारियों के पास है, और ना ही इस अभियान में लगे विषेशज्ञ इस बारे में जानकारी देने तैयार हो रहे हैं। इनमें तो कई मर भी गए, लेकिन वन विभाग आज तक नहीं चेता है। इस बात को तब बल मिलता है, जब यमुना नदी से एक मरा हुआ घडियाल मिला। उसके बारे में कहा जा रहा है कि मछली का शिकार करने वालों ने इसे मार कर फेंक दिया है। इलाकाई लोगों के साथ पर्यावरणविदों का भी यही मानना है। वन्य जीव विभाग ने अपने सर्वेक्षण में पाया कि चंबल नदी से पलायन कर यमुना नदी में पहुंचे 100 से अधिक घडियालों की जान अब शिकारियों के हाथ में हैं।
जिस तरह से चंबल के बजाय अब यमुना नदी से मरे हुए घडियाल बाहर निकल रहे हैं, उससे एक बार फिर से घडियालों की प्रजाति पर संकट सा आता नजर आ रहा है। यमुना नदी में मरे हुए घडियाल का परीक्षण करवा कर सैंपल बरेली स्थित आईबीआरआई लैब को भेज दिए गए हैं। अधिकारी घडियालों पर आने वाले हर प्रकार के संकट से निबटने के लिए तत्पर नजर आ रहे हैं। घडियाल को बचाने की दिशा में तमाम संगठन भी अधिकारियों के साथ सक्रिय नजर आ रहे हैं। इन सबके बावजूद, इतना तो तय है कि विलुप्त प्रजाति के इन घडियालों को बचाने की दिशा में चल रहा अभियान सही ढंग से काम नहीं कर रहा है, तभी तो घडियाल एक के बाद एक करके भटक रहे हैं।

बीहड़ों में तब्दील होती उपजाऊ भूमि

कहने को तो भारत कृषि प्रधान देशों की श्रेणी में आता है, इसके बावजूद हम गेहूं से लेकर अन्य खाद्य पदार्थों का आयात करने पर मजबूर हैं. ऐसा नहीं है कि हमारे पास अन्न पैदा करने के लिए उपजाऊ भूमि और अन्य साधनों की कमी है. यहां तो 800 एकड़ कृषि योग्य भूमि ही बीहड़ों में तब्दील होकर बर्बाद हो रही है. चंबल संभाग की अधिकांश भूमि एल्यूवियल होकर भी हल्के किस्म की है. इस भूमि में रेत,सिल्क, मिट्टी, कंकड़ मिला हुआ है. बरसात होने पर पानी पूरी तरह से भूमि के अंदर नहीं जाता, अपितु ढाल पर ही बहने लगता है. पहले छोटी नाली बनती है, धीरे-धीरे बड़ी नाली में, फिर गहरे नालों में और अंत में बीहड़ों का रूप लेती चली जाती है.
मनुष्य धरती की संतान है, इसलिए मनुष्य सब कुछ पैदा कर सकता है, लेकिन धरती पैदा नहीं कर सकता है. दुनिया में, और खासकर हमारे देश की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है. अनुमान है कि भारत की जनसंख्या 2020 तक 125 करोड़ हो जाएगी. ऐसे में धरती की कमी हमारे लिए एक समस्या बन सकती है. ऐसे में बर्बाद हो रही या उजाड़ हो रही बीहड़ भूमि को समतल बनाकर उसे मनुष्य के काम आने लायक रूप देना समय की सबसे बड़ी ज़रूरत है.
मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में चंबल नदी के कच्छार में एल्यूवियल मिट्टी के कारण लाखों हेक्टेयर भूमि उबड़-खाबड़ होकर बीहड़ के रूप में व्यर्थ पड़ी हुई है. इसके साथ ही भूमि में कटाव के कारण हर साल हज़ारों एकड़ उपजाऊ भूमि बीहड़ में तब्दील हो रही है. मध्य प्रदेश में 6.30 लाख हेक्टेयर भूमि बीहड़ भूमि है, जिसका अधिकांश भाग मध्य प्रदेश के उत्तरी अंचल में बसे जि़ला भिंड, मुरैना एवं श्योपुर में स्थित है. भिंड मुरैना एवं श्योपुर जि़लों में ही हर वर्ष लगभग 800 हेक्टेयर भूमि बीहड़ के रूप में परिवर्तित हो जाती है जिसकी अनुमानित क़ीमत लगभग 400 करोड़ रुपये है. उत्तर मध्य प्रदेश एवं उत्तर प्रदेश राजस्थान के लगे हुए जि़ले इटावा, उरई, जालौन, आगरा, धौलपुर, भरतपुर आदि का यह अंचल यहां डाकुओं के आतंक से जाना जाता है. वहीं दूसरी ओर प्रकृति के प्रकोप से यह अभिशाप बीहड़ बाहुल्य क्षेत्र के नाम से भी जाना जाने लगा है.
सामाजिक एवं सर्वोदय कार्यकर्ताओं के प्रयासों से इस क्षेत्र में डाकुओं द्वारा आत्म समर्पण के कारण मुक्ति मिल जाने से एक नई आशा की किरण का उदय हुआ है. परंतु इस आशा की किरण का पूर्ण लाभ इस क्षेत्र की जनता को तब तक प्राप्त नहीं होगा, जब तक सदियों से बने बीहड़ों को कृषि भूमि एवं वन भूमि में नहीं बदल दिया जाता, जिसकी अभी तक गंभीर उपेक्षा हुई है. चंबल संभाग के भिंड, मुरैना, श्योपुर जि़लों में चंबल, सिंध, क्वारी, बेसली, सीप, सोन, कूनों एवं इनकी सहायक नदियों द्वारा अत्यंत उपजाऊ भूमि को बीहड़ों में परिवर्तित कर दिया गया है. संभाग के 16.14 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में से लगभग 3.10 लाख हेक्टेयर भूमि बीहड़ों में रुपांतरित हो चुकी है जो कि संभाग के संपूर्ण क्षेत्र का लगभग 20 प्रतिशत है, जिसकी क़ीमत खरबों रुपये हैं. यह भी अनुमानित है कि लगभग 800 हेक्टेयर उपजाऊ भूमि प्रति वर्ष बीहड़ में बदलती जा रही है. यदि बीहड़ भूमि को बीहड़ बनने से नहीं रोका गया तो अगली शताब्दी तक भिंड, मुरैना, श्योपुर जि़ले पूरी तरह से बीहड़ में परिवर्तित हो जाएंगे एवं इस बीहड़ की सीमा ग्वालियर एवं दतिया जि़लों को छूने लगेगी.
चंबल संभाग की अधिकांश भूमि एल्यूवियल होकर भी हल्के किस्म की है. इस भूमि में रेत,सिल्क, मिट्टी, कंकड़ मिला हुआ है. बरसात होने पर पानी पूरी तरह से भूमि के अंदर नहीं जाता, अपितु ढाल पर ही बहने लगता है. पहले छोटी नाली बनती है, धीरे-धीरे बड़ी नाली में, फिर गहरे नालों में और अंत में बीहड़ों का रूप लेती चली जाती है. भिंड, मुरैना, श्योपुर जि़लों में अलग-अलग गहराई के बीहड़ हैं. 0 से 1.5 मीटर गहराई के 0.738 लाख हेक्टेयर, 1.5 से 5 मीटर के 1.265 लाख हेक्टेयर, 5 मीटर से 10 मीटर की गहराई के 0.615 लाख है एवं 10 मीटर से अधिक गहराई के 0.489 लाख हेक्टेयर बीहड़ भूमि अनुमानित है. पूर्व ग्वालियर स्टेट के बंदोबस्त के अनुसार मुरैना तहसील का बीहड़ का क्षेत्रफल तहसील के कुल क्षेत्रफल का 21 प्रतिशत था, जबकि वर्ष 1989 में यह बीहड़ क्षेत्र लगभग दो गुना होकर 42 प्रतिशत हो गया था. इसी प्रकार भिंड तहसील के कुल क्षेत्रफल का 49 प्रतिशत बीहड़ क्षेत्रफल है जो कि अब बीहड़ बनने की तीव्र रफ्तार एवं बीहड़ रोकने के गंभीर उपाय न होने से अब यह बीहड़ क्षेत्रफल लगभग तिगुना हो गया होगा.
50 गांवों का अस्तित्व ख़तरे में
चंबल, कछार में अब तक भूमि के कटाव से जो नुकसान हो चुका, उसे अनदेखा किया जाता रहा है, लेकिन आगे होने वाले नुकसान को रोकने के लिए भी कोई प्रयास नहीं किए जा रहे हैं, यह चिंता का विषय है. जीवाजी विश्वविद्यालय ग्वालियर के भूगर्भ शास्त्र विभाग द्वारा किए गए शोधकार्य से पता चला है कि चंबल घाटी में जिन 213 गांवों का अध्ययन किया गया, उनमें से 14 गांव तो उजडऩे की कगार पर हैं, क्योंकि बीहड़ इन गांवों से केवल 100 मीटर दूर रह गए हैं और ये बीहड़ कभी भी फैलकर इन गांवों को लील सकते हैं. इनके अलावा 23 गांवों में बीहड़ अभी 200 मीटर दूर हैं और 13 गांवों में 500 मीटर दूर बने बीहड़ इन गांवों को लीलने के लिए तेजी से आगे बढ़ रहे हैं. सेटेलाईट चित्रों से इन गांवों की तस्वीर आई है.
भूगर्भ अध्ययन शाला, जीवाजी विश्वविद्यालय ग्वालियर के विभाग प्रमुख प्रोफेसर एसएन महापात्रा का कहना है कि शोधकार्य से यह पता चला है कि चंबलघाटी में हो रहे मिट्टी के अपरदन की वज़ह से लगभग 50 गांवों पर बीहड़ में तब्दील होने का ख़तरा मंडरा रहा है. अब इस बात को लेकर शोध किया जा रहा है कि मिट्टी के कटाव को कैसे रोका जा सके.
बीहड़ के नज़दीकी गांव खुशहाली और समृद्धि से कोसो दूर हैं. मिट्टी के लगातार कटाव से किसानों की स्थिति दयनीय हो गई है. कृषि योग्य भूमि लगातार बीहड़ों में बदलती जा रही है, ऐसे में इन गांवों के किसानों का जीवन काफ़ी कठिन और समस्याग्रस्त हो गया है. इस समस्या से चिंतित शोधकर्ता अब इस अध्ययन में जुटे हैं कि ऐसा कौन सा उपाय किया जाए कि घाटी का कटाव रुक जाए और हज़ारों घर बर्बाद होने से बच जाए. हालांकि शोधकर्ताओं को भरोसा है कि वे जल्दी ही किसी ऐसे निष्कर्ष पर पहुंच जाएंगे, जिससे इन गांवों को बीहड़ बनकर उजडऩे से रोक लिया जाएगा. मृदा में नाइट्रोजन, फास्फोरस, आर्गेनिक कार्बन, पोटेशियम, पीएच जिसमें हाईड्रोजन आयंस होते हैं. मृदा की अम्लीय एवं क्षारीय स्थिति को स्पष्ट करते हैं. बारिश होने पर मृदा में मौजूद ये पोषक तत्व बह जाते हैं.
पर्यावरण संकट की दृष्टि से इटावा जिला निरंतर संवेदनशील होता जा रहा है। यहां की चंबल, यमुना और क्वारी नदी के बीच के गांव बंजर बीहड़ का रूप लेते जा रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक लगभग पांच सौ हैक्टेयर भूमि प्रतिवर्ष बीहड़ों में तब्दील हो रही है। लकड़ी का भारी कटान अगर इसी तरह होता रहा तो यहां का पूरा क्षेत्र रेगिस्तान हो जायेगा। लकड़ी कटान का धंधा बेखौफ जारी है।
जिन माननीयों के हाथों पौधे रोपे जाते हैं वह उस दिन के बाद कभी उसे मुड़कर भी नहीं देखते सबसे दु:खद बात तो यह है कि जो संस्थायें पौधरोपण कराती हैं वह भी उस दिन के बाद एक दिन भी पानी डालने कभी नहीं जाती। कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाये तो पौधों के जीवन रक्षा की किसी को चिंता नहीं है। यही कारण है कि प्रतिवर्ष करोड़ों पौधे रोपे जाते हैं और हजारों भी पेड़ नहीं बन पा रहे। राज्य सरकार ने तो गत वर्षो में 31 जुलाई को प्रदेश भर के स्कूलों को लक्ष्य देकर पौधे रोपने का काम कराया था लेकिन यह अभियान भी समारोह बनकर रह गया। स्कूलों में हरियाली कितनी बढ़ी यह किसी से छिपा नहीं है।
चंबल यमुना क्षेत्र में बढ़ते बीहड़ से चिंतित होकर दो दशक पूर्व मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने हैलीकाप्टर से विलायती बबूल के बीज जमीन पर गिरवाये थे लेकिन यह प्रयोग भी बहुत सफल नहीं हो सका। इस क्षेत्र की जमीन पर बेशरम ने पैर जमाये जिसने जमीन की उत्पादन क्षमता को निरंतर कमजोर ही किया। अब जब सड़कों का जाल बिछ रहा है ईट भट्टे बढ़ रहे हैं तब उपजाऊ भूमि पर संकट स्वाभाविक ही है।
चंबल क्षेत्र में बीहड़ों का विस्तार गांव के गांव लीलता जा रहा है. इस अंचल के भिंड, मुरैना और श्योपुर जिलों में हर साल पन्द्रह सौ एकड़ भूमि बीहड़ में बदल रही है. इन जिलों की कुल भूमि का 25 फीसद हिस्सा बीहड़ों का है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक चंबल नदी घाटी क्षेत्र में 3000 वर्ग किलोमीटर इलाके में बीहड़ों का विस्तार है. इन जिलों की छोटी-बड़ी नदियां जैसे बीहड़ों के निर्माण के लिए अभिशप्त हैं.

चंबल में 80 हजार, कुआंरी में 75, आसन में 2036, सीप में 1100, बैसाली में 1000, कूनों में 8072, पार्वती में 700, सांक में 2122 और सिंध में 2032 हेक्टेयर बीहड़ हैं. बीते आठ सालों में करीब 45 प्रतिशत बीहड़ों में वृद्धि दर्ज की गई है. इन बीहड़ों का जिस गति से विस्तार हो रहा है, उसके मुताबिक 2050 तक 55 हजार हेक्टेयर कृषि भूमि बीहड़ों में तब्दील हो जाएगी. इन बीहड़ों का विस्तार एक बड़ी आबादी के लिए विस्थापन का संकट पैदा करेगा.

जमीन की सेहत अब प्राकृतिक कारणों की तुलना में मानव उत्सर्जित कारणों से ज्यादा बिगड़ रही है. पहले भूमि का उपयोग रहवास और कृषि कार्यों के लिए होता था, लेकिन अब औद्योगीकरण, शहरीकरण बड़े बांध और बढ़ती आबादी के दबाव भी भूमि को संकट में डाल रहे हैं. जमीन का खनन कर उसे छलनी किया जा रहा है, तो जंगलों का विनाश कर बंजर बनाए जाने का सिलसिला जारी है. जमीन की सतह पर ज्यादा फसल उपजाने का दबाव है तो भू-गर्भ से जल, तेल व गैसों के अंधाधुंध दोहन के हालात भी भूमि पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहे हैं. पंजाब और हरियाणा में सिंचाईं के आधुनिक संसाधन हरित क्रांति के उपाय साबित हुए थे, लेकिन ज्यादा मात्रा में पानी छोड़े जाने के कारण कृषि भूमि को क्षारीय भूमि में बदलने के कारक सिद्ध हो रहे हैं.

कोयला से काला




कोयला जितना काला है उससे अधिक इस धंधे में लगे लोग काले हैं। ब्लैक डायमंड के नाम से प्रख्यात कोयले के काले कारोबार ने रातों ही रात में कईयों को फर्श से उठाकर अर्श पर ला खड़ा किया है। कोयले के कारोबार में मापदंडों का जिस प्रकार उल्लंघन हो रहा है उससे पर्यावरण भी दूषित हो रहा है। सिंगरौली में 22 सितंबर को ग्रीनपीस द्वारा सार्वजनिक सभा में एक रिपोर्टे जारी की गई। रिपोर्टर को जारी करते हुए ग्रीनपीस की प्रिया पिल्लई ने कहा सिंगरौली पर पर्यावरण एवं मानवाधिकार के हनन के निशान दिखाई देते हैं। हमारी रिपोर्ट देश की विधुत राजधानी में छाए प्रदुषण एवं विनाश को बेनकाब करती है।
चारों तरफ कोयला की धूल के बीच पुरा जन-समुदाय कोयला खदानों के भारी बोझ के साये में जी रहा है।उन्होंने अपनी जमीन विधुत उत्पादन के लिए दी जो उन तक नहीं पहुँचती है और अब उनके पास जीविकोपार्जन के लिए कोई भरोसेमंद साधन नहीं तथा स्वास्थ्य चौपट हो गया है। इसे विकास नहीं कहा जा सकता। धरती और लोगो की इतने व्यापक पैमाने पर हो रही बरबादी को हम नजऱअंदाज़ नहीं कर सकते जिसे उनके अधिकारों की रक्षा किए बिना और हमारे द्वारा किए जा रहे पर्यावरण के अतिक्रमण की सीमा तय किए बिना उन पर थोपा जा रहा है।
यह हजारों हेक्टेयर सघन वनों का सवाल है, हाशिए पर पड़े हजारों आदिवासी एवं दुसरे समुदाय तथा इस क्षेत्र का सम्पूर्ण पारिस्थिकी तन्त्र खतरे में है। फिर भी महज कुछ टन निम्नस्तरीय कोयले के लिए सरकार यहां की समृद्ध जैव विविधता का विनाश करने पर तुली हुई है। कोयला से काला' नामक एक रिपोर्ट आज बैधन की एक सार्वजनिक सभा में जारी की गई। इस सभा में कोयला खनन एवं थर्मल पावर प्लांटों से प्रभावित गांवों के लोग और वैसे लोग जिनके गांवों में खनन या औद्योगिक परियोजनाएँ प्रस्तावित हैं, उपस्थित थे।
यह रिपोर्ट ग्रीनपीस द्वारा जुलाई 2011 में गठित एक तथ्य आंकलन दल (फैक्ट फाइंडिंग मिशन)(1) का नतीजा है। इसमें पर्यावरण एवं इस क्षेत्र के लोगों पर अनियंत्रित कोयला खनन तथा ताप बिजली संयंत्र (थर्मल पावर प्लांटों) के प्रभाव को दर्ज किया गया है। इस तथ्य आंकलन दल को देश की विद्युत राजधानी के तौर पर प्रोत्साहित, सिंगरौली, में कोयला खनन के कारण हो रहे मानवीय उत्पीडऩ एवं पर्यावरण के विनाश की सच्चाई को सामने लाने के लिए गठित किया गया था।
रिपोर्ट को जारी करते हुए ग्रीनपीस की प्रिया पिल्लई ने कहा, ''सिंगरौली पर पर्यावरण एवं मानवाधिकार के हनन के निशान दिखाई देते हैं। हमारी रिपोर्ट, देश की विद्युत राजधानी माने जाने वाले सिंगरौली, में छाए प्रदूषण एवं विनाश को बेनकाब करती है। चारों तरफ कोयले की धूल के बीच पूरा जन-समुदाय कोयला खदानों के भारी बोझ के साये में जी रहा है। उन्होंने अपनी जमीनें विद्युत उत्पादन के लिए दीं जो उन तक नहीं पहुंचती है और अब उनके पास जीविकोपार्जन के लिए कोई भरोसेमंद साधन नहीं है तथा उनका स्वास्थ्य चौपट हो गया है। इसे विकास नहीं कहा जा सकता। धरती और लोगों की इतने व्यापक पैमाने पर हो रही बरबादी को हम नजरअंदाज नहीं कर सकते जिसे उनके अधिकारों की रक्षा किए बिना और हमारे द्वारा किए जा रहे पर्यावरण के अतिक्रमण की सीमा तय किए बिना उन पर थोपा जा रहा है।''
इस तथ्य आंकलन दल के निष्कर्ष महत्वपूर्ण हैं, खासकर मंत्रियों के समूह (जीओएम) द्वारा कोयला खनन के लिए वन प्रखंडों के आवंटन की स्वीकृति के संदर्भ में। केवल सिंगरौली में ही, माहन, छत्रसाल, अमेलिया एवं डोंगरी टाल-2 के वन प्रखंडों को पहले 'वर्जितÓ (नो-गो) की श्रेणी में रखा गया था। लेकिन अब इस विषय में मंत्रियों के समूह की ओर से स्वीकृति की प्रतीक्षा की जा रही है। हाल ही में कुछ खबरों के अनुसार मंत्रियों के समूह द्वारा 'वर्जितÓ व 'गैर वर्जितÓ (गो) क्षेत्र का सीमांकन रद्द किया जा सकता है। जब तक अक्षत वनों का सीमांकन नहीं किया जाता, इन वनों और लोगों की जमीन पर अधिग्रहण का खतरा बढ़ता रहेगा।
आधिकारिक तौर पर, 1980 में वन संरक्षण अधिनियम लागू होने के बाद से सिंगरौली क्षेत्र में 5,872.18 हेक्टेयर वन का गैर-वन्य उपयोग के लिए विपथन किया जा चुका है। सिंगरौली के वन प्रमंडल अधिकारी के अनुसार और भी 3,299 हेक्टेयर वन विपथन के लिए प्रस्तावित है। इसमें वर्तमान एवं प्रस्तावित औद्योगिक गतिविधियों के कारण वन-भूमि के अतिक्रमण के विभिन्न उदाहरण शामिल नहीं हैं।
फिलहाल, प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से माहन के वनों को एस्सार एवं हिंडाल्को के खनन स्वामित्व में हस्तांतरित करने के लिए बेहद दबाव दिया जा रहा है। पूर्व पर्यावरण एवं वन मंत्री, जयराम रमेश ने संकेत दिए थे कि इन वनों में खनन नही किया जाना चाहिए। माहन में उपलब्ध कुल 144 मिलियन टन का कोयला भंडार हिंडाल्को इंडस्ट्रीज लिमिटेड एवं एस्सार पावर लिमिटेड के ताप बिजली संयंत्र के लिए केवल 14 वर्षों तक कोयले की आपूर्ति के लायक हैं।
ग्रीनपीस इंडिया की नीति अधिकारी प्रिया पिल्लई ने आगे कहा, ''यह हजारों हेक्टेयर सघन वनों का सवाल है, हशिए पर पड़े हजारों आदिवासी एवं दूसरे समुदाय तथा इस क्षेत्र का संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र खतरे में हैं। फिर भी, महज कुछ टन निम्नस्तरीय कोयले के लिए सरकार यहां की समृद्ध जैव विविधता का विनाश करने पर तुली हुई है। वन भूमि के और अधिक विपथन के पहले सरकार को दूसरे क्षेत्रों में कोयले की उपलब्धता एवं वैकल्पिक ऊर्जा समाधानों का आंकलन करना चाहिए। कंपनियों को भी चाहिए कि वे प्रभावित समुदायों की आजीविका पर ध्यान दें, मानवाधिकारों पर हो रहे असर का आंकलन करें, भूमिहीनों एवं वन-आश्रित समुदायों की क्षतिपूर्ति तथा पुनर्वास की व्यवस्था करें।''
तथ्य आंकलन दल ने 9 एवं 10 जुलाई 2011 को सिंगरौली के उत्तर प्रदेश वाले इलाके में चिलिका दाड, दिबुलगंज (अनपरा थर्मल पावर प्लांट के निकट), बिलवाड़ा और सिंगरौली क्षेत्र के मोहर वन प्रखंड, अमलोरी एवं निगाही खदानों का दौरा किया। इस दल ने जनपद प्रशासन एवं कोल इंडिया लिमिटेड के प्रतिनिधियों से भी मुलाकात की।
रिपोर्ट में शामिल सूचनाओं के अनुसार देश में चुनिंदा 88 अति प्रदूषित औद्योगिक खण्ड के विस्तृत पर्यावरण प्रदूषण सूचकांक पर सिंगरौली नौवें स्थान पर है। इसके 81.73 अंक यह साफ-साफ संकेत करते है कि यह क्षेत्र खतरनाक स्तर पर प्रदूषित है। दरअसल, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान (एनआईएच) और भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (भेल) के प्रदूषण नियंत्रण अनुसंधान संस्थान (पीसीआरआई) की रिपोर्ट साफ-साफ संकेत करती है कि कोयला खनन के कारण सिंगरौली क्षेत्र में भू-जल का प्रदूषण हुआ है।
इसके अतिरिक्त, ' इलेक्ट्रिसिटे द फ्रांसÓ की एक अप्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार उत्पादन के लिए निम्नस्तरीय कोयले के उपयोग के कारण सिंगरौली के थर्मल पावर प्लांटों से हर साल लगभग 720 किलोग्राम पारा (मर्करी) निकलता है। अनेक गांवों में और यहां तक कि नॉदर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (एनसीएल) के उच्च अधिकारियों के द्वारा भी, तथ्य आंकलन दल को बताया गया कि चूंकि उनका दौरा बरसात के मौसम में हुआ है इसलिए वायु का गुणवत्ता स्तर काफी बेहतर था। सामान्यत:, और खासकर गर्मी के महीनों में वायु की गुणवत्ता का स्तर काफी खराब होता है। राख के तालाबों और खदानों के आस-पास रहने वाले ग्रामवासियों ने कहा कि उन महीनों में उनका जीवन नर्क हो जाता है। इसके फलस्वरूप, सिंगरौली गांव के लोगों को अनेक तरह की स्वास्थ्य समस्याएँ रहती हैं जिनमें सांस की तकलीफ, टीबी, चर्मरोग, पोलियो, जोड़ों में दर्द और अचनाक कमजोरी तथा रोजमर्रा की सामान्य गतिवधियों को करने में कठिनाई जैसी अनेक समस्याएं हैं।
इस रिपोर्ट में इस बात को भी उजागर किया गया है कि किस तरह विभिन्न खनन एवं औद्योगिक गतिविधियों ने ग्रामीण जीवन को नुकसान पहुंचाया है लेकिन इन गतिविधियों के संचालकों से किसी ने भी स्वास्थ्य सेवा एवं बुनियादी सुविधाओं को मुहैया कर लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ रहे कुप्रभाव को कम करने की जिम्मेदारी नहीं ली है। उदाहरण के लिए, सोनभद्र जनपद (उत्तर प्रदेश में) के शक्तिनगर में चिलिका दाड गांव को लें जो नैशनल कोलफील्ड्स लिमिटेड (एनसीएल) के मिट्टी के ढेर, कोयला ढोने वाली रेलवे लाइन और राष्ट्रीय ताप विद्युत निगम के पावर प्लांट से घिरा है और यहां जल को प्रदूषित करने, वायु को प्रदूषित करने एवं स्वीकृत मानदंड से अधिक शोर पैदा करने में इनमें से हरेक की भूमिका है।
केवल अकेले चिलिका दाड में ही 600 ऐसे परिवार हैं जिन्हें इन विभिन्न परियोजनाओं के कारण अनेक बार विस्थापित होना पड़ा है। इन निवासियों को आवासीय पट्टे दिए गए केवल उस पर रहने के अधिकार के साथ। वे न तो इस जमीन को बेच सकते हैं और न ही इसके एवज में कोई कर्ज ले सकते हैं। अब इस गांव से महज 50 मीटर की दूरी पर भारी संख्या में खदानों, बेरोजगारी, उच्चस्तरीय प्रदूषण एवं खनन विस्फोट का खतरा झेल रहे ग्रामीणों के सामने बदहाली को झेलने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचा है।
तथ्य आंकलन दल इस बात की सिफारिश करता है कि जब तक अन्य क्षेत्रों में कोयले की उपलब्धता एवं वैकल्पिक ऊर्जा समाधानों का आंकलन न हो जाए तब तक के लिए सिंगरौली के वन क्षेत्र में सभी खनन गतिविधियों पर रोक लगाई जाए। दल यह भी सिफारिश करता है कि सभी खनन एवं औद्योगिक गतिविधियों का व्यापक मानवाधिकार आंकलन किया जाए और लोगों की शिकायतें दूर करने के लिए जमीनी स्तर पर कारवाई की जाए। इस दल ने महसूस किया है कि दशकों से सिंगरौली में प्रभावित जन समुदायों की आजीविका का सवाल बुनियादी तौर पर अनुत्तरित ही रहा है। इस मोर्चे पर तथ्य आंकलन दल ने सुझाव दिया है कि लोग अपनी पूर्ववर्ती आजीविका को जारी रख सकें, इस पर प्रशासन को ध्यान देना चाहिए। इसके लिए भूमि-आधारित क्षतिपूर्ति व्यवस्था लागू की जाए जिसके माध्यम से अधिग्रहीत की गई कृषि भूमि के बदले में किसी दूसरी जगह कृषि भूमि प्रदान की जाए।