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भेड़ाघाट

Thursday, July 9, 2015

चिटफंड का चमत्कारी चक्रव्यूह

12वीं पास ने चिटफंड कंपनी बनाकर ठगे 100 करोड़
फैक्ट फाइल
- हिंदुस्तान में 10 लाख कंपनियां और हजारों करोड़ की ठगी
- प्रदेशभर में 250, आरबीआई/सेबी से पंजीबद्ध एक भी नहीं
- 20 लाख से ज्यादा लोगों को बनाया शिकार
- नीति के आड़ में कंपनियों को बचाने की राजनीति
- छोटे शहर-कस्बे-गांव गिरफ्त में
- भोपाल, इंदौर, जबलपुर और ग्वालियर जैसे शहरों में चटकदार ऑफिसों को बनाया लूट का गढ़
vinod upadhyay
भोपाल। पांच साल में पैसा दोगुना करके देने या जमा पैसे की एवज में सोने का सब्जबाग दिखाकर लोगों को टोपी पहनाने वाली चिटफंड कंपनियों ने अकेले मप्र में ही लाखों लोगों को अपना शिकार बनाया है। इसका परिणाम यह हुआ है कि लोग कंपनियों पर विश्वास कर अपनी कमाई उन्हें सौंपते रहे जिससे कंपनियां आबाद होती रहीं और लोग बर्बाद। देश में लोगों को बड़े-बड़े सपने दिखाकर ठगने का गोरखधंधा इस कदर फलफूल रहा है कि एक 12वीं पास रातों-रात अरबपति बन गया। लोगों को ठगने के इस गोरखधंधे का खुलासा होने के बाद भोपाल की एमपी नगर पुलिस ने इंदौर से साईं प्रकाश ऑर्गेनिक फूड्स लिमिटेड और साईं प्रकाश प्रॉपर्टी डेवलपमेंट लिमिटेड कंपनी के संचालक को गिरफ्तार किया है। इन दोनों कंपनियों का नेटवर्क पांच राज्यों में है। पुलिस का दावा है कि केवल मध्यप्रदेश में ही 3000 से ज्यादा लोगों से डिपॉजिट के जरिए करीब 100 करोड़ रु. की ठगी की गई। ये वही कंपनी हैं, जिनके खिलाफ सिक्युरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (सेबी) की जांच में करीब 800 करोड़ का घपला सामने आया था। कंपनी संचालक मूलत: शहडोल निवासी पुष्पेंद्र प्रताप सिंह बघेल है। 12वीं पास पुष्पेंद्र ने आईटीआई के बाद एक कंपनी में नौकरी से शुरुआत की। लेकिन पिछले 10 सालों में अपनी कंपनियों का नेटवर्क खड़ा कर लिया। सीहोर के 30 वर्षीय रमेश वर्मा समेत 37 अन्य लोगों ने पुष्पेंद्र के खिलाफ धोखाधड़ी की शिकायत की थी। एएसपी रियाज इकबाल के मुताबिक इसे आधार बनाकर एमपी नगर पुलिस ने 18 अप्रैल को मामला दर्ज किया। पुलिस ने कंपनी के रणविजय सिंह, मृगेंद्र सिंह बघेल, धीरेंद्र सिंह, पुष्पांजलि और शैलेंद्र सिंह को भी आरोपी बनाया।
ग्वालियर में कारिंदे चला रहे थे कारोबार
साई प्रकाश फूड्स ने ग्वालियर में भी अपनी ब्रांच शुरू की थी। लेकिन यहां पर पुष्पेंद्र सिंह सीधे तौर पर सामने नहीं आया। उसके कारिंदे कंपनी की ब्रांच संचालित करते थे। विश्वविद्यालय थानाक्षेत्र में इसकी कंपनी के खिलाफ धोखाधड़ी का मामला दर्ज किया गया है। टीआई मदन मोहन मालवीय का कहना है कि यहां दर्ज मामले में पुष्पेंद्र सिंह आरोपी नहीं है बल्कि कंपनी के अन्य चार पदाधिकारी आरोपी हैं। फिलहाल इनकी गिरफ्तारी नहीं हो सकी है इसके लिए प्रयास किए जा रहे हैं।
सेबी ने ब्लैकलिस्ट किया तो सोसायटी बनाई
पुष्पेंद्र ने दोनों कंपनियां वर्ष 2009 में ग्वालियर से शुरू की थीं। इनकी शाखाएं मप्र, राजस्थान, छत्तीसगढ़, उप्र और झारखंड तक फैली हैं। अब तक केवल मप्र में तीन हजार से ज्यादा लोगों से करीब सौ करोड़ रुपए के डिपॉजिट का खुलासा हुआ है। अन्य राज्यों में निवेशकों की संख्या इससे कहीं ज्यादा है। वर्ष 2013 में दोनों कंपनियों की जांच सेबी ने भी की थी। अप्रैल 2014 में सेबी ने दोनों कंपनियों को ब्लैकलिस्ट कर दिया। साथ ही निर्देश दिए कि इस कंपनी के संचालक अब न तो किसी से रकम जमा करा सकते और न ही कोई दूसरी कंपनी खोल सकते हैं। सेबी ने आठ सौ करोड़ रुपए का घपला करार दिया था। कंपनियों के ब्लैकलिस्ट होने के बाद वर्ष 2013 में पुष्पेंद्र ने चंबल-मालवा चिटफंड सोसायटी रजिस्टर्ड करा ली। इसमें 21 मेंबर हैं। रजिस्ट्रेशन के लिए आरोपी ने ग्वालियर का पता दिया और इसका हेड ऑफिस नोएडा में बनाया। इस कंपनी की शाखाएं भी मप्र, उप्र और राजस्थान में खोली गईं। पुलिस को अब तक सौ लोगों की जमा रकम का रिकॉर्ड मिल चुका है।
जिस कंपनी में नौकरी शुरू की, वह भी ब्लैकलिस्ट
एएसपी के मुताबिक पुष्पेंद्र ने 12वीं पास करने के बाद आईटीआई किया। वर्ष 2005 में वह पीएसीएल इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी में छोटा मुलाजिम था। सेबी ने इस कंपनी को भी ब्लैकलिस्ट कर दिया। इसके बाद उसने वर्ष 2009 में अपनी कंपनी शुरू कर ली। रीवा, नोएडा और भोपाल में उसके नाम से करोड़ों की प्रॉपर्टी होने का पता पुलिस को चला है। उसके खिलाफ वर्ष 2013 में कानपुर के फैजलगंज थाने में धोखाधड़ी का प्रकरण दर्ज हुआ, लेकिन कुछ दिनों बाद ही जमानत मिल गई थी। इंदौर से गिरफ्तार चिटफंड कंपनी के संचालक पुष्पेंद्र सिंह बघेल ने अरबों की संपत्ति बना ली थी। वह लोगों को मुनाफे का लालच देकर इस मुकाम पर पहुंचा है। पूछताछ में उसने नोएडा, रायपुर, भिलाई, राजस्थान, झारखंड और मप्र में संपत्ति की बात पुलिस के सामने कबूल की है। कंपनी संचालित करने से हुए फायदे से पुष्पेंद्र ने ज्यादातर पैसा जमीन खरीदने में लगाया है, ताकि बाद में उन पर प्लॉटिंग कर सके। साईं प्रकाश ऑर्गेनिक फूड्स लिमिटेड और साईं प्रकाश प्रॉपर्टी डेवलपमेंट लिमिटेड कंपनी के संचालक मंडल में शामिल रणविजय सिंह, मृगेंद्र सिंह बघेल, धीरेंद्र सिंह, पुष्पांजलि और शैलेंद्र सिंह की पुलिस तलाश कर रही है। पुलिस को इन कंपनियों से जुड़े दस्तावेज जब्त करने हैं, साथ ही पुष्पेंद्र की संपत्ति से जुड़े कागजात भी हासिल करने हैं।
इन शहरों में है अरबों की संपत्ति >नोएडा में चार मंजिला मकान। >नोएडा में कमर्शियल भवन। >मारूति शॉप भिलाई रोड में साईं प्रकाश प्रॉपर्टी डेवलपमेंट का ऑफिस। >तामिया (राजस्थान) में भवन। >झारखंड के गुमला में एक एकड़ जमीन। >चौमू (राजस्थान) में जमीन। >झुंझुनूं (राजस्थान) में जमीन। >रीवा एयरपोर्ट के पास 41 एकड़ जमीन।
देश भर में 26 सौ करोड़ का गोरखधंधा
साईं प्रसाद चिटफंड कंपनी ने पूरे भारत में करीब 26 सौ करोड़ का गोरखधंधा फैला रखा था। इसका मास्टरमाइंड पुणे का बाला साहब भापकर है ,जो कंपनी का प्रमुख कर्ताधर्ता है। इस कंपनी के कर्ताधर्ता लोगों को दोगुना रकम का लालच देकर फरार हो जाते थे। देशभर के छह राज्यों में इनका गोरखधंधा फैला था। शहडोल का रहने वाला पुष्पेन्द्र ने चिटफंड कंपनी की शुरुआत शहडोल, रीवा समेत उत्तरप्रदेश के कुछ जिलों से शुरू की थी। उसकी कंपनियों के गोरखधंधे की जांच नहीं हो सके, इसके लिए उसने कुछ साल पहले एक नेशनल न्यूज चैनल शुरू किया था। जो फिलहाल बंद बताया जा रहा है। प्लास किसान एग्रोटेक लिमिटेड, पर्ल एग्रोटेक कॉरपोरेशन लिमिटेड (पीएसीएल, प्लस), सांई प्रकाश ग्रुप ऑफ कंपनी, सांई प्रसाद फूड्स लिमिटेड, सांई दीप, श्रद्धा इंडिया सेल्फ हेल्प ग्रुप सरल, जेकेवी मल्टी स्टेट कंपनी, डॉल्फिन कंपनी, वास्तव एलआर, रेनबो ऑफ ग्रुप कोलकाता वायर इंडस्ट्रीज लिमिटेड आदि चिटफंड कंपनिया करोड़ों रुपए लेकर प्रदेश से भाग चुकी हैं।
बघेल को बचाने हरियाणा से आ रहे फोन कॉल
साईं प्रकाश ऑर्गेनिक फूड्स लिमिटेड और साईं प्रकाश प्रॉपर्टी डेवलपमेंट लिमिटेड कंपनी के संचालक पुष्पेंद्र सिंह बघेल ने एक कंपनी के छोटे मुलाजिम के रूप में जिंदगी की शुरूआत की थी। देखते ही देखते वह करोड़ों रुपए का मालिक बन बैठा। देश के बड़े राजनेताओं से संपर्क की बदौलत वह इस मुकाम पर जा पहुंचा। अब वही राजनेता उसे छुड़ाने के लिए पुलिस पर दबाव बना रहे हैं। पुलिस ने उन लोगों की भी पड़ताल शुरू कर दी है, जिनके जरिए बघेल ने इतनी संपत्ति बना ली है। अफसरों के पास ज्यादातर फोन हरियाणा से जुड़े राजनेताओं के आ रहे हैं। पुलिस मुख्यालय से लेकर जांच से जुड़े अफसरों को भी फोन किए जा चुके हैं, ताकि बघेल पर की जा रही कार्रवाई में नरमी बरती जाए। मल्टी सुपर स्पेशिएलिटी हॉस्पिटल में मुफ्त इलाज देने का दावा कर लोगों को ठगने वाले डॉक्टर हितेश शर्मा को भी पुलिस ने अदालत में पेश कर रिमांड पर ले लिया। पुष्पेंद्र बघेल ने कहा कि कंपनी में उसने केवल 88 करोड़ रुपए का डिपॉजिट करवाया है। उसकी संपत्ति 200 करोड़ की है। करीब आठ महीने पहले उसने अपना न्यूज चैनल भी बंद कर दिया। उसका कहना है चैनल बेचकर सबकी रकम चुका दूंगा। बघेल ने कहा कि कुछ लोग मेरे पीछे पड़े हैं, मुझे उलझाना चाहते हैं।
चिटफंड कंपनी का सोलर पॉवर प्रोजेक्ट रद्द
चिटफंड कंपनी साईंप्रकाश के प्रबंध संचालक की गिरफ्तारी के साथ ही कंपनी पर शिकंजा कसना शुरू हो गया है। रीवा में कंपनी के महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट को रद्द कर दिया गया है। यह सोलर पॉवर प्लांट रीवा-सीधी जिले के सीमाई क्षेत्र बदवार पहाड़ में लगाया जा रहा था। कंपनी द्वारा इस प्रोजेक्ट का प्रचार-प्रसार भी तेजी से किया गया था और बदवार पहाड़ में प्रोजेक्ट की शुरुआत भी हो गईथी। कंपनी ने बदवार पहाड़ में सोलर पॉवर प्लांट लगाने का बोर्ड भी लगा लिया था और सड़कें बनाने का काम भी शुरू कर दिया गया था। इसी बीच शासन ने साईंप्रकाश के पॉवर प्रोजेक्ट को रद्द कर दिया है। ऊर्जा के क्षेत्र में बड़ा निवेश करने के कंपनी के मंसूबों पर पानी फिर गया है। बदवार के साथ ही शहडोल में भी 230 एकड़ में पॉवर प्रोजेक्ट लगाने की तैयारी में कंपनी थी। इसमें करीब दो हजार करोड़ रुपए से अधिक का निवेश कंपनी करने जा रही थी। संचालक की गिरफ्तारी के बाद उसके अन्य कई प्रोजेक्टों में पेच फंसता जा रहा है।
संचालक की गिरफ्तारी के बाद कसा शिकंजा
चिटफंड कंपनी साईंप्रकाश प्रायवेट लिमिटेड के प्रबंध संचालक पुष्पेन्द्र सिंह बघेल की गत दिवस हुईगिरफ्तारी के बाद कंपनी के सभी प्राजेक्टों पर शिकंजा कसने की तैयारी की गईहै। रीवा में रियल स्टेट के नाम पर कारोबार करने वाली इस कंपनी ने बदवार में 100 मेगावाट का सोलर पावर प्राजेक्ट लगाने की तैयारी की थी। कंपनी द्वारा बदवार पहाड़ में लगाए गए बोर्ड को हटा दिया गया है।
नौकरी के नाम पर रुपए भी जमा कराए
बदवार में 100 मेगावाटके सोलर पॉवर प्लांट लगाए जाने के नाम पर साईंप्रकाश कंपनी ने दर्जनों की संख्या में युवाओं से बायोडाटा जमा कराया है। जिसमें रीवा के अलावा सीधी और शहडोल के लोग सबसे अधिक हैं। कंपनी के दफ्तर में कुछ दिन पहले ही ऐसे लोगों ने हंगामा मचाया था और आरोप लगाया था कि कंपनी के कर्मचारियों ने नौकरी देने के नाम पर कुछ रुपए भी जमा करा लिया है। हालांकि यह मामला बाद में शांत हो गया।
प्रोजेक्ट की भूमि का होगा सीमांकन
विश्वबैंक के सहयोग से बदवार में जहां पर 750 मेगावॉट का प्रोजेक्ट प्रस्तावित है। उस पर बीते सप्ताह मुख्य सचिव ने आदेश जारी किया है कि सीमांकन कराया जाए। जिला अक्षय ऊर्जा अधिकारी आरएस गौतम ने बताया कि 1250 हेक्टेयर में यह प्रोजेक्ट लगना है इस कारण उसका नक्शा तैयार करने के साथ ही सीमांकन कराया जाएगा। उन्होंने बताया कि साईंप्रकाश कंपनी ने जहां पर अपना बोर्डलगाया गया था और कुछ काम भी कराया है उस जगह की भी रिपोर्ट भेजी जाएगी। उपसचिव नवीन एवं नवकरणीय ऊर्जा मृदुल खरे कहते हैं कि साईंप्रकाश कंपनी ने 100 मेगावॉट का सोलर पॉवर प्लांट रीवा के बदवार में लगाने की अनुमति चाही थी। उसके आवेदन को रद्द कर दिया गया है।
चिटफंड कंपनियों का महफूज गढ़ बना मप्र
चिटफंड कंपनियों के खिलाफ आरबीआई से लेकर सेबी तक शिकंजा कस चुकी है। छत्तीसगढ़, बंगाल से लेकर झारखंड, उत्तराखंड तक कानून और नीतियां बनाई जा रही है। वहीं मप्र चिटफंड कंपनियों का महफूज गढ़ बन चुका है। यहां दो-पांच-दस नहीं बल्कि सैकड़ों की तादाद में कंपनियां नितनए कारनामे दिखा रही है। जबकि मप्र में एक भी चिटफंड कंपनी रजिस्टर्ड नहीं है। चटकदार ऑफिस और कैबिन दिखाकर जमा रकम दो से तीन गुना करके देने के दावे के साथ छोटे शहरों-कस्बों के लोगों का अपना शिकार बनाने वाली इन तमाम कंपनियों का कोई वैधानिक वजूद है ही नहीं। उनके रंग-बिरंगे ब्रोशर, पेम्पलेट और वैधानिकता के नाम पर दिखाए जाने वाले तमाम दस्तावेज सिर्फ और सिर्फ छलावा है और कुछ नहीं। यह बात अलग है कि इन चिटफंड कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई को प्रशासन और पुलिस के अधिकारियों ने अपनी कमाई का जरिया बना रखा है। इसीलिए सैकड़ों शिकायतों से पहले इन कंपनियों पर कार्रवाई होती नहीं। होती भी है तो इन्हें कुछ ही दिनों में नए रंग-रूप में फिर आगे कर दिया जाता है लूट खसौट के लिए।
सेबी और आरबीआई के अनुसार मप्र में एक भी चिटफंड कंपनी पंजीबद्ध नहीं है। बावजूद इसके सैकड़ों कंपनियां बेधड़क-बेखौफ लोगों को सब्जबाग दिखकार चांदी काट रही है। वह भी उस स्थिति में जब हाईकोर्ट मप्र में चिटफंड प्रतिबंधित कर चुकी है और मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान स्वयं चिटफंड की मुखालफत करते नजर आते हैं। सूत्रों की मानें तो भोपाल, इंदौर, ग्वालियर में दफ्तर खोलकर कंपनियां देवास, शाजापुर, सिहोर, धार, राजगढ़, गुना, बड़वानी, खरगोन, रायसेन, बैतूल जैसे छोटे शहरों और उनके कस्बों को निशाना बना रही है। कम वक्त में ज्यादा कमाई के लालच ने सैकड़ों को दो जून की रोटी तक का मोहताज कर दिया है। चिटफंड कंपनियों का आर्थिक-राजनीतिक नेटवर्क इतना तगड़ा है कि उनके खिलाफ ठोस कार्रवाई नहीं हो पाती। अब जब बड़े-बड़े मामले सामने आने लगे हैं तब जाकर सरकार भी सख्त नजर आती है। वरना इससे पहले तो पुलिस भी एफआईआर नहीं लिखती थी।
ये हैं चिटफंड कंपनियां....
सांई सर्वोत्तम एजुसाफ्ट कापोर्रेट सर्विसेस प्रालि, सांई सर्वोत्तम संपत्ति डेवलपर्स एंड इंफ्रा. प्रालि, एसएसएस कॉपोर्रेट ग्रुप, सनराइज, साईं प्रसाद, साईंराम, आदर्श क्रेडिट को ऑपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड, गरिमा रियल स्टेट, दिव्यानी, एचबीएन, मिलियंस माइंस इंफ्राट्रक्चर, एडीवीडी, जी-लाइफ इंडिया, रोजवेली, बीएनजी ग्लोबल, जीएन गोल्ड, एवएम रियल एस्टेट एंड अलाइड लिमिटेड, सनसाइन इन्फ्राबुल कॉर्प, पीएसीएल लिमिटेड, वी रिलेशन इंडिया लिमिटेड, जेएसवी डेवलपर्स प्रा.लि., केएमजी इंडिया लिमिटेड, जीएनडी इंडिया, जीएन डेयरी लिमिटेड, एचबीएन क्रेडिट। यह कंपनियां कार्रवाई या कुछ दिनों की फरारी के बाद नए नाम से दोबारा अपना काम शुरू कर देती हैं।
देश भर में 10 लाख फर्जी चिटफंड कंपनियां
देश में करीब 10 लाख चिटफंड कंपनियां संचालित हो रही है। इनमें केवल 12 हजार 120 कंपनियां ही रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) द्वारा अधिकृत है। मप्र और छत्तीसगढ़ में तो किसी भी कंपनी को आरबीआई से मान्यता प्राप्त नहीं है। इसमें नॉन बैकिंग को लेकर कई केटेगरी है। इनमें एडवांस व डिपाजिट योजना को लेकर अलग-अलग नियम निर्धारित हैं। यदि किसी संस्था के नाम के साथ डेवलपर जैसा शब्द जुड़ा है और उसके द्वारा उपभोक्ता से किश्त में राशि ली जा रही है तो उसे प्राप्त किए गए रकम के एवज में जमीन दी देना होगा। उपभोक्ता को नगद भुगतान नहीं कर सकेगा। यदि वह ऐसा करता है तो आरबीआई के शर्तों का उल्लंघन माना जाएगा। आरबीआई उसकी मान्यता समाप्त कर सकती है। अवैध तरीके से पैसा जुटाने वाली पोंजी स्कीमों ने 2013 में निवेशकों को खूब रुलाया। कॉरपोरेट गवर्नेस की कमियों और नियामकीय चूकों का फायदा उठाकर कंपनियों ने फजीर्वाड़े के जरिये आम निवेशकों को निशाना बनाया। लोगों को करीब 40 हजार करोड़ रुपये का चूना लगा। जमीनी निवेश, सोना निवेश, आलू बांड, बकरी पालन, घी में निवेश जैसी फर्जी योजनाओं के जरिये घोटालेबाजों ने खूब चांदी काटी।
क्या है चिटफंड कंपनी और कैसे करती है काम
चिटफंड एक्ट 1982 के मुताबिक चिटफंड स्किम का मतलब होता है कि कोई शख्स या लोगों का ग्रुप एक साथ समझौता करे। समझौते में एक निश्चित रकम या कोई चीज एक तय वक्त पर किश्तों में जमा की जाए और तय वक्त पर उसकी नीलामी की जाए। जो फायदा हो बाकी लोगों में बांट दिया जाए। इसमें बोली लगाने वाले शख्स को पैसे लौटाने भी होते हैं। नियम के मुताबिक ये स्कीम किसी संस्था या फिर व्यक्ति के जरिए आपसी संबंधियों या फिर दोस्तों के बीच चलाया जा सकता है।लेकिन आम तौर पर ऐसा होता नहीं है। ये चिटफंड स्कीम कब पॉन्जी स्कीम में बदल जाती है कोई नहीं जानता है। आम तौर पर चिटफंड कंपनियां इस काम को मल्टीलेवल मार्केटिंग में तब्दील कर देती हैं। मल्टीलेवल मार्केटिंग यानि अगर आप अपने पैसे जमा करते हैं साथ ही अपने साथ और लोगों को भी पैसे जमा करने के लिए लाते हैं तो मोटे मुनाफे का लालच। ऐसा ही बाजार से पैसा बटोरकर भागने वाली चिटफंड कंपनियां भी करती हैं। वो लोगों से उनकी जमा पूंजी जमा करवाती हैं। साथ ही और लोगों को भी लाने के लिए कहती हैं। बाजार में फैले उनके एजेंट साल, महीने या फिर दिनों में जमा पैसे पर दोगुने या तिगुने मुनाफे का लालच देते हैं।
मनी सर्कुलेशन कंपनी चलाना ही अपराध
प्राइज चिट्स एंड मनी स्कीम बैनिंग एक्ट 1978 के तहत ऐसी मनी सर्कुलेशन कंपनियां चलाना ही अपराध है, जो निवेशकों को मनी सकुर्लेशन योजना का लालच देती हैं। ऐसे में कंपनी निवेशको को पैसे लौटा भी देती है तो दोषी मानी जाएगी। एक्ट में ऐसे संचालकों के खिलाफ भी कार्रवाई हो सकती है, जिन्होंने नई कंपनी बनाई है। भले उसमें एक भी सदस्य नहीं है, यदि एक्ट के दायरे में आ रही है तो उसकी गिरफ्तारी संभव है। चिटफंड या मनी सर्कुलेशन स्कीम वाली कंपनियों में पैसा जमा कराना भी कानूनन गलत है। प्राइज चिट्स एंड मनी सर्कुलेशन स्कीम बैनिंग एक्ट 1978 के सेक्शन तीन में ये प्रावधान किया गया है। इसके अंतर्गत मनी सर्कुलेशन व चिटफंड कंपनियों का सदस्य बनना भी अपराध है। इसलिए लोगों को चाहिए कि वे ऐसी कंपनियों से दूर रहें। यहां तक कि जिसने कंपनी का फॉर्म भर दिया उसे भी पुलिस मुजरिम मान सकती है। पैसा लगाने वालों के लिए भी उतनी ही सजा का प्रावधान है जितना कंपनी चलाने वालों के लिए।
63 प्रतिशत पुलिसवालों को नहीं मालूम चिटफंड एक्ट
निवेशकों को ठगी का शिकार बना रही चिटफंड और मल्टी लेवल मार्केटिंग कंपनियों के खिलाफ प्राइज चिट्स एंड मनी सकुर्लेशन स्कीम बैनिंग एक्ट 1978 के तहत कार्रवाई की जाए तो ऐसी कंपनियां बच नहीं सकती। दिक्कत यह है कि 63 प्रतिशत पुलिसवालों को इस एक्ट की जनकारी ही नहीं है। इसका खुलासा राजस्थान में हुए एक सर्वे में हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार ज्यादातर कार्रवाई धोखाधड़ी की धाराओं में की जाता है।
चिटफंड का चक्रव्यूह
- इंदौर की आई माता मार्केटिंग प्राइवेट लि. ने आधा दर्जन एजेंटों को साथ लेकर 3500 रुपए जमाकर 45-90 दिन में एक लाख रुपए का लोन दिलाने का वादा करके 100 से ज्यादा लोगों को टोपी पहनाई। - साढ़े तीन हजार रुपये लगाकर लाखों रुपये हर माह कमाई का सपना दिखाने वाली ट्यूलिप चिटफंड कंपनी गायब हो गई। ट्यूलिप कंपनी के देशभर में 30 लाख से ज्यादा ग्राहक हैं। 3200 रुपये लेकर एक लाख रुपये माह कमाने का सपना कंपनी द्वारा अपने निवेशकों को दिखाया गया था। अकेले इंदौर में ही एक लाख से ज्यादा निवेशकों के पैसा लगाए जाने की बात सामने आ रही है। - कोलकाता की रोजवैली कंपनी के साथ जीलाइफ और बीएनजी गोल्र्ड के खिलाफ प्रशासन ने कार्रवाई की। ऐसी कि जीलाइफ का कारोबार बढ़कर दो गुना हो गया। अब निवेशक भटक रहे हैं। - 30 मई 2013 को जीएनटी मार्केट के एक ऑटोमोबाइल व्यापारी कीरकी शिकायत पर चिटफंड कंपनी सारधा ग्रुप का कर्ताधर्ता सुदीप्तो पर इंदौर में भी 58 लाख की ठगी का केस दर्ज हुआ। 30 हजार करोड़ की ठगी की है। मामले में मिथुन चक्रवति तक से पूछताछ हो चुकी है। - सारणी पाथाखेड़ा से मोटी रकम लूटकर फरार हुई चिटफंड कंपनी संचालकों का सुराग नहीं लग पा रहा है। क्षेत्र की जनता ने बंगाली बंधुओं पर भरोसा कर डबल के लालच में करीब 120 करोड रुपए गवा दिए हैं। - सीबीआई का दावा पीएसीएल और पीजीएफ पोंजी स्कीम चलाकर करीब 5 करोड़ निवेशकों को 45,000 करोड़ रुपए का चूना लगाया। - उत्तर बंगाल में 500 करोड़ का चिटफंड घोटाला, 27 कंपनियां हुईं फरार, निवेशकों के आए दिन प्रदर्शन।

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