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भेड़ाघाट

Wednesday, August 25, 2010

करोड़पतियों का भुक्खडऩाच

भारत अनेकता में एकता का देश है। यह तथ्य पूरा विश्व जानता है लेकिन यह बात मुझे और बेहतर ढ़ंग से तब समझ में आई जब हमने संसद में अलग-अलग स्वर में अलाप करने वाले सांसदों को एक स्वर में एक ही मसले पर एक साथ चिल्लाते देखा। वह मसला था स्वयं के वेतन-भत्तों की बढ़ोत्तरी का। हद तो यह कि सांसदों ने अपने वेतन बढ़ोत्तरी का मामला उस समय उठाया जब आधा देश सूखे और आधा बाढ़ से त्राहिमाम कर रहा था। आलम तो यह देखिए कि एक तरफ सूखे की मार झेल रहे झारखंड के एक गांव के करीब 2000 किसान इच्छा मृत्यु की इजाजत मांग रहे थे वहीं 6600 मीट्रिक टन अनाज गोदाम के अभाव में सड़ रहा था। ऐसी विकट स्थिति में देश की करीब सवा करोड़ आबादी की चिन्ता छोड़ सांसद अपने वेतन-भत्तों के लिए कोहराम मचाए हुए थे।
आखिरकार वेतन बढ़ाने को लेकर बच्चों की तरह जिद कर रहे सांसदों का वेतन 16 हजार से बढ़ाकर 50 हजार कर दिया गया। वेतन के अलावा सांसदों को मिलने वाले भत्तों और पेंशन में भी बढोतरी को मंजूरी मिल गई है। सांसदों की पेंशन को भी 8 हजार से बढाकर 20 हजार करने का प्रस्ताव मंजूर हो गया है। यही नहीं जो सांसद पांच साल से ज्यादा का कार्यकाल पूरा कर चुके हैं उन्हें पांच साल के बाद अतिरिक्त कार्यकाल के लिए पेंशन के तौर पर हर साल 1500 रूपए अधिक दिए जाएंगे। सांसदों को मिलने वाले भत्तों मे भी भारी इजाफा होने का प्रस्ताव मंजूर कर लिया गया है। सांसदों का दैनिक भत्ता एक हजार रूपए से बढाकर 2 हजार रूपए कर दिया गया है। सांसदों को प्रतिमाह 20,000 रुपए संसदीय क्षेत्र भत्ता और 20,000 रुपए कार्यालय भत्ता मिलता है। इन भत्तों को दोगुना किया गया था और अब सरकार ने इनमें पांच-पांच हजार रुपए की अतिरिक्त वृद्धि करने का फैसला किया है। सांसदों को आने जाने में मंहगाई का असर महसूस न हो इसके लिए यात्रा भत्ता एक लाख रूपए से बढ़ाकर 4 लाख रूपए सालाना कर दिया गया है। रोड माइलेज अलाउंस भी 13 रूपए प्रति किलोमीटर से बढाकर 16 रूपए प्रति किलोमीटर कर दिया गया है। वहीं, सांसद अब पत्नी सहित रेलवे के फर्स्ट क्लास एसी में असीमित मुफ्त में यात्रा कर सकते हैं। इसके साथ ही पत्नी के साथ बिजनेस क्लास में 34 मुफ्त हवाई यात्रा करने का लाभ सांसदों को दिए जाने पर कैबिनेट ने मुहर लगा दी है। लेकिन इतना मिलने के बाद भी सांसद संतुष्ट नजर नहीं आ रहे हैं और अपनी गरीबी का रोना-रो रहे हैं। घर में अमीर और संसद में गरीब सांसदों की संपति के आंकड़ों पर नजर डाले तो हमें एहसास होता है कि हमारे माननीय कितने गरीब (अमीर) हैं। आंकड़ों के अनुसार सांसदों में 315 करोड़पति हैं और उनमें से सबसे ज्यादा 146 कांग्रेस के हैं। ज्ञान, चरित्र, एकता वाली भाजपा के 59 सांसद करोड़पति हैं। समाजवादी पार्टी के 14 सांसद करोड़ का आंकड़ा पार कर चुके हैं। दलित और गरीबों की पार्टी कहीं जाने वाली बहुजन समाज पार्टी के 13 सांसद करोड़पति हैं। द्रविड़ मुनेत्र कडगम के सभी 13 सांसद करोड़पति हैं। कांग्रेस में प्रति सांसद औसत संपत्ति छह करोड़ हैं जबकि भाजपा में साढ़े तीन करोड़ है। देश के सारे सांसदों को मिला लिया जाए तो कुछ को छोड़ कर सबके पास कम से कम साढ़े चार करोड़ रुपए की नकदी या संपत्तियां तो हैं ही। यह जानकारी किसी जासूस ने नहीं निकाली गई अपितु खुद सांसदों ने चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार इस संपत्ति का खुलासा किया है। यह तो रही हमारे करोड़पति माननीयों के भुक्खडऩाच की कहानी जब की असल भारत की कहानी सरकार द्वारा गठित अर्जुन सेन गुप्ता समिति कहती है।
सांसदों के वेतन भत्तों पर संसद के भीतर और बाहर बहस मची हुई थी तो दूसरी गरीबी और गरीबों का पता लगाने के लिए सरकार द्वारा गठित कोई आधा दर्जन समितियां अपनी रिपोर्ट सरकार को दे चुकी है लेकिन गरीबी और गरीबों की संख्या का सवाल अब भी पहेली बनकर खड़ा हुआ है। अर्जुन सेन गुप्ता समिति के अनुसार देश में 78 प्रतिशत लोग दिन भर में बीस रुपए से भी कम में गुजारा करते हैं। यूएनडीपी की एक रिपोर्ट के अुनसार देश के आठ राज्य ऐसे हैं जहां 42 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं। विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार भारत के कई क्षेत्रों में गरीबी की स्थित सब-सहारा अफ्रीका से भी खराब है। देश को सबसे अधिक प्रधानमंत्री देने वाले उत्तर प्रदेश में 70 प्रतिशत लोग गरीबी की रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे हैं। देश में गरीबों की पहचान और गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों की संख्या और निर्धारण को लेकर सरकार से लेकर संसद तक भारी विरोधाभाष हैं। देश के सांसदों को भी नहीं पता कि देश में कितने गरीब है।
भारत की तुलना किन अर्थो में आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, जापान, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, कनाडा, सिंगापुर और संयुक्त राज्य अमेरीका से की जा सकती है? क्या इन देशों में भारत की तरह गरीबी, अशिक्षा, भुखमरी, बेरोजगारी और कुपोषण है? जिन देशों के सांसदों का वेतन भारत के सांसदों के वेतन से कई गुना अधिक है वे देश पिछड़े और अविकसित नहीं हैं। भारत में राजनीति का पेशा और व्यवसाय बनना नव उदारवादी अर्थव्यवस्था के दौर में अधिक हुआ है।
ऐसे में आज कितने सांसदों को वास्तविक अर्थो में जनप्रतिनिधि कहा जा सकता है? सांसदों के वेतन-भत्ते में वृद्धि का प्रश्न कितना नैतिक और उचित है? अस्सी करोड़ जनता की दैनिक आय मात्र दो दहाई है। क्या सचमुच भारतीय सांसदों को इस सामान्य जनता से कोई सरोकार है? 1984 तक सांसदों का वेतन 500 रुपये प्रतिमाह था और दैनिक भत्ता मात्र 51 रुपये। यह राशि एक उप समाहर्ता के वेतन से कम थी। उस समय तक किसी भी सांसद को आज के सांसदों की तरह चिंता और शिकायत नहीं थी। अब सचिव से एक रुपया अधिक वेतन (80,001) की मांग का क्या औचित्य है? क्या सांसद नौकरी करते हैं? वेतन के अतिरिक्त उन्हें जितनी सुविधाएं प्राप्त हैं, क्या उतनी ही सुविधा सचिवों को प्राप्त है? एक दिन के लिए भी सांसद बन कर, जीवन भर पेंशन प्राप्त करते हैं, ऐसी सुविधा किस नौकरी में है? सभी नौकरियों में एक निश्चित अवधि तक कार्य करने के बाद ही पेंशन दी जाती है। नौकरी करने वालों की जिम्मेदारियां तय है। सांसदों की जिम्मेदारियां क्या हैं? नौकरी करने की एक आयु सीमा तय है जबकि सांसदों के लिए अधिकतम आयु सीमा निर्धारित नहीं है। सांसदों को दिये जाने वाले भत्तों पर कोई आयकर नहीं लगता।
नौकरशाहों से सांसदों की अपनी तुलना करना एक प्रकार का पतन है। भारतीय राजनीति का चरित्र पूर्णत बदल गया। अस्सी के दशक से राजनीति व्यवसाय बन गयी। नब्बे के दशक से राजनीतिज्ञ स्व-चिंता में लीन हुए। सरकारी अफसरों, न्यायाधीशों, संपादकों, डॉक्टरों, इंजीनियरों, प्रोफेसरों आदि के वेतन से सांसदों के वेतन की तुलना नहीं की जा सकती। भारत जैसे देश में, किसी भी क्षेत्र में कार्यरत लोगों का वेतन अधिक नहीं होना चाहिए। सांसदों को उदाहरण पेश करना चाहिए। वे न शारीरिक श्रम करते हैं, न मानसिक। किसानों की आत्महत्या से उन्हें कोई चिंता नहीं है। देश के अनेक जिले सूखाग्रस्त घोषित हो चुके हैं। सदन में तमाम बहसों और हल्ला-हंगामों के बावजूद महंगाई घट नहीं रही है और सांसद अपनी तीन गुना वेतन वृद्धि से संतुष्ट नहीं हैं।
संयुक्त संसदीय समिति ने सांसदों का वेतन कैबिनेट सचिव के वेतन के समतुल्य या उससे कुछ अधिक करने की जो अनुशंसा की थी, उससे पांच गुना वेतन वृद्धि को मंत्रिमंडल ने स्वीकार न कर अच्छा कार्य किया है। सांसदों का वेतन 1985 में 1500, 1998 में 4000, 2001 में 12,000 और 2006 में 16,000 रुपये था। यह वेतन वृद्धि पिछले चार वर्षो में चार गुणा से अधिक है। कैबिनेट द्वारा प्रस्तावित इस वेतन-वृद्धि को वापस लेने की मांग को लेकर लोकसभा में जो दृश्य उपस्थित हुआ, क्या वह गरिमामय था? सांसदों की वेतन वृद्धि को लेकर लालू प्रसाद सदैव मुखर रहे हैं। उनके अनुसार संसदीय समिति की सिफारिश का पालन न होना संसद का अपमान है। लोकसभा में अपनी वेतन-वृद्धि को लेकर सांसदों द्वारा किये गये हंगामे और इसके कारण सदन की कार्रवाई के स्थगन के बाद सांसदों द्वारा नकली और अवास्तविक (मॉक) संसद का गठन एक हास्यास्पद और चिंताजनक है। लोकसभा में इस तरह का नाटक आज की राजनीति का एक चित्र प्रस्तुत करता है। लालू प्रसाद और मुलायम सिंह इसमें अग्रणी रहे हैं। वास्तविक सांसदों द्वारा अवास्तविक संसद के गठन को क्या गंभीरतापूर्वक नहीं लिया जाना चाहिए। इस नकली, फर्जी संसद के प्रधानमंत्री लालू प्रसाद थे, अध्यक्ष गोपीनाथ मुंडे और कीर्ति आजाद विरोधी दल के नेता। लालू प्रसाद ने यूपीए की सरकार को बरखास्त करने का नाटक किया क्योंकि यह अलोकतांत्रिक और जनविरोधी थी। संसदीय लोकतंत्र में क्या इस तरह के नाटक की प्रशंसा की जानी चाहिए? मंत्रिमंडल के निर्णय को अस्वीकृत करते हुए लालू प्रसाद और मुलायम सिंह यादव ने सांसदों का वेतन अस्सी हजार एक रुपये किये जाने की मांग की। यह पूरी घटना हमारे सांसदों के क्रिया व्यापारों का एक चित्र पेश करती है। अपनी वेतन वृद्धि को लेकर सांसदों द्वारा लोकसभा के कार्य में बाधा उत्पन्न करना और उसे ठप करना कितना जायज है? क्या ऐसे सांसदों के वेतन में वृद्धि होनी चाहिए?
पंद्रहवीं लोकसभा के 315 करोड़पति सांसदों के लिए वेतन वृद्धि कितना जरूरी है? चौदहवीं लोकसभा में करोड़पति सांसदों की संख्या 154 थी, जो पंद्रहवीं लोकसभा में बढ़ कर दोगुनी से अधिक हो गयी है। पिछले पांच वर्ष में कई सांसदों की आय में वृद्धि हजार-दो हजार प्रतिशत से अधिक हुई है। क्या करोड़पति सांसदों में से कोई इस वेतन वृद्धि को स्वीकार न कर एक उदाहरण प्रस्तुत करेगा? विजय माल्या के लिए प्रतिमाह अस्सी हजार या पचास हजार रुपये का कितना महत्व है? सांसदों की वेतन वृद्धि के संबंध में सबकी राय लगभग एक समान और चिंताजनक है। सांसदों को प्राप्त होने वाला प्रति किलोमीटर सोलह रुपये यात्रा भत्ता कहां से जायज है? क्या प्रति किलोमीटर यह यात्रा भत्ता अन्य किसी सेवा में प्राप्त होता है? अमेठी के कांग्रेसी सांसद संजय सिंह राज परिवार के हैं, पर क्या उनके लिए सांसदों का अस्सी हजार रुपये वेतन सही है।
कई कांग्रेसी सांसदों के अनुसार अस्सी हजार वेतन भी कम है। सांसदों को सर्वाधिक सुविधाएं प्राप्त हैं। उनसे सभी सुविधाएं लेकर प्रतिमाह उनका वेतन दो-चार लाख रुपये किया जाना चाहिए। सांसदों ने अब अपने को जनसेवक न समझ कर सरकारी नौकरों की श्रेणी में ला खड़ा किया है। वे महंगाई के प्रश्न पर संसद में समानांतर सरकार का गठन नहीं करते। सुप्रीम कोर्ट की सलाह के बाद भी कृषि मंत्री शरद पवार मुफ्त में गरीबों के बीच अनाज के वितरण के पक्ष में नहीं हैं। अनाज तब सड़ता है जब व्यवस्था सडऩे लगती है।
सांसद अक्सर देश में गरीबी रेखा की बात करते हैं, लेकिन खुद को अमीर बनाने का कोई मौका नहीं छोड़ते। महीने का खर्चा प्रति सांसद साढ़े तीन लाख रुपये हो गया है, मगर सांसदों को संतोष नहीं, उन्हें और चाहिए। सरकारी नौकरशाह रहे मनमोहन सिंह ने पहली बार प्रधानमंत्री बनते ही सरकारी बाबुओं, नौकरशाहों, अध्यापकों आदि का वेतन बढ़ाकर 90 हजार रूपये तक कर दिया। यात्रा, आवासीय भत्ते, पेंशन आदि को भी बढ़ा दिया गया। तब अम्बिका सोनी, पवन बंसल या किसी और ने चूं नहीं किया था।
एक पूर्व वामपंथी सांसद का कहना है कि नकल करके किताबें लिखकर बहुत से लोग प्रोफेसर हो गये हैं, उनका वेतन 90 हजार रूपये यदि जायज है, यह मनमोहन सरकार उनको यदि कुल मिलाकर 90 हजार रूपये माहवारी दे रही है तो सांसदों को इतना वेतन देने में परेशानी क्यों? सभी सांसद तो उद्योगपति ,स्कूलपति, अस्पताल पति उनके अघोषित लाइजनर तो हैं नहीं, सो सांसदों को वेतन सचिवों से एक रूपया अधिक मिलना ही चाहिए। संसद सदस्यों ने अपना वेतन तीन गुना बढ़वा लिया और छह लाख रुपए महीने के खर्चे का पात्र बनने के बावजूद उनकी लड़ाई जारी रही।
लड़ाई का मुख्य कारण हैं कि सांसदों के अनुसार उन्हें जनता ने चुना है और जनता की ओर से वे देश के मालिक हैं इसलिए उनका वेतन भारत के सबसे बड़े अफसर कैबिनेट सचिव से कम से कम एक रुपए ज्यादा होना चाहिए। कैबिनेट सचिव को अस्सी हजार रुपए महीने मिलते है। जबकि देश की अस्सी फीसदी आबादी की पारिवारिक आमदनी मात्र छह सौ रुपए महीने है। गरीबी की सीमा रेखा के नीचे जो लोग रह रहे हैं और जो भूखे सो जाने के लिए अभिशप्त हैं उनकी गिनती तो छोड़ ही दीजिए। उस पर तो हमारे ये माननीय सांसद खुद ही हंगामा कर के संसद का समय बर्बाद करते रहेंगे।
सांसदों का यह भी कहना है कि अगर बेहतर सुविधाए मिलेंगी और अधिक वेतन मिलेगा तो ज्यादा प्रतिभाशाली लोग राजनीति में आएंगे। यह अपने आप में अच्छा खासा मजाक हैं। सिर्फ लोकसभा के 162 सांसदों पर आपराधिक मुकदमें चल रहे हैं जिनमें से 76 पर तो हत्या, चोरी और
अपहरण जैसे गंभीर मामले चल रहे हैंं। इन्हीं आंकड़ों के अनुसार चौंदहवीं लोकसभा में 128 सांसदों पर आपराधिक मामले थे जिनमें से 58 पर गंभीर अपराध दर्ज थे। जाहिर है कि प्रतिभाशाली नहीं, आपराधिक लोग संसद में बढ़ रहे हैं और उन्हें फिर भी पगार ज्यादा चाहिए।
भारतीय संविधान में सांसदों को यह अधिकार दिया गया है कि वे बहुमत के बल पर जो चाहे निर्णय कर सकते हैं। वह चाहें तो अपने वेतन और भत्ते आदि में भी बढ़ोतरी करवा सकते हैं। वैसे भी इनके वेतन भत्तों के विरोध में जितनी भी आवाजें सामने आ रही हैं वे वास्तविक कम और दिखावा ज्यादा हैं। विरोध करने वालों में वे लोग भी शामिल हैं जो स्वयं अपने पेशे में उनसे ज्यादा वेतन पाते हैं या पाने के लिए लालायित रहते हैं। देश के मौजूदा वातावरण और व्यवस्था में हर कोई यही सामान्य तर्क देता नजर आ रहा है कि जिस प्रकार खर्च बढ़े हैं उसमें एक सांसद को इतना वेतन और भत्ता तो मिलना ही चाहिए ताकि वह जनता की उम्मीदों के अनुरूप अपने दायित्वों का ईमानदारीपूर्वक निर्वहन कर सके। यदि उसे पर्याप्त वेतन और सुविधाएं नहीं मिलेंगी तो वह अपने दायित्वों का ठीक प्रकार से निर्वहन नहीं कर पाएगा। यह तर्क भी पहली नजर में बिल्कुल सही लगता है कि केंद्र सरकार के एक सचिव का वेतन यदि 80 हजार है तो माननीय संासदों का उससे कम क्यों होना चाहिए? आखिर एक सांसद की श्रेणी सचिव से ऊपर तो होनी ही चाहिए। चरणदास महंत की अध्यक्षता वाली समिति ने इसी के मद्देनजर सांसदों का वेतन 80,001 रुपया प्रतिमाह करने की संस्तुति किया। सांसदों के वेतन भत्ते बढ़ाए जाने के विरुद्ध जो कुछ कहा जा रहा है, वह इतने सामान्य हंैं कि तर्क की कसौटी पर ज्यादा देर नहीं ठहरते। मसलन, ऐसे सांसदों की संख्या बहुत ज्यादा है जो स्वयं कई व्यवसाय करते हैं या ऐसे पेशे से जुड़े हैं जिनसे उन्हें मोटी कमाई होती है। किंतु, ऐसे भी सांसद हो सकते हैं जो किसी व्यवसाय या पेशे से जुड़े नहीं हैं। इस तर्क के आधार पर तो हम भविष्य में केवल राजनीति को सर्वस्व मानकर सांसद बनने वालों के लिए कठिन स्थिति पैदा कर देंगे।
इस प्रकार के तर्को द्वारा आप संासदों को उनके सम्मान और जिम्मेवारी के अनुरूप वेतन-भत्ते और सुविधाएं पाने को गलत नहीं ठहरा सकते। वैसे भी, लोकसभा का एक सांसद औसत रूप से लगभग 14 लाख मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करता है। यह एक आम अनुभव है कि ज्यादातर सांसदों के यहां आने वालों का तांता लगा रहता है और उन्हें उनकी मदद भी करनी पड़ती है। इतना व्यापक जन संपर्क बनाए रखना ही भारी खर्च का काम है। ऐसा तो है नहीं कि बढ़ी हुई महंगाई केवल हमारे लिए है सांसदों के लिए नहीं। पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने यही तर्क तो दिया कि कुछ लोग हैं जिनके पास कई तरह के धन हैं, लेकिन ज्यादातर लोग ऐसे हैं भी है जिनको वेतन-भत्तों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। इस प्रकार सामान्य दृष्टि से सांसदों के वेतन-भत्तों में बढ़ोतरी सही नजर आती है। लेकिन जरा दूसरे नजरिये से देखिए। सांसद राजनीति में क्यों आते हैं? उनका सरोकार क्या है? वास्तव में इसके लिए गठित चरणदास महंत समिति द्वारा दूसरे देशों के सांसदों के वेतनमानों से तुलना करने की कसौटी ही गलत थी। इसी तरह अपने देश में सचिवों से सांसदों की तुलना भी उचित नहीं है। सचिव तो सरकारी नौकर हैं, उनके वेतन से तुलना का कोई औचित्य ही नहीं है। दुनिया के दूसरे कई देशों और भारत की राजनीति पृष्ठभूमि में भी अंतर है। वस्तुत: ये दो कसौटियां ही यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि हमारी राजनीति कहां से निकलकर कहां आ चुकी है।
भारत में राजनीति पेशा नहीं, जनसेवा का माध्यम मानी गई है। आजादी की लड़ाई या फिर बदलाव के आंदोलनों की पृष्ठभूमि से आए नेताओं की एक स्थापित परंपरा हमारे यहां है। उस श्रेणी के जो भी नेता इस समय संसद में होंगे वे कतई अत्यधिक वेतन-भत्ते और सुविधाओं को उचित नहीं ठहरा सकते। हमारे देश में ऐसे भी उदाहरण हैं जब राजनेता अपने पद को मिलने वाले वेतन का बड़ा हिस्सा देश के खजाने में वापस कर देते थे। यह थी राजनीति के पीछे की भावना। उनके सामने केवल देश होता था, देश के आम नागरिक होते थे, अपनी सुख-सुविधा उनके लिए मायने नहीं रखती थी। कोई सचिव यानी सरकारी अधिकारी कैसे एक जनसेवी के समकक्ष माना जा सकता है! इस प्रकार की तुलना केवल और केवल राजनीतिक मनोविज्ञान के पतन का सुबूत है। अगर वेतन एवं धनबल के आधार पर तुलना करनी है तो फिर सांसदों को सबसे ज्यादा वेतन लेने वाले कारोबारियों से भी ज्यादा मिलना चाहिए। आखिर एक कारोबारी को, चाहे वह कितना संपन्न क्यों न हो, हमारे संविधान ने एक सामान्य नागरिक के समान ही अधिकार दिया है, जबकि सांसदों को विशिष्ट अधिकार हैं। महात्मा गांधी के पास तो कौड़ी की भी संपत्ति नहीं थी, किंतु राष्ट्रपिता का दर्जा उन्हें ही मिला। जब राजनीति करने सरोकार बदल जाए तो फिर किसी राजनेता के लिए गांधी मानक नहीं हो सकते हैं। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद जैसे राष्ट्रपति उनके लिए आदर्श नहीं हो सकते, जो अपने लिए निर्धारित वेतन से ज्यादा का हिस्सा वापस कर देते थे। तब एक राजनेता या जनसेवी के लिए अत्यधिक खर्च पाप माना जाता था। ऐसे लोगों का राजनीति में सम्मान नहीं था। धीरे-धीरे राजनीति और उसके द्वारा पोषित अर्थव्यवस्था ने सारे पुराने मानक धराशाई कर दिए। आज तो जिसके पास जितनी अधिक सुख-सुविधाएं हैं, जितनी विलासिता है, जितनी संपत्ति है, उसे उतना ही ज्यादा सम्मान मिल रहा है। ये मानक भी हमारे नेतृत्व वर्ग का ही बनाया हुआ है। यही वर्ग है, जिसने देश के बहुसंख्य आम आदमी की आय की चिंता किए बगैर सरकारी कर्मचारियों का वेतन बेतहाशा बढ़ा दिया। जिस देश की करीब 40 प्रतिशत आबादी अपनी न्यूनतम आवश्यकताएं भी पूरी नहीं कर पा रही हों, वहां एक सचिव का वेतन 80 हजार क्यों होना चाहिए? हालांकि न हमारे प्रधानमंत्री ही धनपति हैं और न कोई पूर्व प्रधानमंत्री ही इस श्रेणी के थे, पर आम मानक आज यही हो चुका है। इसलिए सांसदों को 50 हजार का वेतनमान, 45 हजार का क्षेत्र भत्ता, इतना ही कार्यालय भत्ता आदि भी कम लगता है। अगर वे भारतीय राजनीति के स्त्रोत को कसौटी बनाते तो निश्चित ही निष्कर्ष दूसरा आता। विडंबना देखिए कि वेतन भत्तों के लिए हंगामा करने वालों में वे लोग सबसे ज्यादा थे, जिनका आविर्भाव जयप्रकाश आंदोलन से हुआ है। उस आंदोलन का तो लक्ष्य ही राजनीति को आडंबरों से मुक्त कर उसे जनसरोकारों से जोडऩा था। यह इस बात का प्रमाण है कि हमारी समूची राजनीति का कितना क्षरण हो चुका है।

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