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भेड़ाघाट

Friday, March 21, 2014

बड़े बाबू को चढ़ा नेता बनने का शौक

बात सिर्फ आला अफसरों के सियासत की दुनिया में आने तक सीमित नहीं है। ये अफसर कॉरपोरेट घरानों से भी जुड़ रहे हैं चुनावी मौसम में सरकारी आला अफसरों ने नौकरी को अलविदा कहकर सियासी संसार का रुख करना शुरू कर दिया है। यह पहली बार नहीं हो रहा है। नया कुछ है तो सिर्फ यह कि अभी सेवा के दौरान ही अफसर किसी नेता या दल के ‘आदमी’ के रूप में अपनी पहचान बनाने लगे हैं। के दामोदरन, के सुब्रमण्यम और जेएन दीक्षित जैसे तटस्थ और ईमानदार सरकारी अफसरों की तादाद हमारे यहां लगातार घट रही है। अभी तो सिविल सेवा के माध्यम से आए तमाम आला अफसर नौकरी पर रहते हुए ही किसी बड़े नेता के खासमखास बन जाते हैं ताकि रिटायर होने के बाद भी उन्हें कोई बढ़िया सी पोस्टिंग मिल जाए। दूसरी प्रजाति उन अफसरों की है,जो अपने सेवाकाल में ही किसी दल विशेष का आदमी बनकर बाकायदा किसी चुनाव क्षेत्र में अपना चुनावी ढांचा भी बनाना शुरू कर देते हैं।
‘पार्टी एनिमल’
बात वर्तमान की हो तो मुंबई के पुलिस कमिश्नर सत्यपाल सिंह बीजेपी से जुड़कर बागपत-बड़ौत लोकसभा क्षेत्र से पार्टी के प्रत्याशी बन गए हैं। पूर्व रक्षा सचिव आरके सिंह (प्रत्याशी, आरा लोकसभा क्षेत्र) और पूर्व आईएफएस अफसर हरदीप पुरी ने भी बीजेपी से जुड़ने का फैसला किया। मिडिल क्लास, गालिब और दिल्ली पर लिखते रहे पवन वर्मा पिछले कुछ वर्षों से जेडी-यू के साथ हैं। पश्चिम बंगाल के आईपीएस अफसर नजरुल इस्लाम सीपीएम में जा रहे हैं। माना जाता है कि सियासत से जुड़ने वाले अफसर उन्हीं दलों में अपने को बेहतर महसूस करते हैं, जिनके नेताओं से इनके संबंध अंतरंग और मधुर होते हैं। हाल के दौर में जिस तरह चोटी के सरकारी बाबुओं के नाम भ्रष्टाचार में आकंठ डूबने से लेकर अपने राजनीतिक आकाओं के लिए किसी भी स्तर तक जाकर काम करने से जुड़ रहे हैं, उसके चलते भयावह हालात बन गए हैं। लोकतंत्र में जो कानून संसद बनाती है, उन्हें जमीन पर लागू करने का दायित्व इन बाबुओं का ही होता है। पर 2जी घोटाले में तिहाड़ जेल की हवा खा चुके पूर्व टेलीकॉम सेक्रेटरी सिद्धार्थ बेहुरिया से लेकर मध्य प्रदेश के आईएएस द्वय जोशी दंपती तक ने जिस तरह से अपने पद का दुरुपयोग करके धन अर्जित किया, उससे साफ है कि हमारे नौकरशाह बेलगाम होते जा रहे हैं। यहां बात सिर्फ आला अफसरों के सियासत की दुनिया में आने तक सीमित नहीं है। ये अफसर कॉरपोरेट घरानों से भी जुड़ रहे हैं। भारत सरकार के वित्त सचिव पद पर आसीन आईएएस अफसर अशोक झा ने रिटायर होने के चंद माह बाद ही ह्युंदै के सीईओ का पद संभाल लिया। भारत की एक प्रमुख रीयल एस्टेट कंपनी डीएलएफ ने कुछ साल पहले एक वरिष्ठ आईएएस अफसर राजीव तलवार को अपने यहां बड़े पद पर रखा। जाहिर है, हमें इस बात से रत्ती भर भी लेना-देना नहीं है कि किसी को कितनी पगार मिलती है। मगर, ऐसे तमाम अफसरों के बारे में यह जरूर पता लगाया जाना चाहिए कि सेवा में रहते हुए उन्होंने किसी खास नेता, राजनीतिक जमात या कॉरपोरेट घराने के लिए ऐसा कौन सा काम किया, जिसके बदले में उन्हें इनसे ये रेवड़ियां प्राप्त हुईं। सीमा सुरक्षा बल के पूर्व डीजीपी प्रकाश चंद्रा ने अपने एक हालिया इंटरव्यू में कहा कि जब तक ऐसा कोई कठोर नियम नहीं बनाया जाता कि भारतीय प्रशासनिक सेवाओं के अफसर अपनी सेवा से मुक्त होने के कम से कम तीन-चार साल तक किसी पार्टी या कॉरपोरेट घराने से नहीं जुड़ेंगे, तब तक हालात ऐसे ही रहेंगे। वे मानते हैं कि अब अफसर पैसे कमाने को लेकर इतने व्याकुल रहते हैं कि अपने मूल काम की अनदेखी करते हुए किसी की भी सेवा करने को तैयार हो जाते हैं। आगे बढ़ने से पहले यशवंत सिन्हा और अजीत जोगी जैसे सरकारी सेवा से सियासत में आए लोगों की बात करना जरूरी है। इन और इन जैसे अफसरों ने उस वक्त अपनी सेवा से रिटायर होने का फैसला लिया, जब इनकी नौकरी 10-15 साल बची हुई थी। देश के किसी भी अन्य नागरिक की तरह इन्हें भी अपना पेशा चुनने या बदलने का अधिकार है। इन्होंने रिटायर होने से कुछ साल या महीने पहले नौकरी नहीं छोड़ी, लिहाजा इनका किसी पार्टी में शामिल होना गलत नहीं माना जा सकता। इनकी तुलना भारत की सबसे बड़ी बिजली उत्पादन कंपनी एनटीपीसी के सीएमडी रहे आरएस शर्मा से नहीं की जा सकती जो रिटायर होने के कुछ ही समय बाद निजी क्षेत्र की एक बिजली कंपनी में शीर्ष पद पर चले गए।
कूलिंग पीरियड जरूरी
अपने फायदे के लिए सियासत का रुख करने वाले अफसरों पर लगाम लगाने के लिहाज से एक सुझाव यह भी आ रहा है कि रिटायर होने के बाद इन्हें खुद ही तीन साल तक किसी पार्टी या कॉरपोरेट घराने से नहीं जुड़ना चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि इस सुझाव को मानेगा कौन/ जाहिर है, स्वेच्छा पर छोड़ने से बात नहीं बनने वाली। उम्मीद की जानी चाहिए कि प्रशासनिक सेवाओं की गरिमा और विश्वसनीयता बचाए रखने के लिए कोई सरकार इस सवाल पर दलीय भावना से ऊपर उठकर विचार करेगी और इस दिशा में ठोस कानूनी उपाय करेगी। अफसरी छोड़ नेतागीरी के लिए निकल पड़ने की प्रवृत्ति लोकतंत्र की जड़ें हिला सकती है

छत्तीसगढ़ को मिले आधा दर्जन नए आईएएस

रायपुर। भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसरों की कमी से जूझ रहे छत्तीसगढ़ को शुक्रवार को आधा दर्जन नए आईएएस अफसर मिले हैं। इनमें डॉ. राजेन्द्र कुमार कटारा (राजस्थान), इंद्रजीत सिंह चंद्रावल व जगदीश सोनकर (उत्तरप्रदेश), गौरवकुमार सिंह व नम्रता गांधी (महाराष्ट्र) और विनीत नंदनवार (छत्तीसगढ़) शामिल हैं। 2012 बैच के इन अधिकारियों को हाल ही में काडर आवंटित हुआ है। ट्रेनिंग के बाद ये अफसर छत्तीसगढ़ आकर जॉइनिंग देंगे। छत्तीसगढ़ के लिए भारतीय प्रशासनिक सेवा के 178 पद स्वीकृत हैं। वर्तमान में यहां 129 आईएएस अफसर कार्यरत हैं। दो अफसर दूसरे काडर के हैं, जो अंतरराज्यीय प्रतिनियुक्ति पर छत्तीसगढ़ में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। वहीं छत्तीसगढ़ कॉडर के आधा दर्जन से अधिक अफसर प्रतिनियुक्ति पर छत्तीसगढ़ से बाहर पदस्थ हैं। बताया जाता है कि छत्तीसगढ़ के राज्य प्रशासनिक सेवा के आधा दर्जन अधिकारियों को भारतीय प्रशासनिक सेवा में पदोन्नति दी जानी है। इसकी प्रक्रिया लगभग पूरी हो चुकी है। केंद्र सरकार द्वारा जल्द ही पदोन्नति का आदेश जारी होने की संभावना है। इसी तरह आईएएस एसोसिएशन ने छत्तीसगढ़ काडर रिव्यू किए जाने की मांग की है। राज्य सरकार की ओर से आईएएस काडर रिव्यू का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भी भेजा जा चुका है। इस पर अभी कोई फैसला नहीं हुआ है।

छत्तीसगढ़ में जाति लोकप्रियता पर दांव

रायपुर। छत्तीसगढ़ की ग्यारह लोकसभा सीटों के लिए कांग्रेस और भाजपा के प्रत्याशी तय होने के बाद अब यह तस्वीर लगभग साफ हो गई है कि दोनों दलों ने किन समीकरणों के आधार पर टिकट का बंटवारा किया है। प्रदेश की छह अनारक्षित सीटों पर दोनों दलों ने जातिगत समीकरणों का ध्यान रखने की कोशिश तो की ही है, लेकिन प्रत्याशी की लोकप्रियता के आधार पर जातिगत समीकरणों से परे भी टिकट बांटे गए हैं। राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि यदि जाति के आधार पर वोट पड़े तो कुछ सीटों पर उलटफेर हो सकता है।
रायपुर सीट पर पिछले छह चुनाव से भाजपा के रमेश बैस का कब्जा है। श्री बैस कुर्मी समुदाय से संबंध रखते हैं। उनके खिलाफ कांग्रेस ने पिछले चुनावों में उच्च सवर्ण से लेकर पिछड़े वर्ग तक के कई प्रत्याशियों को आजमाया, लेकिन श्री बैस की किलेबंदी को तोड़ने में कांग्रेस का कोई भी गणित कारगर नहीं हो सका। 2009 के चुनाव में कांग्रेस ने कुर्मी समाज के भूपेश बघेल को मैदान में उतारा था, लेकिन उन्हें भी करारी हार का सामना करना पड़ा।
इस बार के चुनाव में भी कांग्रेस के पास जातीय समीकरण के अलावा कोई और अस्त्र नहीं था। लिहाजा, पार्टी ने एक और कुर्मी प्रत्याशी छाया वर्मा को उतारा है। पार्टी के जानकारों का कहना है कि छाया वर्मा के कुर्मी होने के साथ-साथ महिला होने का कांग्रेस को लाभ मिल सकता है। रायपुर संसदीय क्षेत्र में कुर्मी वोटर करीब 12 प्रतिशत, साहू वोटर करीब दस प्रतिशत व सतनामी वोटर सात से आठ प्रतिशत है।
दुर्ग सीट पर भाजपा से सरोज पांडेय इस बार भी मैदान में हैं। पिछले चुनाव में उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार प्रदीप चौबे को हराया था। खास बात यह है कि दुर्ग लोकसभा क्षेत्र पिछड़ा बाहुल है। यहां सबसे अधिक संख्या कुर्मी, साहू और लोधी मतदाताओं की है। साहू वोटर लगभग 30 प्रतिशत, सतनामी वोटर लगभग 14 प्रतिशत, कुर्मी 20 प्रतिशत व लोधी वोटर तीन से चार प्रतिशत है।
भाजपा ने यहां से सरोज पांडेय को उनकी लोकप्रियता के आधार प्रत्याशी बनाया है। वे दुर्ग शहर की महापौर और वैशालीनगर से विधायक रह चुकी हैं। इस सीट से सरोज पांडेय से पहले भाजपा के टिकट पर ताराचंद साहू चार बार लोकसभा का चुनाव जीते थे। कांग्रेस ने इस बार के चुनाव में दुर्ग के किले को भेदने के लिए जातीय गणित का सहारा लिया है। कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव 2013 में हारे ताम्रध्वज साहू को प्रत्याशी बनाया है। पार्टी के भीतर इस बात की संभावना देखी जा रही है कि यदि साहू मतदाता ताम्रध्वज के पक्ष में लामबंद हो गए तो नतीजा अनुकूल हो सकता है।
राजनांदगांव में टूटा ओबीसी गणित
राजनांदगांव में भाजपा ने मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के पुत्र अभिषेक सिंह को प्रत्याशी बनाया है। इस सीट से 2009 के चुनाव में भाजपा के मधुसूदन यादव ने करीब सवा लाख वोटों से जीत दर्ज की थी। श्री यादव ने कांग्रेस उम्मीदवार राजपरिवार से जुड़े और सामान्य वर्ग के देवव्रत सिंह को हराया था। बल्कि तब भाजपा ने नारा उछाला था कि यह हल और महल के बीच की लड़ाई है।
माना जाता है कि पिछड़ा वर्ग की लामबंदी की वजह से मधुसूदन यादव को यह बड़ी जीत मिली थी। लेकिन 2014 के चुनाव में गणित बदल गया है। भाजपा ने मुख्यमंत्री के पुत्र और सामान्य वर्ग के अभिषेक सिंह को उतारकर उन्हें लोकप्रिय प्रत्याशी के रूप में पेश किया है। दूसरी ओर कांग्रेस ने पिछड़ा वर्ग के लोधी समाज से आने वाले कमलेश्वर वर्मा को मैदान में उतारा है। भाजपा को अपने युवा प्रत्याशी की लोकप्रियता पर और कांग्रेस को ओबीसी कार्ड पर भरोसा है। राजनांदगांव में साहू के अलावा यादव, सतनामी वोटर आठ प्रतिशत व लोधी छह प्रतिशत है।
महासमुंद में जोगी की जीत दोहराने का दांव
महासमुंद लोकसभा प्रदेश के उन संसदीय क्षेत्रों में शामिल है, जो हमेशा चर्चा में रही है। कांग्रेस ने इस सीट पर पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी को उतारा है। अजीत जोगी 2004 के चुनाव में इस सीट से भारी बहुमत से जीते थे। उन्होंने इस चुनाव में भाजपा प्रत्याशी विद्याचरण शुक्ल को महासमुंद संसदीय क्षेत्र की हर विधानसभा सीट में मात दी थी। पिछड़ा वर्ग में साहू, कुर्मी, यादव व आदिवासी मतदाताओं की संख्या सबसे अधिक है। यहां साहू 22 प्रतिशत व कुर्मी वोटर लगभग 20 प्रतिशत है।
कांग्रेस ने पिछले चुनाव में पिछड़ा वर्ग का दांव खेलते हुए मोतीलाल साहू को प्रत्याशी बनाया था, लेकिन वे भाजपा के चंदूलाल साहू के हाथों मात खा गए। इस बार कांग्रेस ने इस सीट पर अपने पूर्व मुख्यमंत्री की लोकप्रियता को भुनाने का दांव खेलते हुए जीत की संभावनाओं के आधार पर अजीत जोगी को प्रत्याशी बनाया है। जबकि भाजपा ने एक बार फिर पिछड़ा कार्ड पर भरोसा जताते हुए चंदूलाल साहू को ही प्रत्याशी बनाया है। बिलासपुर लोकसभा सीट से कांग्रेस ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की भतीजी करुणा शुक्ला को प्रत्याशी बनाया है।
भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रह चुकीं करुणा शुक्ला की उम्मीदवारी के पीछे उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि की भूमिका अहम मानी जा रही है। हालांकि बिलासपुर संसदीय क्षेत्र में सतनामी, साहू, कुर्मी, यादवों की संख्या सबसे अधिक है। यहां सतनामी वोटर 15 प्रतिशत व साहू वोटर लगभग 12 प्रतिशत है। भाजपा ने इस सीट से एक नए नवेले नेता को दांव पर लगाया है। पिछड़ा वर्ग के साहू समाज से आने वाले लखनलाल साहू पार्टी के प्रत्याशी हैं। राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि भाजपा ने करुणा का मुकाबला करने के लिए ओबीसी कार्ड खेला है। कोरबा सीट से कांग्रेस के प्रत्याशी केंद्रीय राज्यमंत्री डॉ. चरणदास महंत हैं। 2009 के चुनाव में उन्होंने यह सीट जीती थी। पिछड़ा वर्ग के पनिका समाज से आने वाले डॉ. महंत कबीरपंथी भी हैं। कबीरपंथ के ज्यादातर अनुयायी पिछड़े वर्ग के हैं। भाजपा ने उनके खिलाफ पिछड़ा वर्ग से आने वाले बंशीलाल महतो को प्रत्याशी बनाया है। माना जा रहा है कि कांग्रेस के पिछड़ा वर्ग कार्ड के खिलाफ भाजपा ने वही दांव दोहराया है। बंशीलाल महतो को भाजपा की राजनीति से पहले छात्र राजनीति और जनसंघ के जमाने में सक्रिय और आक्रामक नेता माना जाता था। उन्होंने 1999 में जांजगीर लोकसभा से डॉ. महंत के खिलाफ चुनाव लड़ा था, इस चुनाव में श्री महतो की महज डेढ़ हजार मतों से हार हुई थी। कोरबा संसदीय क्षेत्र में सतनामी वोटर लगभग 12 प्रतिशत व साहू वोटर 16 प्रतिशत के अलावा आदिवासी वोटर भी बड़ी संख्या में हैं।

रंगपंचमी जुलूस में नेता गले मिले, उड़ाया गुलाल

भोपाल। भोपाल शहर में रंगपंचमी की धूमधाम रही। नए और पुराने शहर दोनों स्थानों पर जुलूस निकाले गए। पुराने शहर में नेताओं ने दलगत राजनीति से ऊपर उठकर गले मिलकर एक-दूसरे को रंग-गुलाल लगाया। सेंट्रल स्कूल में त्योहार के बाद भी परीक्षा रखी गई जिससे बच्चे परेशान हुए। राजधानी में रंगों का विशेष पर्व रंगपंचमी शुक्रवार को हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। इस दौरान शहरभर में करीब 6 बड़े जुलूस निकाले गए। श्री हिंदू उत्सव समिति के बैनर तले सुभाष चौक से चल समारोह निकाला गया। इसकी अगुवाई समिति के संरक्षक पंडित ओम मेहता ने की। नया भोपाल त्योहार उत्सव समिति के बैनर तले दुर्गा मार्केट शाहपुरा से जुलूस निकाला गया। अन्ना नगर, कोलार और भेल में भी टोलियां निकलीं। पुलिस रही मुस्तैद रंगपंचमी पर सुरक्षा व्यवस्था के मद्देनजर शहरभर में करीब 3000 पुलिसकर्मी तैनात किए गए थे। एसपी नॉर्थ अरविंद सक्सेना के मुताबिक, पुलिस ने लगातार ऐसे स्थलों पर गश्त की, जहां गडबड़ी की आशंका बनी रहती है। नए शहर में नेहरू नगर से युवकों ने जुलूस निकाला जो विभिन्न मार्गों से होता हुआ न्यू मार्केट पहुंचा। इसी तरह पुराने शहर में हिंदू उत्सव समिति ने रंगपंचमी का जुलूस निकाला जिसके सोमवारा पहुंचने पर टैंकर से पानी की बौछार की गई। पुराने शहर के जुलूस में ऊंट औऱ बैंडबाजे भी चल रहे थे। रंगपंचमी जुलूस में हिंदू उत्सव समिति के अध्यक्ष नारायण सिंह कुशवाहा, पूर्व विधायक रमेश शर्मा गुट्टू, बीजेपी की जिला अध्यक्ष आलोक शर्मा, भगवानदास सबनानी, विष्णु राठौर, कांग्रेस नेता गोविंद गोयल, ईश्वर सिंह चौहान आदि शामिल हुए। रंगपंचमी पर भी परीक्षाएं हुईं रंगपंचमी पर सरकारी छुट्टी के चलते शासकीय दफ्तर बंद थे लेकिन सेंट्रल स्कूल में घोषित परीक्षा कार्यक्रम के तहत स्कूल लगे। इससे सुबह बच्चों को स्कूल पहुंचने में परेशानी हुई। 80 पार गौर ने मारे ठुमके 80 के पार गौर साब ने रंगपंचमी पर खूब ठुमके मारे। उसके बाद रथ पर सवार होकर मुस्कराते, रंग उड़ाते अपने क्षेत्र में निकले। मध्यप्रदेश के गृहमंत्री मौके की नजाकत को देखते हुए हर रंग में ढलने का हुनर जानते हैं। उम्र 80 के पार हो चुकी है, लेकिन जिंदगी को अपने अंदाज में जीते हैं। रंगपंचमी के मौके पर जब उनके विधानसभा क्षेत्र यानी भेल की जनता 74 बंगला स्थित उनके बंगले पर पहुंची, तब उन्होंने बगैर कोई ना-नुकुर के रंग खेला। उन्होंने फिल्मी गीतों और फागों पर ठुमके भी लगाए। इसके बाद गौर साब भानपुर पहुंचे। यहां पूर्व पार्षद तुलसा वर्मा ने रंगपंचमी का आयोजन किया था। यहां से एक भव्य जुलूस निकाला गया। इसमें गृहमंत्री जी को रथ पर बैठाया गया। जुलूस भानपुर ब्रिज से शुरू होकर दशहरा मैदान तक आया। यहां भी गौर साब अपने कार्यकर्ताओं के संग खूब मस्ती की।

Wednesday, January 15, 2014

अपने और आप की फांस में अरूण यादव

क्षत्रपों के चक्रव्यूह को तोडऩा अरुण के लिए चुनौती
भोपाल। मध्य प्रदेश में राजनीति के वेंटिलेटर पर पड़ी कांग्रेस को उबारने की जिम्मेदारी आलाकामन ने अरूण यादव को सौंप तो दी है लेकिन Óसिर मुढ़ाते ही ओले पड़ेÓ की तर्ज पर वे अपने(कांग्रेसियों) और आप (आम आदमी की पार्टी)की फांस में फंस गए है।
उल्लेखनीय है कि यादव को प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाकर कांग्रेस नेतृत्व ने अपने कार्यकर्ताओं को यह संदेश देने की कोशिश की है कि प्रदेश के क्षत्रपों की अब ज्यादा नहीं चलेगी। लेकिन इसी तरह के संकेत पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने विधानसभा चुनाव के पूर्व भी दिए थे,लेकिन हुआ वही जो क्षत्रपों ने चाहा। इस लिए यादव को को उनके पिता सुभाष यादव के साथियों से पार पाना सबसे बड़ी चुनौती होगी। प्रदेश में सहकारिता के सबसे बड़े नेता माने जाने वाले सुषाभ यादव के साथ दिग्विजय, कमलनाथ और सुरेश पचौरी ने भी राजनीति शुरू की थी। अरुण की राह में ये तीनों क्षत्रप सबसे ज्यादा मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं। इनको साथ लेकर चलना भी नए पीसीसी चीफ के लिए किसी चुनौती से कम नहीं होगा। प्रदेश कांग्रेस की राजनीति से अब तक अपने को दूर रखने वाले सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण यादव को वैसे तो पिता की विरासत में हर ब्लाक और जिले में समर्थक मिले हैं, लेकिन उनके पिता के गुट की उपेक्षा के कारण अब ये सब लोग हाशिए पर हैं। ऐसे में अरुण यादव को संगठन के अलावा अपनी अलग से नई टीम बनाना होगी। जिसमें पिता से जुड़े लोगों को एक साथ लाना होगा। प्रदेश कांग्रेस की राजनीति में बरसों से छाए क्षत्रपों को भी साधना चुनौती है। हालांकि ऐसा माना जा रहा है कि अरुण यादव को अध्यक्ष बनाने के पीछे केंद्रीय नेतृत्व अगले पांच सालों में प्रदेश कांग्रेस संगठन को फिर से मजबूत करना चाहता है। ऐसे में अरुण प्रदेश अध्यक्ष की लंबी पारी खेल सकते हैं। इसलिए ही हाईकमान ने युवा नेतृत्व को प्रदेश कांग्रेस की कमान सौंपी है।
क्या अरूण को पचा पाएंगे दिग्गज
आलाकमान ने अरूण यादव को प्रदेश की कमान तो सौंप दी है,लेकिन सवाल उठता है कि अपने से बहुत जूनियर को कांग्रेस के क्षत्रप अपना नेता मान सकेंगे। इस मामले में पूर्व केंद्रीय मंत्री असलम शेर खान कहते हैं कि कमलनाथ,दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया के रहते मप्र मे कांग्रेस कभी खड़ी नहीं हो सकती। वे कहते हैं कि अरुण यादव को इन तीनों से दूर रहना चाहिए। इससे पहले कांग्रेस की तेजतर्रार नेत्री कल्पना परुलेकर ने बगावती तेवर दिखाते हुए यह तक कह दिया कि, 'मप्र कांग्रेस का अध्यक्ष अरुण यादव क्या कोई भी बन जाए, जब तक गद्दारों को सजा नहीं मिलती, पार्टी का भला होने से रहा।Ó यह मामला अभी राजनीतिक गलियारों में चर्चा से बाहर आ भी नहीं पाया था कि अब नर्मदा बचाओ आंदोलन के नेता आलोक अग्रवाल ने घाटी प्रभावित हजारों लोगों के संग आप की सदस्यता लेने का ऐलान किया है। उन्होंने खंडवा से अरुण यादव के खिलाफ लोकसभा चुनाव लडऩे की घोषणा कर दी है।
एक साथ कई चुनौतियां
यादव के सामने एक संग कई चुनौतियां आकर खड़ी हो गई हैं। पहली चुनौती दिग्गज नेताओं से समन्वय बिठाकर अपनी टीम का गठन करना। यादव की ताजपोशी से पीसीसी के कई पदाधिकारियों की छुट्टी होना तय माना जा रहा है जिनमें प्रदेश उपाध्यक्ष बिसाहू लाल सिंह, अरुणोदय चौबे, हुकुम सिंह कराड़ा, विजय दुबे, मोहम्मद अबरार के साथ महासचिव सुनील सूद, गोविंद गोयल, शशि कथूरिया, संजय ठाकुर, बटनलाल साहू, रवि जोशी, रघुवीर सिंह सूर्यवंशी और शांतिलाल पडियार शामिल हैं। ऐसे में इन नेताओं के आका दिग्गज नेताओं को साधना अरूण के लिए बड़ी चुनौती होगी। वहीं इंदौर एक से विधायक रह चुके रामलाल यादव बल्लू भैया, केके मिश्रा को महत्व मिल सकता है। इसी तरह रीवा के विमलेंद्र तिवारी, भोपाल के पूर्व महापौर दीपचंद यादव को भी संगठन में महत्व मिल सकता है। विधायक मुकेश नायक और प्रवक्ता रवि सक्सेना का संगठन में कद बढ़ेगा।
अरूण के सामने दूसरी चुनौती है लोकसभा चुनाव में पूरी तैयारी के साथ उतरना। चुनाव निकट हैं विधानसभा चुनाव में बुरी पराजय के बाद कांग्रेस क मनोबल टूटा हुआ है। ऐसे में कांग्रेस की लोकसभा की 12 सीटें बचाना अरुण यादव के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।
तीसरी चुनौती अंदरुनी कलह है। कांग्रेस में कलह इस कदर है कि असलम शेर खान और कल्पना परूलेकर खुलेआम पार्टी गाइड लाइन की धज्जियां उड़ा रहे हैं। कांग्रेस की तेजतर्रार नेत्री में शुमार कल्पना परुलेकर लंबे समय से अपनी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से नाराज चल रही हैं। उन्होंने आप में जाने का ऐलान कर दिया है। इस लिए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद अरुण यादव के सामने पार्टी की अंदरुनी कलह दूर करने के अलावा अब पार्टी में आप की सेंधमारी रोकना भी एक बड़ी चुनौती होगी। दअरसल, नर्मदा बचाओ आंदोलन से हजारों गांववाले जुड़े हुए हैं। ये वो डूब प्रभावित हैं, जो उचित मुआवजा नहीं मिलने के कारण वर्षों से लगातार संघर्ष करते आ रहे हैं। हालांकि ये भाजपा के लिए भी चुनौती हैं, लेकिन वे इस बात से भी नाराज हैं कि सांसद रहते हुए अरुण यादव ने उनकी आवाज को ताकत नहीं दी।
खंडवा की सीट बचाना टेड़ी खीर
अब नर्मदा बचाओ आंदोलन के नेता आलोक अग्रवाल ने अरुण यादव के खिलाफ खंडवा से लोकसभा चुनाव लडऩे की घोषणा कर दी है। हालांकि सूत्रों के मुताबिक, अरुण यादव संभवत: इस बार लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे। यदि वे चुनाव लड़ते हैं, तो इस बार उन्हें नर्मदा बचाओ आंदोलन से जुड़े आलोक अग्रवाल का सामना करना होगा। आलोक अग्रवाल ने आप की सदस्यता लेने का ऐलान करते हुए खंडवा से अरुण यादव के विरुद्ध चुनाव लडऩे की घोषणा की है। नर्मदा बचाओ आंदोलन के नेता आलोक अग्रवाल ने दावा किया कि बहुत जल्द लाखों डूब प्रभावित आप में शामिल होंगे। उन्होंने कहा कि करप्शन सबसे बड़ा मुद्दा है, जो डूब प्रभावितों के अलावा सब पर बुरा असर डालता है।
खत्म हुआ दिग्गी राजा का वक्त!
कांग्रेस आलाकमान ने मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पद के लिए पार्टी सचिव एवं सांसद अरुण यादव पर भरोसा जता कर एक ओर जहां अन्य पिछड़ा वर्ग कार्ड चला है, वहीं पीसीसी में लंबे समय बाद किसी भी महत्वपूर्ण पद पर कांग्रेस महासचिव एवं प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के खेमे को जगह नहीं दी गई है। राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता सत्यदेव कटारे और अब पीसीसी मुखिया अरुण यादव केन्दीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के खेमे से हैं। युवा कांग्रेस और महिला कांग्रेस में भी अब दिग्विजय समर्थक नहीं हैं। इससे पहले राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता अजय सिंह और पीसीसी मुखिया सांसद कांतिलाल भूरिया और युवा कांग्रेस अध्यक्ष प्रियव्रत सिंह को दिग्विजय सिंह का समर्थक माना जाता था। हालांकि अब भी प्रदेश कांग्रेस में सबसे अधिक संख्या दिग्विजय समर्थक नेताओं एवं विधायकों की ही है, लेकिन चूंकि विधानसभा चुनाव में दिग्विजय समर्थकों के नेतृत्व में कांग्रेस को करारी शिकस्त मिली है, इसलिए इस बार होने वाले लोकसभा चुनाव के मद्देनजर दूसरे खेमे को महत्व दिया गया है।
पुराने नेताओं के दिन लदे
प्रदेश कांग्रेस के इतिहास में सबसे कम उम्र के अध्यक्ष बने अरुण यादव प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद पर खंडवा के सांसद अरुण यादव की ताजपोशी के साथ ही प्रदेश में अब कांग्रेस के पुराने नेताओं के दिन लदते नजर आ रहे हैं। वे प्रदेश कांग्रेस की कमान संभालने वाले अब तक के सबसे कम उम्र के नेता होंगे। यादव केंद्र में मंत्री भी रह चुके हैं और अभी अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सचिव हैं। प्रदेश में कांग्रेस नेताओं के अंतरकलह से त्रस्त केंद्रीय नेतृत्व के इस फैसले को लोकसभा चुनाव की दृष्टि से अहम व नए नेतृत्व को आगे लाने की शुरुआत कहा जा रहा है। अजयसिंह व महेंद्रसिंह कालूखेड़ा जैसे दिग्गजों को नेता प्रतिपक्ष पद पर दरकिनार कर कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने विवादों से परे रहने वाले सत्यदेव कटारे को कुछ दिन पहले ही यह दायित्व सौंपा था। विधानसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद कांतिलाल भूरिया द्वारा इस्तीफा देने, सिंधिया के प्रदेश कांग्रेस का दायित्व संभालने से मना करने के बाद से ही अरुण यादव का नाम भी इस पद के लिए चर्चा में था।
जातिगत समीकरण की अहम भूमिका
जातिगत समीकरण के आधार पर पदों का बंटवारा करने वाली कांग्रेस में यादव को यह पद मिलने में भी यही समीकरण काम आए। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष पद पर ब्राम्हण, उपनेता आदिवासी व उपाध्यक्ष के रूप में क्षत्रिय को मौका देने के बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का पद पिछड़ा वर्ग के नेता को जाना तय था।

सर्वे कराकर लोकसभा टिकट बांटेगी भाजपा

शिवराज का टारगेट-29 .........
23 से मोदी फॉर पीएम अभियान शुरू करेगी भाजपा
22 से शिवराज जिलों में करेंगे सभाएं
भोपाल। नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनवाने के लिए भाजपा ने लोकसभा की 545 में से 272 सीटों को जीतने का लक्ष्य रखा है,वहीं मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान मिशन टारगेट-29 शुरू करने जा रहे हैं। यानी भाजपा इस बार प्रदेश की सभी 29 लोकसभा सीटों का जितना चाहती है और इसके लिए विधानसभा की तर्ज पर सर्वे कराकर टिकटों का वितरण किया जाएगा।
विधानसभा की तर्ज पर टिकटों का वितरण
भाजपा ने अब अपना ध्यान आगामी लोकसभा चुनावों पर लगा दिया है। इसके तहत लोकसभा चुनाव के लिए भी विधानसभा चुनाव टिकट वितरण का फार्मूला ही लागू करने जा रही है। इसके तहत तीन स्तरों पर सर्वे करने के साथ ही पर्ची पर क्षेत्र के प्रमुख नेताओं से संभावित उम्मीदवारों के नाम लिखवाए जाएंगे। पार्टी ने फरवरी के अंत तक उम्मीदवार तय करने का लक्ष्य तय किया है। केन्द्रीय से लेकर निचले स्तर त होगी पूछ
पार्टी ने फरवरी के अंत तक टिकटों को अंतिम रूप देने के साथ ही निचले स्तर तक के कार्यकर्ता एवं पदाधिकारियों से संपर्क साधने की रणनीति तैयार की है। पार्टी ने उम्मीदवार तय करने के लिए विभिन्न एजेंसियों के माध्यम से सर्वे कराने की योजना बनाई है। इसके लिए एक-एक मंत्री को दो से तीन लोकसभा क्षेत्रों की जिम्मेदारी सौंपी गई है। केंद्रीय सर्वे सहित प्रदेश स्तर पर भी कार्यकर्ताओं से राय लेने के साथ ही जीतने की संभावना की जांच करने के बाद भी जिताऊ को टिकट दिया जाएगा।
अंकों से तय होगी प्राथमिकता
पार्टी के मुताबिक, लोकसभा क्षेत्र में रहने वाले पार्टी पदाधिकारियों को एक स्थान पर बुलाया जाएगा। जहां पर चुनाव पर चर्चा करने के साथ ही एक पर्ची पर तीन-तीन संभावित उम्मीदवारों के नाम लिखवाए जाएंगे। प्रथम स्थान वाले को 10 अंक और दूसरे, तीसरे नाम को क्रमश: 7 व 5 अंक दिए जाएंगे। इसके बाद सूची तैयार करने के बाद सर्वे होगा। लोकसभा चुनाव में टिकट के लिए क्षेत्र के पदाधिकारियों की राय 19 से 21 फरवरी के बीच ली जाएगी। तीन दिन में आठ-आठ लोकसभा क्षेत्र के पदाधिकारियों को एक स्थान पर बुलाया जाएगा।
तोमर ने भेजे मुखबिर
लोकसभा सीटों पर जीत हासिल करने की योजना बना रही भाजपा ने जिताऊ उम्मीदवार की तलाश के लिए निजी एजेंसी से सर्वे के साथ संगठन स्तर पर फीडबैक का तरीका अख्तियार किया है। प्रदेशाध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने इस काम में कुछ वरिष्ठ नेताओं को लगाया है, जो सौंपे गए क्षेत्र में जाकर अपनी राय से प्रदेश नेतृत्व को अवगत कराएंगे। भाजपा सांसद पद के लिए अपने प्रत्याशियों के चयन की प्रक्रिया फरवरी में शुरू करेगी। इससे पहले प्रदेश नेतृत्व विभिन्न स्त्रोतों से वर्तमान सांसद के साथ ही अन्य दावेदारों के बारे में जानकारी जुटा रहा है। जिलों से आने वाले सुझाव के आधार पर प्रदेश नेतृत्व प्रत्याशियों के नाम के पैनल बनाएगा और केंद्रीय नेतृत्व को सौंपेगा।
उधर,इस मिशन को पूरा करने के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान आओ बनाएं मध्यप्रदेश अभियान के तहत 22 जनवरी से जिलों में सभाएं लेंगे। वहीं संगठन 23 जनवरी को प्रदेशभर में नेताजी सुभाषचंद्र बोस की जयंती से मोदी फॉर पीएम अभियान शुरू होने जा रहा है। 11 फरवरी तक चलने वाले इस अभियान के दौरा एक नोट-एक वोट का कार्यक्रम चलेगा। खेतों की मिट्टी संग्रह होगी। स्टेच्यू ऑफ यूनिटी के लिए लोहा एकत्रीकरण किया जाएगा। इसके अलावा मंडल-मंडल जनसंपर्क अभियान होंगे।
पूर्व मंत्री खटीक और नागेंद्र लड़ सकते हैं चुनाव
भाजपा लोकसभा चुनाव में कुछ वर्तमान सांसदों की सीट बदलने के साथ कुछ के टिकट काटने पर विचार कर रही है। सतना सांसद गणेश सिंह की जगह इस बार विधानसभा चुनाव नहीं लडऩे वाले नागेंद्र सिंह नागौद के नाम पर विचार किया जा रहा है। विंध्य अंचल की चार सीटों में ब्राह्मण, ठाकुर, आदिवासी आदि का संतुलन रखा जाएगा। खजुराहो सीट पर भी जितेंद्र सिंह बुंदेला की जगह पिछड़ा वर्ग से टीकमगढ़ जिलाध्यक्ष अभय प्रताप सिंह यादव के नाम पर विचार हो सकता है। यहां से पूर्व राज्यमंत्री हरिशंकर खटीक का नाम भी विचार में है। हरिशंकर खटीक के बारे में टीकमगढ़ सुरक्षित सीट के लिए भी चर्चा चल रही है। यहां के सांसद वीरेंद्र खटीक को यदि बदला जाता है तो हरिशंकर को प्रत्याशी बनाया जाएगा। सागर से टिकट की रेस में कई दावेदार हैं। इनमें युवा मोर्चा के प्रदेश उपाध्यक्ष रजनीश अग्रवाल, मुकेश जैन ढाना आदि शामिल हैं। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के यहां से चुनाव लडऩे की सुगबुगाहट के चलते इस सीट पर कांग्रेस से आने वाले प्रत्याशी को देख कर भाजपा अपना उम्मीदवार उतारेगी।
दिग्गजों के मुकाबले होंगे मंत्री
भाजपा कांग्रेस के दिग्गज नेताओं के मुकाबले मंत्रियों को चुनाव लड़ाने पर विचार कर रही है। छिंदवाड़ा में केंद्रीय मंत्री कमलनाथ के मुकाबले पंवार वोट वाले कृषि मंत्री गौरीशंकर बिसेन, गुना में केंद्रीय राज्यमंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के सामने पूर्व मंत्री केएल अग्रवाल, खंडवा में प्रदेश कांग्रेसाध्यक्ष अरूण यादव के मुकाबले खाद्य मंत्री विजय शाह अथवा उनकी पत्नी एवं महापौर भावना शाह पर भाजपा दांव खेल सकती है। अलग-अलग राय ली जाएगी।